Saturday, November 27, 2010

रविवार

एक टीचर की जिन्दगी मे रविवार का क्या महत्व है यह बताने की जरुरत नही है पूरे हफ्ते की अकादमिक गतिविधियों के बाद संडे फुल रेस्ट का दिन होता है मै इस दिन अपनी रुटीन लाईफ के क्रम को तोडता हूं मसलन सुबह उठ कर नहा-धो कर अपटूडेट होने की बजाए औघड बना रहता हूं केवल शौच आदि से ही निवृत्त होता हूं फिर बिना मंजन कुल्ला किए ही नाश्ता चरता हूं फिर सारा दिन यूं ही बेतरतीब पडा रहता हूं बिना नहाए धोए ही और आजकल सर्दीयां है तो मैने सुबह से अपनी केचुली (रजाई) नही उतारी है पत्नि कई बार टोकती रहती है लेकिन आज के दिन मै ढीट बना रहता हूं कोई ज्यादा ही आवश्यक काम न हो तो मै आज घर से बाहर भी नही निकलता हूं।
वैल रुटीन टाईप की जिन्दगी की नीरसता मे कुछ इस प्रकार के प्रयोग बेहद जरुरी होतें है तभी ज़िन्दगी मे चटखारा बना रह पाता है अन्यथा बहुत से लोग है जो सब कुछ प्लानिंग के साथ जीते है खाने पीने से लेकर सोने तक का सब टाईमिंग फिक्स होता है अपने बस की तो है नही ऐसी स्किल्ड फुल लाईफ बस थोडी फक्कडी मे और थोडी सांसारिक दिनचर्या मे वक्त बीत जाए बस यही तमन्ना है।
आजकल मेरे साथ छोटा भाई भी रह रहा है उसका आगामी 5 दिसम्बर मे दिल्ली मेट्रो की जेई की एक परीक्षा है उसी की तैयारी कर रहा है उसने अपनी टेलीकम्यूनिकेशन की जाब को फिलहाल अलविदा कह दिया है वह सरकारी मुलाज़िम बनने की फिराक मे है प्राईवेट सेक्टर की कार्यशैली और शोषणपरक प्रवृत्तियों से आज़िज आ कर उसने यह फैसला किया है कुछ भी हो तमाम खामियों के बाद सरकारी नौकरी मे सुकून तो है ही...।
जब मै घोर आर्थिक तंगी से गुजर रहा था तब मैने उससे लगभग 10-12 हज़ार रपये की आकस्मिक मदद ली थी लेकिन ये बडे अफसोस की बात है कि आज जब उसे अपने जेबखर्च के लिए धनराशि की जरुरत है तब मेरे पास उसको देने के लिए एक फूंटी कौडी भी नही है ये बात सोचकर मै दिन मे कई बार अपराधबोध और आत्मग्लानि से भर जाता हूं बडा भाई होने के बावजूद भी मै उससे उसकी जरुरतों के बारे मे बात करने से परहेज़ करता हूं क्योंकि मेरा बजट पहले से ही ओवर ड्राफ्ट चल रहा है,हालांकि वह अपनी ज़बान से कभी कुछ नही मांगेगा लेकिन मै उसकी जरुरत अच्छी प्रकार से जानता हूं लेकिन क्या करुं मजबूर हूं कई बात ये इरादा किया कि एकमुश्त उसे दस हजार रुपये दे दूं ताकि वह इस मुश्किल वक्त मे अपनी बुनियादी जरुरतें पूरी कर सकें लेकिन कभी ऐसा हो ही नही पाया मुझसे जो बडे ही अफसोस की बात है।
तो कुल मिलाकर इन दिनों इसी ऊहापोह मे टाईम पास हो रहा है रोज़ाना कुछ नया एवं सार्थक करने की धुन मे उठता हूं लेकिन अंत मे लौटकर स्वयं को वही शून्य पर खडा पाता हूं विदेश जाने का प्रोजेक्ट भी अभी ठंडे बस्ते मे पड गया है कई बार लगता है अभी समय अनुकूल नही है तो कई बार ऐसा भी लगने लगता है कि मेरे प्रयासों की ऊर्जा ही इतनी संगठित किस्म की नही है कि मुझे सफलता मिल सकें जिसकी एक प्रमुख वजह मेरी जटिल पारिवारिक पृष्टभूमि भी हैं...।
आज के लिए इतना ही शेष फिर...
डा.अजीत

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