Wednesday, November 24, 2010

आजकल

कल और आज मैने अपने कुछ पुराने पडे कामो को निबटाया जिसमे बच्चे का चश्मा ठीक करवाने से लेकर सिलेंडर लाने तक के कुछ काम सम्मलित है। अभी अभी शाम को एक पुराने मित्र के साथ एसएमएस बाजी हुई उसे आजकल मेरी छोटी से छोटी बात भी तंज लगती है फोन पर संवाद तो कब का बंद हो चूका है बस कभी कभी जब मेरे अन्दर उसके साथ गुजारे कुछ पुराने लम्हों की कसक उठती है तब बरबस ही मेरे हाथ एसएमएस के लिए मचलने लगते है और हर बार की तरह मै अपनी ढीटता की सीमा का अतिक्रमण करता हुआ उसको एक छोटा एसएमएस भेज ही देता हूं जबकि मेरे एक अन्य पूर्व मित्र ने मुझे चेताया भी था कि मेरा कोई भी एसएमएस या काल उसके लिए जानलेवा साबित हो सकती है बावजूद इसके भी मै अपनी इन ओछी हरकतो से बाज़ नही आता हूं....रिश्तों को घसीटना और इनमे घिसटने की मुझे पुरानी लत है। हर बार उसके स्पष्ट और तल्ख एसएमएस के बाद ये संकल्प लेता हूं कि अब मै उससे दोबारा हालचाल जानने के लिए भी न काल ही करुंगा और न ही एसएमएस लेकिन पता नही क्या कीडा है मेरे अंदर कुछ दिन बीतने के बाद ही मै फिर से अपनी औकात पर आ ही जाता हूं।

मेरे शुभचिंतक और पूर्व के मित्र ने तो मेरी इस तरह की हरकत को सनकी की संज्ञा दे डाली थी...जो किसी के लिए भी जानलेवा साबित हो सकता हूं...।

बस इन सब बातों के बीच मे मुझे केवल यह कहना है कि मै एक अतीत व्यसनी बन्दा है और सुनहरे अतीत को एक पल मे विस्मृत करके एक झटके से तथाकथित परिपक्व और प्रेक्टिकल लाईफ नही जी सकता हूं...कई बार अपने आप को बदलने की कोशिस कर चूका हूं लेकिन मन के संवेदना को नही बदल पाया हूं। प्रथम दृष्टया मेरा इस प्रकार का व्यवहार किसी भी सामान्य जन को सनकी किस्म का प्रतीत हो सकता है लेकिन इसमे कोई सनक निहित नही है ये बस एक प्रकार के मैत्री से उपजी मे हितचिंता होती है प्राय: जिसके अर्थ अन्यथा लिए जाते रहें हैं।

बहरहाल मै अद्वैत मे जी रहा हूं अब अपेक्षा का स्तर भी घट गया है हाँ! जिन्दगी कुछ ऐसे कडवे किस्म के तज़रबे जरुर दिए है जिसकी वजह से मन अपने आप का ही बैरी बना बैठा है और कभी भी खीझ भी पैदा होती मन के अन्दर...लेकिन अब फिर भी बहुत कुछ सामान्य हो गया है। एक शेर के साथ विराम लेता हूं शायद आप को अच्छा लगे...।

अर्ज़ किया है:-

हम ऐसे पेड हैं जो छाँव बाँट कर अपनी

शदीद धूप मे खुद साये को तरसते हैं...। (दाराब बानो वफ़ा)

डा.अजीत

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