Thursday, November 25, 2010

शायरी दोस्ती की...

मैने कही पर पढा था कि रिश्तें होतें है शायरी की तरह...बात बडे काम की कही है किसी शायर ने...जब मै बी.ए. मे पढता था तब तक मुझे शायरी से एक खास तरह की चिढ थी और गजल सुनना तो एक दम बकवास लगता था,मै तब यह सोचता था कि शायरी केवल मुहब्बत की ज़बान मे बात करती है और इसमे माशूका और महबुब की ही ख्यालात होतें है लेकिन जैसे ही मै एम.ए.करने के लिए हरिद्वार मे आया तब मेरा छात्रावास मे परिचय हास्टल के एकमात्र साहित्य प्रेमी अभिषेक यादव से हुआ देखने मे सामान्य कद काठी का और एकांतवासी बंदा था और कुछ जरुरत से ज्यादा औपचारिक रुप से शिष्टाचारी भी यह बात स्वीकार करने मे मुझे कतई संकोच नही होता है कि मेरे शब्दकोश में धन्यवाद शब्द यदि शामिल हो पाया तो इसमे अभिषेक यादव का सबसे बडा योगदान है। बात केवल धन्यवाद तक ही सीमित नही है अभिषेक यादव ने मुझे शायरी के सलीके से रुबरु कराया और ज़िन्दगी जीने का मकसद से भी उनके खजाने मे बेहतरीन किस्म का शेर हमेशा मौजूद रहते थे और वें भी बिल्कुल समसामयिक,प्रासंगिक और सारगर्भित।

फिर इसके बाद शायरी और गज़लगोई का ऐसा चस्का लगा कि आज तक नही छूटा और अब तो मै भी कुछ टूटे फूटे शेर और गज़ल कह लेता हूं वो बात अलग है कि मेरा अन्दाज़-ए-ब्याँ बढिया नही है।

जनाब बशीर बद्र से लेकर डा.राहत इन्दौरी,प्रो.वसीम बरेलवी,मुनव्वर राणा,डा.नवाज़ देवबन्दी जैसे मशहूर शायरों के बेहतरीन ख्यालों को पढने का अवसर और चस्का सब अभिषेक यादव जी की ही देन है। जब हम मित्र लोग अभिषेक यादव से कौतुहलवश यह पूछते कि आपको इतने मौजूं शेर कैसे याद रह जाते है तो उनका यही जवाब होता था कि आप शायरी पढते है मै जीता हूं और वही शेर याद रख पाता हूं जिसको अपनी असल जिन्दगी मे अमल मे ला सकूं और वास्तव मे ऐसा ही था।

जब मैने भी कुछ बेहतरीन किस्म के शेर याद रखने की कोशिस तो यही हुआ जो दिल के करीब थे वही शेर याद रह पाये बाकि सब पढने के बाद ही भूल जाते थे...। एक बार महफिल मे अभिषेक ने मेरी शायरी के अनुराग पर चुटीला जुमला कसते हुए कहा था कि डाक्टर साहब यू आर ए गुड कलेक्टर....लेकिन शायरी जीने किसे कहते है यह अभी तक नही सीख पाये हो...।

अंग्रेजी बोलने मे निष्णात होने के बावजूद भी अभिषेक जी प्राय: शुद्द हिन्दी मे ही बात करते थे जबकि उनकी सारी शिक्षा कान्वेंट स्कूल की थी सेंट जेवियर से पढे हुए थे लेकिन हिन्दी से असीम अनुराग रखते थे और यदि मै ये कहूं कि हिन्दी,अंग्रेजी,ऊर्दू और संस्कृत इन चारो भाषाओं पर उनका समान अधिकार था तो कोई अतिश्योक्ति न होगी लेकिन वे प्रयोग हमेशा हिन्दी ही करते थे।

आज जब अपने विश्वविद्यालय मे आचार्य वर्ग को अंग्रेजी भाषा की मानसिक गुलामी करते हुए देखता हूं तो बडा दुख होता है क्योंकि उनके लिए अंग्रेजी भाषा मे बातचीत करना स्टेट्स सिम्बल बन गया है चाहे सामने वाला अंग्रेजी बोलने और समझने मे असमर्थ क्यों न हो वें ऐसा कोई मौका हाथ से नही जाने देना चाहते है जहाँ वे अपनी अंग्रेजी बोलने के अर्जित कौशल का भौंडा प्रदर्शन कर सकें।

ऐसे मे मुझे फिर से अभिषेक का सुनाया एक शेर याद आ रहा है, जोशे-दरियां से कह रहा है समन्दर का सकूँ,जिसमे जितना जर्फ हैं वो उतना ही खामोश हैं... अभिषेक के अंग्रेजी भाषा के ज्ञान के मामले मे भी इतना ही जर्फ था वह कभी भी अपने नंबर बनाने के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग नही करता था बल्कि इतनी शुद्द हिन्दी मे बात करता था कि कोई यह अन्दाजा भी नही लगा सकता था कि वह बेहतरीन और क्लासिक किस्म की अंग्रेजी बोलना भी जानता है...।

दुख की बात यह है कि हमारे ग्रुप का परमानेंट मोटिवेटर अभिषेक यादव आज खुद गर्दिश मे जी रहा है जिसकी वजह से बेहद अशांत और चिढ-चिढा भी हो गया है कभी लकीर का फकीर और जबान का पक्का जैसे तमगो से नवाज़ा गया यारों का यार अभिषेक अब उस डगर का पथिक है जिसका रास्ता किसी मंजिल की तरफ नही जाता है मतलब एक तयशुदा मौत का इंतजार...और मै और मेरे जैसे उसके बहुत से चाहने वाले बेबस और लाचार होकर उसकी बर्बादी का तमाशा देख रहें है...। सभी हैरान है और परेशान भी।
अब उससे न कोई संवाद होता है और न भविष्य मे मिलने की कोई उम्मीद है बस एक दुआ हमेशा करता रहता हूं कि ईश्वर उसको इतनी ताकत दे कि वो अपनी कश्ती को तूफान से सही सलामत निकाल कर साहिल पर ला सकें क्योंकि उसका होना हमारे लिए एक बहुत बडा हौसला है उसका वजूद का व्यक्तिगत महत्व है और उसकी जीवन से हार एक ऐसी निराशा का हम सब के अवचेतन मे भर देंगी जिसका उपचार दूनिया का कोई मनोवैज्ञानिक नही कर सकता है।
हमारी लाचारी और बेबसी के बीच उसको वो हौसला मिलें जिससे वो फिर से बहुत से बुझे हुए दिलों मे आत्मविश्वास की रोशनी पैदा कर सके जैसा वो अक्सर करता भी था और चमत्कार हो जाया करेते थें...कुछ ऐसा ही चमत्कार उसकी असल ज़िन्दगी मे भी हो बस यही दुआ है...। ईश्वर उसकी मदद करे...और मेरी भी...आमीन।
डा.अजीत

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