Wednesday, August 23, 2017

तंत्र का मंत्र

भारत जैसे विकासशील देश के समक्ष बेरोज़गारी एक बड़ी चुनौति है. दस-दस बरस या इससे भी अधिक समय हो गया है लोग अपनी उच्चतम डिग्री लेकर बेरोजगार घूम रहे. शिक्षा में सुधार के नाम पर केन्द्रीय और राज्य स्कूली बोर्ड ने किस्म-किस्म के परिवर्तन भी किए और शिक्षा के तीनों स्तरों बेसिक.माध्यमिक और उच्च में बड़े बदलाव देखने को मिले है.
मेरी पीढ़ी के लोगो ने जब आज से बीस-पच्चीस साल पहले दसवीं की थी उस समय स्टेट बोर्ड के एग्जाम एक बहुत बड़ा हौव्वा हुआ करते थे बोर्ड का रिजल्ट भी दस से पन्द्रह प्रतिशत ही रहा करता था. पूरे गाँव में पास होने वाले इक्का-दुक्का बच्चे ही होते थे उन दिनों फर्स्ट डिवीज़न तो आना बहुत बड़ी उपलब्धि हुआ करती थी, उस सिस्टम से पढ़े सेकंड डिवीज़न धारी बच्चे भी पढनें में ठीक ठाक बुद्धिमान ही हुआ करते थे.
बाद में बोर्ड ने अपनी शिक्षा पद्धति की समीक्षा की और सीबीएसई की तर्ज पर मार्किंग सिस्टम को अपनाया अब बोर्ड एग्जाम में स्टूडेंट्स अस्सी और नब्बे प्रतिशत से अधिक अंक लेकर पास होते है. यही हाल अब उच्च शिक्षा में भी है. देश भर में सीबीसीएस सिस्टम लागू हो गया है जिसने 70 प्रतिशत अंक लिखित परीक्षा के माध्यम से मिलते है और 30 प्रतिशत अंक सेशनल के माध्यम से स्टूडेंट्स अर्जित करते है इस कारण अब यूजी और पीजी लेवल पर अस्सी और नब्बे फीसदी अंको वाले स्टूडेंट्स खूब मिल जाएंगे.
हमारे दौर में, हमारा कालेज एक राज्य विश्वविद्यालय से सम्बन्धित था जिस पर एक बड़ी जनसंख्या की उच्च शिक्षा की जिम्मेदारी था इसलिए वहां भी मार्किग सिस्टम कुछ ऐसा था कि आर्ट्स और सोशल साइंस के सब्जेक्ट्स में हमेशा औसत श्रेणी के ही नम्बर मिलते थे.
इस कहानी का जिक्र करने का मकसद यह है कि पुराने सिस्टम से पढ़े लोगो को अभी तक सरकार नौकरी नही दे पाई है और इस नई सिस्टम से पढ़े लोग अब उनके साथ नौकरी की कतार में लग गए है. इस नए सिस्टम से पढ़े लोगो की मेरिट भी जाहिरी तौर पर ऊंची है इनकी दसवीं, बारहवीं, ग्रेजुएशन, पीजी में फर्स्ट डिविजन है और न केवल फर्स्ट डिवीज़न है बल्कि बोरा भरकर इनके नम्बर आए हुए है. ऐसे में जो पुराने बोर्ड और पुराने हायर एजुकेशन सिस्टम से पढ़ें है उनके समक्ष एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है क्योंकि जब मेरिट बनती है तो ये नए वाले बच्चे टॉप में आ जाते है और पुराने सिस्टम से पढ़ें लोग खिसकते हुए आखिर में चले जाते है जबकी नौकरी की कतार में ये उनसे पहले लगे है.
बोर्ड और हायर एजुकेशन का सिस्टम सरकार ने बदला है इसलिए इसमें उन लोगो का क्या दोष है जो पुराने सिस्टम से पढ़े है? जब साधन भी कम होते थे और नम्बर भी कम ही मिला करते थे. आप उन्हें उनके समय में नौकरी नही दे पाए और वर्तमान समय में नए सिस्टम से निकले लोग उनकी योग्यता को एकदम ही खारिज कर रहे है. न्याय के सिद्धांत के अनुसार ये अन्याय है क्योंकि जो बदलाव आपने अब किया है वो आप बीस-तीस साल पहले कर लेते कौन सा उन बच्चों ने मना किया था? उन्होंने तब के सिस्टम में संघर्ष किया और पास होकर आगे बढे और लगातार खुद को अपडेट भी करते रहे मगर देश में बरोजगारी का आलम यह है कि उनको कोई भी सरकार नौकरी नही दे सकी है ये उनका नही पूरे सिस्टम का फैल्योर है.
गुड अकेडमिक रिकॉर्ड के नाम पर अब पुराने सिस्टम से पढ़े लोग बेहद कमजोर स्थिति में आ गए है जबकि उस समय की पढ़ाई और आज की पढ़ाई में बुनियादी अंतर है आज का स्टूडेंट् टेक्नोसेवी है और तब के स्टूडेंट की चुनौति अलग किस्म की थी. अब बढ़िया ग्रेड और मेरिट है मगर नोलेज अब सेकंडरी हो गई है पुराने समय के पढ़े लोगो के पास डिवीज़न भले ही सैंकड़ है मगर उनके पास ठोस ज्ञान भी है.
फिर मैं एक सवाल यह पूछता हूँ जब एक ख़ास समय में एक प्रमाणित सिस्टम से पास हुए लोगो को सरकार नौकरी नही दे पाई है और अब उन्हें उसी भीड़ का हिस्सा बना दिया गया है जिसमें नए सिस्टम से पढ़े और अधिक अंकधारी लोग नौकरी की कतार में खड़े है, तब ऐसे में क्या उनको नौकरी मिल सकेगी? शायद नही.
साक्षात्कार और मेरिट के झोल में वो स्वत: बाहर होते चले जाएंगे जो पापुलेशन पिछले दो दशक से आपकी व्यवस्था का हिस्सा रही है और जो इस आशा की प्रत्याशा पर काम करती रही कि एक न एक दिन उन्हें एक अदद सरकारी नौकरी मिल जाएगी उनके लिए आपने एक ऐसा जाल बुन दिया है जिसमें वो खुद ही उलझकर बाहर हो जाएंगे.
नीति बनाने वाले लोग कभी अनजान नही होते है बस वो कुछ मुद्दों पर जानबूझकर आँख बंद कर लेते है क्योंकि उन्हें लगता है इतना बड़ा देश है इसलिए ऐसे में भीड़ में कुछ करोगे तो चल जाएगा और नौकरी की कतार में लगा व्यक्ति सच में इतना कमजोर हो जाता है कि वो खुद के साथ हुए किसी किस्म के अन्याय पर उफ़ तक नही करता है क्योंकि उन्हें लगता है कि एक न एक दिन उनके दिन जरुर बदलेंगे.
उनके दिन बदलते जरुर है और उन्हें इसका एहसास तब होता है जब उनका पढ़ाया कोई स्टूडेंट उन्ही के साथ एक समान पद पर इंटरव्यू देने पहुंचता है. तब समझ नही आता कि उसकी नमस्ते ली जाए कि उससे हाथ मिलाया जाए क्योंकि सिस्टम ने दोनों के लिए जगह बना दी है.

©डॉ. अजित 

Friday, August 11, 2017

रेडियो: एक सच्ची सखी

रेडियो: एक  सच्ची सखी
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यह कोई कोरी लिजलिजी भावुकता नही है और न ही यह देहात बनाम शहरी का कोई संसाधनमूलक विमर्श की भूमिका है.यह रेडियो की  यारी से जुडी एक याद है जो अब लगभग अपने भूलने के कगार पर है मगर मैं अपनी कुछ हसीं यादों का दस्तावेजीकरण करना चाहता हूँ. क्यों करना चाहता हूँ इसका भी मेरे पास  कोई पुख्ता जवाब नही है मगर मुझे रेडियो से प्यार रहा है यही कारण है कि मुझे रेडियो की बातें करना उतना ही सुकून देता है  जितना मैं अपने स्कूल के किसी मास्टर जी का जिक्र करता हूँ और उनकी शिक्षाओं को गल्प समझने की अपनी नादानी पर मुस्कुराता हूँ.
रेडियो के साथ एक भरोसे का रिश्ता था और ये सूचना और मनोरंजन की सबसे किफायती सखी थी किफायती और सखी शब्द दोनों एक साथ प्रयोग करना एक किस्म की ज्यादती है मगर फिर मैं दोनों को एक साथ इसलिए याद कर रहा हूँ  रेडियो साथ भी देती थी और इसकी आवाज़ सुनने के लिए मुझे मेरी जेब पर कभी अधिक जोर भी नही पड़ा एक बार उसके सेल ( बेट्री) डलवाओ और फिर तीन महीने के लिए भूल जाओ. उन दिनों जेब खर्च जैसा कुछ कांसेप्ट गाँव में नही हुआ करता था इसलिए बुआ मामा के दिए पांच दस रुपये को जोड़कर मैं रेडियो की बेट्री का बंदोबस्त किया करता था.
आल इंडिया रेडियो से समाचार सुनता था रोज़ सुबह कलियर नाग,विमलेन्दु पांडे की आवाज़ से हम देश दुनिया में की खबरों से रूबरू होते थे आज भी उस आवाज़ की खनक मेरे कानों में बसी हुई है. रेडियो के साथ अच्छी बात यह थी कि ये आपका हाथ पकड़कर बैठाने की जिद नही करती थी ये हवा में घुल कर आपके साथ साथ फिरने की कुव्वत रखती थी. इसलिए रेडियो सुनते समय पशुओं को चारा डाला जा सकता था उन्हें नहलाया जा सकता था यहाँ तक गणित के सवाल भी हल किये जा सकते है मानो रेडियो खुद में इतनी बेफिक्र और मुस्तैद थी कि उसे और किसी से कोई सौतिया डाह नही था, वो किसी काम में व्यवधान नही बल्कि उस काम को और दिल से करने की प्रेरणा देती थी.
छुट्टी के दिनों में मैं सुबह से रेडियो बजा देता था उन दिनों मुझे सुबह साढ़े नौ बजे विविध भारती पर आने वाले प्रायोजित कार्यक्रम का इन्तजार रहता था फ़िल्मी गानों से अपडेट रहने का एक वही जरिया था. गर्मी की दोपहर में घर का एक अन्धेरा कमरा  और रेडियो दोनों मिलकर क्या गजब की सोफी रचती थी उस मदहोशपन को शब्दों से ब्यान नही किया जा सकता है. रेडियो तब मेरी छाती पर सवार रहती और मैं तब ट्यून करता था कि विविध भारती उस पर नई नई रिलीज़ हुई फिल्मों पर आधारित प्रायोजित कार्यक्रम आया करते थे. मुझे आज भी याद आता है कि कैसे उस प्रोग्राम में एक डायलोग आता था ‘दक्षिण से आया है ममूती’ ममूती दक्षिण के अभिनेता थे और उन्होंने किसी हिंदी फिल्म से डेब्यू किया था.
इसके अलावा क्षेत्रीय रेडियो केन्द्रों से ‘सैनिको के लिए’ और  सदाबहार नगमे आते थे उन्हें सुनते हुए मैं नींद के आगोश में चला जाता था. मैं दावे के साथ कह सकता हूँ रेडियो जिस तरह से लोरी के जैसा काम करती है ऐसा और कोई ऑडियो का मीडियम नही कर सकता है. रेडियो तब हमारी माँ की भूमिका में आ जाती थी और रेडियो सुनते-सुनते क्या गहरी नींद आती थी मानो गहरे तनाव के समय एक स्लीपिंग पिल ले ली लो, वैसी नींद अब नही आती है. फिर ढाई बजे मेरी आँख अंग्रेजी समाचार बुलेटिन से पहले बजने वाली बीप-बीप की आवाज़ से खुलती थी. हमारे लिए तब यही अलार्म था.
ऐसा कई बार हुआ अतिशय गर्मी में हमने चारपाई नीम के पेड़ के नीचे डाल ली और रेडियो सुनते-सुनते सो गये और उसके बाद  धूप और इस बीप की आवाज़ की सांझी नींद से हमें जगाया.


अपना विविध भारती कनेक्शन
तीसरे पहर मेरी ड्यूटी प्राय: पशुओं को पानी पिलाने की होती थी तब मैं रेडियो नल के पास के पेड़ पर टांग देता था और एक तरफ गाने बजते रहते और दूसरी तरफ मैं नल चलाकर पानी भरता जाता. 4 बजे आने वाला हेल्लो फरमाइश मेरा प्रिय प्रोग्राम रहा है और हेल्लो फरमाइश में भी मंगलवार को जब विविध भारती के उद्घोषक कमल शर्मा जी की खनक आवाज़ और उनके हंसी सुनता तो मेरा दिल बाग़-बाग़ हो जाता था. मैंने बहुत बार गाँव के लैंडलाइन फोन से मुम्बई स्टूडियो में काल लगाने की कोशिश की मगर कभी सफल न हो पाया.
कमल शर्मा जी से मेरी बात करने की बड़ी तमन्ना थी जो आज भी बाकी है वो कमाल के एनाउंसर है आवाज़ से ही लगता है कि वो कितने भद्र और सहृदय होंगे.
इसके अलावा यूनूस खान को युवाओं पर केन्द्रित कार्यक्रम भी नियमित सुनता था और ममता सिंह , निम्मी मिश्रा को रेडियो सखी के जरिए सुनना ठीक वैसा अनुभव था जैसे  अपनी गली मुहल्ले में बैठकर बैठकी की जा रही हो.
आज यूनूस जी और ममता जी फेसबुक पर मित्र है तब के रेडियो के दिनों को याद करते हुए यह एकदम अविश्ववसनीय सी ही बात लगती है.
रात में छाया गीत, हवा महल सुनना एक स्प्रिचुअल प्लीजर जैसा अनुभव था.

एफ एम का आना और रेडियो का बदलना

हालांकि गाँव में एफ एम को सुनना आसान काम न था मगर ये रेडियो की दुनिया में एक बड़ा बदलाव था इसने विविध भारती के श्रोता सबसे पहले अपने कब्जे में लिए मगर फिर भी विविध भारती से प्यार में कोई खास कमी नही आई. आज तो प्राइवेट एफ एम की बाढ़ आई हुई है एकाध आर जे को छोड़ दे  बाकी को सुनने में  कोई ख़ास मजा नही आता है निजी कंपनियों के एफएम पर बाजार के अपने दबाव है मगर शुरुवाती दौर में आल इंडिया रेडियो का एफएम ने गाँव देहात में जरुर तेजी से लोकप्रियता हासिल की. कुछ ख़ास ब्रांड के रेडियो सेट गाँव में लोग खरीदते थे क्योंकि वो दिल्ली का एफएम बढ़िया पकड़ते थे. एफएम में मुझे ओपी राठौड की आवाज़ बेहद पसंद थी बाद में वो टीवी पर भी आए मगर टीवी पर वो करिश्मा नही कर सके.

रेडियो को लेकर मेरे पास इतने किस्से है कि लेख बहुत बड़ा हो जाएगा रेडियो मेरे दिल की सच्ची साथी रही है अब जब स्मार्ट फोन की दुनिया ने सबको बेहद नजदीक बैठा दिया तब भी मुझे रेडियो की वो दूरी वाली दुनिया शिद्दत से याद आती है और मुझे जब भी मौक़ा मिलता है मैं रेडियो जरुर सुनता हूँ.
रेडियो  मेरे जीवन में फ्रेंड, फिलासफर और गाइड की भूमिका में रही है समसामयिक मुद्दों को जानने और समझने के लिए शोर्ट वेव्ज पर बीबीसी को सुनना आज भी शिद्दत से याद आता है यदि बीबीसी न होती तो मैं तटस्थता से सोचने की कला न सीख पाता.

...और अंत में इस लेख को लिखने के लिए मुझे मोटिवेट करने के लिए विविध भारती की मेधावी उद्घोषिका नेहा शर्मा को जरुर धन्यवाद कहूंगा नेहा के कारण ही मैं इन भूली बिसरी यादों का दस्तावेजीकरण कर पाया. नेहा अब नई पीढ़ी की उम्मीद है.
मैं दुआ करूंगा कि जीवन की आपाधापी में रेडियो का सुकून और रेडियो की दीवानगी दोनों बरकरार रहें साथ ही वो खूबसूरत आवाजें भी सलामत रहें जिन्हें हमे खुद से ईमानदारी से बातचीत करने का सलीका और शऊर सिखाया.
© डॉ. अजित



Tuesday, July 11, 2017

मां (दादी)

श्रीमति बिशम्बरी देवी ‘नम्बरदारनी’

सबसे मुश्किल काम होता है खुद के किसी परिजन के विषय में निष्पक्ष एवं तथ्यात्मक रुप से संतुलित होकर लिखना मगर मै खुद की दादी ( जिन्हें सम्बोधन में मैं मां ही कहता हूं) के विषय में लिखते हुए किचिंत भी दुविधा में नही हूं जिसकी एक बडी वजह यह है कि वो मेरे लिए महज़ मेरी दादी (मां) नही है बल्कि एक आदर्श मातृछवि भी है इसलिए जीवनपर्यंत संघर्षरत रही ऐसी लौह महिला के विषय में लिखकर मै खुद को न केवल गौरवांवित महसूस कर रहा है बल्कि उन पर लिखना अपना एक नैतिक कर्तव्य भी समझता हूं। मेरे मन मे यदि कोई दुविधा है तो केवल इतनी है कि उनके विशद जीवन को एक लेख में समेट पाना तमाम शब्द सामर्थ्य के बावजूद भी बेहद मुश्किल काम है उनका जीवन स्वतंत्र रुप से एक जीवनी लेखन का विषय है।

गांव के पुरुष प्रधान समाज़ और जन-धन बल के जीवन में जिस प्रकार से उन्होनें संघर्षपूर्ण जीवन को अपने आत्मबल से जीया है वह न केवल अनुकरणीय है बल्कि व्यापक अर्थों में चरम विपरीत परिस्थितियों में ऐसा जीवन जीना अकल्पनीय भी है।

मात्र छब्बीस साल की उम्र में मां विधवा हो गई थी मेरे बाबा जी का मात्र 28 वर्ष की उम्र में टायफायड बुखार की वजह  से आकस्मिक निधन हो गया था। चूंकि बाबा जी अकेले थे और गांव के बडें ज़मीदार घर में उनके जाने के बाद एकदम से सन्नाटा पसर गया था लगभग साढे तीन सौ बीघा जमीन और घर पर वारिस के नाम कोई व्यक्ति न बचा था। गांव में कोई कुटम्ब कुनबा भी नही था ऐसें मे बाबा जी के निधन से जो रिक्तता आई थी उसको भर पाना असम्भव कार्य था। गांव के समाजशास्त्रीय ढांचे में यह स्थिति बेहद जटिल किस्म की थी। इतनी बडी सम्पत्ति की देखरेख के लिए कोई पुरुष परिवार में नही था अमूमन तब यही अनुमान लगाया जा रहा था कि मेरी मां यहां की जमीन को औने-पौने दामों में बेच कर अपने मायके रहने चली जाएगी।

इस बेहद प्रतिकूल और आशाविहीन परिस्थिति में मां के इस निर्णय नें बुझती उम्मीदों को एक नई रोशनी दी जब उन्होनें तय किया वो कहीं नही जाएंगी और यही गांव में रहेंगी। यहां बताता चलूं जिस वक्त बाबा जी का निधन हुआ मेरे पिताजी दादी (मां) के गर्भ में थे। अतिशय चरम तनाव और अनिश्चिता के दौर में भी मां ने महस छब्बीस साल की उम्र में उस साहस का परिचय दिया जिसकी कल्पना आज भी सम्भव नही हो पाती है।

गांव की चौधरी परम्परा में पुरुषविहीन परिवार में इतनी बडी सम्पत्ति खेती-बाडी का संरक्षण कोई आसान काम नही थी उनका यह निर्णय कुछ पक्षों के लिए नागवार गुजरने जैसा था क्योंकि अमूमन यह मान लिया गया था कि अब यह परिवार बर्बाद हो गया है मगर मां नें अपनी हिम्मत,आत्मबल और सूझ-बूझ से एक पुरुष प्रधान समाज़ में अपनें परिवार को वो आधार प्रदान किया जिसकी वजह से आज भी मां न केवल गांव में बल्कि पूरे क्षेत्र में बेहद सम्मानीय है। शायद ही आसपास का कोई गांव ऐसा होगा जो लम्बरदारनी ( नम्बरदारनी) को न जानता होगा।

पिताजी के जन्म के बाद एक आशा का संचार हुआ कि परिवार में एक पुरुष वारिस पैदा हो गया है परंतु गांव की कुछ शक्तियों के लिए यह बहुत पाच्य किस्म खबर नही थी। पिताजी किशोरावस्था तक जाते जातें कुसंग का शिकार हो गए ( एक एजेंडे के तहत यह सब किया गया था फिलहाल वह उल्लेखनीय नही है)। पिताजी मदिरा व्यसनी हो गए जिसके फलस्वरुप उनकी भूमिका अपना वह आकार न ले सकी जिस उम्मीद से परिवार उनकी तरफ देख रहा था। कालांतर में उन्होने उस अवस्था में मदिरा त्यागी जब शरीर व्याधियों की शरण स्थली बन गई थी। मां की प्ररेणा से वो गांव के प्रधान और जिला सहकारी बैंक के डायरेक्टर भी रहें।

मेरी मां नें आजीवन संघर्ष किया गांव के पितृसत्तात्मक और जनबल के समाज़ के समक्ष वो अकेली वैधानिक लडाई लडती रही। जिस वक्त घर पुरुषविहीन हो गया था उन्होनें अपने मायके से कहकर अपना एक भाई स्थाई रुप से गांव में रखा वो खेती बाडी दिखवाते है। इन सब के पीछे की ऊर्जा प्ररेणा और सच्चाई की लडाई लडने वाली मां ही रही है।

उनके अन्दर गजब की जीवटता भरी थी नेतृत्व उनके खून में था इतने प्रतिशोध उन्होनें सहे कि सभी की चर्चा की जाए तो एक बडी कथा लिखी जा सकती है। जमीन से जुडे और अन्य फौजदारी के कई कई मुकदमें उन्होनें लडे क्योंकि उनको इस आशय से परेशान किया जाता था कि उनका मनोबल कमजोर हो जाए और वो गांव  से भाग खडी हो। तहसील और जिले स्तर पर अधिकारियों से ,नेताओं से,जजों से मिलना उनके जीवन का हिस्सा बन गया था उनके अन्दर गजब का आत्मविश्वास रहा है जो आज भी कायम है। गांव में चाहे डीएम आया हो या एसएसपी उनके अन्दर कभी स्त्रियोचित्त संकोच मैने नही देखा है।

मेरी मां कक्षा तीन पढी थी उन्हें अक्षर ज्ञान था वो पढ भी लेती थी और आज भी हस्ताक्षर ही करती है। उनके संस्कार  और मूल्य हम तीन भाई और एक बहन के अन्दर स्थाई रुप से बसे हुए है। मां ने हमें बताया कि अपने परिश्रम से अर्जित सम्पत्ति का यश भोग ही मनुष्य का नैतिक अधिकार होता है पैतृक सम्पत्ति के अभिमान में नही रहना चाहिए इसमें हमारी भूमिका मात्र हस्तांतरण भर की होती है। निजी तौर पर मेरे अन्दर सामंतवादी मूल्य नही विकसित हुए इसकी बडी वजह मां के दिए संस्कार ही थे। उन्होनें सदैव मानवता,करुणा और शरणागत वत्सल का पाठ पढाया इतनी बडी जमीदारन होने के बावजूद भी वो वंचितों के शोषण के कभी पक्ष में नही रही बल्कि ऐसा कई बार हुआ गांव ने अन्य शक्तिशाली ध्रूवों के द्वारा सताए गए लोगों की उन्होनें अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करके मदद की। वो संकट में पडे किसी भी व्यक्ति की मदद के लिए सदैव तत्पर रहती थी।

अपने दैनिक जीवन में मां बेहद अनुशासित और आध्यात्मिक चेतना वाली महिला रही है। आज भी लगभग ब्यासी साल की उम्र में नित्य पूजा कर्म और यज्ञ करना उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है। मां को कभी कमजोर पडते मैने नही देखा अपनी याददाश्त के आधार पर कह सकता हूं कभी उनको शिकायत करते हुए नही देखा ना ही उनके अन्दर स्त्रियोचित्त अधीरता मुझे कभी नजर आई। मां के मन के संकल्प इतने मजबूत किस्म के रहे है कि उन्होने जो तय किया वो उन्होने प्राप्त भी किया है।

मेरे बडे भाई डॉ.अमित सिंह सर्जन ( एम.एस.) है मै पीएचडी (मनोविज्ञान) हूं और मुझसे छोटा भाई जनक बी टेक है हम तीनों भाई अपनी मां की वजह से ही उच्च शिक्षित और दीक्षित हो पाए है। एक बेहद लापरवाह किस्म के पारिवारिक परिवेश में मेरी मां अपने अपने पोत्रों के जीवन में मूल्यों और संस्कारों का निवेश किया है और उसी के बल पर हम एक बेहतर इंसान बनने की दिशा में आगे बढ पाएं है।

 गत वर्ष पिताजी का लीवर की बीमारी के चलते आकस्मिक निधन हो गया यह सदमा जरुर मां के लिए अपूरणीय क्षति है इकलौते पुत्र के निधन नें उन्हे अन्दर से तोड दिया है मगर आज भी वो हमें हौसला देती रहती है। उनका होना भर एक बहुत बडी आश्वस्ति है। ये मां के संस्कारों का आत्मबल था कि पिताजी के निधन के उपरांत हम बहुत आत्मश्लाघी होकर न सोच पाए और मै अपनी स्थापित अकादमिक दुनिया और छोटा भाई अपनी एमएनसी की जॉब छोडकर गांव में खेती बाडी के प्रबंधन के लिए चले आए।



सदियों में ऐसी जीवट और जिजिविषा वाली महिला का जन्म होता है उनका जीवन स्वयं में एक अभिप्ररेणा की किताब है जिसको पढतें हुए जिन्दगी आसान और मुश्किलें कमजोर लगने लगती है। ऐसी दिव्य चेतना से मेरा रक्त सम्बंध जुडा हुआ है यह निश्चित रुप से मेरे प्रारब्ध और पूर्व जन्म के संचित् कर्मों का फल है। मेरे अन्दर संवेदना,सृजन,करुणा आदि कोमल भावों के बीज रोपण में मां की अभूतपूर्व भूमिका है।  सार्वजनिक जीवन के हिसाब से मां महज़ मेरी दादी नही है बल्कि गांव की एक आदर्श महिला है जिसके व्यक्तित्व और कृतित्व से गांव का इतिहास अनेक वर्षो तक प्रकाशित होता रहेगा। निसन्देह उनका होना हमारे लिए एक सामाजिक गौरव का विषय है उनका व्यक्तित्व सदैव यही पाठ पढाता रहेगा कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हो मनुष्य को अपने आत्मबल पर भरोसा रखना चाहिए। नीयत नेक हो तो मंजिल अवश्य ही मिलती है।