Thursday, July 30, 2015

बाग़ का ब्याह

बाग़ का ब्याह
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बाग़ का ब्याह सुननें में काफी विचित्र लगता है मगर सच है बाग़ का भी ब्याह किया जाता है। जब मैंने बाग़ के ब्याह की बात सुनी तो मुझे भी बड़ा अचरज हुआ था। हमारा आम का बाग़ है आज से लगभग पचास साल पहले मेरी माँ (दादी) ने इस बाग़ को लगवाया था इस बाग़ में पहला आम का पेड़ माँ के हाथों रखा गया था। लोक जीवन में एक बड़ी विचित्र मान्यता है कि बाग़ को लगाने वाला तब अपने बाग़ का फल नही खा सकता है जब तक वह बाग़ का ब्याह न कर दें। मानन्यता यह भी थी कि यदि कोई बिना ब्याह के अपने बाग़ का फल खा लेता है तो उस बाग़ के फल में कीड़े पड़ने शुरू हो जायेंगे। हमारे घर पर जब भी आम आतें तो माँ उन्हें बिलकुल नही खाती थी उनके लिए किसी दुसरे बाग़ के आम मंगवाए जाते थे। सुननें में बड़ा विचित्र सा है कि जो फलदार पेड़ लगाए वही उसका फल न खा सके। जब मैंने माँ से पूछा कि बाग़ का ब्याह कैसे किया जाएगा तब उन्होंने बताया बकायदा खेत पर हवन होगा तथा दो पेड़ के शाखाओं को लाल कपड़े से आपस में बांधा जाएगा इसके बाद अपनी सामर्थ्य अनुसार गाँव भर के लोगो को प्रीतिभोज कराया जाएगा और यह प्रीतिभोज ठीक वैसा ही होगा जैसे घर के किसी बच्चे की शादी में आयोजित किया जाता है।
बाग़ का ब्याह करनें के बाद माँ अपने बाग़ के आम खाने की अधिकारी हो जाऐंगी।
हमनें कई बार बाग़ का ब्याह करनें का मन बनाया मगर अपरिहार्य कारणोंवश वो महूर्त न सध सका आज भी माँ अपने बाग़ के आम नही खाती है। मैं कई बार मजाक में कह देता हूँ कि माँ अब तो बाग़ बूढा यानि पचास पचपन साल का हो गया है अब इस उम्र इसका ब्याह करनें से क्या फायदा रहनें देते है इसे यूं ही कुंआरा माँ चूंकि अब अपनी यात्रा के अंतिम चरण में है इसलिए वो भी दार्शनिक भाव से कह देती है अब क्या बाग़ का ब्याह करोगे ! मगर फिर भी कहीं न कहीं उनके मन में अपने बाग़ का ब्याह न कर पाने की पीड़ा ठीक वैसे ही दिख जाती है जैसे माँ बाप का कोई बच्चा अविवाहित रह जाने की नजर आ जाती है।
लोक मान्यताओं के इतर इस तरह की परम्पराओं के व्यापक समाजशास्त्रीय अर्थ भी है यह मनुष्य और प्रकृति के सम्वेदना के रिश्तें को मजबूत करने की एक लोकरीति भी समझी जा सकती है। भले ही इस तरह की मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार न हो मगर सामाजिक जीवन में वानिकी और मनुष्य के रिश्तें को मजबूत करने की कड़ी में इस तरह की परम्पराओं का एक विशिष्ट महत्व है। ये परम्पराएं भी अंतिम दौर में है इसलिए हम भले ही इन्हें बचाने में असमर्थ है मगर इन्हें याद करकें इनका दस्तावेजीकरण तो कर ही सकते है।
© डॉ. अजित 

Friday, June 12, 2015

हमउम्र

यह भी बड़ा विचित्र संयोग है मेरे जन्मवर्ष के हिसाब से मेरे तमाम दोस्तों में मैं सबसे छोटा हूँ। मेरे सभी दोस्त मुझसे उम्र में बड़े है और उम्र का यह अंतर एक साल से लेकर दस साल तक का है।कैलेंडर की भाषा में कहूँ तो मेरा कोई हमउम्र दोस्त नही है। मेरी सबसे गहरी दोस्ती 35-45 के वय के लोगो से है। विचित्र बात है इससे न मुझे कभी कोई असुविधा महसूस और न मेरे किसी बड़ी उम्र के मित्र को। अलबत्ता हमउम्र लोगो से मेरी ज्यादा निभ नही पाती है मेरे और उनके विषय और मन की दशा एकदम भिन्न किस्म की होती है।
दरअसल उम्र मेरे लिए महज एक देह की एक भौतिक आयु का फिनोमिना भर है मेरी यात्रा अस्तित्व की यात्रा है और वहां आयु निसन्देह एक छोटी इकाई भर है। शायद जीवन संघर्षों में मैंने अपने वय से आगे की जिंदगी का अभ्यास विकसित कर लिया है यह एक आत्म आश्वस्ति की प्रक्रिया भी समझी जा सकती है जहां आप खुद ही खुद के फ्रेंड फिलॉसफर और गाइड बन जातें हैं।
अध्यापन काल में कुछ छात्र अवश्य मित्रवत् हुए बस मेरे जीवन में वहीं छोटी उम्र के लोग बचें है मैंने कभी गुरुडम को विस्तारित नही किया और डिपार्टमेंट में खासकर रिसर्च स्कॉलर से लोकतांत्रिक और दोस्ताना व्यवहार रखा उसी की वजह से मेरे गुरु भाई आज भी मित्रवत् मुझसे जुड़े हुए है।
उम्र एक बड़ी मनोवैज्ञानिक बाधा होती है यह कनिष्टता और वरिष्टता की एक रेखा खींचती है इसमें लोग क्या तो आपको उपेक्षित करतें है या फिर बड़प्पन की केयर टाइप की फीलिंग में जीतें है। एकदम समानतावादी दृष्टि से किसी को स्वीकार करना मुश्किल होता है कनिष्टता के अपने बाल सुलभ संकोच होते है और वरिष्टता के अपने ईगो इशूज़।
मित्रता में समवयता का तर्क निजी तौर पर मुझे कभी नही जँचा मेरा मानना रहा है कि यदि आपके चेतना और सम्वेदना का स्तर समान है तो फिर ऐसी मित्रता की उपादेयता अधिक है बनिस्पत इसके कि आप अपने हमउम्र लोगो की मूर्खताएं बर्दाश्त करते रहो महज इसलिए कि वो आपके हमउम्र हैं।
बहरहाल, हो सकता है कि यह कोई मनोवैज्ञानिक असामान्यता हो (हालांकि अकादमिक पढ़ाई लिखाई में ऐसा को मनोरोग पढ़ा तो नही) या फिर मेरी यात्रा के अनुभव की थाती भी हो सकती है जहां मेरी उठ बैठ हमेशा अपने से बड़े लोगो के साथ ही रही है।
फ़िलहाल, जब अपने किसी चालीस साला या उससे ऊपर के दोस्त से बात होती है तो उस सम्वाद में आत्मीयता परिपक्व सम्वेदनशीलता और वैचारिकी का लोकतांत्रिक स्वरूप सबसे मुखर अवस्था में होता है।
पता नही मेरे जैसे कितने लोग होंगे मगर मैं अपने ऐसा होने में बेहद सहज खुश और समायोजित महसूस करता हूँ।
इस पोस्ट अपने चालीस साला दोस्त Sushil Upadhyay जी (वरिष्ठ पत्रकार एवं प्राध्यापक)से एक मनोगत टिप्पणी अवश्य चाहूंगा कि वो आखिर ऐसा कौन सा बिंदू होता है जो हमें हमेशा के लिए आयुबोध से मुक्त कर देता है।

डिस्क्लेमर: यह पोस्ट मुख्यत: फेसबुक दोस्तों से इतर दोस्तों के बारें में है। यहां अवश्य Ratanjeet Singh जैसे दोस्त भी है जो उम्र में छोटे भी है और दोस्त भी है मगर उनके लिए मैं पहले भाईसाहब/सर हूँ बाद में दोस्त इसी क्रम में कई नाम और भी है।

Sunday, June 7, 2015

मन की बात

मन की बात:

अपनें देश में सरकारी नौकरी सामाजिक आर्थिक सुरक्षा की गारंटी समझी जाती है। यह उद्यमशीलता को भी घुन की तरह चाटती है। सवाल रोटी और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा होता है इसलिए जोखिम लेनें की क्षमता भी स्वत: कमजोर हो जाती है।
ईमानदारी से कहूँ तो मुझे व्यक्तिगत तौर पर कभी सरकारी नौकरी ने उस तरह से आकर्षित नही किया है मैंने एक विश्वविद्यालय में सात साल तदर्थ नौकरी भी की है सम्भव है कल किसी विश्वविद्यालय/कॉलेज में फिर से स्थाई असि.प्रोफ़ेसरी करता पाया जाऊं। मगर मेरा ऐसा करनें की वजह सरकारी नौकरी का मोह नही होगा बल्कि हिंदी पट्टी में बतौर फ्रीलांस लेखक/कवि जीवन जीनें की क्षीण सम्भावनाओं के चलते ऐसा होगा।
फिलहाल जो स्थिति है उसमें हिंदी लेखक मात्र लेखन के जरिए अपने परिवार को नही पाल सकता है अतिशय श्रम के बावजूद भी न्यूनतम पारिश्रमिक/रॉयल्टी मिलती है। अपवाद स्वरूप कुछ नाम छोड़ दें तो तमाम हिंदी के बड़े लेखक का मुख्य व्यवसाय कुछ और रहा है जिसके जरिए उनका घर चलता था और लेखन उन्होंने द्वितीयक रूप से किया है। ये कहानी तो बड़े लेखकों की है जो नवोदित है उनकी उड़ान के लिए आसमान और भी ऊंचा हो जाता है।
हिंदी पट्टी में पूर्णकालिक लेखक होने की अवधारणा अभी विकसित नही हो पाई है लेखन को शौकिया काम ही समझा जाता रहा है जबकि अंग्रेजी के लेखन में परिस्थितियां ठीक इसके विपरीत है वहां फ्रीलांस राइटर अपनी बेस्ट सेलर के जरिए एक बढ़िया सामाजिक और आर्थिक सम्पन्न जिंदगी जीता है। भारत में भी समकालीन अंग्रेजी लेखकों की आर्थिक सामाजिक स्थिति कई गुना बेहतर है वो आत्मविश्वास भरी जिंदगी जीते है।
हिंदी के लेखक का जीवन त्रासद और उपेक्षित माने जाने के लिए शापित है कुछ इक्का दुक्का लोग मायानगरी मुम्बई की शिफ्ट हो जातें है वहां पैसा मिलता है अपेक्षाकृत पहचान गुम हो जाती है।
बहुत से सम्भावनाशील हिंदी के लेखक ऐसे ही सरकारी गैर सरकारी जिंदगी के बीच झूलते हुए अपना लेखकीय प्रतिदान समाज़ को देते है। पूर्णकालिक लेखक होकर जीना वास्तव में काफी मुश्किल काम है।
निजी तौर मेरी दिली तमन्ना है कि मैं एक पूर्णकालिक लेखक के रूप में जीवन जिऊँ लेखन के सिलसिले में मुक्त यायावर बन देश विदेश की यात्राऐं करूँ भिन्न भिन्न सभ्यता और संस्कृति के लोगो से मिलूँ उनके जीवन के अप्रकाशित पहलूओं की पड़ताल करते हुए उन पर लेखन करूँ। अच्छे विश्वविद्यालयों में विजिट करूँ महंगे बीयर बार में बैठ साहित्यिक चर्चा कर सकूं( अंग्रेजी लेखकों की तरह)
मगर साथ में मेरी कुछ सामाजिक जिम्मेदारियां भी है  मुझे अपने परिवार के लिए बुनियादी सुविधाओं का ढांचा खड़ा करना है मेरे बच्चे बढ़िया स्कूल में पढ़ें इसका भी प्रबन्ध करना है और इन सबके लिए अंततः मुझे हारकर एक अदद सरकारी नौकरी की तरफ की देखना पड़ेगा क्योंकि हिंदी के मुक्ताकाशी लेखन से फिलहाल अपनें देश में मैं ये सब प्रबंध नही कर सकता हूँ जो मेरी पारिवारिक सामाजिक जरूरतों से जुडी हुई बुनियादी चीजें है।
यह हिंदी के लेखन के परिप्रेक्ष्य में बड़ी त्रासद बात है जिसके चलतें लेखक का एक बड़ा हिस्सा वो उपक्रम खा जाता है जहां उसका तन खपता है और इसी तन को खपा कर उसे तनख्वाह मिलती है जिसके जरिए उसका और उसके परिवार का पेट पलता है बाकि वो जो भी लिख रहा है उसे बोनस ही समझिए।

डिस्क्लेमर: मैं एक बड़े किसान परिवार से ताल्लुक रखता हूँ इसलिए मेरे लिए धन अर्जन कोई विषय नही होगा यह एक मिथक और पूर्वाग्रह होगा। यहां 'मैं' से मेरा आशय नितांत ही मेरे स्वतन्त्र अस्तित्व से है उसमें पैतृक पृष्टभूमि की कोई भूमिका नही है न ही उसे मैं एक साधन के रूप में कभी देखता हूँ।

Tuesday, May 12, 2015

गांव की बातें

मनुष्य जहां जन्म लेता है उस जमीन से उस मिट्टी से उसका ताउम्र एक आत्मीय लगाव रहता है। अपनी जन्मभूमि से साथ हमारा एक गहरा अतीत जुडा होता है भले ही उस अतीत की स्मृतियां सुखद हो या दुखद मगर फिर भी अपनी जडें हमे सदैव अपनी और खींचती रहती है। गांव-देहात में जन्मे लोगो की नगरीकरण की प्रक्रिया में यह अतीत सदैव आडे आता रहा है। पहले अध्ययन और बाद में नौकरी के सिलसिलें मै डेढ दशक तक शहर में रहा अब एक दुर्योग की वजह से पिछले सवा साल से गांव में हूं। शहर मे रहतें हुए मैने गांव की जीवनशैली और मातृभूमि प्रेम के बारें मे खूब लिखा। निसन्देह गांव के जीवन में एक खास किस्म की सहजता है मगर पिछले एक साल से गांव के जीवन का पुन: हिस्सा बनने के बाद कुछ सवाल मेरे जेहन मे सतत दस्तक देते रहें है जिस वक्त हमनें गांव छोडा था उस दौर की पीढियां एकदम अलग किस्म की थी वें सीमित साधनों और बिना किसी मार्गदर्शन के खुद ही गिरती संभलती हुई अपना रास्ता बना रही थी। अब गांव की तस्वीर भी काफी हद तक बदल गई है अब गांव उस सहजता और आत्मीयता के केन्द्र नही बचें है जिसके लिए ये जाने जाते थे। मैनें बहुत सी पोस्ट गांव की सकारात्मकता के विषय पर लिखी है आज कुछ ऐसे बिन्दूओं को प्रकाशित कर रहा हूं जो न केवल असहज करने वाले है बल्कि गांव के विषय में स्थापित लोक अवधारणाओं का पर भी प्रश्नचिंह लगाते है। मेरे पास एक समीक्षक दृष्टि है इसलिए मेरा उद्देश्य महज गांव का महिमामंडन करना नही है आज इस पोस्ट के जरिए मैं गांव की कुछ विसंगतियों के बारें में बात करने जा रहा हूं मुझे लगता है गांव के विषय में बहुत भावुक होकर सोचने से पहलें इन तथ्यों पर भी विचार किया जाना चाहिए।
1.गांव में जातिवादी तंत्र बेहद सक्रिय और जटिल अवस्था में मौजूद है। कोई भी प्रगतिशील व्यक्ति इस तंत्र को देखकर एक खास किस्म की बैचेनी महसूस कर सकता है। लाख समतामूलक समाज़ का दावा करें आज भी गांव में सवर्ण जातियों की दबंगई कायम है। दलित और अति पिछ्डों की स्थिति कमोबेश आज भी एक जैसी ही है। 21 वीं सदी के भारत में गांव का यह स्वरुप निसन्देह बडे सवाल खडे करता है।

2.गांव में पडौसी अपने खुद के पडौसी को बर्बाद देखना चाहता है वो उसकी तरक्की से कतई खुश नही होता है बल्कि एक चिढ और ईर्ष्या की भावना रखता है। गांव में किसी सम्पन्न और भलेमानुष के लडकें को बाकायदा एजेंडा बनाकर कुसंग का शिकार किया जाने की परम्परा है खुद मेरे पिताजी को किशोरावस्था में मदिरा के व्यसन का आदी बनाना इसी एजेंडे के तहत किया गया था क्योंकि वो अकेले थे और सम्पत्ति के लिहाज़ से गांव के सबसे बडे जमींदार थे। इसका खामियाज़ा हमारे पूरे परिवार ने भोगा और पिताजी मात्र 57 साल की उम्र मे व्यसन व्याधि शरीर की वजह से दिवंगत हो गए।

3.गांव में आपके पास सर्वाईव करनें के लिए मैन पावर (मसल्स पावर) का होना एक अनिवार्य शर्त है भले ही आपके पास जमीन कम हो मगर आपके पास कुटम्ब जरुर होना चाहिए तभी गांव में आप सुरक्षित है। मैन पावर की कमी में आप गांव के असामाजिक तत्वों के लिए एक इजी टारगेट हो जातें हैं और फिर आपको किस्म किस्म से परेशान किया जा सकता है।

4.गांव में सम्पत्ति के झगडें इतने आम बात है कि इसकी वजह से परिवारों मे तनाव पसरा रहता है आपसे मे बोलचाल तक बंद हो जाती है और यहां तक की छोटी छोटी मेढ की लडाई में कत्ल तक हो जातें हैं। आपके परिजन भी आपको दीवानी के मुकदमों में फंसाकर ताउम्र कचहरी के चक्कर कटवाते रख सकतें हैं। अविवाहित पुरुषों की सम्पत्ति के चक्कर मे दुर्गति और हत्या आम बात है।

5.गांव में वर्चस्व और पंचायती राजनीति के चलते किसी संवेदनशील और रचनात्मक व्यक्ति के लिए यहां कोई सम्भावना नही बचती है बल्कि यदि आप तटस्थ है न्यायप्रिय है और अपने गांव के लिए सच मे कुछ सकारात्मक करना भी चाहते है तो उसमें भी राजनीति दांवपेंच घुसाकर आपकी यथासम्भव लैगपुलिंग करने की एक बडी नकारात्मक परम्परा है।

6.गांव में बेहद उदार भद्र तटस्थ और एकांतिक जीवन नही जी सकते है यदि आप ऐसा जीना चाहतें है तो आप गांव के सामाजिक गॉसिप के तंत्र के लिहाज़ से ‘असामाजिक’ या घमंडी जीव है।

7.संयोग से एक बडी पृष्टभूमि से ताल्लुक रखनें की वजह से यह जान पाया कि आप गांव में केवल कृषि आधारित जीवन नही जी सकते है लोग सतत रुप से आपको अपनी नूरा कुश्ती में हिस्सा लेने के लिए प्रोवोक करते रहेंगे आपकी कृषि आधारित प्रयोगधर्मिता से अभिप्रेरणा लेने की बजाए उसे एक अफवाह केन्द्रित सामाजिक चटखारे का विषय बनाने मे यकीन रखते है जिसमें अजीब सा व्यंग्यात्मक कौतुहल छिपा होता है।

8.अब गांव में उस किस्म की आत्मीयता लगभग हाशिए पर बची है जब लोग सबके दुख मे दुखी और सबके सुख में सुखी हुआ करते थे अब यहां घर घर डीटीएच लगे है और हाथ में स्मार्ट फोन है मगर बावजूद इनके मनुष्य से मनुष्य की भावनात्मक दूरी बढती गई है।

9.एक बडा कडवा सच यह भी है गांव में वही आदमी रहना चाहता है जिसके पास शहर में बसनें का कोई विकल्प नही है अन्यथा हर आदमी चाहता है उसका शहर में छोटा ही सही एक मकान हो जहां कम से कम उसके बच्चें रहकर पढ सकें।

 10.बिजली,शिक्षा,स्वास्थ्य,परिवहन, लॉ एंड ऑडर यें पांच मूल भूत तंत्र गांव में पूरी तरह से ध्वस्त है इसके लिए न किसी राज्य सरकार और ने केन्द्र सरकार के पास कोई कार्ययोजना है सब भगवान भरोसे है यदि आप नजदीक से इस बुनियादी तंत्र की कमी से उपजी विसंगतियां दुश्वारियां देखेंगे तो आप हैरत मे पड जायेंगे कि गांव के लोग आखिर किसके सहारे जिन्दा हैं।

...फिलहाल इतना है इन दस बिन्दूओं के व्यापक समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक अर्थ है जिन पर शोध विमर्श हो सकता है। कई दिनों से यह लिखनें की सोच रहा था मगर मातृभूमि का प्रेम मुझे अक्सर रोक लेता है आज लगा कि चूंकि मैं इस जीवन का हिस्सा हूं इसलिए कम से कम उन लोगों को गांव का यह सच जरुर बताना चाहिए जो मेरे जरिए गांव को देख और समझ रहें है।
कल वाणी गीत जी के एक कमेंट ने मेरे मन की जड़ता तोड़ी जिसमें उन्होने कहा कि ग्राम्य जीवन का मतलब ‘अहा जीवन’ नही होता है। सच में गांव मे जीना उतना आसान नही है जितना आप सब को लगता है यहां के जीवन की अपनी कुछ ऐसी पेचीदिगियां है जिनका कोई हल किसी के पास नजर नही आता है।


© डॉ.अजीत

डिस्क्लेमर: यह मेरा नितांत ही निजी ऑब्सर्वेशन है।इसे गाँव के विषय में नकारात्मक प्रचार न समझा जाए।

Saturday, April 11, 2015

दो भाई

(फेसबुक के पुराने पाठक मित्र जानतें है अपनें गांव के कुछ किरदारों पर मैं पहले भी एक शृंखला लिख चुका हूं। ये कोई खास किरदार नही है न ही इनके जीवन मे कोई नायकत्व है परंतु देहात के जीवन के ये किरदार अपने किस्म के आखिरी जरुर है जवान होती पीढियों के लिए इनके मामूली से दिखने वाले जीवन का दस्तावेजीकरण मेरे लिए लेखकीय सुख से बढकर निजि तौर पर सुखदायक इसे मेरी जन्मभूमि के प्रति मेरे लगाव की एक अभिव्यक्ति भर भी समझा जा सकता है। आने वाली पीढियां भले ही इसमें कोई रुचि प्रकट न करें मगर कभी पीछे मुडकर देखनें ये छोटी सी कतरन हमेशा मददगार रहेगी। गांव के जीवन को समझनें का एक समाजशास्त्रीय दस्तावेज़ बने यह मेरी इच्छा है इन लोगो के जरिए गांव के जीवन मे झांकना निसन्देह आत्मीय महसूस होता है।)

--------’मंगलू-काशी नाई: दो भाई’

मंगलू नाई का कागज़ पतरों मे नाम मंगलसैन है मगर गांव की सम्बोधन की अपभ्रंश परम्परा (जाति का समाज़शास्त्रीय अनुक्रम भी एक पक्ष है) में वो मंगलसैन से मंगलू हो गया है। मंगलू का एक छोटा भाई काशी। दोनों भाई गांव में रहकर नाई का काम करते रहे है दोनो ही जज़मान सिस्टम ( किसानों के बाल काटनें का फसलाना तंत्र) के जरिए गुजर बसर करते आये हैं। गांव मे नाई को बडे और मझोले किसान हर छमाही पर फसल में से अनाज़ देते है जिसकी ऐवज़ में वो साल भर उनके बाल काटते है।

मंगलू के चार बेटे है मगर कोई भी अपने पिता के इस पैतृक काम को नही करता है एक शराब के ठेके पर सेल्समैन है एक टेलर मास्टर है दो बेटे धारुहेडा( हरियाणा) में किसी फैक्टरी मे काम करते है। काशी का एक बेटा है जिसका वास्तव में नाम जगप्रकाश है मगर गांव मे उसे लोग चट्टु कहतें है वो जरुर नाई का काम करता है।

मंगलू पुरानें जमाने का दसवी दर्जे तक पढा हुआ है फारेस्ट विभाग में सरकारी नौकरी पर लग गया था मगर जंगलात मे काम करने मे जी नही लगा तो सरकारी नौकरी छोड गांव में नाई का काम करने आ लौट आया मंगलू की उम्र अब सत्तर के पार मगर आज भी उसे अपने उस नौकरी छोडने का अफसोस है। मेरे पास अक्सर बैठ जाता है बातचीत में कुछ अंग्रजी के वाक्य धाराप्रवाह बोलता है जिससे उसका पुराना पढा लिखा होने की पुष्टि हो सके। काशी अनपढ है मगर वो अपने काम में पारंगत है।

जिस बात के लिए मंगलू-काशी दोनों भाई जाने जाते है वो उन दोनों भाईयों का आपस का प्रेम। दोनों की एकदम से राम-लक्ष्मण की जोडी है। गांव मे आज भी भाईयों के प्रेम का उदाहरण के लिए मंगलू-काशी का ही नाम लिया जाता है। मंगलू चूंकि पढा लिखा है इसलिए वो थोडा शार्प भी है मगर काशी का प्रेम एकदम निश्छल और नैसर्गिक किस्म का रहा है। काशी जवानी में ही विधुर हो गया था उसनें कभी अपने जीवन की परवाह नही की हमेशा अपने बडे भाई के लिए जुता रहा। अब दोनों ही भाई लगभग सन्यास आश्रम में है मगर आज भी दोनो का प्रेम अद्भुत किस्म का है। ऐसा प्रेम विरला ही देखने को मिलता है। गांव में लगभग सभी लोग यह बात जानते है कि यदि मंगलू कहीं गांव से बाहर गया होता था और शाम तक वापिस नही आता था वो काशी शाम को लालटेन लेकर बस स्टैंड पर पहूंच जाता था और जब तक मंगलू वापिस न आता वहीं बैठ उसकी राह देखता था। पिछलें दिनों मंगलू की आंखों का मोतियाबंद का आपरेशन हुआ तो काशी अपने बडे भाई मंगलू का हाथ पकडकर उसे गली मे लेकर चलता था। दोनो बूढे हो चुके है मगर आज भी दोनों में गजब का प्यार है।

दोनों भाईयों में यह प्रेम बचा रहा है इसकी एक बडी वजह काशी का बेहद सरल होना रहा है। हालांकि अब काशी अपने बेटे के साथ अलग रहता है मगर एक वक्त वह भी हुआ करता था कि जब तक शाम को मंगलू खाना न खा ले काशी खाना नही खाता था। काशी से पूछने पर बताता है क्या कहूं बाबू जी मेरा जी ही ऐसा है। छ महीने पहले मंगलू गम्भीर रुप से बीमार हो गया था बचने के कम आसार थे कई दिन अस्पताल में भर्ती रहा उन दिनों काशी मेरे पास चिंतातुर हो बैठा रहता और कहता है भाई के मरनें पर मेरा जीना मुश्किल हो जाएगा मेरी भगवान से यही प्रार्थना है कि मै मंगलू से पहले मरुं क्योंकि मंगलू मेरे बिना जी सकता है मगर मै मंगलू के बिना जी न सकूंगा। खैर ! जब मंगलू स्वस्थ होकर घर आया तब काशी को राहत की सांस नसीब हुई।

मंगलू चूंकि पढा लिखा है इसलिए वो थोडा उसका लाभ भी लेता है अब उसने संत गुरु राम रहीम का सत्संग लिया हुआ है इसलिए वो अब हमेशा आध्यात्मिक बातों मे ज्यादा रुचि लेता है और काशी चूंकि शाम को एक एक-दो पैग देशी शराब के लगा लेता है इसलिए वो काशी की निंदा भी करता है उसे अपने साथ सत्संग में लेकर चलने की जिद करता है मगर काशी ने साफ मना कर देता है इसे मंगलू उसकी अज्ञानता कहता है। दोनों भाई दो विपरीत ध्रुव है मगर फिर भी बेहद सहज है।

ओढी हुई सामाजिक समझदारी और सामाजिकता के इस दौर में मंगलू और काशी जैसे भाई अपने किस्म के अकेले है। भले ही मंगलू का संवेदना का पक्ष काशी की अपेक्षा कमजोर है उसकें अन्दर वैचारिकता और पढे लिखे होने का अतिशय दंभ भी नजर आता है मगर फिर भी दोनों भाईयों का प्रेम वास्तव में अद्भुत किस्म का है उम्र के इस दौर में भी दोनों भाई ठीक वैसे ही लगते है जैसे स्कूल के दिनों के साथ जानें वाले दो भाई दिखते है जिनकी कक्षाओं मे एक दो साल का ही फर्क होता है।

काशी के भाई प्रेम की वजह से वो निजि सम्बधों मे पिछडा भी है वो अपने बेटे की उतनी केयर नही कर पाया जितनी करनी चाहिए थी आज बडे भाई के बेटे शहरों मे निकल गये है उसका खुद का बेटा गांव में ही रह गया है मगर फिर भी काशी के मन में कोई मलाल नही है वो आज भी भाई के लिए अपनी जान छिडकता है। आज भी शाम को यदि उसके मंगलू न दिखे तो वो मौहल्ले में पूछना शुरु कर देता है कि भाई कहीं मंगलू देखा क्या?

दिन ब दिन एकाकी होते जीवन में और भाईयों की सामाजिक दूरी के बीच में अपने आसपास दो ऐसे भाईयों को देखना निसन्देह सुखप्रद है उनके अलावा पूरे गांव भाईयों के पारस्परिक प्रेम का कोई उदाहरण नजर नही आता है कल मंगलू और काशी भले ही नही रहेंगे मगर उन दोनों भाईयों के पारस्परिक प्रेम के किस्से हमेशा जिन्दा बचे रहेंगे यह अपने आप में क्या कम बडी बात है

Tuesday, March 31, 2015

फेसबुक

इनबॉक्स में दिखते है जो परेशान बहुत
हकीकत में छूट गए उनके अरमान बहुत

स्माइल उनका डर कभी लिहाज़ बताती थी
जोश से जब हमें सुनाते थे वो फरमान बहुत

लाइक करके चले गए हम चुपचाप वॉल से
देखा जब उनके दर पर बैठें है मेहमान बहुत

कभी बेतक्कलुफ सी बातें कभी दुनियादारी
उनके कमेंट्स करते थे बारहा हमें हैरान बहुत

यूं तो लाइक कमेंट शेयर टैग में शामिल थे सब
फेसबुक पर दोस्तों से रहें हम अनजान बहुत

© डॉ.अजीत




Monday, March 23, 2015

टाइमपास

खुद से भागते लोगो को जीने का सलीका दे गया
ऐ जुकरबर्ग बच्चों के हाथ में कैसा लतीफा दे गया

एक अदद आई डी बना कर क्या गुनाह कर दिया
ये तेरा इनबॉक्स तो तल्खियों का वजीफा दे गया

पहले फ्रेंड फिर अन्फ्रेंड आखिर ब्लॉक कर दिया
दोस्त के नाम पर सर्च करके कुछ खलीफा दे गया

कुछ हकीम ऐसे भी थे इस चेहरे की किताब पर
होना जिनका मरीज ए इश्क को  शिफ़ा दे गया

म्यूच्यूअल फ्रेंड की पता नही कोई बात बुरी लग गई
डिएक्टिवेट के साथ दोस्त वापिस सारी वफ़ा दे गया।

© डॉ. अजीत


Sunday, March 8, 2015

याद

वक्त कभी थम जाता है कभी तेजी से गुजर जाता है मगर कभी कभी वक्त फांस की तरह मन में फंस जाता है आज 9 मार्च ठीक वैसा ही मेरे मन में फंसा हुआ है जैसा पिछले साल का 9 मार्च था। आज ही के दिन पिताजी आकस्मिक रूप से अपनी यात्रा पूर्ण कर हमें दुनिया में अकेला छोड़ गए थे।
पिछले एक साल में पिता का न होना क्या होता है इसके अर्थ समझ पाया हूँ उनके जीते जी मेरी उनसे तमाम मुद्दों पर असहमतियां/मतभेद रहे थे परन्तु अब मुझे खुद के तर्क बेहद बचकाने और हास्यास्पद लगते है।
पिछले एक साल से कोई दिन ऐसा नही गया होगा जिसमें पिताजी की कमी न खली हो परन्तु स्मृतियों को सायास एक बंद कमरें में रख छोड़ा था यहां तक तमाम रिश्तेंदारों के दबाव के बावजूद घर की बैठक में पिताजी का मालायुक्त चित्र भी नही लगनें दिया क्योंकि सच्चाई यह है मनुष्य की नश्वरता के नाम का पूरे परिवार को उपदेश देते देते मैं खुद अंदर से इतना कमजोर और डरा हुआ था कि पिताजी को एक निर्जीव फ्रेम में टंगा देखनें की हिम्मत मुझमें नही थी।
जीवन में पिता का न होना आपके जीवन में एक स्थाई किस्म की आश्वस्ति का न होना होता है आपकी तमाम दुनियावी सफलता महज एक घटना में तब्दील हो जाती है क्योंकि आपसे ज्यादा उस पर फख्र करनें वाला आपके पास नही होता है।
पिताजी के निधन के बाद मेरे जीवन में यू टर्न आया और पिछले एक साल से गाँव में हूँ उनका स्थान लेना तो बहुत बड़ी बात है गाँव के लिहाज से मैं उनका दशमांश भी नही बन पाया हूँ। गाँव में उनका कद बेहद बड़ा था उनका एक लिहाज़ था और इसी के चलतें पूरे गाँव में कोई उन्हें उनके नाम से सम्बोधित नही करता था। भलें ही पिताजी एक सामन्त जमींदार थे परन्तु वो कभी शोषक नही थे बल्कि गाँव के अन्य चौधरियों द्वारा सताए गए गरीब दलित/पिछड़ों के रक्षक थे वो सच्चे अर्थों में शरणागत वत्सल थें।
बहरहाल, पिताजी को लेकर एक सवाल अक्सर मन में घूमता रहता है कि अभी बहुत जल्द था उनका जाना उन्हें इस समय नही जाना चाहिए था वो तो एक हफ्ते की बीमारी भोग निकल गए इस दुनिया से।और पीछे छोड़ गए एक यथार्थ का एक कड़वा संसार जहां रोज जीना है रोज मरना हैं।
पिता का न होना आपको एकदम से इतना बड़ा बना देता है कि आप उस प्रौढ़ता को जीते हुए कब हंसना भूल जाते है खुद आपको भी नही पता चलता है।
फिलहाल एक साल बीत गया है मगर बहुत कुछ है जो मेरे अंदर बीत नही रहा है कुछ सवाल कुछ अधूरे जवाब और कुछ धुंधले स्वप्न मेरे जेहन में यादों की आंच में पकतें है और पिघलता मैं जाता हूँ।
पारिवारिक उत्तरदायित्व के भूमिका में जब कभी तन्हा घिर जाता हूँ तब पिताजी का न होना बड़ी शिद्दत से याद आता है निसन्देह सूक्ष्म रूप में पिताजी मुझे यूं देखकर मुस्कुराते होंगे क्योंकि उनको जितनी सलाह मैं दिया करता था अब मैं खुद उस किस्म की एक भी अमल नही कर पाता हूँ।
लोक परलोक में प्रायः यकीन नही रखता हूँ परन्तु आज खुद को सांत्वना देने के लिए यही कहता हूँ ईश्वर पिताजी को इस सांसारिक जीवन मरण से मुक्त करें और अपने श्री चरणों में स्थान दें भले ही इसके लिए मेरे संचित कर्मों का भी उपयोग कर लें। जीवन है तो सम्बन्ध है और सम्बन्ध है तो दुःख है। बीतते सालों में पिताज़ी की स्मृतियाँ मुझे मजबूत बनाएं यही कामना करता हूँ।

एक साल का एक वृत्त पूर्ण होने पर एक अभागे पुत्र की अपने पिता को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि !

Sunday, February 22, 2015

रॉकस्टार

रॉकस्टार: ‘जो मेरे अंदर कहीं रहता है’

आज रॉकस्टार फिल्म देखी। फिल्म पुरानी है मगर एक मित्र ने अनुशंसा की तो देखने की वाजिब वजह मिल गई। सबसे पहले तो उस दोस्त का आभार जिसनें एक खूबसूरत फिल्म का हिस्सा बनने के लिए मुझे प्रेरित किया। यह फिल्म मुझसे छूट गई थी इसका अब मुझे मलाल हुआ है। आज फिल्म पर समीक्षा जैसा कुछ नही लिखूंगा बस फिल्म के जरिए खुद के अहसास के खुले पोस्टकार्ड बेनामी पतों पर लिखने और भेजने का मन है। रॉकस्टार एक ऐसे रुहानी किरदार की कहानी है जो हमारे अन्दर ही बसता है खुद से खुद की रिहाई और खुद को खुद के अक्स से देखने की फुरसत ये कमबख्त दुनिया कब देती है और फिल्म इसी ही हिमायत करती है। निजी तौर पर मेरी जो संगीत की समझ कहती है रॉक बैचेनियों का संगीत है। रॉक म्यूजिक रुह की बैचेनियों का लाउड साउंड के जरिए कैथारसिस है वो हमारी बंदिशों को तोडकर हमे आजाद होने की ख्वाहिश का आसमान देता है। रॉकस्टार दरअसल एक ऐसी ही दुनिया की कहानी है जो हम सबके अन्दर एक अमूर्त रुप में बनती बिगडी रहती है। ये भी सच बात है कि कम ही लोग जेजे ( जॉर्डन) की तरह उस अहसास को पहचान पाते है जो दर्द के लिफाफे में अक्सर बैरंग खत की शक्ल में हमारे तकिए के नीचे सिरहारने रखा मिलता है और हम अक्सर करवट बदल सो जाते है। जॉर्डन और हीर दरअसल दो किरदार नही है बल्कि मै उनको किरदार से आगे बढकर दो उन्मुक्त चेतनाएं कहूंगा जो एक दूसरे पर आश्रित भी है और एकदूसरे को जानने समझने की यात्रा पर भी है।फिल्म में नायक और नायिका का आपसी भरोसे का मेआर भी बहुत ऊंचा है जिससे हौसला मिलता है। फिल्म का एक अपना महीन सूक्ष्म मनोविज्ञान है रॉकस्टार फिल्म एक ‘विचित्र अहसास’ को परिभाषित करती है उसके जिन्दगी मे देर सबेर दस्तक होने पर उसके बाद के जिन्दगी मे आये बदलाव को एक नए नजरिए से देखने का जज्बा देती है। फिल्म में मैत्री और प्रेम से इतर भी एक अपरिभाषित रिश्तें की व्यापकता और उसको स्वीकार कर जीने की कहानी भी है। जॉर्डन ( रणवीर कपूर) और हीर ( नरगिस फाखरी) दोनो की सहजता प्रभावित करती है दोनो की प्रयोगधर्मिता आरम्भ मानवीय सम्बंधो को देहातीत होने की सम्भावना को भी पल्लवित करती है। निसन्देह स्त्री पुरुष सम्बंधों मे देह एक मनोवैज्ञानिक सच है यह एक लौकिक तत्व है इसके अलावा पूरी फिल्म में इशक में दरगाह की रुहानियत है बैचेनियों के आलाप है। फिल्म में म्यूजिक लोबान की तरह जलता है और रुह को सुकून अता करता है पूरी फिल्म में एक खास किस्म का अधूरापन भी प्रोजेक्ट किया है जो एक Abstract Emotion के रुप में उपस्थित रहता है।

दरअसल,फिल्म इश्क के जरिए खुद के रुह की बैचेनियों को रफू करने की एक ईमानदार कोशिस है जो इसकी फिक्र नही करती है कि क्या दुनियावी लिहाज़ से ठीक है और क्या गलत है। एक पाक इश्क के ज़ज़्बात को फिल्म एक बिखरी हुई कहानी में पिरोती है और उसी के जरिए दिल की बीमारी का ईलाज़ करती है। फिल्म को देखते हुए खुद का दिल कई बार बेहद तेज धडकने लगता है जिसका एक ही मतलब है कि बात सीधे तक दस्तक दे रही है। दिल का टूटना और दर्द को महसूस करना किसी भी फनकार के लिए जरुरी है फिल्म इसी के सहारे आगे बढती है मगर इस दर्द की कीमत सच में बहुत बडी है यकीनन इश्क का मरहम उसकी मरहम पट्टी जरुर कर सकता है मगर कमबख्त ! इस मतलबी दुनिया न हीर जैसी माशूका मिलती है और न जॉर्डन जैसा आशिक।रॉकस्टार हम सबके अन्दर दबे एक ऐसे वजूद को से हमें मिलवाती है जो सही गलत के भेद मे नही पडना चाहता बस मुक्त हो जीना चाहता है कुछ मासूम अहसासो के जरिए दुनियादारी के लिहाज़ से वो गंद मचाना चाहता है मगर ये गंद मासूम बदमाशियों से शुरु हो रुहों के मिलन पर जाकर खत्म होती है। इतनी हिम्मत जब रब अता करता है तब एक ऐसी दुनिया का हिस्सा हम खुद ब खुद बन जाते है जो इश्क के वलियों की दुनिया है जहां हमारी रुह अपने बिछडे अहसासों से मिलकर थोडी देर के लिए एक रुहानी जश्न मे खो जाती है। ये फिल्म सच में सूफियाना फिल्म है जो हमे खुद के करीब ले आती है भले घंटे दो घंटे के लिए ही सही।

और अंत में शुक्रिया दोस्त 

Wednesday, January 14, 2015

परिवर्तन

प्रायः साधना को आध्यात्म से जोड़कर देखा जाता है। व्यापक सन्दर्भों में इसकी जड़े दर्शन और आध्यात्म से ही पोषित होती है। ये स्वयं को साधने से सम्बंधित है इसलिए साधना कहा गया है और जरूरी नही प्रत्येक साधना रहस्यमयी ही हो हम रोजमर्रा की जिंदगी में भी किसी न किसी स्तर पर साधनारत होते ही है। आध्यात्म,रहस्यवाद,साधना इनसे आत्म उन्नयन की दिशा में आगे बढ़ सकते बशर्ते आप होशपूर्वक खुद को देख सके और जो भी कदम इस दिशा में आगे बढ़ाएं उससे आपके ईगो को खुराक न मिल पाये बल्कि ईगो के प्रति अपनी प्रतिक्रिया को विलम्बित करते हुए लगभग स्तंभित कर दिया जाना चाहिए।
बिना किसी उपलब्धि सरीखी स्प्रिचुअल ग्लैमराईजेशन और महानताबोध के मैंने एक प्रयोग खुद के साथ किया वास्तव इस प्रयोग के पीछे न साधना जैसे भाव थे न उस तरह किसी लक्ष्य का निर्धारण किया था। लम्बें समय से मेरी आदत पकी हुई थी भोजन के समय प्रिय आहार देख आह्लादित हो जाना और नापसन्द की चीज़ बनी देख कर हद दर्जे का खिन्न हो जाना कई दफा प्रतिक्रिया स्वरूप दाल/सब्जी चिढ कर छोड़ देता और केवल नमक से रोटी खाता था। इसकी वजह से प्रायः घर पर वही बनता जो केवल मुझे पसन्द होता था और मेरी पसन्द बेहद सीमित किस्म थी मसलन सब्जियां लगभग ना के बराबर खाता था। इसके अलावा आहार व्यवहार से जुडी एक आदत और थी भूख लगी होने की स्थिति में मेरी इच्छा होती कि घर पर सबसे पहले भोजन मुझे मिलें।
पिछले 9 महीने से गाँव में हूँ इन आदतों के चलते शुरुवात में थोड़ी असुविधा हुई परन्तु बाद में स्वत: ही खुद में यह परिवर्तन आ गया कि अब भोजन के प्रति एक साक्षी भाव उत्पन्न हो गया है। अमूमन जब माताजी मुझसे यह पूछती कि आज क्या बनाये तो मै घर के अन्य सदस्यों की पसन्द के अनुरूप खाना बनाने की बात कहता हूँ। अब मुझे न सबसे पहले भोजन चाहिए और न केवल खुद की पसन्द अब न बेस्वाद भोजन बनने पर मेरी कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया होती है। अब जिस समय और जैसा भी भोजन मिल जाए मुझे रुचिपूर्ण लगता है। अब मुझे इस बात से कोई ख़ास फर्क नही पड़ता कि भोजन मेरी पसन्द का बना है या मेरी नापसन्द का बस उसे शरीर की एक जरूरत समझ साक्षी भाव से ग्रहण करता हूँ और इससे मुझे बेहद संतोष भी मिलता है। अब समझ की यात्रा भोजन/स्वाद से आगे निकल गई है अब जो भी जिस समय मिल जाए वो ही सहर्ष स्वीकार है। खाने के मामलें में मेरी नगण्य प्रतिक्रिया हो गई है इस बात पर परिजन भी हैरान है कि एक चूजी और चटोरा शख्स ऐसे कैसे बदल गया है। यह बदलाव बेहद सुखद है।
गौरतलब हो यह कोई विशिष्ट बात नही है कोई उपलब्धि है जिसका ग्लेमराईजेशन करके मै अपने ईगो को पुष्ट करना चाह रहा हूँ यहां इसका उल्लेख केवल इस भाव से किया है कि अपने कंडीशण्ड जीवन में कुछ रेडिकल चेंज लाकर कई दफा चेतना की जड़ता टूटती है जिसका अपना एक सुख है।
प्रयोग के रूप में आप अपनी किसी आग्रही आदत के उलट जाकर साक्षी या स्वीकार भाव विकसित कर सकते है। देखिए एक रेडिकल चेंज आपको कितनी सुखद अनुभूति देता है।

'रेडकिल चेंज'

Wednesday, December 24, 2014

ख़्वाब

कुछ ख़्वाब केवल
आँखें देखती है
उन्हें देखने की इजाज़त
दिल और दिमाग नही देते
ऐसी बाग़ी आँखों से
नींद विरोध में विदा हो जाती है
ऐसे ख़्वाब बहुत जल्द
नींद की जरूरत से बाहर निकल आते है
वो हमारी चेतना का हिस्सा बन
खुली आँखों हमें दिखते है
दिल अपनी कमजोरी दिखाता नही
दिमाग को जताता है अक्सर
और दिमाग की होती है एक ही जिद
वो देखना चाहता हमें हर हालत में
विजयी और सफल
दिल धड़कनों की आवाज़ सुनता है
सुनकर डरता है
वो भांप लेता है
मन के राग के आलाप
जो बज रहे होते है
बिना लय सुर ताल के
इन ख़्वाबों को देखते हुए
न रूह थकती है और न आँख
दोनों ही करती है इन्तजार
एक ऐसे ख़्वाब के सच होने का
यही इन्तजार बनता है जीने की वजह
मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने में ऐसे ख़्वाब
ईश्वर के नियोजित षडयन्त्र का हिस्सा होते है
क्योंकि
ऐसे ख़्वाब कभी पूरे नही होते
बस उनका अधूरापन
उन्हें न कभी बूढ़ा नही होने देता
और न मरने देता है।

© डॉ. अजीत

Monday, December 8, 2014

दुःख का मनोविज्ञान

तमाम उम्र जो रिश्तों की तुरपाई करता रहा उसकी भूमिकाऐं बदली मगर न वो बदला और न उसके अंदर की अच्छाई ही। जिंदगी ने उसको बहुत जल्दी ही नट की तरह संतुलन साधने के लिए प्रशिक्षित कर दिया था। जिन्दगी ने उसको उम्मीदें दी मगर उसके बदले जो लिया वो उसके चाहने वालो का स्थाई दुःख बना रहेगा उम्र भर। सुख दुःख की धूप छाँव में उसके हिस्से तपती धूप ज्यादा आई मगर उसको धूप छाँव से ज्यादा अपना खुद का आसमान बुनने की धुन थी उसने सबको दिया अपने हिस्से का आकाश। उसका होना सबके लिए एक आश्वस्ति जैसा था उसके रहतें हर गलती छोटी और हर खुशी बड़ी हो जाती थी। उसकी डांट में फ़िक्र और दुआओं में अपने संचित कर्मों को बांटने की आदत शामिल थी।
वो जब तक आसपास था तब तक अपने कद का अकेला अहसास साथ नही चलता था परछाई पर उसकी परछाई की नजर साथ चलती थी। एक छोटी सी दुनिया के जितना बड़ा विस्तार हो सकता था उसका केंद्र था वो अकेला शख्स। नही देखा था कभी उसको बोझिल बातें करते हुए। वो कभी एक निरपेक्ष यात्री था तो कभी एक संघर्षरत योद्धा।
बाहर की दुनिया से लड़ते भिड़ते बनते बिगड़ते उसकी जो लड़ाई खुद से चल रही थी उसका किसी को भी आभास नही था और जब वो प्रकट हुई तो उसके बाद की दुनिया बेहद निःसहाय किस्म की हो गई थी।
उस आदर्श पुरुष को तयशुदा मौत की तरफ बढ़ते हुए देखना जीवन का सबसे अविस्मरणीय निसहायताबोध था। जब तक हम अपने हिस्से के सुख का दशमांश भी उसको लौटा पातें नियति ने उसके लेने के सारे केंद्र पर मनाही का ताला टांग दिया था।
किस्तों में अपने प्रियजन को पीड़ा त्रासदी और मौत के चक्र का हिस्सा बनते देखना सदी का सबसे बड़ा दुःख था और ये दुःख तब और भी गहरा जाता जब वो शख्स मेरा पिता था। तमाम वैचारिक असहमतियों के बावजूद और कथित ज्ञान अर्जन के बाद भी मेरा कद कभी इस काबिल न हो सकता है कि उनके किए कामों को अच्छा या बुरा कहकर सम्पादित कर सकूं।
जीवन का उत्तरार्द्ध जब सुख भोगने के लिए शास्त्रों ने अनुकूल बताया तब भी मुझे यकीन नही होता था मगर पिता का ऐसे आकस्मिक चलें जाना मेरे उस विश्वास को और पुष्ट कर गया कि कुछ लोगो के न पूर्वाद्ध में सुख नसीब होता है और उत्तरार्द्ध में वो जीवनपर्यन्त अपने हिस्से का दुःख जीने और सुख बांटने के लिए ही जन्म लेते है।
पिता का यूं चले जाना अपने साथ एक दुनिया ले जाता है जहां बहुत से ऐसे प्रश्न हमारें मन में घूमते रहते है जिनका कोई जवाब किसी के पास नही होता है।
वक्त भले ही सब सीखा देता है परन्तु एक निर्वात सदैव मन के अंदर बचा रह जाता है जहां कुछ वक्त से शिकायतें कुछ खुद से सवाल चलते रहतें गाहे बगाहे मनुष्य के रूप में इस निर्वात को जीना बेहद त्रासदपूर्ण लगता है क्योंकि हम केवल सोच कर भी मन को सांत्वना नही दे पातें है ऐसे दुःख बड़े अपरिहार्य और ढीठ किस्म के होते है कहने/लिखनें/बांटने से इनकी मात्रा और तीव्रता पर कोई फर्क नही पड़ता है।

Sunday, November 2, 2014

त्रिशंकु

धर्म को छोड कोई दूसरी एक भी चीज ऐसी नही थी जिसे मै बदल सकता था और धर्म के बदलने से मेरी किसी समस्या का समाधान नही हो सकता था। प्रज्ञा चेतना और सम्वेदना की यात्रा पर मै पैदल चलता चलता बहुत दूर निकल आया था इस मार्ग का चयन मेरा खुद का चयन नही था बल्कि इस मार्ग मे खुद मुझे चुन लिया था। वय वर्ग जाति धर्म सबके लिहाज़ से लगभग मै निष्काषित और निर्वासित था यह एक किस्म का स्व निर्वासन था। वर्ण संकरो दलितों अति पिछ्डो अल्पसंख्यकों की स्थिति मुझसे सम्मानजनक थी क्योंकि वें अपनी पहचान के साथ संगठित थे वे लड रहे थे अपने हिस्से की लडाईयां।
नितांत संयोग के चलते जिस धर्म जाति पृष्टभूमि में जन्म हुआ उसकी रवायतों मे मेरी दिलचस्पी किशोरावस्था के शुरु होने तक रही तब तक मेरा मस्तक भी गर्व से भरा रहता कभी अपने हिन्दू होने पर और कभी अपनी जाति के गौरवशाली इतिहास पर मगर शायद अस्तित्व का नियोजन दूसरे किस्म का था उसने मेरे हिस्से वर्ग निर्वासन/बहिष्कार लिख दिया था जैसे ही समझ जैसी किसी चीज का उदभव मन मे हुआ तो पता चला कि गर्व तो केवल उस चीज़ पर किया जा सकता है जो आपने अपने श्रम से अर्जित की हो बाकि तो संयोग की भीख में मिला हो उस पर गर्व करने का कोई औचित्य नही बनता है इसलिए तभी उस मिथ्याभिमान से मुक्त हुआ मेरे लिए हिन्दू होना और अपनी इस क्षत्रिय जाति में पैदा होना ठीक एक संयोग का मामला लगने लगा।
अपने अतीत से कटकर चलना आपकी आंतरिक यात्रा के लिए सहज हो सकता है मगर बाह्य जगत मे इतनी सहजता नही मिलती है एक तरफ तो मै अपने वर्ग से कटाव की प्रक्रिया से गुजर रहा था वहीं दूसरी तरफ तमाम संवेदनशीलता के बावजूद मेरे दलित और अति पिछ्डें मित्रों के लिए मुझे उसी सदाश्यता से स्वीकार कर पाना मुश्किल था जिस वर्ग से उनका प्रतिशोध का रिश्ता रहा हो उस वर्ग से निर्वासित किसी व्यक्ति को अपने समूह का हिस्सा बनाने से पहले उनके मन मे तमाम शंकाएं थी सच तो ये है सखा भाव से वो कभी आत्मसात कर भी नही पाए मेरे सम्वेदनशील रचनाधर्मी व्यक्तित्व के बावजूद मेरा कद और मेरा अक्स उन्हें घसीटता हुआ अपने अतीत मे ले जाता जहाँ सामंती शोषण के तमाम किस्से उनके जेहन मे विचर रहे होते उस वक्त उनका मन मुझे लेकर तीन हिस्सों में बंट जाता एक मन मुझे बिना शर्त और शंकारहित स्वीकारने की वकालत करता एक मन उन्हे सावधान करता कि सामंती चरित्र के षडयंत्र कभी नही समाप्त होते है इसे जब भी मौका मिलेगा ये तुम्हें तुम्हारी औकात बता देगा और तीसरा मन एक खास किस्म के सैडेटिव प्लीज़र मे जीता उसे लगता कि अब उनकी वैचारिकी और संघर्ष के परिणाम सामने आने लगे है एक खांटी सामंती परिवार का लडका उनकी सोहबत मे आकर राहत महसूस करता है वें उसके साथ हमप्याला होते समय गर्व और अभिमान से भर जाते उस समय वंचित वर्ग का सामंती मनोविज्ञान देखा जा सकता था वस्तुत: मनुष्य का स्वाभाविक चरित्र पावर सेंटर ही विकसित करना होता है।
इन तीन किस्म के मन के बीच मै सच्चे दोस्तों के हाथ पकड उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिस करता कि मै शोषक,उत्पीडक नही हूं चेतन स्तर पर वो इससे सहमत भी थे परंतु अर्द्धचेतन और अवचेतन के स्तर पर उनका भोगा हुआ यथार्थ मुझे समग्र रुप से कभी स्वीकार न कर पाता उस समय मेरी बडी विचित्र स्थिति हो जाती है एक तरफ मै अपना मूल खुद काटकर आया हूं वही दूसरी तरफ जो मेरा मित्र वर्ग है उसकी शंका सन्देह या ग्राह्यता मुझे स्वीकारने मे बाधा बनती जाती है मै त्रिशकुं की भांति बीच मे लटक जाता था।
अपने आसपास के आसमान को देखने पर पता चलता कि मै अकेला त्रिशकुं नही हूं यहां तो मेरे जैसे बहुत से लोग है जो अपने हिस्से का निर्वासन झेल रहे है अपने वर्ग मे उनकी दिलचस्पी और श्रद्धा नही बची है और जिन लोगो की तरफ वो उम्मीद और मानवीय दृष्टि से आए थे उनके पूर्वाग्रह और संघर्षो की आंच ने उन्हें कभी करीब नही आने दिया। मैने देखा इन त्रिशकुंओं मे कुछ ब्राहमण भी थे वो उदास होकर बताते कि उनके पूर्वजों ने चाहे जो किया हो मगर उन्होने कभी दलितों को नही सताया वो दलितों से मैत्री की अभिलाषा मे थें मगर दलित/पिछ्डे मित्रों को उनके आने से षडयंत्र और अपना आन्दोलन कमजोर पडने का भय था इसलिए उनको टांग दिया जाता था ऐसे ही आसमान में उनमे से कुछ सच्चे मुसलमान थे जिन्होनें लानत भेजी थी हिंसा पर जेहाद के बदले आंतक और इंसानों के कतले आम पर जिसके बदले मुसलमानों ने उन्हे काफिर कहा मगर हिन्दूओं के लिए वो कभी सहज न्ही रहे उन्हें लगता रहा कि ये मुसलमान पहले है इंसान बाद में।
खांचों मे बंटकर रहना इंसान की नियति है अपने लिए सुरक्षा तलाशना मनुष्य की अस्तित्व को बचाने की अपनी सबसे बडी युक्ति विचारधारा जिस ईमानदारी की मांग करती है वो ईमानदारी एक किस्म का पूर्वाग्रह साथ बांटती है जिसके चलते मेरे जैसे बहुत से लोग अपने अपने हिस्से का निर्वासन भोगते हुए ताउम्र यही बताते रहते है कि वो वैसे कतई नही है जैसे उनके पूर्वज़ रहे होंगे अपने बिना किसी दोष वो जीते है अपने हिस्से का अपराधबोध बार बार यह विश्वास दिलाते है कि मै अपने लोगो अपनी परम्पराओं के खिलाफ आपके नही मगर अविश्वास और भोगे हुए यथार्थ की चासनी इतनी गाढी होती है उसमे अपना संघर्ष हमेशा गाढा और मीठा दिखता है दूसरे व्यक्ति का उद्देश्यपूर्ण ! मनुष्य की समझ पर यह एक ऐसा प्रश्नचिंह है जो हाल फिलहाल तो मिटता नही दिखता है बाकि उम्मीद पर दुनिया कायम है और मै भी इसी उम्मीद पर कायम हूं शायद कल इंसान को उसके मौलिक वजूद से पहचाना जाए न कि उसकी धर्म,जाति,आर्थिक-सामाजिक पृष्टभूमि से उसकी सीमाएं निर्धारित की जाएं।


‘एक त्रिशकुं की आपबीती

Friday, October 3, 2014

हैदर

'हैदर' रिश्तों की सच्चाई और कश्मीर वादी की स्याह हकीकत की महीन पड़ताल करती फिल्म है। फिल्म में दो यात्राएं समानांतर रूप से चलती है एक कश्मीर में पूछताछ के नाम पर उठाए गए लोगो के परिवार की दारुण कथा है दूसरी रिश्तों की महीन बुनावट में उलझे प्यार की पैमाइश की कोशिस फिल्म करती दिखती है। फिल्म की गति थोड़ी स्लो है मगर एक बार जुड़ने के बाद आप फिल्म के सिरे जोड़ पाते है। विशाल भारद्वाज की फिल्मों में स्त्री किरदार को काफी रहस्यमयी ढंग से विकसित किया जाता है हैदर में भी तब्बु के मिजाज़ को पढ़ने के लिए मन जीने से नीचे तहखाने में उतरना पड़ता है।
फिल्म मां-बेटे और भाभी-देवर के रिश्तें को काफी अलग एंगल से दिखाया गया है। हैदर और उसकी मां यानि तब्बु के रिश्तें में एक अलग किस्म की टोन भी है जो कभी कभी विस्मय से भरती है।फिल्म उम्मीद,बेरुखी,इश्क और धोखे के जरिए कश्मीर की अवाम के एक जायज मसले पर बात करती नजर आती है। केके मेनन गजब के एक्टर है तब्बु के देवर खुर्रम मियाँ के रूप में उनका काम पसंद आया। श्रद्धा कपूर भी फिल्म में काफी नेचुरल लगी है वो काफी आगे तक जाएँगी। शाहिद कपूर फिल्म में एक अपने रोल का एक फ्लेवर मेंटन नही रख पाते है कहीं बहुत भारी हो जाते तो कहीं थोड़े कमजोर निजी तौर पर फिल्म में श्रीनगर के लाल चौक पर एक कश्मीर की हालात पर एक पोलिटिकल स्टायर करने के सीन में बेहद गजब की परफोर्मेंस देते दिखे ओवरआल ठीक ही है। फिल्म में इरफ़ान खान और नरेंद्र झा का रोल काफी छोटा है मगर इरफ़ान खान तो इरफ़ान खान वो गागर में सागर भर देते है नरेंद्र झा का काम भी बहुत क्लासिक किस्म का है।
फिल्म में गीतों में गुलजार ने कश्मीर की खुशबू भर दी है उनमें आंचलिकता का पुट है फिल्म में फैज़ की शायरी फिल्म को असल मुद्दे से जोड़े रखती है।
फिल्म की कमजोरी स्लो होना है जिन दर्शकों के पास सब्र नही है उन्हें फिल्म नही देखनी चाहिए हैदर को महसूस करने के लिए दिमाग का खुला और दिल का जला होना जरूरी है मौज मस्ती के लिए कोई और स्क्रीन देखी जा सकती है। विशाल भारद्वाज ने एक संवेदनशील मसलें पर एक काफी प्रासंगिक फिल्म बनाई है इसके लिए वो बधाई के पात्र है।

(आज घुटने में दर्द के बावजूद यह फिल्म बड़े बेटे राहुल के साथ देखी राहुल की मल्टीप्लेक्स स्क्रीन की यह पहली फिल्म थी इसलिए उसके लिए यह फिल्म और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। दोस्तों के साथ बहुत से फ़िल्में देखी है मगर आज बेटे को दोस्त के रूप फिल्म दिखाकर एक अलग किस्म का सुख मिला इसलिए भी हैदर ताउम्र मेरे लिए एक यादगार फिल्म रहेगी)

Tuesday, September 30, 2014

वो तीन

मोहम्मद अजीज़ शब्बीर कुमार अनवर ये तीन ऐसे गायक है जो अस्सी-नब्बे के दशक में बेहद लोकप्रिय रहें है यूपी और बिहार में आज भी मोहम्मद अजीज़ के चाहने वालो की कमी नही है उनके रोमांटिक ड्युटस आज भी ऑटो/बस ने सुने जा सकते है इस दौर की पढ़ी लिखी पीढ़ी को न उनमे नाम याद होंगे और न उनके गाए सुपरहिट गीत हाँ उनको एक वर्ग विशेष की पसंद में जरुर टाइप्ड कर दिया गया है। मोहम्मद अजीज़ को बस/ऑटो ड्राईवर रिक्शा चालको की पसंद का गायक समझा जाने लगा है। मगर ये तीनो अपने अपने किस्म के अजीम फनकार रहें है सभी नही तो कुछ गीत मोहम्मद अजीज़ ने बेहद दिलकश आवाज में गाएं है चाहे वह कर्मा फिल्म का कालजयी गीत दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए या फिर फिल्म मुद्दत का रोमांटिक गीत प्यार हमारा अमर रहेगा याद करेगा ये जहां हो...ठीक ऐसे ही शब्बीर कुमार और अनवर के भी बेहद दिलकश गीत मौजूद है।
बदलते वक्त ने इस फनकारों को हमारी याददाश्त से बाहर कर दिया है मै कभी कभी इनके एकाकी जीवन की कल्पना करता हूँ तो सिहर जाता हूँ मोहम्मद अजीज़ ने खासी लोकप्रियता का समय भी जिया है अब जब उन्हें इंडस्ट्री में कोई नही पूछता है तब वो कैसे निर्वासन में जिन्दगी जीते होंगे ऐसे गुमनामी जिन्दगी जीना बेहद मुश्किल होती होगी पिछले दिनों कहीं पढ़ा था वो आर्थिक बदहाली से भी गुजर रहें है। फ़िल्मी दुनिया की कितनी छोटी याददाश्त होती है कल तक जो आपका स्टार गायक था आज गुमनाम है यही बात हम श्रोताओं की भी है हम आगे बढ़ते चले जाते है एक दौर कुमार शानू अलका याज्ञनिक सोनू निगम का था अब वो भी ढलान पर है अब अरजित मोहित चौहान या नए लोगो का दौर है। कुमार शानू को अब मै मोहम्मद अजीज की जगह जाता देखता हूँ उनके मेलोडियस सोंग्स भी अब एक वर्ग विशेष तक सीमित होकर रह गए वरना एक समय था जब रोमांटिक ट्रैक का मतलब की कुमार शानू था पुरानी आशिकी फिल्म के गीतों ने क्या धमाल मचाया था।
कुल मिलाकर मेरी तो आदत अतीत में जीने की रही है इसलिए गाहे बगाहे इन पुराने दौर के फनकारो को याद करता रहता हूँ। किशोर-रफी-मुकेश त्रयी की दुनिया से भी अलग फनकारों की एक दुनिया रही है जिन्होंने अपने फन की ताकत से अपने चाहने वाले पैदा किए अब आप उन्हें लोअर मीडिल क्लास समझ मूल्यवान न समझे तो यह आपकी समझ की सीमा हो सकती है। बड़े चेहरों के बीच खुद को जमाना बहुत हिम्मत की बात होती है हिन्दी फ़िल्मी गायकी के इन सर्वहारा का मै बड़े दिल से सम्मान करता हूँ और उन्हें उनके गीतों के माध्यम से शिद्दत से याद भी करता हूँ। भले वो आज हाशिए की जिन्दगी जी रहें है मगर मेरे लिए वो सदैव मेरे दिल के करीब ही रहेंगे उनको यादों में बचाकर रखना दरअसल उस दौर को बचाकर रखना था जब हम गुनगुनाने की सच्ची वजह अपने दिल में रखते थे आज की तरह नही कि गायक का नाम भी मुश्किल से याद रह पाता है। 

Monday, September 29, 2014

सच के आर-पार


विज्ञान के डर से आध्यात्म की शरण व्यक्ति को एक मानसिक सांत्वना तो देती ही है साथ ही जीवन के मिथ्या होने के बोध से साक्षात्कार करा कर उसे आपदा को भोगने के लिए मानसिक रुप से तैय़ार भी करती है।
गांव में स्कूल से लेकर बीए तक मेरा साथ देने वाला मेरा एकमात्र लंगोटिया यार है देवेन्द्र। अभी परसो मेरे पास आया था मिलनें के लिए दोपहर में कई घंटे सत्संग चला देवेन्द्र के साथ एक त्रासद कथा यह है उसकी पत्नि के गले मे भोजन नली में पिछले तीन साल से संकुचन हो रखा है जिससे भोजन निगलने मे उसे खासी दिक्कत होती है चंडीगढ पीजीआई में उसका उपचार भी करवाया मगर आशातीत सफलता नही मिली है डॉ वास्तविक बीमारी को भी नही खोज पाए थे दबे स्वरों और बुरी कल्पना में कुछ डॉ को यह भी सन्देह है कि यह गले का कैंसर हो सकता है। जब से पत्नि बीमार हुई है देवेन्द्र के लिए यह बेहद तनाव भरा वक्त रहा है उसका एक बेटा है घर भाई माता-पिता से भावनात्मक और मोरल सपोर्ट लगभग शून्य है। देवेन्द्र ने अपनी पत्नि के उपचार के लिए अपनी सामर्थ्य के हिसाब यथा सम्भव सब प्रयास किए कई कई दिन अकेले चंडीगढ पडा रहा जो जहां भी डॉक्टर बताता वही दिखाने चला जाता मगर कई से कोई उल्लेखनीय राहत नही मिली जब विज्ञान से राहत नही मिली तो उसने झाड फूंक वालों को भी खूब पत्नि को दिखाया मगर वहां के पाखंड से वह शीघ्र ही वाकिफ हो गया कहते है न जब आदमी परेशान होता है वह भी तर्कातीत हो किसी भी चमत्कार की उम्मीद लगा बैठता है इसी मनस्थिति में देवेन्द्र ने न जाने कहां कहां चक्कर न काटे मगर अंत मे हुआ वही ढाक के तीन पात।
फिलहाल एक साल देवेन्द्र की पत्नि का उपचार एक होम्योपैथ कर रहा है उससे उसे काफी आराम है अब वह एक-दो रोटी खा लेती है वरना एक बार तो नौबत तो यह भी आ गई थी कि वो तरल पदार्थ भी नही निगल पा रही थी। परसों मैने डरते-डरते देवेन्द्र से कहा भाई अगर यह कैंसर ही निकला तो क्या होगा एक पल के लिए देवेन्द्र भी सहम गया उसे सबसे ज्यादा फिक्र अपने पांच साल के बेटे की है भगवान न करें कुछ ऐसा वैसा हो जाए तो बच्चें का जीवन तबाह हो जाएगा..खैर मैने उसको कैंसर के कुछ एडवांस सेंटर पर जाकर टेस्ट वगैरह करवाने की सलाह दी है वो सहमत है मगर उसने बताया पत्नि बडे सेंटर पर जाने से डरती है कहीं कैसर की पुष्टि हो गई तो उसका क्या होगा फिलहाल वो इस भ्रम मे जीवन जी रही है कि होम्योपैथी से उसको आराम मिल रहा है और यही डॉक्टर उसको ठीक कर देगा।
इस त्रासद कथा का एक दूसरा पक्ष है जो मै बताने जा रहा हूं जब मै पीजी के लिए हरिद्वार आ गया देवेन्द्र गांव मे ही रह गया उसने प्राईवेट एम ए किया उस वक्त देवेन्द्र एक सामान्य गांव देहात का युवा था जिसकी अपनी लौकिक रुचियां थी धर्म और आध्यात्मिकता को बेकार की चीज़ समझता था उन दिनो मै वेदपाठी हुआ करता था वह मेरी भी मजाक बनाया करता था मगर अब पत्नि के इस स्वास्थ्य संकट के बाद जब मुसीबत ने चारो तरफ से घेर लिया अपने रक्त संम्बंधियों नें मूंह फेर लिया तब उसने आध्यात्म और ईश्वर को जानने समझने मे वक्त बिताना शुरु किया रामचरितमानस,गीता आदि का स्वाध्याय किया दैनिक पूजा आदि करने लगा है परसों उसने लगभग एक घंटे गीता के दार्शनिक पक्ष पर गजब का दार्शनिक व्याख्यान मुझे दिया स्थिर प्रज्ञ,जीवात्मा, सृष्टि चक्र, जीवन मरण, ईश्वर, माया,मोह. राग इन सब बिन्दूओं पर उसने धाराप्रवाह और तर्क सम्मत अपनी बात रखी है मै उसको अपलक सुनता रहा एक बार तो मुझे यकीन नही हुआ कि ये वही देवेन्द्र है जिस बीए पास को मै गांव छोड गया था जो धार्मिक कर्मकांड और व्रत रखने पर मेरा मजाक बनाया करता था।
गांव के जीवन और सीमित साधनों के साथ स्वाध्याय के बल पर उसने गीता के बारें जो समझ विकसित की है वो मेरे लिए हैरत मे डालने वाली थी उसने मुझसे कहा कि आप तो ज्ञानी ध्यानी आदमी है ( उसकी मान्यता है) कुछ और पुस्तकों का नाम बताईये ताकि ईश्वर को समझने मे मदद मिल सके मैने अपनी जानकारी के हिसाब से उसको कुछ नाम बताएं भी बल्कि यह भी आश्वासन दिया कि शहर से कुछ किताबें लाकर दूंगा।
इस पूरे प्रकरण का सारांश यही है कि कई बार विज्ञान जब इंसान को डराता है तब वह अपने मन की सांत्वना के लिए ईश्वर की शरण मे जाता है उसके अस्तित्व पर सवाल खडे करके उसे खोजता है मै दावे से कह सकता हूं यदि देवेन्द्र ने इस आपदकाल मे खुद को गीता के स्वाध्याय मे न लगाया होता तो वह मानसिक रुप से टूट चुका होता आज वह मजबूत होकर एक जीवनहंता बीमारी से लड रहा है साथ ही मानसिक रुप से दृढ हो रहा है। धर्म इस रुप मे जरुर उपयोगी हो सकता है।
परसों मै उसको अपलक होकर सुनता रहा है एकाध बिन्दूओं पर असहमत होते हुए भी उसका प्रतिकार नही किया गीता के तत्व दर्शन पर वह जितने अनुभूत अधिकार से बोल रहा था वह मेरे लिए चमत्कृत करने जैसा था उसकी बातों मे गीता के कर्म योग के तत्व दर्शन की बेहद प्रभावी और सरल भाषा मे व्याख्या थी। अपनी आंतरिक अनुभूतियों की बात कहूं तो उस दिन मै अर्जुन रुप में था और देवेन्द्र कृष्ण रुपी जीवन के तत्व का भाष्याकार...!
अज्ञेय ने सच ही कहा है दुख व्यक्ति को मांझता है..! मेरी दिल से यही कामना है कि यदि वास्तव मे ईश्वर जैसी कोई सत्ता विद्यमान है तो मेरे इस युद्धरत मित्र की पत्नि को सम्पूर्ण आरोग्य प्रदान करें ताकि विश्वास करने की वजह प्रज्ञा मे बची रहें।

डॉ.अजीत

Thursday, July 10, 2014

बजट का गजट

लगभग सभी सरकारों की नजर में सस्ती ब्याज दरों पर फसली ऋण उपलब्ध कराना किसानों के हित एवं कल्याण का सबसे बड़ा कदम है। मुझे अफ़सोस होता है कि कर्जे के मकडजाल और सहकारी/सरकारी क्षेत्रों के बैंको में व्याप्त भ्रष्टाचार के चक्रव्यूह में किसान किस कदर फंसा हुआ है किसी को इसकी सुध लेने का समय नही है।
जेटली साहब ! महज सस्ता कर्ज किसानों की मदद नही करता है इससे तो उनका शोषण और बढ़ता है पहले तो आप अपने मंत्रालय के अधीन बैंको के कार्मिको और मेनेजरों का रिफ्रेशर कोर्स करवाईए उनको यह तमीज सिखाइए कि देश के अन्नदाता से किस तरह बात की जाती है आपकी ब्याज दर घटाने से उनकी खीझ और बढ़ती है ( न जाने क्यूं, शायद खुद को वेतनभोगी-टैक्स दाता अभिमान होता होगा) और उन्हें किसान में फ्री में लोन लेंने वाला दरिद्र जीव लगता है।
मै आर्थिक मामलों का जानकार नही हूँ परन्तु मेरी समझ में किसानों को सस्ती ब्याज दर पर ऋण देने की घोषणा सुनने पढ़ने में जरुर राहत भरी/लोकप्रिय लग सकती है परन्तु इससे कोई लाभ नही होगा। अगर मोदी सरकार सच में किसानों का भला करना चाहती है तो इन कुछ बिंदूओ पर जरुर सोचना चाहिए था गौरतलब है इन सुझावों को राज्य या केंद्र के अधिकार क्षेत्र में उलझाकर नही बल्कि एक कॉमन पालिसी के जरिए लागू करना चाहिए--
1. गन्ना मिल मालिकों पर गन्ना भुगतान के नियमित भुगतान की जवाबदेही बनाने के लिए एक केन्द्रीय आयोग/ट्रिब्यूनल बनाया जाए।
2. कृषि यंत्रो/कीटनाशक/अन्य कृषि रसायन पर सब्सिडी दी जाए तथा प्राइवेट कम्पनीयों की लूट रोकने के लिए इनके विपणन में सहकारी क्षेत्र को शामिल किया जाए।
3. ग्रामीण क्षेत्रों में सिचाई हेतु विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित की जाए और नहर/राजवाहों को फिर से पुनर्जीवित किया जाए।
4. कृषि उत्पादन के लिए मंडियों में आढतियों पर प्राइस मोनोपोली रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाए ( अधिकाँश आढ़ती किसान की उपज का मनमुताबिक़ भाव तय करवाते है और किसान को किस्तों में भुगतान करते है यदि किसान को अपनी कृषि उपज का तुरंत भुगतान चाहिए तो दो रूपये प्रति सैंकड़ा काट कर भुगतान करते है)
5. किसानों को विशेष पहचान पत्र जारी किए जाए तथा उन्हें कृषि कार्यो हेतु सब्सिडी पर डीजल उपलब्ध कराया जाए।
6. गाँव के स्तर पर एक प्रशिक्षित एग्री काउंसलर नियुक्त किया जाए जो किसानों को रोग,उर्वरक,कीटनाशक,जैविक खेती के बारें में परामर्श प्रदान करें। मिट्टी के परीक्षण के लिए ब्लॉक स्तर पर एक मोबाइल वेन हो जिसमे वैज्ञानिक खुद खेत पर जाकर मृदा के नमूनें एकत्रित करें और रिपोर्ट खुद किसानों तक पहूंचाए।

....बाकि आपके पास आईएएस/ कृषि आर्थिकी के जानकार लोगो की लम्बी फौज है उनको वातानुकूलित कमरों/ फर्जी सर्वो के आंकड़ो और गूगल की रिसर्च से बाहर निकलने के लिए कहिए ताकि वो किसानों की दरिद्र हालत से रुबरु हो सके ऐसे दिल्ली में बैठ कंप्यूटर पर बजट छापने से न आपकी सरकार का भला होगा और न किसानों का।

(बजट में किसानों के हित के मीडिया प्रचार पर एक किसान की गैर विशेषज्ञ टिप्पणी )

Sunday, June 15, 2014

कुछ वर्जन

नौकरी क्यों छोडी?
नौकरी नही छोड़नी चाहिए थी कुछ बीच का रास्ता निकालना चाहिए था।
इमोशनल होकर निर्णय लिया प्रेक्टिकल होकर सोचना चाहिए था तुम्हारा करियर सामने था सात साल की यूनिवर्सिटी में एडहोक जॉब रूपी साधना थी अब परमानेंट होने का नम्बर था।
तुम एक अतिसम्वेदनशील एकांतप्रिय चिन्तनशील प्राणी हो गाँव में जल्दी खुद को इररेलिवेंट फील करना शुरू कर दोगे।
तुम्हारा बड़ा बेटा शारीरिक चुनौतियों से जूझता है उसके पुनर्वास में तुम्हारी महत्वपूर्ण भूमिका है महान बनने के चक्कर में अपनी खुद की फैमली को क्यों दांव पर लगा रहे हो।
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(पिताजी के निधन और मेरी गाँव वापसी पर कुछ दोस्तों की सलाह,हितचिंता और नसीहतों के कुछ वर्जन )

---- रिश्तेदारों के वर्जन :
गाँव में तुम ही मेनेजमेंट देख सकते हो बड़ा भाई डॉक्टर है वो कुछ नही कर सकता है छोटे वाला इंजीनियर है उसको नौकरी करने दो तुम गाँव में रहो।
रिश्तेदारी में आना-जाना शुरू करो लोगो के जीने-मरने में शामिल हुआ करो अब मूंह मोडकर काम नही चलेगा।
जमीन में पोपलर के पेड़ लगवा दो।
बच्चें गाँव में रखो अपने साथ हरिद्वार अकेले छोड़ने ठीक नही है।
जीते जी जो पिताजी के विरोधी रहे अब पिताजी के जीवन से उदाहरण खोजकर हमारे लिए अपेक्षाओं के मानक तैयार करते है।

गाँववालों के वर्जन:
गली में आते-जाते सबसे राम-राम करते चला करो।
लोगो के सुख दुःख में शामिल हुआ करो।
लोगो के यहाँ उठ-बैठ के लिए जाया करो।
एक बड़ा वर्ग आपके परिवार में निष्ठा रखता है उनका हालचाल पूछते रहा करो।
इस पंचायत चुनाव में प्रधान का चुनाव लड़ना है उसकी तैयारी रखो।

देख लीजिए मित्रों,
एक पिता के जीवन से यकायक चले जाने से आपका जीवन किन-किन वर्जनों से घिर जाता है ये सारे वर्जन कल्पनातीत थे मेरे लिए अब इनके बीच रहकर इनसे जूझते हुए जीने और आगे बढ़ने का कौशल विकसित कर रहा हूँ सही क्या है गलत क्या है नही जानता हूँ बस हाल फिलहाल तो कुछ चुनौतियों से निबटने में लगा हुआ हूँ वक्त इतना कम है कि खुद की कमजोरी पर सोचने की फुरसत भी है।

Friday, June 6, 2014

ताप

दोस्तों ! इस बात यकीन करना मुश्किल है कि गाँव में दिन यदि चार घंटे लाइट लगातार आ जाए तो उस दिन हम इस बात की खुशी में रहते है कि आज बिजली बढ़िया चली है। याददाश्त के बिनाह पर कह सकता हूँ कि यदा कदा ही शाम को गाँव में लाइट देखी है सुबह घर के बुजुर्ग बताते है कि रात लाइट आई थी।
उत्तर प्रदेश के सम्पन्न कहे जाने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उस गाँव का किस्सा कह रहा हूँ जिसकी आबादी लगभग बारह हजार है और गाँव में बिजलीघर भी है शेष यूपी के देहात का क्या हाल होगा समझा जा सकता है नेताजी के जिले या संसदीय क्षेत्र की रोशनी अपवाद हो सकती है।
सूर्य के प्रचंड ताप से खेत पर किसान खलिहान में पशु और घर पर बच्चे तप कर अपनी अपनी साधना में लीन है वातानुकूलित कक्षों के कहकहों में उनका जिक्र भी कहां शामिल होगा।
घर के एक से तीन साल के वय के बच्चें महीने भर में तीन से चार बार दस्त/बुखार की शिकायत से डॉक्टर के यहाँ जा चुके है अब बच्चा शाम को प्यार से लिपटना चाहता है तो गर्मी की आंच उसको मिनट भर में खुद से अलग कर देती है।
तपती दुपहरी में देह से टपकते पसीने की गंध को मिटा देना किसी भी देशी विदेशी डियो के बसकी बात नही है।
दो बखत स्नान और रात में छत पर मच्छरदानी लगाकर लेटने से थोड़ी राहत मिलती है रात को बारह से सुबह के पांच बजे तक जो बेसुध नींद आती है बस वही गाँव के जीवन का बोनस है इसकी तुलना एसी/कूलर और बंद कमरों की नींद से नही की जा सकती है।

Monday, December 2, 2013

बदहाल किसान और शाईनिंग इंडिया



किसानों की व्यथा-कथा इस देश में नई कतई नही है भिन्न-भिन्न प्रांतो के किसान अलग-अलग रुप से प्रताडित और शोषित है विदर्भ का किसान आत्महत्या कर रहा है तो यूपी का किसान अपनी बहन-बेटी की शादी और रोजमर्रा के खर्चो के लिए सरकार का मूँह ताक रहा है कि वह चीनी मिल मालिकों के साथ सख्ती से पेश आए और उसके बकाया का भुगतान कराये लेकिन हालत जस की तस बनी हुई है।
दोआब क्षेत्र के जिस गांव से मेरा ताल्लुक है वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ‘शुगर बाऊल’ के रुप मे जाना जाता है। मेरे पिताजी भले ही गांव के बडे काश्तकार है लेकिन गन्ना किसान होने की वजह से वो भी उतने ही प्रताडित और शोषित है जितना कोई एक आम किसान होता है। पिछले कई सालों से हम गांव के बडे गन्ना उत्पादक रहे है लेकिन अब यह बेहद घाटे का सौदा लगने लगा है। गन्ना किसान की जिन्दगी बद से बदतर होती जा रही है एक समय था जब गन्ना पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सबसे बडी कैश क्राप समझी जाती थी और इसी वजह से गन्ना उत्पादन की तरफ बेहताशा लोगो का रुझान भी बढा था लेकिन सरकार की चीनी मिल मालिकों से मिलीभगत होने की वजह अब गन्ना उत्पादन करना बेहद घाटे का सौदा बन कर रह गया है।
किसानों की दारुण कथा देखिए वह अपने बलबूते पर गन्ना उगाता है और उसको कटवा कर/छिलवा कर मिल के गेट तक अपने खर्चे पर पहूंचा कर आता है मिल प्रबंधन के लिए कोई टेंशन नही होती है उसे रॉ मैटेरियल अपने गेट तक फ्री मे मिल रहा है और गन्ने से चीनी के अलावा शीरा.खोई,ऐथनॉल का भी उत्पादन करता है लेकिन चीनी मिल मालिकों को चीनी की कीमतों का झूठा रोना रोने की ऐसी आदत पड गई है जिसके आधार पर वो जमकर कारपोर्टिया स्टाईल में ब्लैकमेलिंग करने में लग जाती है। सरकार के लिए किसान केवल मूर्ख किस्म का वोट बैंक है जो किसान होने से पहले अलग अलग जातियों में भी बटें हुए है इसलिए उनका उपयोग करना या उनको बहलाना सरकार के तुलनात्मक रुप से आसान काम है इसलिए उनकी तरजीह का हमेशा केन्द्र चीनी मिल मालिक ही रहते है।
सिस्टम की मार देखिए किसानों को कहने के लिए तो आसान ब्याज़ दर पर क्रेडिट कार्ड/क्राप लोन दिया जाता है लेकिन ये लोन लेना भी कम घाटे का सौदा नही है क्योंकि बैंक के लिए किसान बेहद घृणास्पद और मजबूर किस्म का ग्राहक है वह उसके जमीन की डीड के बदले बेहद कम राशि का लोन की मंजूर करते है और यह लोन लेने का भी कोई सीधा तंत्र नही है बीच मे दलालों की दूनिया है जिसके बिना आप लोन ले ही नही पाएंगे कुछ समय तक सरकारी बैकों के मैनेजर की केवल बेरुखी और बदतमीजी ही किसानों को बर्दाश्त करनी पडती थी अब हालत यह है कि बिना दलाल की मध्यस्ता के लोन ही नही मिल पायेगा और लोन के लिए उनके मौटे कमीशन भी तय है। यूपी मे सहकारी क्षेत्र का एक बैंक है भूमि विकास बैंक जिसके चैयरमेन मुलायम सिंह के भाई शिवपाल यादव है किसाने के दर्द के लिहाज़ यह भूमि हडप बैंक है यहाँ कमीशनखोर दलालों की 30 परशेंट का खुला रेट है मतलब यदि आपको 1 लाख का लोन चाहिए तो आपके हाथ इन कैश केवल 70 हजार ही लगेंगे बाकि के 30 हजार बैंक कर्मियों और दलालों में बतौर रिश्वत वितरित होंगे यह खुली व्यवस्था इसमे कोई भी लुका-छिपी का खेल नही है जहाँ जहाँ भूमि विकास बैंक है वहाँ वहाँ आपको ऐसे दलाल (जिन्हे डीलर कहा जाता है) के दफ्तर खुले मिलेंगे मेरी निजि पडताल यह भी पता चला कि यह एक सुनियोजित तंत्र है जिसमे पैसा जनपद और कस्बों से निकलकर राजधानी तक पहूंचता है।
किसानों की खून पसीने की कमाई का पैसा भले ही चीनी मिल मालिकों की तिजोरियों मे फंसा रहे उसकी कोई सुनवाई नही है अपने गन्ने के भुगतान का ब्याज़ की छोडिए मूलधन भी समय पर नही मिल पाता है  लेकिन जैसे ही इन बैंको की किस्त देने मे किसान असमर्थ होता है बैंको के द्वारा उसका मानसिक उत्पीडन शुरु हो जाता है दीगर बात यह भी है कोई भी किसान चालाकी से बैंक का लोन चुकाने से नही बचना चाहता है उसके लिए तो यह लोन नाक का भी सवाल होता है जिसके चलते वह अपने सामाजिक परिवेश से लेकर रिश्तेदारियों तक मे जिल्लत झेलता है लेकिन उसकी दिन ब दिन बिगडती आर्थिकी उसको मजबूर कर देती है और ऐसे मे बैंक मैनेजर दल बल सहित उस पर बैंक का पैसा जमा करने का तकादा करता है कई बार आर.सी काटने की धमकी के नाम पर भी छोटी छोटी राशि वसूलता है और जो लोन उसने इस करप्ट सिस्टम के चलते हासिल किया होता है जिसका एक एक हिस्सा भ्रष्ट अधिकारियों से लेकर दलालों तक ने चट किया होता है उसके देनदार के रुप में उसके गले में जिल्लत का ऐसा फंदा फंस जाता है कि वह उससे निकल ही नही पाता है। एक सीमा के बाद लोन की उगाही के लिए आर सी काट देता है फिर तहसील का राजस्व विभाग किसान की जान लेने पर उतारु हो जाता है संग्रह अमीन उसका किस हद तक मानसिक शोषण करता है आप अन्दाज़ा भी नही लगा सकते है और बहुत बार तहसीलदार उसको पुलिसिया बल के साथ उठाकर तहसील में कारागार में बंद भी करवा देता है। अभी हाल ही मै रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के विभिन्न बैंको का लगभग 14000 करोड रुपया उद्योगपति लोन के रुप मे दबाए बैठे है और बैंको ने इस बडी राशि की उगाही मे असमर्थता जाहिर कर दी है लेकिन इन कारपोरेटस को पकडने की कोई भी कार्यवाही बैंको के द्वारा नही की गई और उनकी कुल परिसम्पत्तियों से कई गुना राशि का लोन उन्हे दिया गया है इनमे से अधिकांश लोग  विदेश मे शिफ्ट हो गए है अब तंत्र देखिए एक तरफ एक मजबूर किसान है जो चालाक नही है और मंशा से भी लोन देना चाहता है  और दूसरी तरफ चालाक कारपोरेट्स है जिनके हिसाब से नीतियां तय होती है और जो देश का धन भी हडपे बैठे है।  
इन सब जिल्लतों को झेलने के बाद भी भारत का किसान बेहद आशावादी जीव है वह धैर्य नही खोता है वह हर साल इस उम्मीद पर फसल उगाता है कि इस बार उसके साथ छल नही होगा कभी प्रकृति की मार तो कभी सरकार की मार झेलता भारतीय किसान उत्पीडन और शोषण का केन्द्र बन कर रह गया है। किसानों की फिख्र न सत्ता पक्ष को है न ही विपक्ष को ही है दोनो के एजेंडे मे किसान नही दिखता है हाँ दिखता है तो केवल वोट जो लेना सभी पार्टियों को आता ही है। किसान असंगठित है सवर्ण और पिछडे के धडों मे भी बंटा हुआ है और शायद इसलिए सबसे अधिक शोषित भी है।