Friday, December 17, 2010

आरटीआई









पी.एच.डी. बनाम नेट: एक राहत भरी खबर

पहली बार इस ब्लाग के निज़ाज से अलग किस्म की पोस्ट प्रकाशित कर रहा हूँ अभी तक आपने मेरी निजी गालबजाई पढी होगी जिसमे मेरे असामाजिक किस्म के जीवन का रोजनामचा होता है वह भी नितांत की व्यक्तिगत किस्म का...। इस बार जो जिक्र महफिल मे आया है वो थोडा मेरा निजी है और बहुत सारा सभी का जो मेरे जैसे ही भाई-बन्धु है तथा उच्च शिक्षा की व्यवस्थागत खामियों के चलते प्रतिभाशाली होने के बावजूद भी तदर्थ और अंशकालिक जैसे विशेषणों के साथ मास्टरी करने को मजबूर है...उस पर यूजीसी का तुर्रा यह कि वो अपने सेवा शर्तों मे हर तीसरे महीने कुछ न कुछ बदलाव करके एक अजीब सा मज़ाक हमारे साथ करती रहती है और मज़ाक भी ऐसा कि कभी कहती है कि हम मास्टरी के लिए सर्वथा पात्र हैं तो कभी कुछ शिक्षाविदों की संस्तुतियों पर अपात्र बता कर बाहर का रास्ता दिखा देती है...बडी ही दुविधा और असमंजस के हालात हैं भईया...!

जनाब मसला यह है कि पिछले कुछ महीनों से यूजीसी ने विश्वविद्यालय और महाविद्यालों मे शिक्षक बनने की पात्रता मे कुछ बदलाव करने की कसरत की है और यूजीसी के नये रेगुलेशन की भाषा शैली बडी ही अस्पष्ट किस्म है जिसे पढकर यह प्रतीत होता है कि अब उच्च शिक्षा के क्षेत्र मे शिक्षक बनने के लिए यूजीसी नेट पास होना अनिवार्य है। यह खबर मेरे जैसे पी.एच.डी उपाधिकारक के लिए निराशाजनक थी और मेरे नेट पास मित्रों के लिए उत्साहजनक क्योंकि उन्हें लगा कि अब पी.एच.डी/एम.फिल. वालो की भीड छँट जाएगी और वे सरकारी मुलाज़िम बनकर व्यवस्था परिवर्तन कर देंगे।

बहरहाल हुआ यह है कि यूजीसी द्वारा इन नये रेगुलेशनस के सन्दर्भ में प्रो.एस.पी.त्यागराजन की अध्यक्षता मे एक विसंगति समिति का गठन किया गया जिसकी अनुशंसा पर यूजीसी ने अपनी मीटिंग संख्या 472 मे इस आशय का प्रस्ताव पास किया है जिसमे 31 दिसम्बर 2009 तक के पी.एच.डी./एम.फिल उपाधि धारक तथा 10 जुलाई 2009 तक के सभी पंजीकृत पी.एच.डी./एम.फिल उपाधि छात्र अब नेट पास होने की अनिवार्यता से मुक्त होंगे। यह एक बडी ही राहत देने वाली खबर है वरना हमारी सांसे अटकी हुई थी। मुझे इस खबर के बारे मे पहले चैन्नई के एक मित्र ने बताया था तब मैने इसकी पुष्टि करने के यूजीसी मे एक आर टी आई दाखिल की थी जिसका जवाब अभी तीन दिन पहले मुझे मिला है जिसमे यूजीसी ने आधिकारिक रुप से मुझे यह सूचना दी है कि यूजीसी के द्वारा यह निर्णय लिया जा चुका है और अभी मानव संशाधन विकास मंत्रालय के पास एप्रुव्ल के लिए गया हुआ है जैसे ही इसका एप्रुव्ल होगा इसका नोटिफिकेशन होना संभावित है।

चूंकि थोडा बहुत मै भी व्यवस्था का सताया हुआ हूँ इसलिए अपने विश्वविद्यालय मे थोडी बहुत मेरी छवि खबरिया चैनल की भाषा मे कहूँ तो आरटीआई मामलो के जानकार की बन गई है सो मैने अपने इसी हथियार का प्रयोग एक सद्कार्य के लिए किया है जो लाखों आशावादी पढे लिखे बेरोजगारो के भविष्य से जुडा हुआ है। यह सूचना मिलने पर मैने यह नही सोचा था कि मै इसे अखबार मे प्रकाशित करवाउंगा लेकिन मेरी मित्र मंडली मे मास्टर कम है पत्रकार ज्यादा सो यूं ही बातों बातों मे अपने पत्रकार एवं मास्टर मित्र डा.सुशील उपाध्याय से इसका जिक्र कर बैठा,उपाध्याय जी अभी लगभग छ महीने पूर्व ही विश्वविद्यालय मे असिस्टैंट प्रोफेसर नियुक्त हुए है इससे पहले हिन्दुस्तान अखबार मे वरिष्ठ उप सम्पादक/रिपोर्टर थें और उत्तराखण्ड मे शैक्षणिक मामलो की खबरों के मामले मे उनका कोई सानी नही था उच्च शिक्षा के मसलो पर एक गज़ब की समझ एवं विजन उनके पास हमेशा रहा है उनकी बाई लाईन खबरें अक्सर अखबार के आल एडिशन की शोभा बढाती रही है सो उनका पत्रकार मस्तिष्क सक्रिय हो गया और पूरी बातचीत के दौरान उन्होनें मुझे यह कतई आभास नही होने दिया कि यह खबर कल के अखबार मे छपने वाली है।

अगले दिन के दैनिक जागरण के आल एडिशन मे यह खबर प्रकाशित हुई और वो भी बेहद सटीक ढंग से तब से लेकर अभी तक मेरे पास लगभग पचास फोन आ चूके है पता नही इतने लोगो को मेरा मोबाईल नम्बर भी कहाँ से मिला...! यह जानकार मै थोडा उत्साहित हूँ थोडा रोमांचित और थोडा सा चिंतित भी....। चिंतित इस बात के लिए कि मेरे जैसे कितने और बहुत से भद्र पुरुष है जो व्यवस्था की कमियों से ये सब पीडा झेल रहें है।

खैर! सभी का आग्रह यही था कि उन्हें भी इस आरटीआई की एक छायाप्रति मिल जाती तो बेहतर रहता बात जायज़ भी है लेकिन सभी को इसकी प्रति भेजना मेरे लिए संभव नही है सो इसके लिए यह बीच का रास्ता निकाला है कि मैं उस रिपोर्ट का वह भाग जिसमे एम.फिल./पी.एच.डी का जिक्र हुआ उसकी एक स्कैन कापी अपने इस ब्लाग पर प्रकाशित कर रहा हूँ कृपया जिसे भी इससी आवश्यकता हो वो इसे यहाँ से कापी करके प्राप्त कर सकता है मै तो यही चाहता हूँ कि सबका भला हो...।

यदि कापी करने मे कोई दिक्कत आ रही हो तो मुझे नीचे लिखे ई मेल से बताने का कष्ट करें मै इसकी एक पीडीएफ फाईल मेल के माध्यम से भेज दूंगा।

आप सभी के प्यार,सम्मान और आग्रह के लिए तहे दिल से शुक्रिया... ये मेरा सौभाग्य है कि यदि मै आपके किसी काम आ सका।

उम्मीद करता हूं कि संवाद बना रहेगा।

शेष फिर

(अगली पोस्ट मे सारी स्कैन कापी आरटीआई की है जो पी.एच.डी/एम.फिल से सम्बन्धित हैं)

डा.अजीत

dr.ajeet82@gmail.com

Sunday, December 12, 2010

नो प्राब्लम: एक मुश्किल आसान हुई

आज का दिन कुछ खास है खास इस वजह से है कि आज नो प्राब्लम की वजह से हमारी एक प्राब्लम समाप्त हो गई है। आपको शायद यह सुनकर थोडा आश्चर्य हो कि आज तक मेरी पत्नि ने सिनेमा हाल मे एक भी फिल्म नही देखी थी जबकि वो पिछले तीन साल से तो मेरे साथ ही हरिद्वार शहर मे रह रही है पहले गांव मे रहती थी। मैने अभी तक कितनी फिल्में सिनेमा हाल मे देखी है इसकी गणना करनी तो थोडी मुश्किल है लेकिन मेरी पत्नि ने आज अपने जीवन मे पहली बार सिनेमा हाल मे फिल्म देखी, मैने बहुत दिन पहले से ही यह तय किया हुआ था कि मैं इस बार बच्चों को फिल्म दिखाने ले जाउंगा जैसे ही सेलरी आई मेरे अरमानो को और पंख लग गये और जब मैने पत्नि से इस बाबत चर्चा की तो उसने भी सहमति प्रदान कर दी हालांकि वो अभी तक मेरे किसी भी आउटिंग के प्रोग्राम को खारिज़ करती आ रही है वजह साफ है उसे मेरी जेब का कुछ जरुरत से ज्यादा ही ख्याल रहता है एक और राज़ की बात आज बता दूं कि मेरी पत्नि शायद दूनिया की सबसे कम फरमाईश रखने वाली पत्नि होगी हमेशा बुद्दत्व मे जीती है भौतिक संसाधनो और आभूषणों के मामले मे एकदम अपेक्षा रहित..।

खैर! वो एक अलग दर्शन है जिसकी ज्यादा महिमामंडन करने की जरुरत नही है सबका अपना एक अलग ढंग होता है जिन्दगी जीने का....।

आज हमने सपरिवार जिसमे मेरा छोटा भाई भी शामिल है हिन्दी फीचर फिल्म नो प्राब्लम देखी यदि समीक्षक मन से कहूं तो एकदम बकवास और नानसेंस किस्म की कामेडी फिल्म है लेकिन आज वो ज्यादा महत्वपूर्ण नही है आज की खास बात बस यही है कि आज की तारीख मेरी पत्नि के जीवन मे एक ऐतिहासिक दिन के रुप मे दर्ज़ हो गई है अभी तक टी.वी. पर फिल्में देख कर संतोष करने वाली ने आज 70 एम.एम.को बडे परदे पर देख लिया है साथ ही हमारे कुल का सबसे कम उम्र का सिनेमा हाल देखने का रिकार्ड हमारे बेटे राहुल के नाम हो गया है।

मुझे उम्र तो ठीक से ध्यान नही है लेकिन मैने अपने जीवन की पहली हिन्दी फिल्म जो सिनेमा हाल मे देखी थी वो थी-हाथी मेरे साथी एक शादी से लौटते समय मैने बतौर रिश्वत यह फिल्म देखी थी क्योंकि मै उस शादी मे शामिल होने के कारण जो बस यात्रा मे मुझे असुविधा हुई थी उससे खासा खफा हो गया था (तब मुझे बस मे यात्रा करना कतई पंसद नही था कारण उल्टी की शिकायत थी) और मेरी इस नाराज़गी को दूर करने के लिए गांव के ही एक भाई ने मुझे शादी से लौटते समय यह फिल्म दिखाई थी।

आज का यह तारीखी दिन हमारे लिए कुछ खास बन गया है इसलिए मैने अपनी थमी हुई लेखनी को फिर से गति दी है रोजाना लिखना चाहता हूं लेकिन आजकल कुछ लिखने की इनर काल नही आती है सो यह विलम्ब हो रहा है और आप सबको तो पता ही है कि मैने बिना इनर काल के कुछ नही करता हूं...।

आज नो प्राब्लम ने मेरे जीवन की एक मुश्किल आसान कर दी है अब देखते है कि हम सपरिवार अगली कौन सी फिल्म सिनेमा हाल मे देखेंगे उसकी तब ही चर्चा करुंगा...।

अब एक विराम...

डा.अजीत

Thursday, December 2, 2010

पुरानी किताब से...

आज मुझे अपनी एक पुरानी किताब हाथ लग गई जो मैने एम.ए. मे खरीदी थी और शायरी की मेरी यह पहली किताब थी इसके बाद ही मुझे चस्का लगा शायरी पढने की और लिखने का भी...आज वही किताब फिर से मेरे सामने आ गई तो मेरे जेहन मे पुरानी यादें फिर से ताज़ा हो गई और मै फिर से एकबारगी से पुरी किताब पढ गया है शेर तो वही पुराने थे लेकिन इस बार तारीख बदल गई है सो पढ कर दिल को बहुत सुकून भी मिला...उसी किताब से कुछ शेर जो मुझे पंसद आये आपके साथ सांझा कर रहा हूं हो सकता है कि आपको भी ख्याल पसंद आये...।

जो कीडे रेंगते रहते हैं नालियों के करीब

वो मर भी जाएँ रेशम बना नही सकते...।(तश्ना आलमी)

हर एक बच्चा अदब करने लगा है

बुढापा मुझ पै शायद आ गया है....।(सय्यद सईद अख्तर)

अँगडाई भी वो लेने पाये उठा के हाथ

देखा तो मुझे छोड दिया मुस्करा के हाथ...।(निज़ाम रामपुरी)

हर एक आदमी उडता हुआ बगूला था

तुम्हारे शहर मे हम किससे गुफ्तगू करते...।(बाकी सिद्दीकी)

मेरी शोहरत का इश्तहार अभी

उसकी दीवार तक नही पहुंचा...।(अनवर हुसैन अनवर)

दुख मेरा देखो कि अपने साथियों जैसा नही

मैं बहादुर हूँ मगर हारे हुए लश्कर मे हूं....(रियाज़ मजीद)

हो चुकी जब खत्म अपनी ज़िन्दगी की दास्ताँ

उनकी फरमाइश हुए इसको दोबार कहें...।(शमशेर बहादुर सिंह)

नही आती जो याद उनकी महीनों तक नही आती

मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं....(हसरत मोहानी)

शेष फिर...

डा.अजीत

Saturday, November 27, 2010

रविवार

एक टीचर की जिन्दगी मे रविवार का क्या महत्व है यह बताने की जरुरत नही है पूरे हफ्ते की अकादमिक गतिविधियों के बाद संडे फुल रेस्ट का दिन होता है मै इस दिन अपनी रुटीन लाईफ के क्रम को तोडता हूं मसलन सुबह उठ कर नहा-धो कर अपटूडेट होने की बजाए औघड बना रहता हूं केवल शौच आदि से ही निवृत्त होता हूं फिर बिना मंजन कुल्ला किए ही नाश्ता चरता हूं फिर सारा दिन यूं ही बेतरतीब पडा रहता हूं बिना नहाए धोए ही और आजकल सर्दीयां है तो मैने सुबह से अपनी केचुली (रजाई) नही उतारी है पत्नि कई बार टोकती रहती है लेकिन आज के दिन मै ढीट बना रहता हूं कोई ज्यादा ही आवश्यक काम न हो तो मै आज घर से बाहर भी नही निकलता हूं।
वैल रुटीन टाईप की जिन्दगी की नीरसता मे कुछ इस प्रकार के प्रयोग बेहद जरुरी होतें है तभी ज़िन्दगी मे चटखारा बना रह पाता है अन्यथा बहुत से लोग है जो सब कुछ प्लानिंग के साथ जीते है खाने पीने से लेकर सोने तक का सब टाईमिंग फिक्स होता है अपने बस की तो है नही ऐसी स्किल्ड फुल लाईफ बस थोडी फक्कडी मे और थोडी सांसारिक दिनचर्या मे वक्त बीत जाए बस यही तमन्ना है।
आजकल मेरे साथ छोटा भाई भी रह रहा है उसका आगामी 5 दिसम्बर मे दिल्ली मेट्रो की जेई की एक परीक्षा है उसी की तैयारी कर रहा है उसने अपनी टेलीकम्यूनिकेशन की जाब को फिलहाल अलविदा कह दिया है वह सरकारी मुलाज़िम बनने की फिराक मे है प्राईवेट सेक्टर की कार्यशैली और शोषणपरक प्रवृत्तियों से आज़िज आ कर उसने यह फैसला किया है कुछ भी हो तमाम खामियों के बाद सरकारी नौकरी मे सुकून तो है ही...।
जब मै घोर आर्थिक तंगी से गुजर रहा था तब मैने उससे लगभग 10-12 हज़ार रपये की आकस्मिक मदद ली थी लेकिन ये बडे अफसोस की बात है कि आज जब उसे अपने जेबखर्च के लिए धनराशि की जरुरत है तब मेरे पास उसको देने के लिए एक फूंटी कौडी भी नही है ये बात सोचकर मै दिन मे कई बार अपराधबोध और आत्मग्लानि से भर जाता हूं बडा भाई होने के बावजूद भी मै उससे उसकी जरुरतों के बारे मे बात करने से परहेज़ करता हूं क्योंकि मेरा बजट पहले से ही ओवर ड्राफ्ट चल रहा है,हालांकि वह अपनी ज़बान से कभी कुछ नही मांगेगा लेकिन मै उसकी जरुरत अच्छी प्रकार से जानता हूं लेकिन क्या करुं मजबूर हूं कई बात ये इरादा किया कि एकमुश्त उसे दस हजार रुपये दे दूं ताकि वह इस मुश्किल वक्त मे अपनी बुनियादी जरुरतें पूरी कर सकें लेकिन कभी ऐसा हो ही नही पाया मुझसे जो बडे ही अफसोस की बात है।
तो कुल मिलाकर इन दिनों इसी ऊहापोह मे टाईम पास हो रहा है रोज़ाना कुछ नया एवं सार्थक करने की धुन मे उठता हूं लेकिन अंत मे लौटकर स्वयं को वही शून्य पर खडा पाता हूं विदेश जाने का प्रोजेक्ट भी अभी ठंडे बस्ते मे पड गया है कई बार लगता है अभी समय अनुकूल नही है तो कई बार ऐसा भी लगने लगता है कि मेरे प्रयासों की ऊर्जा ही इतनी संगठित किस्म की नही है कि मुझे सफलता मिल सकें जिसकी एक प्रमुख वजह मेरी जटिल पारिवारिक पृष्टभूमि भी हैं...।
आज के लिए इतना ही शेष फिर...
डा.अजीत

Thursday, November 25, 2010

शायरी दोस्ती की...

मैने कही पर पढा था कि रिश्तें होतें है शायरी की तरह...बात बडे काम की कही है किसी शायर ने...जब मै बी.ए. मे पढता था तब तक मुझे शायरी से एक खास तरह की चिढ थी और गजल सुनना तो एक दम बकवास लगता था,मै तब यह सोचता था कि शायरी केवल मुहब्बत की ज़बान मे बात करती है और इसमे माशूका और महबुब की ही ख्यालात होतें है लेकिन जैसे ही मै एम.ए.करने के लिए हरिद्वार मे आया तब मेरा छात्रावास मे परिचय हास्टल के एकमात्र साहित्य प्रेमी अभिषेक यादव से हुआ देखने मे सामान्य कद काठी का और एकांतवासी बंदा था और कुछ जरुरत से ज्यादा औपचारिक रुप से शिष्टाचारी भी यह बात स्वीकार करने मे मुझे कतई संकोच नही होता है कि मेरे शब्दकोश में धन्यवाद शब्द यदि शामिल हो पाया तो इसमे अभिषेक यादव का सबसे बडा योगदान है। बात केवल धन्यवाद तक ही सीमित नही है अभिषेक यादव ने मुझे शायरी के सलीके से रुबरु कराया और ज़िन्दगी जीने का मकसद से भी उनके खजाने मे बेहतरीन किस्म का शेर हमेशा मौजूद रहते थे और वें भी बिल्कुल समसामयिक,प्रासंगिक और सारगर्भित।

फिर इसके बाद शायरी और गज़लगोई का ऐसा चस्का लगा कि आज तक नही छूटा और अब तो मै भी कुछ टूटे फूटे शेर और गज़ल कह लेता हूं वो बात अलग है कि मेरा अन्दाज़-ए-ब्याँ बढिया नही है।

जनाब बशीर बद्र से लेकर डा.राहत इन्दौरी,प्रो.वसीम बरेलवी,मुनव्वर राणा,डा.नवाज़ देवबन्दी जैसे मशहूर शायरों के बेहतरीन ख्यालों को पढने का अवसर और चस्का सब अभिषेक यादव जी की ही देन है। जब हम मित्र लोग अभिषेक यादव से कौतुहलवश यह पूछते कि आपको इतने मौजूं शेर कैसे याद रह जाते है तो उनका यही जवाब होता था कि आप शायरी पढते है मै जीता हूं और वही शेर याद रख पाता हूं जिसको अपनी असल जिन्दगी मे अमल मे ला सकूं और वास्तव मे ऐसा ही था।

जब मैने भी कुछ बेहतरीन किस्म के शेर याद रखने की कोशिस तो यही हुआ जो दिल के करीब थे वही शेर याद रह पाये बाकि सब पढने के बाद ही भूल जाते थे...। एक बार महफिल मे अभिषेक ने मेरी शायरी के अनुराग पर चुटीला जुमला कसते हुए कहा था कि डाक्टर साहब यू आर ए गुड कलेक्टर....लेकिन शायरी जीने किसे कहते है यह अभी तक नही सीख पाये हो...।

अंग्रेजी बोलने मे निष्णात होने के बावजूद भी अभिषेक जी प्राय: शुद्द हिन्दी मे ही बात करते थे जबकि उनकी सारी शिक्षा कान्वेंट स्कूल की थी सेंट जेवियर से पढे हुए थे लेकिन हिन्दी से असीम अनुराग रखते थे और यदि मै ये कहूं कि हिन्दी,अंग्रेजी,ऊर्दू और संस्कृत इन चारो भाषाओं पर उनका समान अधिकार था तो कोई अतिश्योक्ति न होगी लेकिन वे प्रयोग हमेशा हिन्दी ही करते थे।

आज जब अपने विश्वविद्यालय मे आचार्य वर्ग को अंग्रेजी भाषा की मानसिक गुलामी करते हुए देखता हूं तो बडा दुख होता है क्योंकि उनके लिए अंग्रेजी भाषा मे बातचीत करना स्टेट्स सिम्बल बन गया है चाहे सामने वाला अंग्रेजी बोलने और समझने मे असमर्थ क्यों न हो वें ऐसा कोई मौका हाथ से नही जाने देना चाहते है जहाँ वे अपनी अंग्रेजी बोलने के अर्जित कौशल का भौंडा प्रदर्शन कर सकें।

ऐसे मे मुझे फिर से अभिषेक का सुनाया एक शेर याद आ रहा है, जोशे-दरियां से कह रहा है समन्दर का सकूँ,जिसमे जितना जर्फ हैं वो उतना ही खामोश हैं... अभिषेक के अंग्रेजी भाषा के ज्ञान के मामले मे भी इतना ही जर्फ था वह कभी भी अपने नंबर बनाने के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग नही करता था बल्कि इतनी शुद्द हिन्दी मे बात करता था कि कोई यह अन्दाजा भी नही लगा सकता था कि वह बेहतरीन और क्लासिक किस्म की अंग्रेजी बोलना भी जानता है...।

दुख की बात यह है कि हमारे ग्रुप का परमानेंट मोटिवेटर अभिषेक यादव आज खुद गर्दिश मे जी रहा है जिसकी वजह से बेहद अशांत और चिढ-चिढा भी हो गया है कभी लकीर का फकीर और जबान का पक्का जैसे तमगो से नवाज़ा गया यारों का यार अभिषेक अब उस डगर का पथिक है जिसका रास्ता किसी मंजिल की तरफ नही जाता है मतलब एक तयशुदा मौत का इंतजार...और मै और मेरे जैसे उसके बहुत से चाहने वाले बेबस और लाचार होकर उसकी बर्बादी का तमाशा देख रहें है...। सभी हैरान है और परेशान भी।
अब उससे न कोई संवाद होता है और न भविष्य मे मिलने की कोई उम्मीद है बस एक दुआ हमेशा करता रहता हूं कि ईश्वर उसको इतनी ताकत दे कि वो अपनी कश्ती को तूफान से सही सलामत निकाल कर साहिल पर ला सकें क्योंकि उसका होना हमारे लिए एक बहुत बडा हौसला है उसका वजूद का व्यक्तिगत महत्व है और उसकी जीवन से हार एक ऐसी निराशा का हम सब के अवचेतन मे भर देंगी जिसका उपचार दूनिया का कोई मनोवैज्ञानिक नही कर सकता है।
हमारी लाचारी और बेबसी के बीच उसको वो हौसला मिलें जिससे वो फिर से बहुत से बुझे हुए दिलों मे आत्मविश्वास की रोशनी पैदा कर सके जैसा वो अक्सर करता भी था और चमत्कार हो जाया करेते थें...कुछ ऐसा ही चमत्कार उसकी असल ज़िन्दगी मे भी हो बस यही दुआ है...। ईश्वर उसकी मदद करे...और मेरी भी...आमीन।
डा.अजीत

Wednesday, November 24, 2010

आजकल

कल और आज मैने अपने कुछ पुराने पडे कामो को निबटाया जिसमे बच्चे का चश्मा ठीक करवाने से लेकर सिलेंडर लाने तक के कुछ काम सम्मलित है। अभी अभी शाम को एक पुराने मित्र के साथ एसएमएस बाजी हुई उसे आजकल मेरी छोटी से छोटी बात भी तंज लगती है फोन पर संवाद तो कब का बंद हो चूका है बस कभी कभी जब मेरे अन्दर उसके साथ गुजारे कुछ पुराने लम्हों की कसक उठती है तब बरबस ही मेरे हाथ एसएमएस के लिए मचलने लगते है और हर बार की तरह मै अपनी ढीटता की सीमा का अतिक्रमण करता हुआ उसको एक छोटा एसएमएस भेज ही देता हूं जबकि मेरे एक अन्य पूर्व मित्र ने मुझे चेताया भी था कि मेरा कोई भी एसएमएस या काल उसके लिए जानलेवा साबित हो सकती है बावजूद इसके भी मै अपनी इन ओछी हरकतो से बाज़ नही आता हूं....रिश्तों को घसीटना और इनमे घिसटने की मुझे पुरानी लत है। हर बार उसके स्पष्ट और तल्ख एसएमएस के बाद ये संकल्प लेता हूं कि अब मै उससे दोबारा हालचाल जानने के लिए भी न काल ही करुंगा और न ही एसएमएस लेकिन पता नही क्या कीडा है मेरे अंदर कुछ दिन बीतने के बाद ही मै फिर से अपनी औकात पर आ ही जाता हूं।

मेरे शुभचिंतक और पूर्व के मित्र ने तो मेरी इस तरह की हरकत को सनकी की संज्ञा दे डाली थी...जो किसी के लिए भी जानलेवा साबित हो सकता हूं...।

बस इन सब बातों के बीच मे मुझे केवल यह कहना है कि मै एक अतीत व्यसनी बन्दा है और सुनहरे अतीत को एक पल मे विस्मृत करके एक झटके से तथाकथित परिपक्व और प्रेक्टिकल लाईफ नही जी सकता हूं...कई बार अपने आप को बदलने की कोशिस कर चूका हूं लेकिन मन के संवेदना को नही बदल पाया हूं। प्रथम दृष्टया मेरा इस प्रकार का व्यवहार किसी भी सामान्य जन को सनकी किस्म का प्रतीत हो सकता है लेकिन इसमे कोई सनक निहित नही है ये बस एक प्रकार के मैत्री से उपजी मे हितचिंता होती है प्राय: जिसके अर्थ अन्यथा लिए जाते रहें हैं।

बहरहाल मै अद्वैत मे जी रहा हूं अब अपेक्षा का स्तर भी घट गया है हाँ! जिन्दगी कुछ ऐसे कडवे किस्म के तज़रबे जरुर दिए है जिसकी वजह से मन अपने आप का ही बैरी बना बैठा है और कभी भी खीझ भी पैदा होती मन के अन्दर...लेकिन अब फिर भी बहुत कुछ सामान्य हो गया है। एक शेर के साथ विराम लेता हूं शायद आप को अच्छा लगे...।

अर्ज़ किया है:-

हम ऐसे पेड हैं जो छाँव बाँट कर अपनी

शदीद धूप मे खुद साये को तरसते हैं...। (दाराब बानो वफ़ा)

डा.अजीत

Tuesday, November 23, 2010

एसएमएस

आज सुबह-सुबह मुझे अपने एक मित्र का एसएमएस मिला जिसमे उन्होनें मेरी ब्लाग पर लेखन के मामले मे गैरहाजिरी का जिक्र किया था उनका कहना भी एकदम वाजिब ही है पिछले कुछ दिनों से मै नियमित रुप से लेखन नही कर पा रहा हूं जिसकी एक बडी वजह मेरा आलस है तथा दूसरा यह कि आजकल अन्दर से इतना शांत जी रहा हूं कि कुछ रचनात्मक करने की एक आंतरिक प्रेरणा ही नही पैदा होती है और जैसाकि मै पहले भी लिख चूका हूं कि सायास लेखन मेरे बस की बात नही है।

खैर! अपनी कमजोरियों का बार-बार जिक्र करने का जो लुत्फ है वो मै बहुत समय से उठाता आ रहा हूं यह भी एक किस्म की प्रवृत्ति है जिसको मनोविज्ञान की भाषा मे ईगो डिफेंस मैकनिज़्म कहा जाता है ऐसा करने से ईगो को बहुत मोटी खुराक मिलती रहती है। सब कुछ जानकर भी कुछ अजीब से जीना एक खास किस्म की लत है जो एक बार लग जाए तो फिर पीछा नही छोडती है।

आजकल मौसम बदल रहा है धीरे-धीरे सर्दीयां दस्तक दे रही है पिछले दो दिन से मुझे भी बाईक चलाते समय ठंड महसूस हो रही है कुछ गर्म कपडे भी खरीदने है लेकिन शायद वेतन आने के बाद ही यह संभव हो पायेगा। उतरोत्तर वेतन बढता ही रहा है लेकिन मैने अपनी जीवन शैली मे कोई खास फर्क महसूस नही किया है अब भी जैसे-तैसे काम चल रहा है तब भी चल ही रहा था जब सेलरी मात्र 9 हज़ार रुपये होती थी।

कई बार मुझे लगता है कि मुझे थोडा सा मितव्ययी होना चाहिए और आपदाकाल के लिए भी थोडी सी सेविंग करनी चाहिए लेकिन पता नही क्यों हर महीने के अंत मे हाथ तंग हो ही जाता है बस ईश्वर की कृपा है कि किसी का कर्ज़ सिर पर नही है जैसे-तैसे काम चल जाता है मेरे गांव मे एक कहावत बहुत प्रचलित है गाय की भैस तले करके काम चल जाता है बस मै भी गाय की भैस तले(नीचे) करके अर्थात जुगाड के तंत्र से काम चला ही लेता हूं ये बात अलग है कि पिछले चार महीनें से कोई भी ऐसा महीना नही गया कि मैने जब अपने घर से आर्थिक मदद न ली हो...क्या करुं करना पडता है भाई अब यहाँ परदेश मे किसके सामने हाथ फैलाया जाए लोग अन्यथा अर्थ निकालने मे तो माहिर होतें ही है।

मेरे साथ काम करने वाले एक साथी प्रवक्ता(जो मुझे नापंसद करते है और बनना भी मेरी तरह चाहते है) ने किसी मित्र के सामने अपनी यह जिज्ञासा व्यक्त कर ही दी कि जब मै इतनी प्रबल पारिवारिक पृष्टभूमि से हूं जमीन भी 100 बीघे हिस्से मे आती है तो क्यों इस बाईस हज़ारी नौकरी के लिए हरिद्वार पडा हूं सारी विलासिता छोडकर क्यों जीवन को बेवजह संघर्षमय बना रहा हूं। इस बात का जवाब न मेरे मित्र के पास था और न मेरे ही पास है अगर मुझे विलासिता का भोग करना होता तो निसंदेह मै आज राजप्रसाद भोग रहा होता ये तो एक स्वंयसिद्द का यज्ञ चल रहा है जिसमें खुद को सिद्द करना है येन-केन-प्रकारेण।

दूनिया का काम है बातें बनाना सो बनाती रहे मुझे अब कुछ ज्यादा फर्क नही पडता है पहले ऐसी बातें सुनकर मै बहुत तनाव मे आ जाता था...। अब लगता है कि कोई क्या कह रहा है इससे क्या फर्क पडता है बस एक बात का जरुर ध्यान रखता हूं कि कौन कह रहा है? ताकि सनद रहें...।

शेष फिर

डा.अजीत

Friday, November 19, 2010

आदत

आजकल मेरी प्रमादी प्रवृत्तियों की भरमार हो गई है मसलन मै कुछ जरुरत से ज्यादा आलसी हो गया हूं,इसी वजह से मै अपने नियमित लेखन के दावे से नजरें चुरा रहा हूं...आज फिर से वही गीत याद आ रहा है कि जब दर्द नही था सीने में...क्या खाक मज़ा था जीने में.. बस अब सन्दर्भ बदल गये हैं मैने महसूस किया है कि जब मै अत्यंत पीडा मे था आहत था बैचेन था तब अन्दर से एक ऐसी स्वाभाविकता से सृजनात्मकता फूंट रही थी कि कमाल का लेखन हो रहा था और इसी क्रम मे इस ब्लाग का भी अवतरण हुआ था मैने अपनी पीडा संवेदना इस ब्लाग पर खुब शेयर की हैं...बडी-बडी पोस्ट लिखकर अब मन:स्थिति के लिहाज़ से मै शांत अवस्था मे जी रहा हूं तनाव आते जाते रहते है लेकिन मै प्रतिक्रिया परिपक्व किस्म की हो गई है। पिछले चार महीने के अपने हर व्यवहार पर मै एक समीक्षक दृष्टि से देख सकता हूं कब मैने बालकीय व्यवहार किया? और कब अतिरिक्त रुप से परिपक्वता का परिचय दिया...आदि-आदि।

अब मेरी लोक अपेक्षा का स्तर बहुत घट गया है जो शायद मेरी पीडा और असहज़ता की एक बडी वजह भी था अब न दूनिया से कोई उम्मीद है न अपने आपसे ही...।

बस इस संतुलित जीवनशैली का नुकसान मेरी रचनाधर्मिता को थोडा सा उठाना पड रहा है अब न पहले से तेज शेर कह पाता न गज़ल... तब बहुत कुछ उम्दा लिखा गया था ऐसा मेरा नही बहुत से मित्रों का मानना हैं।

बहुत ही मुश्किल वक्त था जो मैने काटा है लेकिन अब इस बात का शुक्र है कि कट गया है अच्छा या बुरा जैसा भी था...। कई बार तो मुझे खुद ही विश्वास नही होता था कि मै इस अप्रिय मनस्थिति से उबर भी पाऊंगा या नही लेकिन सभी मित्रों,शुभचिंतको का कोटि-कोटि धन्यवाद कि उन्होनें मुझे इस पीडा की अवस्था मे ऐसा मौका दिया कि मैने अपने आपको और मांझ सकूं और बुरे वक्त को साक्षी भाव से गुजार सकूं..निसंदेह अब मेरी दृष्टि बदल गई है दूनियादारी को देखने की पहले बहुत पीडा होती थी जब कोई दिल दुखाता था अब लगता है कि ये दस्तूर ही है दूनियादारी का...बस एक चीज़ अभी तक नही सीख पाया हूं कि अपने प्रति स्वार्थी कैसे हुआ जाता है बहुत से लोग कहते है कि डाक्टर साहब! अपनी और अपने परिवार की परवाह करना शुरु करो ! काहे बाहर के लोगो मे उलझे पडे हो अब ये उलझन तो घटी है लेकिन अभी भी मै अपनी और अपने परिवार की परवाह कैसे की जाती है ये दूनियादारी का सबक नही सीख पाया हूं...।

एक बात और आपको बताता चलूं कि जब से मैने रुद्राक्ष का कंठा धारण किया था उसी दिन से मेरी सद्बुद्दि की शुरुवात हो गई थी पहले तो मुझे भी यकीन नही हुआ लेकिन इस रुद्राक्ष का प्रभाव चमत्कृत करने वाला है अब मन बहुत संयमित और संतुलित है और अनिन्द्रा का रोग भी दूर हो गया है वरना दो महीने तो मै शामक दवाईयों के सहारे से ही सो पाता था...। इस बारे मे ज्यादा इसलिए नही लिखना चाहता क्योंकि फिर ये टेलीशापिंग का एड लगाना शुरु हो जायेगा लेकिन ये बात तय है कि इससे मुझे निसंदेह लाभ हुआ और वह भी अनापेक्षित रुप से...। अब ईश्वर की कृपा से दवा की जरुरत नही है बस दुआ से ही काम चल जाता है जो हमेशा मेरे साथ रहती ही है...।
आज के लिए इतना ही.... अनकहे किस्से बहुत से है लेकिन अब मै ही नही कहना चाहते उन्हे तो उनका जिक्र करके भी क्या फायदा..।
डा.अजीत

Tuesday, November 16, 2010

बेवजह

आजकल वक्त बेवजह कट रहा है वैसे तो एक अरसे से मै इस प्रकार की जिन्दगी जीने का आदी हूं लेकिन पिछले कुछ महीनो मे मैने अपने सामर्थ्य अनुसार बहुत प्रयास किए है अपनी लाईफ मे रेडिकल चैंज लाने चाहे वह विदेश जाने का प्रयास हो या देश मे ही अपने आपको स्थापित करने की बात हो पर जो बात मेरी समझ मे आई है वह है कि सब कुछ अपनी इच्छानुसार हो पाना संभव नही होता है हम अपनी बेहतरी के लिए सोच सकते है कुछ बडे निर्णय ले सकते है लेकिन परिणाम सब नियति अधीन होता है और लब्बोलुआब यही कि कुछ सवाल ऐसे होते है जिनका जवाब शायद वक्त के पास ही होता शायद सबक की शक्ल में...।

पिछले तीन दिनों से बैचलर लाईफ जी रहा हूं मेरे साथ आजकल छोटा भाई रह रहा है हम पिछले तीन दिन से खुद ही खा-पका रहे है तीन वक्त मैगी खा कर काम चलाया बाकि दाल भात खाकर..आज जब रोटी की भुख ने बैचेन कर दिया तो होटल से रोटी लाया और दाल घर पर ही बनाई हमेशा की तरह दाल मे नमक कुछ ज्यादा हो गया था लेकिन भुख की तीव्रता के आगे घी के सहयोग से काम चल गया,वैसे तो मै दाल ठीक-ठाक बना लेता हूं लेकिन इस बार दाल की पाक कला मे कुछ हाथ जम नही रहा है नमक तीखा ही हो जाता है बस जैसे तैसे खा लेतें है।

आजकल विश्वविद्यालय मे कुछ खास नही हो रहा है प्रशासन की लोक सेवा आयोग से लडाई चल रही है पिछले दो दिन पहले कुछ छात्रो और शिक्षकों के विरोध प्रदर्शन पर पुलिस ने लाठियां भांजी और विश्वविद्यालय का छात्र संघ अध्यक्ष गंभीर रुप से घायल हो गया है तथा दून अस्पताल मे भर्ती है। पुलिस का चरित्र हमेशा से ही हिंसक रहा है और जैसे ही उन्हे मौका मिलता है वे ब्रिटिश कालीन दौर की तरह बर्बतापूर्वक अपना हाथ चला ही देती है हद की बात तो यह है कि एक कांसटेबिल और एस आई लेवल के पुलिस ने कुलपति जैसे ओहदेदार व्यक्ति को भी धकियाया गया वो भी सारा प्रोटोकाल को भूलकर,कुछ ने लाठियां खाई और कुछ ने तमाशा देखा तमाशबीन बनकर।

खैर ये सब तो राज काज़ की बातें है चलती ही रहेंगी...अभी अभी एक मित्र ने फोन करके सूचना दी है कि यूजीसी ने असिस्टैंट प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए नेट पास होने की अनिवार्यता से दिसम्बर 2009 तक के पी.एच.डी. डिग्री होल्डर्स को मुक्त किया है यह खबर व्यक्तिगत रुप से मुझे भी थोडी राहत देने वाली है क्योंकि इस नये नियम आने के बाद मेरी पात्रता पर संकट के बादल छट जायेंगे...।

शेष फिर...

डा.अजीत

Monday, November 15, 2010

फिर से विराम

(यह पोस्ट एक दिन पोस्ट कर रहा हूं सो सभी घटनाएं 14 नवम्बर के हैं।)

माफी चाहूंगा दोस्तों पिछले कुछ दिनों से मेरे नियमित लेखन के दावे की हवा निकल रही हैं उसकी दो वजह है एक तो मै स्वस्थ नही हूं खांसी कुछ ज्यादा ही बढ गई है और सितोपलादि चूर्ण भी कुछ खास असर नही दिखा रहा है दिन मे फिर भी थोडा सामान्य रहता हूं लेकिन रात को कई बार खांसते-खांसते बुरा हाल हो जाता है श्वास नली से लेकर पेट तक दुखने लगता है।

आज मै पत्नि और बच्चे को मायके छोड कर आया हूं जैसाकि मैने पहले भी जिक्र किया है पत्नि का भाई दीपावली की रात एक दुर्घटना मे गंभीर रुप से घायल हो गया था आज उसकी अस्पताल से छुट्टी हो गई है वह नौ दिन अस्पताल मे बितानें के बाद आज घर लौटा है,सो पत्नि और बच्चा बुधवार की शाम तक लौटेंगे तब तक मै और मेरा छोटा भाई मकान पर रहेंगे खुद ही खाना पकायेंगे और खायेंगे यदि मै अकेला रहता तो बडे आलस मे भुख के साथ ये दिन गुजरते लेकिन चूंकि छोटा भाई साथ मे है सो अब मै नैतिक दबाव मे समय पर कुछ न कुछ खाने का प्रबन्ध जरुर करुंगा चलो! इसी बहाने मेरी भी पेट पूजा होती रहेगी।

आने वाले तीन दिन कुछ कुछ बैचलर लाईफ के जैसे बीतेंगे सो आज शाम हम दोनो मार्किट गये थे और ब्रेड,बटर और मैगी के चार पैकेट खरीद लाएं है ताकि क्षुधा शांत की जा सके। दाल-चावल बनाने मे मै माहिर हूं बस रोटी बनानी नही आती है सो अल्टरनेटिव फूडस पर ही ज्यादा निर्भर रहना पडेगा,दाल-भात तो मै पकाता ही रहूंगा।

रास्ते मे आते-आते हमने सूप का पान किया और एक प्लेट पाव भाजी भी खायी और आज रात का अपना इंतजाम कर लिया मतलब शायद आज रात के लिए कुछ रोटियां पत्नि बना कर चली गई है सो देर रात उनका भोग किया जायेगा।

कल का मीनू अभी तय नही है देखते है कल क्या खाया-पकाया जायेगा? खाना बनाना तो मुझे ठीक लगता है अगर कोई साथ मे हो अकेले मे मै कुछ नही पकाता हूं लेकिन बर्तन मांजना मुझे कतई रुचिकर नही लगता है इस बार छोटा भाई साथ मे सो आशा है कि कुछ सहयोग वह करेगा तो काम चल ही जायेगा।

कल की किस्सागोई अब होगी कल...।

डा.अजीत

Wednesday, November 10, 2010

एक दिन बाद

कल एक दिन की विश्राम और हो गया है नियमित लेखन का प्रयास करता हूं लेकिन सायास कुछ नही करता हूं अगर इनर काल आएं लेखन की तभी कुछ बक-बक कर लेता हूं जिस दिन मन नही होता है उस दिन चाहकर भी लिख नही पाता हूं शायद मेरी मौलिकता इसी में है।

बहरहाल,कल बच्चे वापस हरिद्वार आ गयें है और आज से राहुल ने फिर से स्कूल जाना शुरु कर दिया। मुझे कईं सालों बाद कुछ भयंकर किस्म की खांसी हो गई है,जिससे मै खासा किस्म का परेशान हूं खांसी की बीमारी मुझे बहुत बुरी लगती है रात को सोना भी हराम हो गया है दो बोतल अंग्रेजी सिरफ पी चूका हूं लेकिन कोई लाभ नही हुआ है सो आज आर्युवेद की शरण मे आ गया हूं,अभी-अभी सितापलादि चूर्ण खरीद कर लाया हूं कल से शहद के साथ इसको चाटूंगा शायद कुछ आराम मिल जाए।

आज से विश्वविद्यालय भी खुल गया है लगभग एक सप्ताह के अवकाश के बाद खुला है सो आज छात्रों की उतनी रौनक नही रही बच्चे अभी दीपावली के बाद घर से नही लौटे है। आज दो तीन रुटीन के काम निबटाए बस कुछ खास नही रहा दिन।

चूंकि आज सुबह मै सूक्ष्म जलपान करके गया था सो जब तीन बजे वापस घर लौटा तो बहुत जोर से भुख लगी हुई थी रास्ते से अमूल की नमकीन लस्सी(छाछ) लेता आया क्योंकि मुझे आज पहले से ही यह खबर थी कि घर पर पालक,चने का साग बना हुआ है। भरपेट खाने के बाद कम्बल ओढ कर लेटा रहा शाम तक ऐसे ही बेतरतीब ढंग से बस कुछ पत्नि के बतियाता रहा साथ जोर-जोर से खांसता भी रहा।

शाम को पत्नि ने तुलसी अदरख की गरमा गरम चाय पिलाई जिससे थोडी राहत मिली है...।

अब बस लिखने मे थोडी तकलीफ हो रही है..खांसी की वजह से सो लेता हूं एक विश्राम।

शेष फिर

डा.अजीत

Monday, November 8, 2010

हादसा: एक कडवी याद

पिछले तीन दिनों से इस डायरी मे कुछ नही लिखा गया है जिसके वजह दीपावली की रात को पटाखों के शोर के बीच मेरी ससुराल में मेरे साले के साथ एक बेवजह का हादसा हो गया जहाँ सब लोग खुशियां बांट रहे थे वही मेरे ससुराल पक्ष मे एक आकस्मिक आपदा आ पडी जिससे मै भी प्रभावित रहा हूं बहुत बेतरतीब और आपाधापी मे कटे पिछले तीन दिन...। हुआ यूं कि मेरे साले साहब पटाखें छुडाते-छुडाते हुए गंभीर रुप से घायल हो गयें उम्र कुछ ज्यादा नही है अमित की इसलिए इसे थोडा बचपना भी कहा जा सकता है कि उसने उस शोर शराबे के दिन न जाने क्या सूझी कि पटाखों के साथ अपनी पिस्टल से भी फायर करने छत पर पहूंच गया साथ मे दो चार बच्चे और पारिवारिक लोग भी कौतुहलवश पहूंच गये...और एक मिस फायर के चक्कर मे पिस्टल को देखने और खोलने की असावधानी मे गोली सी बांह को चीरती हुई छाती के पास से निकल गई..आनन फानन मे प्राथमिक चिकित्सा के बाद स्थानीय अस्पताल ले जायेगा लेकिन गोली लगने की वजह से खुन बहुत निकल गया था गोली आर-पार हो गई अच्छी बात यह रही कि हड्डी बच गई बस मांस को चीरा उसने और छाती भी बच गई...।

हमे तो अगले दिन सुबह फोन से ये सूचना मिली बडी अजीब स्थिति हो गई थी क्योंकि जैसाकि मैने पहली पोस्ट मे लिखा है कि इन दिनों मेरी साली भी मेरे यहाँ आई हुई थी सो दोनो बहनें अपने भाई के अनिष्ट की कल्पना कर-करके बुरा हाल थी फिर मैने जैसे तैसे थोडा ढांडस बंधाया और उन दोनो को टैक्सी के माध्यम से उनके घर भेजा..और मै अस्पताल के लिए रवाना होने की तैयारी करने लगा...।

मेरे साथ एक दुविधा यह भी थी कि मेरा उस दिन का अप्याईंटमेंट पहले से ही ऋषिकेश मे किस्सी सज्जन के साथ फिक्स था मै तो सुबह सुबह उठ कर जाने की तैयारी मे लगा हुआ था कि तभी यह दुर्घटना का समाचार मिल गया मै किंकर्तव्यविमूढ हो गया था एक तरह मेरी ज़बान का सवाल तो एक तरफ अस्पताल मे गंभीर रुप से घायल साला...खैर ! जैसे तैसे मैने परिस्थितियों मे सामंजस्य बैठाया और पहले पत्नि को उसके घर भेजा और फिर पहले ऋषिकेश गया वही से सीधा अस्पताल पहूंचा...।

जब मै अस्पताल मे पहूंचा तब अमित आपरेशन थियेटर मे था जैसा मुझे बताया गया कि दिन के 3 बजे से आपरेशन चल रहा है एमएस डाक्टर के अलावा के एक प्लास्टिक सर्ज़री की स्पेशलिस्ट डाक्टर बुलाया गया है देहरादून से..।

आपरेशन के दौरान अस्पतालीय अवसाद के ग्रसित सभी परिजनों की मनोदशा मे मै भी शरीक हो गया था शाम को लगभग 7.30 के आसपास डाक्टर ने ब्रीफिंग की और बताया कि आपरेशन सफल रहा है और जो आंतरिक इंजरी हुई है उसको ठीक प्रकार से रिपेयर कर दिया गया है...तब जा कर सबने राहत की सांस ली।

मै देर रात से हरिद्वार पहूंचा वो दिन मानसिक और शारीरिक रुप से बहुत थकान से भरा था सो मै जल्दी ही सो गया।

उसके बाद से अस्पताल,घर,फोन,अपडेट का सिलसिला इन तीन दिनों मे चलता रहा मै आज फिर से अमित को देखने अस्पताल गया था अभी भी वो आईसीयू मे ही है ज्यादा खुन बहने के कारण उसके खुन मे हीमाग्लोबिन का स्तर बहुत कम हो गया था सो उसको चार यूनिट खुन चढाया गया है आज फिर से दो यूनिट खुन चढाया गया है वो धीरे-धीरे रिकवर कर रहा है आज मै उससे मिला तो मुझे देखकर उसकी आंखे भरा आई मैने उसका ढांड्स बंधाया और कहा कि होनी बलवान होती है कोई बात नही बुरा वक्त था गुज़र गया सब ठीक हो जायेगा इसके बाद बडे बोझिल मन से मै भी आईसीयू से बाहर निकल आया।

त्यौहारों पर बनी कडवी यादों का कारंवा बहुत दूर तक जिन्दगी मे साथ जाता है उसका सारा परिवार मर्माहत है और परेशान भी बस ऐसे मुश्किल वक्त मे मै तो ईश्वर से यही प्रार्थना कर सकता हूं ईश्वर उन्हे इस हादसे से उबरने की शक्ति प्रदान करें...।

कल शायद पत्नि भी हरिद्वार वापिस आ जाएं क्योंकि बालक का स्कूल खुल गये हैं। अमित को अभी एक सप्ताह तक और अंडर मेडिकल सुपरविज़न अस्पताल मे रहना पडेगा।

मैने अभी बालक के स्कूल वैन वाले को फोन करके यह सूचना दी है कि राहुल परसों से स्कूल जाएगा..।

आज इतना ही बाकि कल...

डा.अजीत

Friday, November 5, 2010

दीपावली

आज दीपावली है शहर मे मकान लडियों से सजे हुए है और गलियों मे पटाखों का शोर शराबा जोर से है। बारुद की गंध से माहौल युद्द के मोर्चे जैसा बना हुआ है लोगो की खुशी इजहार करने का ये तरीका भी थोडा अजीब ही है लेकिन आज के दीपोत्सव की खुशी के अवसर पर मै अपनी कोई दार्शनिक ब्यानबाजी नही करना चाहता सभी को मौलिक अधिकार है अपनी तरह से जीने का उसमे ये उत्सवधर्मिता भी शामिल है। मेरा अतंस इतना शांत और निर्जीव किस्म का है कि मुझे उत्सव आने पर सच कहूं कोई दिल से खुशी महसूस नही होती है ये मेरे साथ बचपन से ही है कुछ जरुरत से ज्यादा गंभीर बचपन जीया है सो वैसी ही आदत बन गई है अब कई बार पत्नि ताना मार देती है कि मेरे सत्संग के कारण वह भी सामाजिक जीवन और इसकी औपचारिकताओं के प्रति अलगाववादी हो गई है वह विवाह से पहले सामान्य परिवेश मे पली-बढी लडकी थी जिसने जीवन मे कभी दुख नही देखा था और जैसा एक आम लडकी की अपने भावी वैवाहिक जीवन को लेकर सपनें होते है ठीक उसके भी वैसे ही थें लेकिन मेरे साथ सप्तपदी होने के बाद अब सब कुछ बदल गया है वो कभी अपने प्रारब्ध का सहारा लेती है तो कभी नियति मानकर मेरे साथ कदम मिलाकर चलने की कोशिस करती रहती है। इसमे न मेरा कोई दोष है न उसका कोई दोष भगवान ने संयोग ही इस किस्म का तय किया था जिसका सहारा लेकर अपनी गृहस्थी चल रही है।

आज का दिन अपनी गृहस्थ पुराण कहने का नही है लेकिन मै इसलिए जिक्र कर रहा हूं कि मेरे घर पर आजकल पत्नि की छोटी बहन आयी हुई है जिसमे अपना अक्स देखकर मेरी पत्नि अपने विवाह से पूर्व के जीवन को उसके साथ जी लेती है उसे मेरी अवसादित किस्म की जीवन शैली का पता है सो सुबह से ही आग्रह कर रही थी कि मै बाज़ार से कुछ दीपावली का सामान खरीद लाऊं ताकि अपने बहन को उत्सव का बोध करा सके। मैने उसकी भावनाओं को समझते हुए वो सब सामान ला कर दिया जिसकी उसने लिस्ट मुझे थमाई थी,पत्नि की बहन ने (साली शब्द से मुझे सदैव से परहेज़ रहा है और कोई शब्द प्रचलन मे नही है सो पत्नि की बहन ही सम्बोधित कर रहा हूं) यथा सामग्री की उपलब्धता के आधार पर बहुत परिश्रम से एक सुन्दर रंगोली बनाई दीपावली पूजन के लिए आटे और थोडे बहुत रंगो से गणेश जी एक मनमोहक प्रतिमा उसने जमीन पर उकेरी जिसके कारण उसकी कला कौशल का मै कायल हो गया हूं अभी उसके घर वाले उसके लिए लडके की तलाश कर रहे है विवाह के लिए अभी-अभी बी.ए.पास किया है,उसके शिल्प को देखकर मेरे मन मे ये सवाल बार बार आ रहा था कि अगर ग्रामीण परिवेश की इस लडकी ने फाईन आर्ट्स की औपचारिक शिक्षा मिल गई होती तो ये एक बेहतरीन कलाकार बन सकती थी अब केवल बेचारी किसी परिवार की टिपिकल बहु बनेगी...सच मे ग्रामीण क्षेत्र मे संसाधनों का बहुत टोटा है और प्रतिभाएं ऐसे ही दम दोड देती है।

खैर! हमने सपरिवार दीपावली पूजन किया मै भी आधे-अधूरे मन से आरती मे सम्मलित हो गया था भगवान कितने क्रुर हो सकते है इसका मुझे अच्छी तरह से बोध है लेकिन फिर भी अपने ऐश्वर्य और विलासिता के लिए लक्ष्मी मैय्या की मैने न केवल पूजा की बल्कि एक भिखारी की तरह मन ही मन गिडगिडाया भी कि अर्थ प्रबन्धन के क्षेत्र मे अब मेरी और अग्नि परीक्षा न लें...मेरा सब्र कभी भी जवाब दे सकता है फिर ये मत कहना कि ये अनैतिक है सरस्वती ने जब पी.एच.डी तक की शिक्षा दी है तो अब ये मां लक्ष्मी का नैतिक फर्ज बनता है कि मेरी भव बाधा हरें...।

बस आज का दिन यूं ही बेवजह और औघडपन मे बीत गया दिन मे दो तीन बार अपने छोटे भाई से बतिया लिया वो अकेला गांव मे दीपावली मना रहा है...।

दिन भर मोबाईल पर दीपावली की शुभकामनाओं के फारवर्ड किए गये एसएमएस टपकते रहें जो औपचारिकता की चासनी मे लिपटे हुए थे मैने केवल चार का जवाब दिया बाकि सबको पढता रहा और डिलिट करता रहा...।

अब लेता हूं एक विश्राम कल की बातें कल होंगी...।

शुभ दीपावली...आत्मीय दीपावली!

डा.अजीत

Thursday, November 4, 2010

दीपावली की पूर्व संध्या पर

आज छोटी दीपावली है कल बडी होगी लोग मशगूल है अपनी तरह से उत्सवधर्मिता को जीने में मैने भी शहर का एक चक्कर लगाया है सारा बाजार अटा पडा है भीड भडाका खुब है शहरी महिलाओं के हाथों मे गिफ्ट हैम्पर देखकर मुझे अपना गांव याद आ रहा है जहाँ पर मित्रों सम्बन्धियों को आपस मे मेल मिलाप के लिए हाथ मे मिठाई का डिब्बा होना अभी तक जरुरी नही होता है सब मिलते है बस आत्मीयता के साथ। ये मेरे जीवन की पहली दीपावली है जिस पर मै अपने गांव नही गया हूं सो शहर मे एक अजनबीपन का शिकार भी हूं वैसे मैने अपने शहर के मित्रों,परिचितों को यह सूचना नही दी है कि मै शहर मे छिपा बैठा हुआ हूं वजह बस इसकी भी यही है कि मुझे ये गिफ्ट हैम्पर का लेन-देन ठीक नही लगता सब कुछ औपचारिक बाजार और दिखावे की रस्मों पर केन्द्रित दूनियादारी की रस्म रिवाज़ के मामले मे मै बडा काहिल-जाहिल किस्म का इंसान हूं।

पिछले दो दिन से आवारा की डायरी के पन्ने कोरे पडे हुए थे सो आज यह रस्म पूरी कर रहा हूं ताकि मेरे नियमित लेखन के दावे की हवा न निकल सके।
दो दिन पहले जो स्पाईस का डबल सिम का फोन मैने जितने चाव के साथ खरीदा था आज उसे उतनी ही उदासीनता के साथ उसे गांव रवाना करके आया हूं आनन-फानन में कूरियर करके आया हूं शायद गांव मे उसकी सही गति हो सके।
छोटे भाई को सूचना भी दे दी है कि पार्सल छूडा ले और किसी उत्साही युवा के मत्थे मेरी नामसमझी को मढ दें इतना चालाक भी हूं मै...। मेरी नामसमझी के कारण अक्सर ऐसे छोटे मोटे आर्थिक नफा नुकसान मैने बहुत उठाए है ये सब तो चलता ही रहता है दूनियादारी में...।
आज मैने एक मुखी से लेकर पन्द्रह मुखी तक के रुद्राक्षों का एक कंठा धारण किया है अब देखता हूं कि भगवान आशुतोष की कृपा होती है या नही...मैने सुबह धारण करने से पूर्व अपने भक्तिहीन,क्रियाहीन होने की आप कबूली की और प्रार्थना की भगवान मुझे सदबुद्दि प्रदान करें...। शेष ईश्वर की इच्छा...राम की बातें राम ही जाने कह गये भईया लोग सयानें!
डा.अजीत

Tuesday, November 2, 2010

उदासी

आज की शाम फिर से बडी उदास हो गई मन के अन्दर बैठा अकेलापन बाहर निकल आया और मै अतीत को स्मरण करता हूं अपने आप को बचाने की कोशिस कर रहा हूं। कुछ दिन पहले मेरा छोटा भाई अपनी परीक्षा के सिलसिले मे मेरे पास आया हुआ था लगभग एक सप्ताह साथ मे रहा वो आज गांव चला गया है सो आज की उदासी की एक वजह वह भी है शाम तक तो मै अपने आपको बेवजह व्यस्त करते हुए इस एकाकीपन से बचता रहा लेकिन अब शाम को जब घर लौटा हूं तो मन बडा डूब सा गया है एक अजीब से खिन्नता वाली मनस्थिति है जिसको शब्दों मे ब्यां नही किया जा सकता है।

मैने आज एक नया स्पाईस कंपनी का डबल सिम वाला फोन खरीदा है बहुत दिन से मै इसे खरीदने की सोच रहा था हालांकि बजट इसकी कतई अनुमति नही दे रहा था लेकिन मुझे जिस चीज़ को पाने की ललक लग जाती है उसको मै लेकर ही दम लेता हूं छोडकर दूनियादारी की उपलब्धियों को...।

मेरे विभागीय सहकर्मी मित्र डा.विक्रम सिंह के पास इसी माडल का फोन था वो उसको बेचना भी चाह रहे थे और खरीददार मै था लेकिन वो रोज़ाना टाल देते थे अब मुझ से रहा नही गया और मैने शाम को सोचा काहे का हजार-पांच सौ का लालच करना नया ही खरीद लेता हूं और फिर जैसे तैसे बजट बैठा कर यह फोन खरीद लाया हूं...जिस पर पत्नि ने अपनी मौन नाराज़गी भी जाहिर कर दी लेकिन अब क्या फर्क पडता है कोई कुछ भी सोचे फोन तो ले ही लिया गया है।

यह फोन मै अपनी पत्नि के लिए ही खरीदना चाह रहा था क्योंकि मेरा बेटा राहुल उसके फोन मे जीरो बैलेंस करके रखता है बेहिसाब बटन दबाता रहता है कभी मैसज़ हो जाते है तो कभी काल भी लग जाती है सो मेरा विचार यह था कि एक नया फोन खरीदकर गोपनीय रुप से पत्नि को दे दूं ताकि कभी इमरजेंसी मे वो मुझे काल कर सके लेकिन पत्नि ने यह फोन लेने से साफ मना कर दिया और कहा कि वो अपने उसी फोन के साथ खुश है। मैने भी ज्यादा जोर नही दिया अब यह मेरे ही पास रहेगा हालांकि रहेगा बेकार ही क्योंकि मेरा खुद का फोन खुद सारा दिन खामोश पडा रहता है जेब की निर्जनता में...ये भी उसी का छोटा भाई बना पडा रहेगा।

आज से मेरी अनिन्द्रा की दवाई भी खत्म हो गई है मतलब मैने खुद ही यह महसूस किया कि अब इसका कोर्स आफ इंटरवेंशन पूरा हो गया है अब बिना गोली के सोने का अभ्यास करना है वरना फिर ये संभावना थी शायद मै एडक्टिव हो जाता इन शामक दवाईयों का..जो मै कभी नही होना चाहता हूं।

बस आज का हिसाब-किताब इतना ही

शेष फिर

डा.अजीत