Saturday, April 11, 2015

दो भाई

(फेसबुक के पुराने पाठक मित्र जानतें है अपनें गांव के कुछ किरदारों पर मैं पहले भी एक शृंखला लिख चुका हूं। ये कोई खास किरदार नही है न ही इनके जीवन मे कोई नायकत्व है परंतु देहात के जीवन के ये किरदार अपने किस्म के आखिरी जरुर है जवान होती पीढियों के लिए इनके मामूली से दिखने वाले जीवन का दस्तावेजीकरण मेरे लिए लेखकीय सुख से बढकर निजि तौर पर सुखदायक इसे मेरी जन्मभूमि के प्रति मेरे लगाव की एक अभिव्यक्ति भर भी समझा जा सकता है। आने वाली पीढियां भले ही इसमें कोई रुचि प्रकट न करें मगर कभी पीछे मुडकर देखनें ये छोटी सी कतरन हमेशा मददगार रहेगी। गांव के जीवन को समझनें का एक समाजशास्त्रीय दस्तावेज़ बने यह मेरी इच्छा है इन लोगो के जरिए गांव के जीवन मे झांकना निसन्देह आत्मीय महसूस होता है।)

--------’मंगलू-काशी नाई: दो भाई’

मंगलू नाई का कागज़ पतरों मे नाम मंगलसैन है मगर गांव की सम्बोधन की अपभ्रंश परम्परा (जाति का समाज़शास्त्रीय अनुक्रम भी एक पक्ष है) में वो मंगलसैन से मंगलू हो गया है। मंगलू का एक छोटा भाई काशी। दोनों भाई गांव में रहकर नाई का काम करते रहे है दोनो ही जज़मान सिस्टम ( किसानों के बाल काटनें का फसलाना तंत्र) के जरिए गुजर बसर करते आये हैं। गांव मे नाई को बडे और मझोले किसान हर छमाही पर फसल में से अनाज़ देते है जिसकी ऐवज़ में वो साल भर उनके बाल काटते है।

मंगलू के चार बेटे है मगर कोई भी अपने पिता के इस पैतृक काम को नही करता है एक शराब के ठेके पर सेल्समैन है एक टेलर मास्टर है दो बेटे धारुहेडा( हरियाणा) में किसी फैक्टरी मे काम करते है। काशी का एक बेटा है जिसका वास्तव में नाम जगप्रकाश है मगर गांव मे उसे लोग चट्टु कहतें है वो जरुर नाई का काम करता है।

मंगलू पुरानें जमाने का दसवी दर्जे तक पढा हुआ है फारेस्ट विभाग में सरकारी नौकरी पर लग गया था मगर जंगलात मे काम करने मे जी नही लगा तो सरकारी नौकरी छोड गांव में नाई का काम करने आ लौट आया मंगलू की उम्र अब सत्तर के पार मगर आज भी उसे अपने उस नौकरी छोडने का अफसोस है। मेरे पास अक्सर बैठ जाता है बातचीत में कुछ अंग्रजी के वाक्य धाराप्रवाह बोलता है जिससे उसका पुराना पढा लिखा होने की पुष्टि हो सके। काशी अनपढ है मगर वो अपने काम में पारंगत है।

जिस बात के लिए मंगलू-काशी दोनों भाई जाने जाते है वो उन दोनों भाईयों का आपस का प्रेम। दोनों की एकदम से राम-लक्ष्मण की जोडी है। गांव मे आज भी भाईयों के प्रेम का उदाहरण के लिए मंगलू-काशी का ही नाम लिया जाता है। मंगलू चूंकि पढा लिखा है इसलिए वो थोडा शार्प भी है मगर काशी का प्रेम एकदम निश्छल और नैसर्गिक किस्म का रहा है। काशी जवानी में ही विधुर हो गया था उसनें कभी अपने जीवन की परवाह नही की हमेशा अपने बडे भाई के लिए जुता रहा। अब दोनों ही भाई लगभग सन्यास आश्रम में है मगर आज भी दोनो का प्रेम अद्भुत किस्म का है। ऐसा प्रेम विरला ही देखने को मिलता है। गांव में लगभग सभी लोग यह बात जानते है कि यदि मंगलू कहीं गांव से बाहर गया होता था और शाम तक वापिस नही आता था वो काशी शाम को लालटेन लेकर बस स्टैंड पर पहूंच जाता था और जब तक मंगलू वापिस न आता वहीं बैठ उसकी राह देखता था। पिछलें दिनों मंगलू की आंखों का मोतियाबंद का आपरेशन हुआ तो काशी अपने बडे भाई मंगलू का हाथ पकडकर उसे गली मे लेकर चलता था। दोनो बूढे हो चुके है मगर आज भी दोनों में गजब का प्यार है।

दोनों भाईयों में यह प्रेम बचा रहा है इसकी एक बडी वजह काशी का बेहद सरल होना रहा है। हालांकि अब काशी अपने बेटे के साथ अलग रहता है मगर एक वक्त वह भी हुआ करता था कि जब तक शाम को मंगलू खाना न खा ले काशी खाना नही खाता था। काशी से पूछने पर बताता है क्या कहूं बाबू जी मेरा जी ही ऐसा है। छ महीने पहले मंगलू गम्भीर रुप से बीमार हो गया था बचने के कम आसार थे कई दिन अस्पताल में भर्ती रहा उन दिनों काशी मेरे पास चिंतातुर हो बैठा रहता और कहता है भाई के मरनें पर मेरा जीना मुश्किल हो जाएगा मेरी भगवान से यही प्रार्थना है कि मै मंगलू से पहले मरुं क्योंकि मंगलू मेरे बिना जी सकता है मगर मै मंगलू के बिना जी न सकूंगा। खैर ! जब मंगलू स्वस्थ होकर घर आया तब काशी को राहत की सांस नसीब हुई।

मंगलू चूंकि पढा लिखा है इसलिए वो थोडा उसका लाभ भी लेता है अब उसने संत गुरु राम रहीम का सत्संग लिया हुआ है इसलिए वो अब हमेशा आध्यात्मिक बातों मे ज्यादा रुचि लेता है और काशी चूंकि शाम को एक एक-दो पैग देशी शराब के लगा लेता है इसलिए वो काशी की निंदा भी करता है उसे अपने साथ सत्संग में लेकर चलने की जिद करता है मगर काशी ने साफ मना कर देता है इसे मंगलू उसकी अज्ञानता कहता है। दोनों भाई दो विपरीत ध्रुव है मगर फिर भी बेहद सहज है।

ओढी हुई सामाजिक समझदारी और सामाजिकता के इस दौर में मंगलू और काशी जैसे भाई अपने किस्म के अकेले है। भले ही मंगलू का संवेदना का पक्ष काशी की अपेक्षा कमजोर है उसकें अन्दर वैचारिकता और पढे लिखे होने का अतिशय दंभ भी नजर आता है मगर फिर भी दोनों भाईयों का प्रेम वास्तव में अद्भुत किस्म का है उम्र के इस दौर में भी दोनों भाई ठीक वैसे ही लगते है जैसे स्कूल के दिनों के साथ जानें वाले दो भाई दिखते है जिनकी कक्षाओं मे एक दो साल का ही फर्क होता है।

काशी के भाई प्रेम की वजह से वो निजि सम्बधों मे पिछडा भी है वो अपने बेटे की उतनी केयर नही कर पाया जितनी करनी चाहिए थी आज बडे भाई के बेटे शहरों मे निकल गये है उसका खुद का बेटा गांव में ही रह गया है मगर फिर भी काशी के मन में कोई मलाल नही है वो आज भी भाई के लिए अपनी जान छिडकता है। आज भी शाम को यदि उसके मंगलू न दिखे तो वो मौहल्ले में पूछना शुरु कर देता है कि भाई कहीं मंगलू देखा क्या?

दिन ब दिन एकाकी होते जीवन में और भाईयों की सामाजिक दूरी के बीच में अपने आसपास दो ऐसे भाईयों को देखना निसन्देह सुखप्रद है उनके अलावा पूरे गांव भाईयों के पारस्परिक प्रेम का कोई उदाहरण नजर नही आता है कल मंगलू और काशी भले ही नही रहेंगे मगर उन दोनों भाईयों के पारस्परिक प्रेम के किस्से हमेशा जिन्दा बचे रहेंगे यह अपने आप में क्या कम बडी बात है

Tuesday, March 31, 2015

फेसबुक

इनबॉक्स में दिखते है जो परेशान बहुत
हकीकत में छूट गए उनके अरमान बहुत

स्माइल उनका डर कभी लिहाज़ बताती थी
जोश से जब हमें सुनाते थे वो फरमान बहुत

लाइक करके चले गए हम चुपचाप वॉल से
देखा जब उनके दर पर बैठें है मेहमान बहुत

कभी बेतक्कलुफ सी बातें कभी दुनियादारी
उनके कमेंट्स करते थे बारहा हमें हैरान बहुत

यूं तो लाइक कमेंट शेयर टैग में शामिल थे सब
फेसबुक पर दोस्तों से रहें हम अनजान बहुत

© डॉ.अजीत




Monday, March 23, 2015

टाइमपास

खुद से भागते लोगो को जीने का सलीका दे गया
ऐ जुकरबर्ग बच्चों के हाथ में कैसा लतीफा दे गया

एक अदद आई डी बना कर क्या गुनाह कर दिया
ये तेरा इनबॉक्स तो तल्खियों का वजीफा दे गया

पहले फ्रेंड फिर अन्फ्रेंड आखिर ब्लॉक कर दिया
दोस्त के नाम पर सर्च करके कुछ खलीफा दे गया

कुछ हकीम ऐसे भी थे इस चेहरे की किताब पर
होना जिनका मरीज ए इश्क को  शिफ़ा दे गया

म्यूच्यूअल फ्रेंड की पता नही कोई बात बुरी लग गई
डिएक्टिवेट के साथ दोस्त वापिस सारी वफ़ा दे गया।

© डॉ. अजीत


Sunday, March 8, 2015

याद

वक्त कभी थम जाता है कभी तेजी से गुजर जाता है मगर कभी कभी वक्त फांस की तरह मन में फंस जाता है आज 9 मार्च ठीक वैसा ही मेरे मन में फंसा हुआ है जैसा पिछले साल का 9 मार्च था। आज ही के दिन पिताजी आकस्मिक रूप से अपनी यात्रा पूर्ण कर हमें दुनिया में अकेला छोड़ गए थे।
पिछले एक साल में पिता का न होना क्या होता है इसके अर्थ समझ पाया हूँ उनके जीते जी मेरी उनसे तमाम मुद्दों पर असहमतियां/मतभेद रहे थे परन्तु अब मुझे खुद के तर्क बेहद बचकाने और हास्यास्पद लगते है।
पिछले एक साल से कोई दिन ऐसा नही गया होगा जिसमें पिताजी की कमी न खली हो परन्तु स्मृतियों को सायास एक बंद कमरें में रख छोड़ा था यहां तक तमाम रिश्तेंदारों के दबाव के बावजूद घर की बैठक में पिताजी का मालायुक्त चित्र भी नही लगनें दिया क्योंकि सच्चाई यह है मनुष्य की नश्वरता के नाम का पूरे परिवार को उपदेश देते देते मैं खुद अंदर से इतना कमजोर और डरा हुआ था कि पिताजी को एक निर्जीव फ्रेम में टंगा देखनें की हिम्मत मुझमें नही थी।
जीवन में पिता का न होना आपके जीवन में एक स्थाई किस्म की आश्वस्ति का न होना होता है आपकी तमाम दुनियावी सफलता महज एक घटना में तब्दील हो जाती है क्योंकि आपसे ज्यादा उस पर फख्र करनें वाला आपके पास नही होता है।
पिताजी के निधन के बाद मेरे जीवन में यू टर्न आया और पिछले एक साल से गाँव में हूँ उनका स्थान लेना तो बहुत बड़ी बात है गाँव के लिहाज से मैं उनका दशमांश भी नही बन पाया हूँ। गाँव में उनका कद बेहद बड़ा था उनका एक लिहाज़ था और इसी के चलतें पूरे गाँव में कोई उन्हें उनके नाम से सम्बोधित नही करता था। भलें ही पिताजी एक सामन्त जमींदार थे परन्तु वो कभी शोषक नही थे बल्कि गाँव के अन्य चौधरियों द्वारा सताए गए गरीब दलित/पिछड़ों के रक्षक थे वो सच्चे अर्थों में शरणागत वत्सल थें।
बहरहाल, पिताजी को लेकर एक सवाल अक्सर मन में घूमता रहता है कि अभी बहुत जल्द था उनका जाना उन्हें इस समय नही जाना चाहिए था वो तो एक हफ्ते की बीमारी भोग निकल गए इस दुनिया से।और पीछे छोड़ गए एक यथार्थ का एक कड़वा संसार जहां रोज जीना है रोज मरना हैं।
पिता का न होना आपको एकदम से इतना बड़ा बना देता है कि आप उस प्रौढ़ता को जीते हुए कब हंसना भूल जाते है खुद आपको भी नही पता चलता है।
फिलहाल एक साल बीत गया है मगर बहुत कुछ है जो मेरे अंदर बीत नही रहा है कुछ सवाल कुछ अधूरे जवाब और कुछ धुंधले स्वप्न मेरे जेहन में यादों की आंच में पकतें है और पिघलता मैं जाता हूँ।
पारिवारिक उत्तरदायित्व के भूमिका में जब कभी तन्हा घिर जाता हूँ तब पिताजी का न होना बड़ी शिद्दत से याद आता है निसन्देह सूक्ष्म रूप में पिताजी मुझे यूं देखकर मुस्कुराते होंगे क्योंकि उनको जितनी सलाह मैं दिया करता था अब मैं खुद उस किस्म की एक भी अमल नही कर पाता हूँ।
लोक परलोक में प्रायः यकीन नही रखता हूँ परन्तु आज खुद को सांत्वना देने के लिए यही कहता हूँ ईश्वर पिताजी को इस सांसारिक जीवन मरण से मुक्त करें और अपने श्री चरणों में स्थान दें भले ही इसके लिए मेरे संचित कर्मों का भी उपयोग कर लें। जीवन है तो सम्बन्ध है और सम्बन्ध है तो दुःख है। बीतते सालों में पिताज़ी की स्मृतियाँ मुझे मजबूत बनाएं यही कामना करता हूँ।

एक साल का एक वृत्त पूर्ण होने पर एक अभागे पुत्र की अपने पिता को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि !

Sunday, February 22, 2015

रॉकस्टार

रॉकस्टार: ‘जो मेरे अंदर कहीं रहता है’

आज रॉकस्टार फिल्म देखी। फिल्म पुरानी है मगर एक मित्र ने अनुशंसा की तो देखने की वाजिब वजह मिल गई। सबसे पहले तो उस दोस्त का आभार जिसनें एक खूबसूरत फिल्म का हिस्सा बनने के लिए मुझे प्रेरित किया। यह फिल्म मुझसे छूट गई थी इसका अब मुझे मलाल हुआ है। आज फिल्म पर समीक्षा जैसा कुछ नही लिखूंगा बस फिल्म के जरिए खुद के अहसास के खुले पोस्टकार्ड बेनामी पतों पर लिखने और भेजने का मन है। रॉकस्टार एक ऐसे रुहानी किरदार की कहानी है जो हमारे अन्दर ही बसता है खुद से खुद की रिहाई और खुद को खुद के अक्स से देखने की फुरसत ये कमबख्त दुनिया कब देती है और फिल्म इसी ही हिमायत करती है। निजी तौर पर मेरी जो संगीत की समझ कहती है रॉक बैचेनियों का संगीत है। रॉक म्यूजिक रुह की बैचेनियों का लाउड साउंड के जरिए कैथारसिस है वो हमारी बंदिशों को तोडकर हमे आजाद होने की ख्वाहिश का आसमान देता है। रॉकस्टार दरअसल एक ऐसी ही दुनिया की कहानी है जो हम सबके अन्दर एक अमूर्त रुप में बनती बिगडी रहती है। ये भी सच बात है कि कम ही लोग जेजे ( जॉर्डन) की तरह उस अहसास को पहचान पाते है जो दर्द के लिफाफे में अक्सर बैरंग खत की शक्ल में हमारे तकिए के नीचे सिरहारने रखा मिलता है और हम अक्सर करवट बदल सो जाते है। जॉर्डन और हीर दरअसल दो किरदार नही है बल्कि मै उनको किरदार से आगे बढकर दो उन्मुक्त चेतनाएं कहूंगा जो एक दूसरे पर आश्रित भी है और एकदूसरे को जानने समझने की यात्रा पर भी है।फिल्म में नायक और नायिका का आपसी भरोसे का मेआर भी बहुत ऊंचा है जिससे हौसला मिलता है। फिल्म का एक अपना महीन सूक्ष्म मनोविज्ञान है रॉकस्टार फिल्म एक ‘विचित्र अहसास’ को परिभाषित करती है उसके जिन्दगी मे देर सबेर दस्तक होने पर उसके बाद के जिन्दगी मे आये बदलाव को एक नए नजरिए से देखने का जज्बा देती है। फिल्म में मैत्री और प्रेम से इतर भी एक अपरिभाषित रिश्तें की व्यापकता और उसको स्वीकार कर जीने की कहानी भी है। जॉर्डन ( रणवीर कपूर) और हीर ( नरगिस फाखरी) दोनो की सहजता प्रभावित करती है दोनो की प्रयोगधर्मिता आरम्भ मानवीय सम्बंधो को देहातीत होने की सम्भावना को भी पल्लवित करती है। निसन्देह स्त्री पुरुष सम्बंधों मे देह एक मनोवैज्ञानिक सच है यह एक लौकिक तत्व है इसके अलावा पूरी फिल्म में इशक में दरगाह की रुहानियत है बैचेनियों के आलाप है। फिल्म में म्यूजिक लोबान की तरह जलता है और रुह को सुकून अता करता है पूरी फिल्म में एक खास किस्म का अधूरापन भी प्रोजेक्ट किया है जो एक Abstract Emotion के रुप में उपस्थित रहता है।

दरअसल,फिल्म इश्क के जरिए खुद के रुह की बैचेनियों को रफू करने की एक ईमानदार कोशिस है जो इसकी फिक्र नही करती है कि क्या दुनियावी लिहाज़ से ठीक है और क्या गलत है। एक पाक इश्क के ज़ज़्बात को फिल्म एक बिखरी हुई कहानी में पिरोती है और उसी के जरिए दिल की बीमारी का ईलाज़ करती है। फिल्म को देखते हुए खुद का दिल कई बार बेहद तेज धडकने लगता है जिसका एक ही मतलब है कि बात सीधे तक दस्तक दे रही है। दिल का टूटना और दर्द को महसूस करना किसी भी फनकार के लिए जरुरी है फिल्म इसी के सहारे आगे बढती है मगर इस दर्द की कीमत सच में बहुत बडी है यकीनन इश्क का मरहम उसकी मरहम पट्टी जरुर कर सकता है मगर कमबख्त ! इस मतलबी दुनिया न हीर जैसी माशूका मिलती है और न जॉर्डन जैसा आशिक।रॉकस्टार हम सबके अन्दर दबे एक ऐसे वजूद को से हमें मिलवाती है जो सही गलत के भेद मे नही पडना चाहता बस मुक्त हो जीना चाहता है कुछ मासूम अहसासो के जरिए दुनियादारी के लिहाज़ से वो गंद मचाना चाहता है मगर ये गंद मासूम बदमाशियों से शुरु हो रुहों के मिलन पर जाकर खत्म होती है। इतनी हिम्मत जब रब अता करता है तब एक ऐसी दुनिया का हिस्सा हम खुद ब खुद बन जाते है जो इश्क के वलियों की दुनिया है जहां हमारी रुह अपने बिछडे अहसासों से मिलकर थोडी देर के लिए एक रुहानी जश्न मे खो जाती है। ये फिल्म सच में सूफियाना फिल्म है जो हमे खुद के करीब ले आती है भले घंटे दो घंटे के लिए ही सही।

और अंत में शुक्रिया दोस्त 

Wednesday, January 14, 2015

परिवर्तन

प्रायः साधना को आध्यात्म से जोड़कर देखा जाता है। व्यापक सन्दर्भों में इसकी जड़े दर्शन और आध्यात्म से ही पोषित होती है। ये स्वयं को साधने से सम्बंधित है इसलिए साधना कहा गया है और जरूरी नही प्रत्येक साधना रहस्यमयी ही हो हम रोजमर्रा की जिंदगी में भी किसी न किसी स्तर पर साधनारत होते ही है। आध्यात्म,रहस्यवाद,साधना इनसे आत्म उन्नयन की दिशा में आगे बढ़ सकते बशर्ते आप होशपूर्वक खुद को देख सके और जो भी कदम इस दिशा में आगे बढ़ाएं उससे आपके ईगो को खुराक न मिल पाये बल्कि ईगो के प्रति अपनी प्रतिक्रिया को विलम्बित करते हुए लगभग स्तंभित कर दिया जाना चाहिए।
बिना किसी उपलब्धि सरीखी स्प्रिचुअल ग्लैमराईजेशन और महानताबोध के मैंने एक प्रयोग खुद के साथ किया वास्तव इस प्रयोग के पीछे न साधना जैसे भाव थे न उस तरह किसी लक्ष्य का निर्धारण किया था। लम्बें समय से मेरी आदत पकी हुई थी भोजन के समय प्रिय आहार देख आह्लादित हो जाना और नापसन्द की चीज़ बनी देख कर हद दर्जे का खिन्न हो जाना कई दफा प्रतिक्रिया स्वरूप दाल/सब्जी चिढ कर छोड़ देता और केवल नमक से रोटी खाता था। इसकी वजह से प्रायः घर पर वही बनता जो केवल मुझे पसन्द होता था और मेरी पसन्द बेहद सीमित किस्म थी मसलन सब्जियां लगभग ना के बराबर खाता था। इसके अलावा आहार व्यवहार से जुडी एक आदत और थी भूख लगी होने की स्थिति में मेरी इच्छा होती कि घर पर सबसे पहले भोजन मुझे मिलें।
पिछले 9 महीने से गाँव में हूँ इन आदतों के चलते शुरुवात में थोड़ी असुविधा हुई परन्तु बाद में स्वत: ही खुद में यह परिवर्तन आ गया कि अब भोजन के प्रति एक साक्षी भाव उत्पन्न हो गया है। अमूमन जब माताजी मुझसे यह पूछती कि आज क्या बनाये तो मै घर के अन्य सदस्यों की पसन्द के अनुरूप खाना बनाने की बात कहता हूँ। अब मुझे न सबसे पहले भोजन चाहिए और न केवल खुद की पसन्द अब न बेस्वाद भोजन बनने पर मेरी कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया होती है। अब जिस समय और जैसा भी भोजन मिल जाए मुझे रुचिपूर्ण लगता है। अब मुझे इस बात से कोई ख़ास फर्क नही पड़ता कि भोजन मेरी पसन्द का बना है या मेरी नापसन्द का बस उसे शरीर की एक जरूरत समझ साक्षी भाव से ग्रहण करता हूँ और इससे मुझे बेहद संतोष भी मिलता है। अब समझ की यात्रा भोजन/स्वाद से आगे निकल गई है अब जो भी जिस समय मिल जाए वो ही सहर्ष स्वीकार है। खाने के मामलें में मेरी नगण्य प्रतिक्रिया हो गई है इस बात पर परिजन भी हैरान है कि एक चूजी और चटोरा शख्स ऐसे कैसे बदल गया है। यह बदलाव बेहद सुखद है।
गौरतलब हो यह कोई विशिष्ट बात नही है कोई उपलब्धि है जिसका ग्लेमराईजेशन करके मै अपने ईगो को पुष्ट करना चाह रहा हूँ यहां इसका उल्लेख केवल इस भाव से किया है कि अपने कंडीशण्ड जीवन में कुछ रेडिकल चेंज लाकर कई दफा चेतना की जड़ता टूटती है जिसका अपना एक सुख है।
प्रयोग के रूप में आप अपनी किसी आग्रही आदत के उलट जाकर साक्षी या स्वीकार भाव विकसित कर सकते है। देखिए एक रेडिकल चेंज आपको कितनी सुखद अनुभूति देता है।

'रेडकिल चेंज'

Wednesday, December 24, 2014

ख़्वाब

कुछ ख़्वाब केवल
आँखें देखती है
उन्हें देखने की इजाज़त
दिल और दिमाग नही देते
ऐसी बाग़ी आँखों से
नींद विरोध में विदा हो जाती है
ऐसे ख़्वाब बहुत जल्द
नींद की जरूरत से बाहर निकल आते है
वो हमारी चेतना का हिस्सा बन
खुली आँखों हमें दिखते है
दिल अपनी कमजोरी दिखाता नही
दिमाग को जताता है अक्सर
और दिमाग की होती है एक ही जिद
वो देखना चाहता हमें हर हालत में
विजयी और सफल
दिल धड़कनों की आवाज़ सुनता है
सुनकर डरता है
वो भांप लेता है
मन के राग के आलाप
जो बज रहे होते है
बिना लय सुर ताल के
इन ख़्वाबों को देखते हुए
न रूह थकती है और न आँख
दोनों ही करती है इन्तजार
एक ऐसे ख़्वाब के सच होने का
यही इन्तजार बनता है जीने की वजह
मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने में ऐसे ख़्वाब
ईश्वर के नियोजित षडयन्त्र का हिस्सा होते है
क्योंकि
ऐसे ख़्वाब कभी पूरे नही होते
बस उनका अधूरापन
उन्हें न कभी बूढ़ा नही होने देता
और न मरने देता है।

© डॉ. अजीत

Monday, December 8, 2014

दुःख का मनोविज्ञान

तमाम उम्र जो रिश्तों की तुरपाई करता रहा उसकी भूमिकाऐं बदली मगर न वो बदला और न उसके अंदर की अच्छाई ही। जिंदगी ने उसको बहुत जल्दी ही नट की तरह संतुलन साधने के लिए प्रशिक्षित कर दिया था। जिन्दगी ने उसको उम्मीदें दी मगर उसके बदले जो लिया वो उसके चाहने वालो का स्थाई दुःख बना रहेगा उम्र भर। सुख दुःख की धूप छाँव में उसके हिस्से तपती धूप ज्यादा आई मगर उसको धूप छाँव से ज्यादा अपना खुद का आसमान बुनने की धुन थी उसने सबको दिया अपने हिस्से का आकाश। उसका होना सबके लिए एक आश्वस्ति जैसा था उसके रहतें हर गलती छोटी और हर खुशी बड़ी हो जाती थी। उसकी डांट में फ़िक्र और दुआओं में अपने संचित कर्मों को बांटने की आदत शामिल थी।
वो जब तक आसपास था तब तक अपने कद का अकेला अहसास साथ नही चलता था परछाई पर उसकी परछाई की नजर साथ चलती थी। एक छोटी सी दुनिया के जितना बड़ा विस्तार हो सकता था उसका केंद्र था वो अकेला शख्स। नही देखा था कभी उसको बोझिल बातें करते हुए। वो कभी एक निरपेक्ष यात्री था तो कभी एक संघर्षरत योद्धा।
बाहर की दुनिया से लड़ते भिड़ते बनते बिगड़ते उसकी जो लड़ाई खुद से चल रही थी उसका किसी को भी आभास नही था और जब वो प्रकट हुई तो उसके बाद की दुनिया बेहद निःसहाय किस्म की हो गई थी।
उस आदर्श पुरुष को तयशुदा मौत की तरफ बढ़ते हुए देखना जीवन का सबसे अविस्मरणीय निसहायताबोध था। जब तक हम अपने हिस्से के सुख का दशमांश भी उसको लौटा पातें नियति ने उसके लेने के सारे केंद्र पर मनाही का ताला टांग दिया था।
किस्तों में अपने प्रियजन को पीड़ा त्रासदी और मौत के चक्र का हिस्सा बनते देखना सदी का सबसे बड़ा दुःख था और ये दुःख तब और भी गहरा जाता जब वो शख्स मेरा पिता था। तमाम वैचारिक असहमतियों के बावजूद और कथित ज्ञान अर्जन के बाद भी मेरा कद कभी इस काबिल न हो सकता है कि उनके किए कामों को अच्छा या बुरा कहकर सम्पादित कर सकूं।
जीवन का उत्तरार्द्ध जब सुख भोगने के लिए शास्त्रों ने अनुकूल बताया तब भी मुझे यकीन नही होता था मगर पिता का ऐसे आकस्मिक चलें जाना मेरे उस विश्वास को और पुष्ट कर गया कि कुछ लोगो के न पूर्वाद्ध में सुख नसीब होता है और उत्तरार्द्ध में वो जीवनपर्यन्त अपने हिस्से का दुःख जीने और सुख बांटने के लिए ही जन्म लेते है।
पिता का यूं चले जाना अपने साथ एक दुनिया ले जाता है जहां बहुत से ऐसे प्रश्न हमारें मन में घूमते रहते है जिनका कोई जवाब किसी के पास नही होता है।
वक्त भले ही सब सीखा देता है परन्तु एक निर्वात सदैव मन के अंदर बचा रह जाता है जहां कुछ वक्त से शिकायतें कुछ खुद से सवाल चलते रहतें गाहे बगाहे मनुष्य के रूप में इस निर्वात को जीना बेहद त्रासदपूर्ण लगता है क्योंकि हम केवल सोच कर भी मन को सांत्वना नही दे पातें है ऐसे दुःख बड़े अपरिहार्य और ढीठ किस्म के होते है कहने/लिखनें/बांटने से इनकी मात्रा और तीव्रता पर कोई फर्क नही पड़ता है।

Sunday, November 2, 2014

त्रिशंकु

धर्म को छोड कोई दूसरी एक भी चीज ऐसी नही थी जिसे मै बदल सकता था और धर्म के बदलने से मेरी किसी समस्या का समाधान नही हो सकता था। प्रज्ञा चेतना और सम्वेदना की यात्रा पर मै पैदल चलता चलता बहुत दूर निकल आया था इस मार्ग का चयन मेरा खुद का चयन नही था बल्कि इस मार्ग मे खुद मुझे चुन लिया था। वय वर्ग जाति धर्म सबके लिहाज़ से लगभग मै निष्काषित और निर्वासित था यह एक किस्म का स्व निर्वासन था। वर्ण संकरो दलितों अति पिछ्डो अल्पसंख्यकों की स्थिति मुझसे सम्मानजनक थी क्योंकि वें अपनी पहचान के साथ संगठित थे वे लड रहे थे अपने हिस्से की लडाईयां।
नितांत संयोग के चलते जिस धर्म जाति पृष्टभूमि में जन्म हुआ उसकी रवायतों मे मेरी दिलचस्पी किशोरावस्था के शुरु होने तक रही तब तक मेरा मस्तक भी गर्व से भरा रहता कभी अपने हिन्दू होने पर और कभी अपनी जाति के गौरवशाली इतिहास पर मगर शायद अस्तित्व का नियोजन दूसरे किस्म का था उसने मेरे हिस्से वर्ग निर्वासन/बहिष्कार लिख दिया था जैसे ही समझ जैसी किसी चीज का उदभव मन मे हुआ तो पता चला कि गर्व तो केवल उस चीज़ पर किया जा सकता है जो आपने अपने श्रम से अर्जित की हो बाकि तो संयोग की भीख में मिला हो उस पर गर्व करने का कोई औचित्य नही बनता है इसलिए तभी उस मिथ्याभिमान से मुक्त हुआ मेरे लिए हिन्दू होना और अपनी इस क्षत्रिय जाति में पैदा होना ठीक एक संयोग का मामला लगने लगा।
अपने अतीत से कटकर चलना आपकी आंतरिक यात्रा के लिए सहज हो सकता है मगर बाह्य जगत मे इतनी सहजता नही मिलती है एक तरफ तो मै अपने वर्ग से कटाव की प्रक्रिया से गुजर रहा था वहीं दूसरी तरफ तमाम संवेदनशीलता के बावजूद मेरे दलित और अति पिछ्डें मित्रों के लिए मुझे उसी सदाश्यता से स्वीकार कर पाना मुश्किल था जिस वर्ग से उनका प्रतिशोध का रिश्ता रहा हो उस वर्ग से निर्वासित किसी व्यक्ति को अपने समूह का हिस्सा बनाने से पहले उनके मन मे तमाम शंकाएं थी सच तो ये है सखा भाव से वो कभी आत्मसात कर भी नही पाए मेरे सम्वेदनशील रचनाधर्मी व्यक्तित्व के बावजूद मेरा कद और मेरा अक्स उन्हें घसीटता हुआ अपने अतीत मे ले जाता जहाँ सामंती शोषण के तमाम किस्से उनके जेहन मे विचर रहे होते उस वक्त उनका मन मुझे लेकर तीन हिस्सों में बंट जाता एक मन मुझे बिना शर्त और शंकारहित स्वीकारने की वकालत करता एक मन उन्हे सावधान करता कि सामंती चरित्र के षडयंत्र कभी नही समाप्त होते है इसे जब भी मौका मिलेगा ये तुम्हें तुम्हारी औकात बता देगा और तीसरा मन एक खास किस्म के सैडेटिव प्लीज़र मे जीता उसे लगता कि अब उनकी वैचारिकी और संघर्ष के परिणाम सामने आने लगे है एक खांटी सामंती परिवार का लडका उनकी सोहबत मे आकर राहत महसूस करता है वें उसके साथ हमप्याला होते समय गर्व और अभिमान से भर जाते उस समय वंचित वर्ग का सामंती मनोविज्ञान देखा जा सकता था वस्तुत: मनुष्य का स्वाभाविक चरित्र पावर सेंटर ही विकसित करना होता है।
इन तीन किस्म के मन के बीच मै सच्चे दोस्तों के हाथ पकड उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिस करता कि मै शोषक,उत्पीडक नही हूं चेतन स्तर पर वो इससे सहमत भी थे परंतु अर्द्धचेतन और अवचेतन के स्तर पर उनका भोगा हुआ यथार्थ मुझे समग्र रुप से कभी स्वीकार न कर पाता उस समय मेरी बडी विचित्र स्थिति हो जाती है एक तरफ मै अपना मूल खुद काटकर आया हूं वही दूसरी तरफ जो मेरा मित्र वर्ग है उसकी शंका सन्देह या ग्राह्यता मुझे स्वीकारने मे बाधा बनती जाती है मै त्रिशकुं की भांति बीच मे लटक जाता था।
अपने आसपास के आसमान को देखने पर पता चलता कि मै अकेला त्रिशकुं नही हूं यहां तो मेरे जैसे बहुत से लोग है जो अपने हिस्से का निर्वासन झेल रहे है अपने वर्ग मे उनकी दिलचस्पी और श्रद्धा नही बची है और जिन लोगो की तरफ वो उम्मीद और मानवीय दृष्टि से आए थे उनके पूर्वाग्रह और संघर्षो की आंच ने उन्हें कभी करीब नही आने दिया। मैने देखा इन त्रिशकुंओं मे कुछ ब्राहमण भी थे वो उदास होकर बताते कि उनके पूर्वजों ने चाहे जो किया हो मगर उन्होने कभी दलितों को नही सताया वो दलितों से मैत्री की अभिलाषा मे थें मगर दलित/पिछ्डे मित्रों को उनके आने से षडयंत्र और अपना आन्दोलन कमजोर पडने का भय था इसलिए उनको टांग दिया जाता था ऐसे ही आसमान में उनमे से कुछ सच्चे मुसलमान थे जिन्होनें लानत भेजी थी हिंसा पर जेहाद के बदले आंतक और इंसानों के कतले आम पर जिसके बदले मुसलमानों ने उन्हे काफिर कहा मगर हिन्दूओं के लिए वो कभी सहज न्ही रहे उन्हें लगता रहा कि ये मुसलमान पहले है इंसान बाद में।
खांचों मे बंटकर रहना इंसान की नियति है अपने लिए सुरक्षा तलाशना मनुष्य की अस्तित्व को बचाने की अपनी सबसे बडी युक्ति विचारधारा जिस ईमानदारी की मांग करती है वो ईमानदारी एक किस्म का पूर्वाग्रह साथ बांटती है जिसके चलते मेरे जैसे बहुत से लोग अपने अपने हिस्से का निर्वासन भोगते हुए ताउम्र यही बताते रहते है कि वो वैसे कतई नही है जैसे उनके पूर्वज़ रहे होंगे अपने बिना किसी दोष वो जीते है अपने हिस्से का अपराधबोध बार बार यह विश्वास दिलाते है कि मै अपने लोगो अपनी परम्पराओं के खिलाफ आपके नही मगर अविश्वास और भोगे हुए यथार्थ की चासनी इतनी गाढी होती है उसमे अपना संघर्ष हमेशा गाढा और मीठा दिखता है दूसरे व्यक्ति का उद्देश्यपूर्ण ! मनुष्य की समझ पर यह एक ऐसा प्रश्नचिंह है जो हाल फिलहाल तो मिटता नही दिखता है बाकि उम्मीद पर दुनिया कायम है और मै भी इसी उम्मीद पर कायम हूं शायद कल इंसान को उसके मौलिक वजूद से पहचाना जाए न कि उसकी धर्म,जाति,आर्थिक-सामाजिक पृष्टभूमि से उसकी सीमाएं निर्धारित की जाएं।


‘एक त्रिशकुं की आपबीती

Friday, October 3, 2014

हैदर

'हैदर' रिश्तों की सच्चाई और कश्मीर वादी की स्याह हकीकत की महीन पड़ताल करती फिल्म है। फिल्म में दो यात्राएं समानांतर रूप से चलती है एक कश्मीर में पूछताछ के नाम पर उठाए गए लोगो के परिवार की दारुण कथा है दूसरी रिश्तों की महीन बुनावट में उलझे प्यार की पैमाइश की कोशिस फिल्म करती दिखती है। फिल्म की गति थोड़ी स्लो है मगर एक बार जुड़ने के बाद आप फिल्म के सिरे जोड़ पाते है। विशाल भारद्वाज की फिल्मों में स्त्री किरदार को काफी रहस्यमयी ढंग से विकसित किया जाता है हैदर में भी तब्बु के मिजाज़ को पढ़ने के लिए मन जीने से नीचे तहखाने में उतरना पड़ता है।
फिल्म मां-बेटे और भाभी-देवर के रिश्तें को काफी अलग एंगल से दिखाया गया है। हैदर और उसकी मां यानि तब्बु के रिश्तें में एक अलग किस्म की टोन भी है जो कभी कभी विस्मय से भरती है।फिल्म उम्मीद,बेरुखी,इश्क और धोखे के जरिए कश्मीर की अवाम के एक जायज मसले पर बात करती नजर आती है। केके मेनन गजब के एक्टर है तब्बु के देवर खुर्रम मियाँ के रूप में उनका काम पसंद आया। श्रद्धा कपूर भी फिल्म में काफी नेचुरल लगी है वो काफी आगे तक जाएँगी। शाहिद कपूर फिल्म में एक अपने रोल का एक फ्लेवर मेंटन नही रख पाते है कहीं बहुत भारी हो जाते तो कहीं थोड़े कमजोर निजी तौर पर फिल्म में श्रीनगर के लाल चौक पर एक कश्मीर की हालात पर एक पोलिटिकल स्टायर करने के सीन में बेहद गजब की परफोर्मेंस देते दिखे ओवरआल ठीक ही है। फिल्म में इरफ़ान खान और नरेंद्र झा का रोल काफी छोटा है मगर इरफ़ान खान तो इरफ़ान खान वो गागर में सागर भर देते है नरेंद्र झा का काम भी बहुत क्लासिक किस्म का है।
फिल्म में गीतों में गुलजार ने कश्मीर की खुशबू भर दी है उनमें आंचलिकता का पुट है फिल्म में फैज़ की शायरी फिल्म को असल मुद्दे से जोड़े रखती है।
फिल्म की कमजोरी स्लो होना है जिन दर्शकों के पास सब्र नही है उन्हें फिल्म नही देखनी चाहिए हैदर को महसूस करने के लिए दिमाग का खुला और दिल का जला होना जरूरी है मौज मस्ती के लिए कोई और स्क्रीन देखी जा सकती है। विशाल भारद्वाज ने एक संवेदनशील मसलें पर एक काफी प्रासंगिक फिल्म बनाई है इसके लिए वो बधाई के पात्र है।

(आज घुटने में दर्द के बावजूद यह फिल्म बड़े बेटे राहुल के साथ देखी राहुल की मल्टीप्लेक्स स्क्रीन की यह पहली फिल्म थी इसलिए उसके लिए यह फिल्म और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। दोस्तों के साथ बहुत से फ़िल्में देखी है मगर आज बेटे को दोस्त के रूप फिल्म दिखाकर एक अलग किस्म का सुख मिला इसलिए भी हैदर ताउम्र मेरे लिए एक यादगार फिल्म रहेगी)

Tuesday, September 30, 2014

वो तीन

मोहम्मद अजीज़ शब्बीर कुमार अनवर ये तीन ऐसे गायक है जो अस्सी-नब्बे के दशक में बेहद लोकप्रिय रहें है यूपी और बिहार में आज भी मोहम्मद अजीज़ के चाहने वालो की कमी नही है उनके रोमांटिक ड्युटस आज भी ऑटो/बस ने सुने जा सकते है इस दौर की पढ़ी लिखी पीढ़ी को न उनमे नाम याद होंगे और न उनके गाए सुपरहिट गीत हाँ उनको एक वर्ग विशेष की पसंद में जरुर टाइप्ड कर दिया गया है। मोहम्मद अजीज़ को बस/ऑटो ड्राईवर रिक्शा चालको की पसंद का गायक समझा जाने लगा है। मगर ये तीनो अपने अपने किस्म के अजीम फनकार रहें है सभी नही तो कुछ गीत मोहम्मद अजीज़ ने बेहद दिलकश आवाज में गाएं है चाहे वह कर्मा फिल्म का कालजयी गीत दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए या फिर फिल्म मुद्दत का रोमांटिक गीत प्यार हमारा अमर रहेगा याद करेगा ये जहां हो...ठीक ऐसे ही शब्बीर कुमार और अनवर के भी बेहद दिलकश गीत मौजूद है।
बदलते वक्त ने इस फनकारों को हमारी याददाश्त से बाहर कर दिया है मै कभी कभी इनके एकाकी जीवन की कल्पना करता हूँ तो सिहर जाता हूँ मोहम्मद अजीज़ ने खासी लोकप्रियता का समय भी जिया है अब जब उन्हें इंडस्ट्री में कोई नही पूछता है तब वो कैसे निर्वासन में जिन्दगी जीते होंगे ऐसे गुमनामी जिन्दगी जीना बेहद मुश्किल होती होगी पिछले दिनों कहीं पढ़ा था वो आर्थिक बदहाली से भी गुजर रहें है। फ़िल्मी दुनिया की कितनी छोटी याददाश्त होती है कल तक जो आपका स्टार गायक था आज गुमनाम है यही बात हम श्रोताओं की भी है हम आगे बढ़ते चले जाते है एक दौर कुमार शानू अलका याज्ञनिक सोनू निगम का था अब वो भी ढलान पर है अब अरजित मोहित चौहान या नए लोगो का दौर है। कुमार शानू को अब मै मोहम्मद अजीज की जगह जाता देखता हूँ उनके मेलोडियस सोंग्स भी अब एक वर्ग विशेष तक सीमित होकर रह गए वरना एक समय था जब रोमांटिक ट्रैक का मतलब की कुमार शानू था पुरानी आशिकी फिल्म के गीतों ने क्या धमाल मचाया था।
कुल मिलाकर मेरी तो आदत अतीत में जीने की रही है इसलिए गाहे बगाहे इन पुराने दौर के फनकारो को याद करता रहता हूँ। किशोर-रफी-मुकेश त्रयी की दुनिया से भी अलग फनकारों की एक दुनिया रही है जिन्होंने अपने फन की ताकत से अपने चाहने वाले पैदा किए अब आप उन्हें लोअर मीडिल क्लास समझ मूल्यवान न समझे तो यह आपकी समझ की सीमा हो सकती है। बड़े चेहरों के बीच खुद को जमाना बहुत हिम्मत की बात होती है हिन्दी फ़िल्मी गायकी के इन सर्वहारा का मै बड़े दिल से सम्मान करता हूँ और उन्हें उनके गीतों के माध्यम से शिद्दत से याद भी करता हूँ। भले वो आज हाशिए की जिन्दगी जी रहें है मगर मेरे लिए वो सदैव मेरे दिल के करीब ही रहेंगे उनको यादों में बचाकर रखना दरअसल उस दौर को बचाकर रखना था जब हम गुनगुनाने की सच्ची वजह अपने दिल में रखते थे आज की तरह नही कि गायक का नाम भी मुश्किल से याद रह पाता है। 

Monday, September 29, 2014

सच के आर-पार


विज्ञान के डर से आध्यात्म की शरण व्यक्ति को एक मानसिक सांत्वना तो देती ही है साथ ही जीवन के मिथ्या होने के बोध से साक्षात्कार करा कर उसे आपदा को भोगने के लिए मानसिक रुप से तैय़ार भी करती है।
गांव में स्कूल से लेकर बीए तक मेरा साथ देने वाला मेरा एकमात्र लंगोटिया यार है देवेन्द्र। अभी परसो मेरे पास आया था मिलनें के लिए दोपहर में कई घंटे सत्संग चला देवेन्द्र के साथ एक त्रासद कथा यह है उसकी पत्नि के गले मे भोजन नली में पिछले तीन साल से संकुचन हो रखा है जिससे भोजन निगलने मे उसे खासी दिक्कत होती है चंडीगढ पीजीआई में उसका उपचार भी करवाया मगर आशातीत सफलता नही मिली है डॉ वास्तविक बीमारी को भी नही खोज पाए थे दबे स्वरों और बुरी कल्पना में कुछ डॉ को यह भी सन्देह है कि यह गले का कैंसर हो सकता है। जब से पत्नि बीमार हुई है देवेन्द्र के लिए यह बेहद तनाव भरा वक्त रहा है उसका एक बेटा है घर भाई माता-पिता से भावनात्मक और मोरल सपोर्ट लगभग शून्य है। देवेन्द्र ने अपनी पत्नि के उपचार के लिए अपनी सामर्थ्य के हिसाब यथा सम्भव सब प्रयास किए कई कई दिन अकेले चंडीगढ पडा रहा जो जहां भी डॉक्टर बताता वही दिखाने चला जाता मगर कई से कोई उल्लेखनीय राहत नही मिली जब विज्ञान से राहत नही मिली तो उसने झाड फूंक वालों को भी खूब पत्नि को दिखाया मगर वहां के पाखंड से वह शीघ्र ही वाकिफ हो गया कहते है न जब आदमी परेशान होता है वह भी तर्कातीत हो किसी भी चमत्कार की उम्मीद लगा बैठता है इसी मनस्थिति में देवेन्द्र ने न जाने कहां कहां चक्कर न काटे मगर अंत मे हुआ वही ढाक के तीन पात।
फिलहाल एक साल देवेन्द्र की पत्नि का उपचार एक होम्योपैथ कर रहा है उससे उसे काफी आराम है अब वह एक-दो रोटी खा लेती है वरना एक बार तो नौबत तो यह भी आ गई थी कि वो तरल पदार्थ भी नही निगल पा रही थी। परसों मैने डरते-डरते देवेन्द्र से कहा भाई अगर यह कैंसर ही निकला तो क्या होगा एक पल के लिए देवेन्द्र भी सहम गया उसे सबसे ज्यादा फिक्र अपने पांच साल के बेटे की है भगवान न करें कुछ ऐसा वैसा हो जाए तो बच्चें का जीवन तबाह हो जाएगा..खैर मैने उसको कैंसर के कुछ एडवांस सेंटर पर जाकर टेस्ट वगैरह करवाने की सलाह दी है वो सहमत है मगर उसने बताया पत्नि बडे सेंटर पर जाने से डरती है कहीं कैसर की पुष्टि हो गई तो उसका क्या होगा फिलहाल वो इस भ्रम मे जीवन जी रही है कि होम्योपैथी से उसको आराम मिल रहा है और यही डॉक्टर उसको ठीक कर देगा।
इस त्रासद कथा का एक दूसरा पक्ष है जो मै बताने जा रहा हूं जब मै पीजी के लिए हरिद्वार आ गया देवेन्द्र गांव मे ही रह गया उसने प्राईवेट एम ए किया उस वक्त देवेन्द्र एक सामान्य गांव देहात का युवा था जिसकी अपनी लौकिक रुचियां थी धर्म और आध्यात्मिकता को बेकार की चीज़ समझता था उन दिनो मै वेदपाठी हुआ करता था वह मेरी भी मजाक बनाया करता था मगर अब पत्नि के इस स्वास्थ्य संकट के बाद जब मुसीबत ने चारो तरफ से घेर लिया अपने रक्त संम्बंधियों नें मूंह फेर लिया तब उसने आध्यात्म और ईश्वर को जानने समझने मे वक्त बिताना शुरु किया रामचरितमानस,गीता आदि का स्वाध्याय किया दैनिक पूजा आदि करने लगा है परसों उसने लगभग एक घंटे गीता के दार्शनिक पक्ष पर गजब का दार्शनिक व्याख्यान मुझे दिया स्थिर प्रज्ञ,जीवात्मा, सृष्टि चक्र, जीवन मरण, ईश्वर, माया,मोह. राग इन सब बिन्दूओं पर उसने धाराप्रवाह और तर्क सम्मत अपनी बात रखी है मै उसको अपलक सुनता रहा एक बार तो मुझे यकीन नही हुआ कि ये वही देवेन्द्र है जिस बीए पास को मै गांव छोड गया था जो धार्मिक कर्मकांड और व्रत रखने पर मेरा मजाक बनाया करता था।
गांव के जीवन और सीमित साधनों के साथ स्वाध्याय के बल पर उसने गीता के बारें जो समझ विकसित की है वो मेरे लिए हैरत मे डालने वाली थी उसने मुझसे कहा कि आप तो ज्ञानी ध्यानी आदमी है ( उसकी मान्यता है) कुछ और पुस्तकों का नाम बताईये ताकि ईश्वर को समझने मे मदद मिल सके मैने अपनी जानकारी के हिसाब से उसको कुछ नाम बताएं भी बल्कि यह भी आश्वासन दिया कि शहर से कुछ किताबें लाकर दूंगा।
इस पूरे प्रकरण का सारांश यही है कि कई बार विज्ञान जब इंसान को डराता है तब वह अपने मन की सांत्वना के लिए ईश्वर की शरण मे जाता है उसके अस्तित्व पर सवाल खडे करके उसे खोजता है मै दावे से कह सकता हूं यदि देवेन्द्र ने इस आपदकाल मे खुद को गीता के स्वाध्याय मे न लगाया होता तो वह मानसिक रुप से टूट चुका होता आज वह मजबूत होकर एक जीवनहंता बीमारी से लड रहा है साथ ही मानसिक रुप से दृढ हो रहा है। धर्म इस रुप मे जरुर उपयोगी हो सकता है।
परसों मै उसको अपलक होकर सुनता रहा है एकाध बिन्दूओं पर असहमत होते हुए भी उसका प्रतिकार नही किया गीता के तत्व दर्शन पर वह जितने अनुभूत अधिकार से बोल रहा था वह मेरे लिए चमत्कृत करने जैसा था उसकी बातों मे गीता के कर्म योग के तत्व दर्शन की बेहद प्रभावी और सरल भाषा मे व्याख्या थी। अपनी आंतरिक अनुभूतियों की बात कहूं तो उस दिन मै अर्जुन रुप में था और देवेन्द्र कृष्ण रुपी जीवन के तत्व का भाष्याकार...!
अज्ञेय ने सच ही कहा है दुख व्यक्ति को मांझता है..! मेरी दिल से यही कामना है कि यदि वास्तव मे ईश्वर जैसी कोई सत्ता विद्यमान है तो मेरे इस युद्धरत मित्र की पत्नि को सम्पूर्ण आरोग्य प्रदान करें ताकि विश्वास करने की वजह प्रज्ञा मे बची रहें।

डॉ.अजीत

Thursday, July 10, 2014

बजट का गजट

लगभग सभी सरकारों की नजर में सस्ती ब्याज दरों पर फसली ऋण उपलब्ध कराना किसानों के हित एवं कल्याण का सबसे बड़ा कदम है। मुझे अफ़सोस होता है कि कर्जे के मकडजाल और सहकारी/सरकारी क्षेत्रों के बैंको में व्याप्त भ्रष्टाचार के चक्रव्यूह में किसान किस कदर फंसा हुआ है किसी को इसकी सुध लेने का समय नही है।
जेटली साहब ! महज सस्ता कर्ज किसानों की मदद नही करता है इससे तो उनका शोषण और बढ़ता है पहले तो आप अपने मंत्रालय के अधीन बैंको के कार्मिको और मेनेजरों का रिफ्रेशर कोर्स करवाईए उनको यह तमीज सिखाइए कि देश के अन्नदाता से किस तरह बात की जाती है आपकी ब्याज दर घटाने से उनकी खीझ और बढ़ती है ( न जाने क्यूं, शायद खुद को वेतनभोगी-टैक्स दाता अभिमान होता होगा) और उन्हें किसान में फ्री में लोन लेंने वाला दरिद्र जीव लगता है।
मै आर्थिक मामलों का जानकार नही हूँ परन्तु मेरी समझ में किसानों को सस्ती ब्याज दर पर ऋण देने की घोषणा सुनने पढ़ने में जरुर राहत भरी/लोकप्रिय लग सकती है परन्तु इससे कोई लाभ नही होगा। अगर मोदी सरकार सच में किसानों का भला करना चाहती है तो इन कुछ बिंदूओ पर जरुर सोचना चाहिए था गौरतलब है इन सुझावों को राज्य या केंद्र के अधिकार क्षेत्र में उलझाकर नही बल्कि एक कॉमन पालिसी के जरिए लागू करना चाहिए--
1. गन्ना मिल मालिकों पर गन्ना भुगतान के नियमित भुगतान की जवाबदेही बनाने के लिए एक केन्द्रीय आयोग/ट्रिब्यूनल बनाया जाए।
2. कृषि यंत्रो/कीटनाशक/अन्य कृषि रसायन पर सब्सिडी दी जाए तथा प्राइवेट कम्पनीयों की लूट रोकने के लिए इनके विपणन में सहकारी क्षेत्र को शामिल किया जाए।
3. ग्रामीण क्षेत्रों में सिचाई हेतु विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित की जाए और नहर/राजवाहों को फिर से पुनर्जीवित किया जाए।
4. कृषि उत्पादन के लिए मंडियों में आढतियों पर प्राइस मोनोपोली रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाए ( अधिकाँश आढ़ती किसान की उपज का मनमुताबिक़ भाव तय करवाते है और किसान को किस्तों में भुगतान करते है यदि किसान को अपनी कृषि उपज का तुरंत भुगतान चाहिए तो दो रूपये प्रति सैंकड़ा काट कर भुगतान करते है)
5. किसानों को विशेष पहचान पत्र जारी किए जाए तथा उन्हें कृषि कार्यो हेतु सब्सिडी पर डीजल उपलब्ध कराया जाए।
6. गाँव के स्तर पर एक प्रशिक्षित एग्री काउंसलर नियुक्त किया जाए जो किसानों को रोग,उर्वरक,कीटनाशक,जैविक खेती के बारें में परामर्श प्रदान करें। मिट्टी के परीक्षण के लिए ब्लॉक स्तर पर एक मोबाइल वेन हो जिसमे वैज्ञानिक खुद खेत पर जाकर मृदा के नमूनें एकत्रित करें और रिपोर्ट खुद किसानों तक पहूंचाए।

....बाकि आपके पास आईएएस/ कृषि आर्थिकी के जानकार लोगो की लम्बी फौज है उनको वातानुकूलित कमरों/ फर्जी सर्वो के आंकड़ो और गूगल की रिसर्च से बाहर निकलने के लिए कहिए ताकि वो किसानों की दरिद्र हालत से रुबरु हो सके ऐसे दिल्ली में बैठ कंप्यूटर पर बजट छापने से न आपकी सरकार का भला होगा और न किसानों का।

(बजट में किसानों के हित के मीडिया प्रचार पर एक किसान की गैर विशेषज्ञ टिप्पणी )

Sunday, June 15, 2014

कुछ वर्जन

नौकरी क्यों छोडी?
नौकरी नही छोड़नी चाहिए थी कुछ बीच का रास्ता निकालना चाहिए था।
इमोशनल होकर निर्णय लिया प्रेक्टिकल होकर सोचना चाहिए था तुम्हारा करियर सामने था सात साल की यूनिवर्सिटी में एडहोक जॉब रूपी साधना थी अब परमानेंट होने का नम्बर था।
तुम एक अतिसम्वेदनशील एकांतप्रिय चिन्तनशील प्राणी हो गाँव में जल्दी खुद को इररेलिवेंट फील करना शुरू कर दोगे।
तुम्हारा बड़ा बेटा शारीरिक चुनौतियों से जूझता है उसके पुनर्वास में तुम्हारी महत्वपूर्ण भूमिका है महान बनने के चक्कर में अपनी खुद की फैमली को क्यों दांव पर लगा रहे हो।
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(पिताजी के निधन और मेरी गाँव वापसी पर कुछ दोस्तों की सलाह,हितचिंता और नसीहतों के कुछ वर्जन )

---- रिश्तेदारों के वर्जन :
गाँव में तुम ही मेनेजमेंट देख सकते हो बड़ा भाई डॉक्टर है वो कुछ नही कर सकता है छोटे वाला इंजीनियर है उसको नौकरी करने दो तुम गाँव में रहो।
रिश्तेदारी में आना-जाना शुरू करो लोगो के जीने-मरने में शामिल हुआ करो अब मूंह मोडकर काम नही चलेगा।
जमीन में पोपलर के पेड़ लगवा दो।
बच्चें गाँव में रखो अपने साथ हरिद्वार अकेले छोड़ने ठीक नही है।
जीते जी जो पिताजी के विरोधी रहे अब पिताजी के जीवन से उदाहरण खोजकर हमारे लिए अपेक्षाओं के मानक तैयार करते है।

गाँववालों के वर्जन:
गली में आते-जाते सबसे राम-राम करते चला करो।
लोगो के सुख दुःख में शामिल हुआ करो।
लोगो के यहाँ उठ-बैठ के लिए जाया करो।
एक बड़ा वर्ग आपके परिवार में निष्ठा रखता है उनका हालचाल पूछते रहा करो।
इस पंचायत चुनाव में प्रधान का चुनाव लड़ना है उसकी तैयारी रखो।

देख लीजिए मित्रों,
एक पिता के जीवन से यकायक चले जाने से आपका जीवन किन-किन वर्जनों से घिर जाता है ये सारे वर्जन कल्पनातीत थे मेरे लिए अब इनके बीच रहकर इनसे जूझते हुए जीने और आगे बढ़ने का कौशल विकसित कर रहा हूँ सही क्या है गलत क्या है नही जानता हूँ बस हाल फिलहाल तो कुछ चुनौतियों से निबटने में लगा हुआ हूँ वक्त इतना कम है कि खुद की कमजोरी पर सोचने की फुरसत भी है।

Friday, June 6, 2014

ताप

दोस्तों ! इस बात यकीन करना मुश्किल है कि गाँव में दिन यदि चार घंटे लाइट लगातार आ जाए तो उस दिन हम इस बात की खुशी में रहते है कि आज बिजली बढ़िया चली है। याददाश्त के बिनाह पर कह सकता हूँ कि यदा कदा ही शाम को गाँव में लाइट देखी है सुबह घर के बुजुर्ग बताते है कि रात लाइट आई थी।
उत्तर प्रदेश के सम्पन्न कहे जाने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उस गाँव का किस्सा कह रहा हूँ जिसकी आबादी लगभग बारह हजार है और गाँव में बिजलीघर भी है शेष यूपी के देहात का क्या हाल होगा समझा जा सकता है नेताजी के जिले या संसदीय क्षेत्र की रोशनी अपवाद हो सकती है।
सूर्य के प्रचंड ताप से खेत पर किसान खलिहान में पशु और घर पर बच्चे तप कर अपनी अपनी साधना में लीन है वातानुकूलित कक्षों के कहकहों में उनका जिक्र भी कहां शामिल होगा।
घर के एक से तीन साल के वय के बच्चें महीने भर में तीन से चार बार दस्त/बुखार की शिकायत से डॉक्टर के यहाँ जा चुके है अब बच्चा शाम को प्यार से लिपटना चाहता है तो गर्मी की आंच उसको मिनट भर में खुद से अलग कर देती है।
तपती दुपहरी में देह से टपकते पसीने की गंध को मिटा देना किसी भी देशी विदेशी डियो के बसकी बात नही है।
दो बखत स्नान और रात में छत पर मच्छरदानी लगाकर लेटने से थोड़ी राहत मिलती है रात को बारह से सुबह के पांच बजे तक जो बेसुध नींद आती है बस वही गाँव के जीवन का बोनस है इसकी तुलना एसी/कूलर और बंद कमरों की नींद से नही की जा सकती है।

Monday, December 2, 2013

बदहाल किसान और शाईनिंग इंडिया



किसानों की व्यथा-कथा इस देश में नई कतई नही है भिन्न-भिन्न प्रांतो के किसान अलग-अलग रुप से प्रताडित और शोषित है विदर्भ का किसान आत्महत्या कर रहा है तो यूपी का किसान अपनी बहन-बेटी की शादी और रोजमर्रा के खर्चो के लिए सरकार का मूँह ताक रहा है कि वह चीनी मिल मालिकों के साथ सख्ती से पेश आए और उसके बकाया का भुगतान कराये लेकिन हालत जस की तस बनी हुई है।
दोआब क्षेत्र के जिस गांव से मेरा ताल्लुक है वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ‘शुगर बाऊल’ के रुप मे जाना जाता है। मेरे पिताजी भले ही गांव के बडे काश्तकार है लेकिन गन्ना किसान होने की वजह से वो भी उतने ही प्रताडित और शोषित है जितना कोई एक आम किसान होता है। पिछले कई सालों से हम गांव के बडे गन्ना उत्पादक रहे है लेकिन अब यह बेहद घाटे का सौदा लगने लगा है। गन्ना किसान की जिन्दगी बद से बदतर होती जा रही है एक समय था जब गन्ना पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सबसे बडी कैश क्राप समझी जाती थी और इसी वजह से गन्ना उत्पादन की तरफ बेहताशा लोगो का रुझान भी बढा था लेकिन सरकार की चीनी मिल मालिकों से मिलीभगत होने की वजह अब गन्ना उत्पादन करना बेहद घाटे का सौदा बन कर रह गया है।
किसानों की दारुण कथा देखिए वह अपने बलबूते पर गन्ना उगाता है और उसको कटवा कर/छिलवा कर मिल के गेट तक अपने खर्चे पर पहूंचा कर आता है मिल प्रबंधन के लिए कोई टेंशन नही होती है उसे रॉ मैटेरियल अपने गेट तक फ्री मे मिल रहा है और गन्ने से चीनी के अलावा शीरा.खोई,ऐथनॉल का भी उत्पादन करता है लेकिन चीनी मिल मालिकों को चीनी की कीमतों का झूठा रोना रोने की ऐसी आदत पड गई है जिसके आधार पर वो जमकर कारपोर्टिया स्टाईल में ब्लैकमेलिंग करने में लग जाती है। सरकार के लिए किसान केवल मूर्ख किस्म का वोट बैंक है जो किसान होने से पहले अलग अलग जातियों में भी बटें हुए है इसलिए उनका उपयोग करना या उनको बहलाना सरकार के तुलनात्मक रुप से आसान काम है इसलिए उनकी तरजीह का हमेशा केन्द्र चीनी मिल मालिक ही रहते है।
सिस्टम की मार देखिए किसानों को कहने के लिए तो आसान ब्याज़ दर पर क्रेडिट कार्ड/क्राप लोन दिया जाता है लेकिन ये लोन लेना भी कम घाटे का सौदा नही है क्योंकि बैंक के लिए किसान बेहद घृणास्पद और मजबूर किस्म का ग्राहक है वह उसके जमीन की डीड के बदले बेहद कम राशि का लोन की मंजूर करते है और यह लोन लेने का भी कोई सीधा तंत्र नही है बीच मे दलालों की दूनिया है जिसके बिना आप लोन ले ही नही पाएंगे कुछ समय तक सरकारी बैकों के मैनेजर की केवल बेरुखी और बदतमीजी ही किसानों को बर्दाश्त करनी पडती थी अब हालत यह है कि बिना दलाल की मध्यस्ता के लोन ही नही मिल पायेगा और लोन के लिए उनके मौटे कमीशन भी तय है। यूपी मे सहकारी क्षेत्र का एक बैंक है भूमि विकास बैंक जिसके चैयरमेन मुलायम सिंह के भाई शिवपाल यादव है किसाने के दर्द के लिहाज़ यह भूमि हडप बैंक है यहाँ कमीशनखोर दलालों की 30 परशेंट का खुला रेट है मतलब यदि आपको 1 लाख का लोन चाहिए तो आपके हाथ इन कैश केवल 70 हजार ही लगेंगे बाकि के 30 हजार बैंक कर्मियों और दलालों में बतौर रिश्वत वितरित होंगे यह खुली व्यवस्था इसमे कोई भी लुका-छिपी का खेल नही है जहाँ जहाँ भूमि विकास बैंक है वहाँ वहाँ आपको ऐसे दलाल (जिन्हे डीलर कहा जाता है) के दफ्तर खुले मिलेंगे मेरी निजि पडताल यह भी पता चला कि यह एक सुनियोजित तंत्र है जिसमे पैसा जनपद और कस्बों से निकलकर राजधानी तक पहूंचता है।
किसानों की खून पसीने की कमाई का पैसा भले ही चीनी मिल मालिकों की तिजोरियों मे फंसा रहे उसकी कोई सुनवाई नही है अपने गन्ने के भुगतान का ब्याज़ की छोडिए मूलधन भी समय पर नही मिल पाता है  लेकिन जैसे ही इन बैंको की किस्त देने मे किसान असमर्थ होता है बैंको के द्वारा उसका मानसिक उत्पीडन शुरु हो जाता है दीगर बात यह भी है कोई भी किसान चालाकी से बैंक का लोन चुकाने से नही बचना चाहता है उसके लिए तो यह लोन नाक का भी सवाल होता है जिसके चलते वह अपने सामाजिक परिवेश से लेकर रिश्तेदारियों तक मे जिल्लत झेलता है लेकिन उसकी दिन ब दिन बिगडती आर्थिकी उसको मजबूर कर देती है और ऐसे मे बैंक मैनेजर दल बल सहित उस पर बैंक का पैसा जमा करने का तकादा करता है कई बार आर.सी काटने की धमकी के नाम पर भी छोटी छोटी राशि वसूलता है और जो लोन उसने इस करप्ट सिस्टम के चलते हासिल किया होता है जिसका एक एक हिस्सा भ्रष्ट अधिकारियों से लेकर दलालों तक ने चट किया होता है उसके देनदार के रुप में उसके गले में जिल्लत का ऐसा फंदा फंस जाता है कि वह उससे निकल ही नही पाता है। एक सीमा के बाद लोन की उगाही के लिए आर सी काट देता है फिर तहसील का राजस्व विभाग किसान की जान लेने पर उतारु हो जाता है संग्रह अमीन उसका किस हद तक मानसिक शोषण करता है आप अन्दाज़ा भी नही लगा सकते है और बहुत बार तहसीलदार उसको पुलिसिया बल के साथ उठाकर तहसील में कारागार में बंद भी करवा देता है। अभी हाल ही मै रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के विभिन्न बैंको का लगभग 14000 करोड रुपया उद्योगपति लोन के रुप मे दबाए बैठे है और बैंको ने इस बडी राशि की उगाही मे असमर्थता जाहिर कर दी है लेकिन इन कारपोरेटस को पकडने की कोई भी कार्यवाही बैंको के द्वारा नही की गई और उनकी कुल परिसम्पत्तियों से कई गुना राशि का लोन उन्हे दिया गया है इनमे से अधिकांश लोग  विदेश मे शिफ्ट हो गए है अब तंत्र देखिए एक तरफ एक मजबूर किसान है जो चालाक नही है और मंशा से भी लोन देना चाहता है  और दूसरी तरफ चालाक कारपोरेट्स है जिनके हिसाब से नीतियां तय होती है और जो देश का धन भी हडपे बैठे है।  
इन सब जिल्लतों को झेलने के बाद भी भारत का किसान बेहद आशावादी जीव है वह धैर्य नही खोता है वह हर साल इस उम्मीद पर फसल उगाता है कि इस बार उसके साथ छल नही होगा कभी प्रकृति की मार तो कभी सरकार की मार झेलता भारतीय किसान उत्पीडन और शोषण का केन्द्र बन कर रह गया है। किसानों की फिख्र न सत्ता पक्ष को है न ही विपक्ष को ही है दोनो के एजेंडे मे किसान नही दिखता है हाँ दिखता है तो केवल वोट जो लेना सभी पार्टियों को आता ही है। किसान असंगठित है सवर्ण और पिछडे के धडों मे भी बंटा हुआ है और शायद इसलिए सबसे अधिक शोषित भी है। 

Sunday, November 24, 2013

डायरी नोटस


डायरी नोट्स

(जो कागज़ की बजाए मन पर ही लिखे रह गए...)

यह कोई संघर्ष कथा या पटकथा जैसी नही है न ही यह वंचित भाव से उपजे असंतोष की मानस गाथा है बल्कि अपने आप में यह एक विचित्र किस्म का प्रलाप है जो सम्पन्नता की दहलीज़ से रिसता हुआ विडम्बनाओं के गलियारें तक आ पहूंचा है।कथ्य के लिहाज़ से यह अपवाद का गल्प है जिसमे मेरी असफलतों के शिल्प से  सम्भावनाओं के षडयंत्रों और विकल्पों के रोजगार की कराह  छिपी हुई है। अभी तक यही स्थापित मान्यता रही है कि अभाव व्यक्ति के लिए संघर्ष की इबारत लिखता है लेकिन क्या कभी आपने सोचा कि कई बार सम्पन्नता भी आपके वजूद के खिलाफ खडी हो सकती है जहाँ आपको हमेशा दोहरी लडाई लडने के लिए तैयार रहना पडता हो एक अपने वर्ग के अन्दर और दूसरी बाहर की दूनिया से जिसकी नजरों में आपके लिए कुछ भी अपरिहार्य न रहा हो। अपनी स्मृतिबोध के साथ ऐसी लडाई लडता गिरता सम्भलता और लडखडाता मै यहाँ तक आ पहूंचा हूँ। इस कहानी में मेरी उदासी के किस्से है इस कहानी में एक बिखरे वजूद के बनने बिगडने की अनकही दास्तान है और शायद मेरे ऐसे होने की वजह भी जिस पर कम ही लोगो को यकीन आएगा।
अपने वय से आगे जिन्दगी जीने का चयन कभी किसी का नही होता है वक्त के हसीन मजाक के लिहाज़ से जब आपके पैरो मे जिम्मेदारी की जंजीर पडी होती है तब आपकी परिधि इतनी सीमित हो जाती है कि आप अपने ही जीवनवृत्त की त्रिज्या तक नही नाप पाते है ऐसे में किस्सागो दोस्तों की महफिल मे आप केवल श्रोता भर हो सकते है या फिर आपकी उपयोगिता सहमति तक ही सिमट आती है। कई बार बडी शिद्दत से सोचता हूँ कि ये अतिसम्वेदनशीलता या भावुकता कहाँ से उपजती है खुद की ही पडताल करने पर पाता हूँ इसकी जड दरअसल भावनात्मक अपवंचन ही है जब आप त्रासदी के नायक बन अपने आसपास बेहद कमजोर लोगो को पाते है जिनके पास खोखली सांत्वना भी नही होती है दरअसल वो परिवेशीय कुंठा और अपनी निजि असफलता से उपजी खीज़ मिटाने के लिए आपके मन के कोमल पक्ष की परवाह किए बिना चोट पर चोट किए जाते है और आप अपनी आसपास के करीबी लोगो की ऐसी खुदमुख्तयारी का शिकवा जीवनपर्यंत किसी से नही कर पाते है यह एक ऐसा बोझ है जिसको अपने साथ जीने-मरने के क्रम में हर हाल में ढोना पडता है।
यह एक ऐसी मनोदशा की मूल ग्रंथि के अकुंरित होने की कहानी है जिसमें शाम अक्सर बोझिल हो जाया करती है जहाँ मन से उत्सवधर्मिता का स्थाई विलोपन हो जाता है जहाँ मन और चेतना की यात्रा अवसाद और समझ के बीच उलझ कर रह जाती है जहाँ आप कई बार सामान्य से भी कई गुना अधिक सामान्य तथा कई बार कई गुना असामान्य प्रदर्शन करते पायें जातें हैं। मन के निर्वात में घुटते मानवीय सम्बंधो के धुंधले रेखाचित्र किस हद तक आपको विचलित कर सकते है इसका अनुमान भी लगाना कठिन काम है। अन्यथा ली जाने वाली बातों के प्रति समझ का प्रकटीकरण और बेहद सामान्य चुस्त जुमलेबाजी में भी गहरा व्यंग्य सूंघने की घ्राण शक्ति को कभी वरदान तो कभी अभिशाप समझना आपके लिए किसी गहरी पहेली से कम नही है।
मन के समानांतर कई स्तरों पर जिन्दगी को युक्तियों के सहारे जीने की कला विकसित करना सहज़ चुनाव का मसला नही है बल्कि  अपने अस्तित्व की मूल प्रकृति और बाह्य जगत की अपेक्षाओं के मध्य समन्वय में खर्च होती मानसिक ऊर्जा के क्षरण का क्षोभ वास्तव में कई बार ब्राह्मांड की अनंत गहराई से बडा प्रतीत होने लगता है।
यह बेहोशी की हालत में बडबडाने जैसा है जिसमे आप मन के आंतरिक बंधनों से मुक्त हो लोक में अपने मानसिक द्वन्द आरोपित करना चाहते है ताकि आप आंतरिक शांति महसूस कर सके लेकिन शांति की कीमत सकार और नकार की लौकिक परिभाषाओं से परे चुकाने की नियति एक खास किस्म की जिद आपके अन्दर पैदा कर देती है जहाँ अपनेपन को तलाशती आंखे सलाह से इसलिए बचने लगती है क्योंकि उसमे नसीहत की बू आती है।
यात्रा अकेले तय करनी है यह प्रज्ञा हमेशा कहती है लेकिन अपेक्षाओं और भावनाओं के वृहदजाल मे उलझा मन हमेशा साथ चाहता है और जिस साथ के आभासी होने की पूरी सम्भावना है उसी को साथ बनाये रखने का लोभ आपको तरह तरह पेश होने के लिए बाध्य करता है अंतोत्गत्वा अकेलेपन की सामाजिक नियति को स्वीकार करने के मानसिक बल को सुरक्षित करता हुआ उस दिशा में आगे निकल जाता है जहाँ कभी कुछ हमसफर बन रहबर साथ चले होते है वह पीछे मुडकर बार बार देखता है लेकिन दूरतलक भी कोई छाया नजर नही आती है लेकिन यात्रा नही रुकती है और हिज्र की ऐसी लम्बी यात्रा मै करके अब यहाँ आ गया हूँ थोडा सुस्ता रहा हूँ खुद को टटोल रहा हूँ ताकि मन की बैलेंसशीट में अटके दोस्तों को अपने दृष्टिबंधन से मुक्त कर आगे की यात्रा की तैयारी कर सकूँ लेकिन बेहद मुश्किल काम है बेहद ही मुश्किल....।

Tuesday, November 19, 2013

अस्पताल: बैचेनी,अवसाद,आशंकाओं की ओवरडोज़



 लगभग एक सप्ताह अस्पताल मे बिताने के बाद आज अपने अकादमिक काम पर लौटा हूँ और पिछला एक सप्ताह मेरे लिए कितना भारी रहा उसकी व्याख्या करना मुश्किल काम है अपने प्रियजन को जीवन-मृत्यु के बीच झूलते देखना और फिर सम्भावनाओं और आशंकाओं के खेल मे खुद को फंसा देखना बेहद अजीब किस्म का अहसास है।
पंचकूला (हरियाणा) के एक अभिजात्य किस्म के अस्पताल की सुविधासम्पन्नता और बेहतरीन वास्तु भी मन को शांति नही दे पा रही थी दीवारों में म्यूट टंगे लम्बे-चौडे एलसीडी उतने ही बोझिल और नीरस थे जितने उस पर चलते क्रिकेट मैच या न्यूज़। अस्पताल में प्रार्थना ही एक मात्र सम्बल थी जो आस्तिकता/नास्तिकता से परे आपको इतनी दिलासा देती है कि आपके साथ कुछ बुरा नही होगा और इस दुखद घटनाक्रम का अंत सुखद होगा।
अस्पताल का मनोविज्ञान बेहद अजीब और दिलचस्प किस्म का है उदासी और चिंताओं मे सने चेहरे देखकर खुद पर से यकीन उठने लगता है डॉ की एक पॉजिटिव बात जहाँ राहत देती है वहीं एक मेडिकल जांच की छोटी से बढी हुई ईकाई भी निर्मूल आशंकाओं का पहाड खडा कर देती है। महंगे अस्पतालों में मौटे तौर पर दो किस्म के रोगी/परिचारक दिखते है एक हमारे जैसे जो छोटे मेडिकल सेंटर से रेफर होकर आएं है जिनके लिए यह अस्पताल किसी देवालय से कम नही है दूसरे समाज़ के ‘समझदार’ तबके के लोग समझदार इसलिए क्योंकि उन्होने पहले ही अपना कैशलैस मेडिक्लेम बीमा करवाया होता है इसलिए उनके लिए मुद्रा प्रबंधन कोई मुद्दा नही होता है वह आश्वस्त हुए अपने मरीज़ के आरोग्य के लिए लगे रहते है।
हमारे जैसे गांव-देहात किसान पृष्टभूमि के लोगो के लिए अकास्मिक बीमारी के लिए कोई बजटीय प्रावधान नही होता है और आकस्मिक बीमारी हमारे लिए एक बडे आर्थिक सकंट की भी द्योतक होती है। हमारे जैसे लोगो का दिमाग दोहरे रुप से प्रताडित रहता है एक तो अपने मरीज़ के स्वास्थ्य को लेकर और दूसरा ज्यों-ज्यों से जेब से कैश कम होता है हमारी चिताएं मुद्रा प्रबंधन पर भी केन्द्रित होती चली जाती है और समानांतर रुप से दोनो मोर्चो पर लडते हुए हम चाहते है जितनी जल्दी हो सके हमे इस त्रासदी से मुक्ति मिले।
इस बार की दादी जी की बीमारी के बाद पहली बार अहसास हुआ कि हमारे लिए मेडिक्लेम पॉलिसी का क्या महत्व हो सकता है यदि यह पॉलिसी है तो फिर हम अपने मरीज़ के सम्पूर्ण आरोग्य के लिए कम से कम आर्थिक रुप से प्रभावित हुए बिना उसको बेहतर मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध करा सकते है। यह बात भी मुझे पहली बार ही पता चली कि सुपर स्पेशिलेटी अस्पताल मेडिक्लेम पॉलिसी धारकों को ज्यादा पसन्द करते है क्योंकि इससे उनकी अच्छी खासी कमाई हो जाती है।
अस्पताल आखिर अस्पताल ही है भले ही वह फाईव स्टार होटल की माफिक दिखता हो उसकी भव्यता आपको सुविधा के लिहाज़ से क्षणिक आश्वस्त कर सकती है लेकिन दिल को असली तसल्ली डॉ की पॉजिटिव कमेंट के बाद ही मिल पाती है। पिछले एक सप्ताह जो तनाव भोगा उसकी चर्चा नही कर रहा हूँ लेकिन दिन भर की अस्पताल की भागदौड और रात में मुझे दादी जी के अटेंडेंट के रुप में उनके साथ रुकने की स्थिति नें बेहद थका दिया था एक अरसे के बाद मैने शारीरिक और मानसिक थकान से उपजी नींद के दबाव को महसूस किया पहली बार खुली आंखो सोने की कोशिस की भावनात्मक रुप से मेरे लिए यह बेहद मुश्किल दौर था क्योंकि जिस महिला नें आपका मल-मूत्र साफ किया हो यदि आपको वही काम उसका करना पडे तो एक पूरा कालचक्र आंखो के सामने घूम जाता है जिसका होना भर आपका मनोबल बढायें रखता हो उसको आपको समझाना पडे कि सब ठीक हो जाएगा मै समझता सबसे मुश्किल काम है। मेरी तमाम मनोविज्ञान की पढाई तब-तब मुझे बौनी लगने लगती थी जब-जब मेरी दादी जी घोषणा करने लगती कि अब चलने का समय आ गया है। मृत्यु शाश्वत सत्य है सबको आनी है इसको क्षणिक स्थगित किया जा सकता है लेकिन स्थाई रुप से टाला नही जा सकता है लेकिन इसके बावजूद भी अपने प्रियजन को खोने का भय वास्तव मे इतना बडा होता है कि हम नही चाहते कि हम इसके स्वीकार्यता भाव के साथ जीने का अभ्यास विकसित कर सकें शायद यही जीवन का वह अनुराग है या आसक्ति है जिसे मोह-माया बंधन कहा गया है।
बहरहाल, अब जब सब कुछ सही होने की दिशा मे आगे बढ रहा है दादी जी घर पर आ गई है लेकिन फिर भी मन मे पिछले एक सप्ताह का चलचित्र लम्बे समय तक खुद ब खुद रिवाईंड होकर चलता रहेगा।

Monday, November 11, 2013

मेरे मित्र-2.... डॉ सुशील उपाध्याय


अपने गांव के बौद्धिक मित्र से जीवन की पहली नसीहत मिली थी जो उस वक्त थोडी अजीब लगी थी लेकिन बाद में वो एक नजीर के जैसी लगने लगी वो सलाह देने वाले मे शख्स थे मेरे मित्र डॉ सुशील उपाध्याय। उन दिनों मुझे पढने का चस्का लगा हुआ था इसलिए किताबों की तलाश रहती थी मै आठवीं में पढता था उसी चस्के में डॉ.सुशील उपाध्याय जी से किताब मांग बैठा तब उन्होने किताब तो दी लेकिन साथ ही एक सलाह भी दी कि ‘ किताबें इंसान को मांग कर नही खरीदकर पढनी चाहिए तभी वह उनका मूल्य समझ पाता है’ उनकी इस नसीहत में छिपा हुआ सन्देश यह भी था मै किताबों को पढने के बाद सुरक्षित वापिस कर दूँ। आज जब अपने पुस्तक संग्रह में से दर्जनों किताबें गायब पाता हूँ तो याद करने की कोशिस करता हूँ कौन कौन सी किताब किस मित्र/परिचित को पढने के लिए दी थी लेकिन आज तक वापिस नही आयी तब मुझे सुशील जी की नसीहत दीगर लगने लगती है।
डॉ.सुशील उपाध्याय मुझसे उम्र मे दस साल बडे है और गांव के रिश्ते-नातें के लिहाज़ से मै उनका चाचा लगता हूँ लेकिन उनसे मेरे रिश्तें सदैव ही मित्रवत रहें है सुशील जी मेरे जीवन के उन लोगो मे शुमार है जिन्होने मुझे बीज रुप मे देखा है मुझे याद आता है कि जब सुशील जी हरिद्वार के गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी) और पीजी डिप्लोमा पत्रकारिता में दोनो में स्वर्ण पदक प्राप्त करके गांव पहूंचे थे जो मेरे मन में उनके प्रति ठीक वही भाव थे जैसे देश का खिलाडी कॉमनवेल्थ खेलों में गोल्ड मैडल जीत कर आता है हालांकि उस समय समझ के लिहाज़ से मै उतना विकसित नही था कि अकादमिक स्वर्ण पदक के महत्व को समझ सकूँ लेकिन फिर भी ‘ स्वर्ण’ शब्द का व्यामोह ही उपलब्धि से जुडा हुआ देखकर मेरे लिए सुशील जी प्रेरणा के स्रोत लगने लगे थे।
उन दिनों मेरे पास एटलस की बीस इंची साईकल हुआ करती थी मै उस पर सवार होकर सुशील जी के घर पहूंच जाता था और उनसे पत्र-पत्रिकाओं में छपने के गुर सीखने की कोशिस करता था हालांकि उस दौर मे सुशील जी के भी संघर्ष के दिन थे वो अमर उजाला मे प्रशिक्षु पत्रकार के रुप मे काम कर रहे थे उनके पास एक ब्लैक एंड व्हाईट कैमरा हुआ करता था जिसको लेकर वो प्रतिदिन पास के कस्बे थानाभवन में रिपोर्टिंग के लिए चले जाते थे।
मै अपनी स्मृतियों को टटोलता हूँ तो मुझे गांव मे सुशील जी लकडी की काले पेंट मे पुती कुर्सी, एक हार्डबोर्ड का पैड और अखबार की तरफ से मिलने वाला पीलिमा युक्त कागज याद आता है वो पीला अखबारी कागज मेरे जैसे नौसिखिए के लिए किसी  भोजपत्र से कम नही हुआ करता था उसके छूने भर का अहसास बडा होता था।  मै सुशील जी के घर जिज्ञासु और साधक भाव से जाता था कई बार ऐसा होता था कि सुशील जी दिल्ली प्रेस समूह की पत्रिकाओं के लिए लेख लिख रहे थे मै चुपचाप उनके पास चारपाई पर बैठा रहता था एकाध घंटे बीतने के बाद या लेख समाप्त होने के बाद सुशील जी मुझसे बतियाते थे उस वक्त उनके मुख से निकला एक एक शब्द मेरे ब्रहम वाक्य से कम नही होता था। जीवन मे बहुत कुछ मैने उनसे सीखा और आज भी सीखता रहता हूँ। सुशील जी उस समय एक सवाल लगभग मुझसे रोज ही पूछते थे कि आप मेरे यहाँ अपने घर बता कर आते है या नही उन्हे ऐसा लगता था कि कहीं मै उनके यहाँ घंटो बैठा रहता हूँ और उधर मेरे घर वाले मुझे ढूंड रहे होते हो।
वैचारिक पृष्टभूमि के लिहाज़ से हम दोनों मे कोई साम्य नही था सुशील जी का झुकाव वामपंथ की तरफ था और मेरी उस समय कोई विचारधारा ही नही थी  लेकिन मेरे अन्दर की जिज्ञासु प्रवृत्ति ने सुशील जी के सामंती पृष्टभूमि के प्रति सामाजिक आक्रोश को थोडा शांत अवश्य कर दिया था उन्होने मुझे एक स्वतंत्र चेतना के रुप मे हालांकि बाद मे स्वीकार किया लेकिन उनकी आत्मीयता ने मुझे सदैव आप्लावित किया है।
एक वंचित पृष्टभूमि से निकल अपनी अपनी बौद्धिक क्षमता के बल पर सुशील जी ख्याति प्राप्त की है फिलहाल वो विश्वविद्यालय में असि.प्रोफेसर है लेकिन इससे पहले अमर उजाला,हिन्दूस्तान जैसे बडे अखबारों में चीफ रिपोर्टर के रुप में कार्य कर चुके थे हालांकि आज भी मेरी नजर वो पहले पत्रकार है बाद में असि.प्रोफेसर। मैने जीवन मे कभी सक्रिय पत्रकारिता नही की लेकिन एक पाठक के रुप में जो मेरी समझ अखबारी दूनिया के बारें में है उसके आधार पर मै दावे से कह सकता हूँ सुशील जी ने जब तक अमर उजाला,हिन्दूस्तान मे काम किया तब तक उनकी कवर की गई खबरों में ‘एक्सक्लूसिवनैस’ के अलावा तथ्यात्मक पुष्टता भी होती थी एक पाठक के रुप उच्च शिक्षा की स्पेशल स्टोरीज़ को मै आज तक दोनो ही अखबारों में आज भी मै मिस्स करता हूँ उनके जाने के बाद उनकी कमी आज भी खलती है।
हमारी उम्र मे दस साल का मोटा अंतर होने के बावजूद भी हमारे बीच मे एक खास किस्म का चेतना और सम्वेदना का रिश्ता बना हुआ है मै जब भी दूनियादारी के झगडो मे उलझ जाता हूँ या कुछ ऐसे मानसिक सवाल जो मुझे निजी स्तर पर परेशान करने लगते है तब शहर मे उन्हे शेयर करने के लिए मेरे जेहन में जो पहला नाम आता है वह डॉ.सुशील उपाध्याय ही है। हालांकि सुशील जी बाह्य रुप से कई बार रुखे या ईमोशनली ड्राई प्रतीत हो सकते है या प्रशंसा करने के मामलें मे कंजूस भी लेकिन उनके पास अनुभव की थाती है साथ ही समचेतना भी जो हमें सवेंदना के एक ऐसे रिश्ते में बांधे रखती है जिसकी जड कई साल पहले हमारे गांव में जम गई थी आज हमारी मित्रता का वटवृक्ष उसी का परिणाम है जिसकी छांव में हम दोनो बारी बारी से सुस्ताते रहते है।  

( और भी बहुत से संस्मरण है लेकिन आज इतना ही शेष फिर....)

Sunday, November 10, 2013

मेरे मित्र..... सुनील सत्यम


एक सामंती जमीदार परिवार में जन्म फिर खांटी दबंगई और मदिरा के तांडव और उसके प्रभावों की सामाजिक आंच में तपता हुआ बचपन जीते हुए मै कब लेखन की तरफ मुड गया इसकी मुझे पुख्ता वजह अभी भी याद नही है हाँ शायद मन के अन्दर संवेदनशीलता के बीज प्रारब्ध से ही मिले थे इसलिए हमेशा अपने वय से आगे की जिन्दगी जीता रहा आज भी जी रहा हूँ आज भी सभी मित्र वय में मुझसे बडे है।
बचपन बाहर से जितना अशांत किस्म का रहा है अन्दर से मै उतना ही विलग और एकाकी होता चला जब अनुकूल माहौल न मिला तो अपने एकांत को अपनी दूनिया बना लिया और मेरे एकांत की जडता तोडने तथा मन मे उपजे अपरिपक्व रचनात्मक कौतुहल को आश्रय देने वाले मेरे पहले मित्र बने आज के पीसीएस अधिकारी और मेरे बचपन के मित्र सुनील सत्यम।
ये उन दिनों की बात है जब मै कक्षा सात में पढता था सुनील सत्यम मुझसे पांच साल बडे है वो उस साल इंटरमीडिएट में थे मेरे एक खेल सखा अमनीष कौशिक ने मुझे बताया कि सुनील जी ( संघ परम्परा के होने की वजह से नाम के बाद जी लगना आदत थी) के पास कॉमिक्स का अकूत भंडार है बस मेरा कॉमिक्स पढने का लोभ ही मुझे सुनील सत्यम के दर तक ले गया। सुनील सत्यम के पास अपनी पुस्तकों का ठीक ठाक निजि संग्रह था उन्होने एक वीर सावरकर सांस्कृतिक पुस्ताकालय भी बनाया हुआ था उनसे मैने पहले चाचा चौधरी, बिल्लू,नागराज़ ये सब कॉमिक्स पढे उसके बाद मुझे उनके सत्संग का चस्का लग गया वो उन दिनों बीमार थे और बैड रेस्ट पर थे सुनील सत्यम को पहली बार डंकल प्रस्ताव के विरोध मनमोहन सिंह का हाथ में कटोरा लिए (आर्थिक उदारीकरण) कार्टून बनाते देखा बस तभी उनकी रचनात्मकता को मन ही मन आदर्श मान लिया और खुद को उनका प्रशिक्षु आज मै जो भी कुछ लिख लेता हूँ जिसकी आप सब तारीफ कर देते है उस लेखकीय वृत्ति के पीछे सुनील सत्यम की प्रेरणा रही है यह बात मै आजीवन भी सार्वजनिक रुप से स्वीकार करने में कोई संकोच नही करुंगा।
हम दोनों में निकटता बेहद तेज गति से विकसित हुई फिर अपने घर के अलावा मेरा ठिकाना सुनील सत्यम की दहलीज़ ही हुआ करता था। हमारी यह अडडेबाजी धीरे-धीरे रचनात्मक रुप लेने लगी थी फिर हमने तमाम बाल प्रयास किए यथा युवा स्वत्ंत्र लेखक विकास मंच, जन उत्थान समिति आदि बनाना।
मै कक्षा आठ में था जब मेरा लिखा पहला सम्पादक के नाम पत्र प्रकाशित हुआ उससे पहले एक साल तक मै लगातार पोस्टकार्ड पर पत्र लिख कर भेजता रहा लेकिन नही छपे वजह एक तो वैचारिक अपरिपक्वता दूसरा बिना लाईन के लिखने का अभ्यास भी नही थी और हस्तलेख भी कोई खास नही था।
एक बार छपने के बाद छपास रोग लग जाता है फिर दिल करता है कि मै रोज अखबारों में छपूँ मै भी इसी फिराक में था इसलिए मै अपने सम्पादक के नाम लिखे पत्र सत्यम भाई को दिखाया करता था वो उसमे वर्तनी की गलती सुधारते थे ( मै उस वक्त भी वर्तनी की खूब गलतियां करता था जैसा आज भी करता हूँ) और कई बार अपने सुन्दर हस्तलेख में भी लिख कर भेजते थे। लेखन के मामलें सुनील सत्यम मेरे वरिष्ठ रहे है और उन्होने मेरे अन्दर बौद्धिक जिज्ञासा के बीज रोपित किए इसके लिए मै उनके प्रति आजीवन कृतज्ञ रहूंगा। विचारधारा,चेतना और सम्वेदना की सबकी अपनी-अपनी यात्रा होती है जो व्यक्ति का खुद का चयन होता है यह बात सच है कि मै बचपन में संघ की वैचारिकी से निकला और एक खास दौर तक कट्टर हिन्दूवादी भी रहा हूँ लेकिन बाद में जब सही-गलत विचार विश्लेषण की क्षमता विकसित हुई तब मेरा मार्ग सत्यम भाई की वैचारिकी से अलग हो गया। हमारी मित्रता में एक बात जो खास रही वह यह थी कि भले ही साल में एकाध बार ही संवाद होता हो लेकिन हम जब भी एक दूसरे मिलें तो तब-तब हम एक दूसरे शिद्दत से मिलें।
सिविल सेवा की तैयारी के सिलसिले में सुनील सत्यम दिल्ली चले गए और मै अपने गांव में ही रह गया लेकिन पत्राचार के जरिए भी हम एक दूसरे से जुडे रहे यदा-कदा मुलाकात भी हो जाया करती थी। ग्रेजुएशन के बाद मै पीजी के लिए हरिद्वार आ गया और फिर यही पीएचडी और तदर्थ नौकरी में लग गया।
एक वक्त ऐसा भी आया जब मेरी और सुनील सत्यम का साल-साल भर बात न होती थी लेकिन फिर सखा भाव हमेशा बना रहा इधर मै अपनी अलग दूनिया में सीखने समझने की धारा से गुजर रहा था। एक रोचक बात और जो बताना चाहता हूँ कक्षा आठ की वार्षिक परीक्षा में मेरे थोडे नम्बर कम आ गये थे मेरे पिताजी को उनके एक मित्र ने भडका दिया कि यह इस पत्रकारिता के भूत और सुनील सत्यम की संगत की वजह से हो रहा है वो साल मेरे जीवन के दुरुहतम वर्षों में से एक था घर,परिवार यहाँ तक भाई-बहन सभी के सहयोग के मोर्चे पर मै नितांत ही अकेला पड गया था मुझे पर चौतरफा वार हो रहे थे यहाँ तक सुनील सत्यम को भी मेरे से अलग बैठाकर मेरे उज्ज्वल भविष्य की दुहाई देकर मुझसे एक सुरक्षित दूरी बनाने की सलाह दी जा रही थी हालांकि हम दोनों के संज्ञान में यह सब था लेकिन हमनें कभी पारस्परिक इस बात की चर्चा नही की यह तो आज मैने लिख दिया है।
लेखन,पत्रकारिता मेरी पारिवारिक पृष्टभूमि के लिहाज़ से भी सम्मानित कर्म नही समझा जाता था देहात के क्षेत्रों में पत्रकारिता का श्रमजीवी स्वरुप न होना मेरे लिए बडा भारी साबित हुआ और मुझ पर लेखन कर्म तत्काल छोडने दबाव बना दिया था कुछ दिनों तक अपने बौने भावनात्मक तर्कों से लडने के बाद आखिर पिताजी के अहंकार के समक्ष मैने हथियार डाल दिए और मन ही मन संकल्प लिया कि अब कक्षा 12 तक मै कलम नही उठाऊंगा और यह सच है कि मैने चार साल तक एक अक्षर नही लिखा।
मेरे लेखकीय कर्म पर जहाँ परिजनों को प्रसन्न होना चाहिए था वही उन्हे वह मेरे व्यक्तित्व का विकार नजर आने लगा था उन्हे लगा कि लडका पढाई मे पिछड जाएगा इसलिए मुझसे लिखना बलात छुडवा दिया गया....मेरे लिए यह सब एक बडा मानसिक सदमा था।
सुनील सत्यम की एक खासियत यह भी रही कि उन्होने मेरे क्रमिक बौद्धिक विकास को हमेशा से सहज स्वीकृति और सकारात्मक दृष्टि से लिया और मुझे कभी अपना ‘चेला’ नही समझा सामान्यत: लोग उन लोगो की प्रगति या बौद्धिक रुपांतरण को सहज रुप से स्वीकार नही कर पाते है जिन्होने आपसे लिखना-पढना सीखा हो। यही वजह है कि सुनील सत्यम मेरे लिए आज भी उतने ही सम्मानीय और ग्राह्य है जितने कभी बचपन में हुआ करते थे हाँ अब मै अपनी कलंदरी से इतनी आजादी जरुर ले लेता हूँ कि जहाँ मै उनसे असहमत हूँ तो अपनी असहमति उन्हे जता देता हूँ और शायद उनके द्वारा दिए गए लौकतांत्रिक स्पेस की वजह से ही यह सम्भव है उन्होने सदैव मेरा हौसला ही बढाया है इसलिए आज भी जब वो मेरे लिखी किसी चीज़ की तारीफ करते है तो मुझे बडी सच्ची खुशी मिलती है क्योंकि उस वक्त यह लगता है यह तारीफ वो शख्स कर रहा है जिससे मैने कलम पकडना सीखा है....लिखना तो खैर अभी भी नही सीख पाया हूँ।

(वर्तमान डॉ अजीत की निर्माण प्रक्रिया के हिस्सेदार रहे ऐसे मित्र के प्रति कृतज्ञता भाव के रुप में यह पोस्ट समर्पित है)