Thursday, May 30, 2013

उच्च शिक्षा

उच्च शिक्षा में लगभग एक दशक बीता दिया पहले पढाई की और पिछले साल से एक विश्वविद्यालय में तदर्थ रूप से पढ़ा भी रहा हूँ चूंकि मेरी नौकरी तदर्थ किस्म की रही है इसलिए स्थायी होने के लिए इधर उधर भी हाथ पैर मारता रहा मसलन देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में साक्षात्कार देने जाता रहा हूँ प्रभु कृपा से मनोविज्ञान के अतिरिक्त पत्रकारिता और हिंदी साहित्य में भी नौकरी पाने की  अकादमिक योग्यता रखता हूँ (यूजीसी-नेट होने के कारण). स्थायी नौकरी पाने के अपने आरंभिक संघर्षो में मुझे लगता था की उच्च शिक्षा में पिछड़े /दलित/अल्पसंख्यक वर्ग  से होना सबसे बड़े अपात्रता हैं क्योंकि नियोक्ता अधिकांश सवर्ण हैं और एक गाँव देहात तथा किसान परिवार की पृष्टभूमि का होने के नाते एक सवर्ण मानसिकता कभी स्वीकार नही कर पाती की इस वर्ग का बच्चा वहां तक पहुंचे जहाँ उनका जन्मसिद्ध अधिकार एवं वर्चस्व रहा है,लेकिन धीरे-धीरे जब मैंने विश्लेषण करना शुरू किया तो पाया कि अपने इस महान देश भारत में केवल जाति के ही मोर्चे पर लडाई नही लड़ी जाति है और भी बहुत से मोर्चे है जिनसे आपको लड़ना होता है और यह विरल संयोग की बात होती है कि इन सबसे आप लड़ते खपते वहां तक पहुँच जाएँ जिसकी आप पात्रता रखते हैं ऐसे ही कुछ मोर्चो की बानगी देखिए:-

.पहला मोर्चा हिंदी बनाम अंग्रेजी का इस देश में बहुत बड़ा है जो मेरे जैसे प्राथमिक पाठशाला में पढ़े बच्चो को झेलना पड़ता है चूंकि हम सरकारी स्कूल में पढ़े है जहाँ कक्षा में पहले बार एबीसीडी सिखाई जाती है हमने तख्ती पोतकर,ईमला लिखकर पढना,लिखना सीखा है इसलिए हम अंग्रेजी भाषा के मामले में हमेशा एक दोयम दर्जे के ही रहते है और जनाब अपने देश में तो अंग्रेजी में बोलना आना मानो कुफ्र है मैं सभी विषयो के अध्यापन में अंग्रेजी के महत्व को नही नकार रहा हूँ लेकिन पत्रकारिता जैसे हिंदी अधिकार के विषय की भी पढाई हमारे विश्वविद्यालयो में अंग्रेजी में होती है इस बात का मुझे तब पता चला जब एक केन्द्रीय विवि के साक्षात्कार में अच्छा इंटरव्यू होने के बाद भी महज़ इसलिए मेरा चयन नही हो पाया क्योंकि मैंने हिंदी में बात की और मैं धाराप्रवाह अंग्रेज़ी बोलना नहीं जानता था. ऐसे में कान्वेंट शिक्षित लोगो को तरजीह दी जाती है और हम हिंदी भाषी कतार से बाहर हो जाते हैं.

. दूसरा मोर्चा साहब संस्थानों का है मेरी इस बात से मेरे कुछ जेएनयू,बीएचयू,डीयू के दोस्त खफा हो सकते है लेकिन यह भी एक कड़वा सच है कि आपको नौकरी दिलाने में आपका संस्थान भी बेहद मददगार साबित होता है मसलन अगर आप जेएनयू,बीएचयू,डीयू,इलाहाबादविवि से पढ़े है तो समझिये आपकी आधी मुश्किल कम हो गयी है इन बड़े संस्थानों का ठप्पा आपके बड़े को पार लगा देता है ऐसे में जो लोग अपेक्षकृत छोटे संस्थानों से पढ़े हैं उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता है मै पात्रता/योग्यता की बात नहीं कर रहा हूँ वो हर संस्थान में हर किस्म के लोग आपको मिल जायेंगे मानता हूँ कि उक्त संस्थान देश के अकादमिक क्षेत्र के बड़े माने हुए संस्थान हैं लेकिन दोस्तों महज़ इस वजह से देश के हर अवसर पर यदि वही के लोगो को अगर तरजीह दी जाने लगेगी तो देश के बाकी विवि के पढ़े लिखे बेरोजगारों का क्या होगा क्या ऐसे सांस्थानिक श्रेष्टता पूर्वाग्रहों का होना न्यायोचित है?

.तीसरा मोर्चा साहब क्षेत्र का है उच्च शिक्षा में आपके क्षेत्र भी आपकी बौद्धिकता तय करता है मसलन जैसे कि मै पश्चिम उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखता हूँ ऐसे में उच्च शिक्षा के क्षेत्र मठाधीश यह बात हजम ही नहीं कर पाते है कि इस क्षेत्र का कोई आदमी कविता,साहित्य,पत्रकारिता,दर्शन,मनोविज्ञान आदि की बात कर सकता है उन्हें लगता है इस क्षेत्र में केवल दबंग और लट्ठबाज ही पैदा हो सकते या फिर अपराधी मुझे कई बार ऐसे असहज स्थिति का सामना करना पड़ा है जब मै किसी महफ़िल में अपनी कविता सुनाई और लोगो को अघोर किस्म का आश्चर्य हुआ है कि मुज़फ्फरनगर का कोई बन्दा वह भी किसान पुत्र कविता कर सकता है या शुद्ध हिंदी में बात कर सकता है इसी पूर्वाग्रह का सामना विभिन्न विवि में इंटरव्यू के दौरान भी करना पड़ता है.

.मैंने आरटीआई के माध्यम से यूजीसी से यह पता किया की देश के प्रमुख विवि के कुलपति कहाँ से सम्बंधित है वहां से जो जानकारी मिली वह हैरत में डालने वाली थी देश प्रमुक विवि और नए बने केंद्रीय विवि में जेएनयू,बीएचयू,डीयू,इलाहाबादविवि,आईआईटी के प्रोफेसर ही कुलपति बने हुए है ऐसे में जब उनके मातृ संस्थान का कोई बंदा इंटरव्यू देने आता है तो उनका अपनी मातृसंस्था के प्रति प्रेम स्वत: ही जागृत हो जाता है और उनकी भरपूर कोशिस यही रहती है कि हम अपने प्रोडक्ट को नौकरी दे सकें.यह ऐसी कडवी सच्चाई है जिसको बुद्धिजीवी दिल जरुर स्वीकार करेगा दिमाग करें या ना करें.

. उच्च शिक्षा में आप जिसके निर्देशन में अपना शोध प्रबंध पूर्ण करते है उन प्रोफेसर साहब का अपना अलग महत्व यांकी अगर आपका पीएचडी गाइड अपने विषय की जानी मानी शख्सियत है तो फिर भी आप के लिए मंजिल आसन हो जायेगी मसलन जब कोई प्रोफेसर अपने विषय का इतना बड़ा विशेषज्ञ होता है तब वह प्रमुख विवि में सब्जेक्ट एक्सपर्ट भी नामित होता हैं फिर जहाँ भी पोस्ट निकलेगी वो आपको इशारा कर देगा बस उसके बाद आपकी नौकरी पक्की ऐसे कम जान पहचान वाले प्रोफेसर के चेले बेचारे ऐसे ही झोला उठाये घूमते रहते है सिलेक्शन कमेटी भी यह पहले से मान लेती है कि जब यह बंदा इतने बड़े ज्ञानी का चेला है तो यह भी ज्ञानी ही होगा ऐसे में बेचारे सामान्य बैकग्राउंड के लोग स्वत: ही बाहर हो जाते हैं.

....दोस्तों और भी बहुत से मोर्चे अगर मैं सभी का जिक्र करना शुरू करूँ तो ये पोस्ट बहुत बड़ी हो जाएगी बाकी आप खुद समझदार हैं. इन सब मोर्चो से लड़ते-भिड़ते सुप्रीम कोर्ट के आरक्षण के आरक्षण लागू करने के  डंडे के चलते अगर आप को नौकरी मिल जाये तो मै आपको परम सौभाग्यशाली कहूँगा..इन मोर्चो के चलते तमाम वाद प्रभावी रहते हैं मैं किसी एक का नाम नहीं लूँगा आप सभी जानते ही हैं ऐसे में स्टेट यूनिवर्सिटीज और डीम्ड यूनिवर्सिटीज के पढ़े गाँव देहात के  लोग उस अवसर की तलाश में दर बदर भटकते रहते है क्योंकि उनका कोई रहनुमा मेज़ की उस तरफ नहीं बैठा होता है जो कह सके कि नौकरी देने में एक ही बात देखी जाए कि बंदा काबिल है या नहीं...

Wednesday, February 20, 2013

चुनौतियाँ



बचपन से लेकर आजतक चुनौतियाँ वैसे तो कभी कम न थी  लेकिन इन दिनों फिर से एक बडा सवाल खडा हुआ है कि आखिर 31 मार्च के बाद क्या किया जाएँ? क्योंकि इस तिथि के बाद इस अकादमिक सत्र के अतिथि अध्यापन सें सेवानिवृत्ति मिलने जा रही है।

फिलवक्त की कुछ बडी चुनौतियाँ:

 बडा बेटा राहुल एक सेरेब्रल पाल्सी से पीडित बच्चा है जिसको पुनर्वास विशेषज्ञ के हिसाब से डिस्लेक्सिया भी हो सकता है उसको एक स्पेशल एजुकेशन के टय़ूटर की जरुरत है जो उसको रेमेडियल कोचिंग दे सके कायदे से तो उसको एक ऐसा स्कूल चाहिए जहाँ स्लो लर्नर और डिस्लेक्सिया के बच्चों के शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था हो, हरिद्वार में ऐसी कोई व्यवस्था नही है जैसे तैसे उसका यह अकादमिक सत्र तो पूरा हो गया है लेकिन अगले सत्र के लिए मेरे पास कोई व्यवस्था नही बन पायी है सो फिर से उसको उसी स्कूल में रखना होगा।मेरी काहिली का यह भी सबसे बडा उदाहरण है।  
घर से मेरे सम्बंध लम्बे समय से असहज़ चल रहे है पिताजी से बोलचाल तक बंद है लेकिन इतने सब से भी राहत थोडे ही मिलती है वहाँ से यदा-कदा भावनात्मक समस्याएं आयतित होती रहती है। गांव में हमारी माताजी (दादी) है जो मेरे जीवन के एक सबसे बडी और जीवंत प्ररेणा है उनसे मिलना भी नही हो पाता है वो अपने जीवन के लगभग अंतिम चरण में है लेकिन अभी मेरे अस्थाई जीवन को लेकर चिंतित रहती है और उनके स्वास्थ्य को लेकर मेरी चिंताएँ है। कुल मिलाकर बेहद तनाव बना रहता है न घर से पूर्णत: मुक्त ही हो पा रहा हूँ और न कुछ घर के लिए कर ही पा रहा हूँ।
सबसे बडी चुनौति खुद के जीवन से जुडी हुई है 3 सबजेक्ट में पीजी,1 में पीएचडी,2 में यूजीसी-नेट पास होने के बावजूद भी मै पिछले छ साल से विश्वविद्यालय में नितांत ही अस्थाई/तदर्थ/अतिथि व्याख्याता किस्म की नौकरी कर रहा हूँ। समय के लिहाज से मुझे एक तुरंत स्थाई नौकरी की जरुरत है लेकिन फिलवक्त उसकी गुंजाईश कम ही नजर रही है। जहाँ मै पिछले 5 साल से तदर्थ पढा रहा था वहाँ तो इस बार खेल बिगड गया सब और मै तदर्थ से खिसककर अतिथि श्रेणी के अध्यापन मे आ गया हूँ जिसमे मुझे आगामी 31 मार्च को अकादमिक शिक्षण की सेवाओं से मुक्त कर दिया जायेगा उसके बाद अगले अकादमिक सत्र में नियुक्ति मिलने की सम्भावना है जो अगस्त से पहले सम्भव नही होगी ऐसे में मुझे अप्रैल-अगस्त लगभग 4 महीने अवैतनिक जीवन जीना होगा जो किसी त्रासदी से कम नही है पिछले वित्तीय वर्ष से ही उधार की अर्थव्यवस्था नें मेरे बजट को काफी ओवरड्राफ्ट कर दिया है। एकाध मित्रों से मदद मिलने का भरोसा है उसी के आत्मविश्वास पर जीवन चल रहा है।
सच तो यह है कि मै अब इस तदर्थ जीवन से थक गया हूँ अब मुझे एक स्थाई समाधान चाहिए चाहे वह किसी भी दिशा का क्यों न हो...। मनोविज्ञान विषय के अध्यापन के लिए मै अब खुद को अप्रासंगिक और अनुपयुक्त महसूस कर रहा हूँ अब यह भी लगने लगा है है अध्यापन के पेशे के चयन के सन्दर्भ में मैने इस विषय का चयन करके गलती की है क्योंकि मेरी समझ इस विषय में थोडी दूसरे किस्म की रही है लेकिन संयोग,परिस्थितिवश अब इस विषय में रुकना मजबूरी बन गया है हालांकि मै इसके अलावा पत्रकारिता एवं हिन्दी में नेट पास हूँ तथा उनमे भी उच्च शिक्षा मे अध्यापन की पात्रता रखता हूँ लेकिन वेतानादि,अवसर के लिहाज़ से फिलहाल उनमें भी कोई सम्भावना नजर नही आ रही है जो विषय अभिरुचि के करीब है उनमे मै फ्रेशर हूँ और जिसमे 6 साल का अनुभव है उससे जी उकताता जा रहा है अब इसे विडम्बना या एक नये परिवर्तन की आहट समझा जायें यह तय नही हो पा रहा है।  
अभी तो इन तात्कालिक चुनौतियों से ही दो चार हो रहा हूँ इन सबके बीच में मानवीय सबन्धों के भावनात्मक संघर्ष भी है जिनमे मै रोज जीता/मरता/खफता यहाँ तक आ गया हूँ...उफ्फ ! बडी बैचेनी है!
ईश्वर मेरी मदद करें  
शेष फिर..
डॉ.अजीत 

ब्रेक के बाद



लगभग डेढ महीने के अवैतनिक ब्रेक के बाद 3 जनवरी से लेकर 31 मार्च तक फिर से नौकरी करने का आधिकारिक आदेश मिला है संभवत: इस अकादमिक सत्र की यह मेरी आखिरी सेवा होगी इसके बाद मुझे फिर से मुक्त कर दिया जायेगा। जुलाई से आरम्भ होने वाले नए अकादमिक सत्र में आंतरिक व्यवस्था के हिसाब से नया निज़ाम आ जायेगा एक तो हमारे विभागाध्यक्ष भी मेरे गुरु जी (पीएचडी गाईड) बन जायेंगे साथ ही विश्वविद्यालय मे नये कुलपति का आना भी लगभग तय है इस हिसाब से नये निज़ाम के साथ नया सत्र आरम्भ होगा। पिछले पांच सालों से मै 15 मई तक अध्यापन किया करता था क्योंकि हमारी संविदा तभी तक हुआ करती थी इस बार डेढ महीने पहले ही सेवानिवृत्ति हो जायेगी। गत वर्ष जुलाई में साक्षात्कार के समय जो खेल बिगडा उससे पूरे साल की त्रासदी अपने नाम हो गई पूरे अकादमिक सत्र मे लगभग छ महीने की किस्तों में मास्टरी का अवसर मिला वह भी 22000 प्रतिमाह के हिसाब से अब इसके लिए किसी को दोष भी नही दिया जा सकता है अपने ही नसीब में यह सब लिखा था सिवाय इस दिलासा के कुछ भी कहना सूझ नही रहा है।
अभी मार्च तक स्थाई नियुक्ति के लिए साक्षात्कार भी सम्भावित है सो उसके समीकरणों के अपने कयास चल रहे है हर कोई चाहता है कि उसी को यह स्थाई नौकरी मिल जाये हम फिलहाल 3 लोग तो 1 पद के लिए सीधे प्रतिस्पर्धा में है बाकि कितने छूपे रुस्तम और पैराशूट टाईप के लोग कतार में होंगे इसके बारे मे कुछ कहा नही जा सकता है।
पिछले पांच सालों के अध्यापन और इस साल के इस अतिथि टाईप के अध्यापन के अनुभव के बाद भी मुझे अपने लिए कम ही अनुकूलताएं नजर आ रही है कुछ भी कहा नही जा सकता है कि क्या होगा मुझे नही लगता है कि मेरे पक्ष मे हालात है लेकिन फिर भी मै अपने पूरे मनोबल से आर-पार की यह लडाई लडने के मूड मे हूँ क्योंकि अवसर के लिहाज़ से मनोविज्ञान में यह मेरे लिए अंतिम अवसर होगा इसके बाद मै कहीं और असि.प्रोफेसरी के लिए प्रयास नही करुंगा यदि यहाँ स्थाई नियुक्ति हो जाये तो बेहतर अन्यथा फिर मनोविज्ञान के इस चोले को यही उतार दिया जायेगा हमेशा के लिए।
बैक अप के लिहाज़ से अभी मेरे पास कोई भी योजना नही है बेहद नाजुक दौर है यदि असफलता मिली तो फिर सब कुछ शून्य से आरम्भ करना होगा एक नये विषय या नये क्षेत्र के साथ एक नई शुरुवात करनी होगी लेकिन फिलवक्त मै किसी भी प्रकार का नियोजन नही कर रहा हूँ कुछ साथी मित्र कई बार पूछते भी है कि यदि विश्वविद्यालय में सेलेक्सन नही हुआ तो...? मै कुछ जवाब नही देता हूँ और सच तो यह है कि मेरे पास कोई जवाब है भी नही कि फिर इसके बाद मै क्या करुंगा।
कभी कभी ऐसा भी लगता है कि पत्रकारिता की जा सकती है लेकिन वहाँ पर भी अवसर के लिहाज़ से कई बडी चुनौतियाँ है एक तो मै फ्रेशर हूंगा सो वेतन नही मानदेय टाईप का ही कुछ मिलेगा जबकि पिछले साल मै 39000 प्रतिमाह का वेतनभोगी और इस बार भी कम से कम 22000 प्रतिमाह का वेतनभोगी रहा हूँ ऐसे में इससे कम धनराशि पर काम करना मेरे लिए असम्भव ही होगा और परिवार की बुनियादी मासिक जरुरतें भी कम से कम 25000 तो है ही....ऐसे भी एक प्रशिक्षु पत्रकार के रुप में काम करना तो कोई विकल्प ही नही है इसके अलावा चूंकि मॉस कॉम मे भी नेट हूँ तो पत्रकारिता की मास्टरी का एक विकल्प बचता है उस पर शायद विचार किया जाये....।
खैर! अभी मै भी कयासों के ही दौर मे हूँ और काफी हद तक कंफ्यूज्ड भी हूँ ऐसे में किसी एक योजना को तय कर पाना मेरे लिए भी मुश्किल काम होगा सो तुलसी बाबा की शरण में हूँ होए सोई जो रामरचि राखा,को करि तर्क बढावे साखा... ।
निजि सम्बंधो के लिहाज़ से भी काफी नाजुक दौर है अब किसी से मेल मिलाप का मन भी नही होता है एक तरह से यथास्थितिवादी मनस्थिति मे जीते-जीते ऐसा लगता है कि अब बदलाव होना चाहिए अब मै खुद एक लम्बी यात्रा पर निकलना चाहता हूँ जहाँ एकांत हो,अज्ञातवास हो,मेरा कडवा अतीत न हो,मुझे दोस्तों से शिकायत न हो... इसी दिशा में चाहता हूँ कि कुछ व्यवस्था हो जाये बस...।
देखतें है कि कब वक्त करवट लेता है और मै अपने ढब से जी सकने की एक कवायद शुरु कर सकूँ।
अभी के लिए इतना ही....शेष फिर
डॉ.अजीत  
(एक पुरानी पोस्ट)

Wednesday, January 9, 2013

दर-ब-दर



24 दिसम्बर को घर से झोला उठा कर निकला था सबसे पहला पडाव राजधानी दिल्ली में था एक निजि मित्र और कई फेसबुक के माध्यम से बने मित्रों से मेल मिलाप का मन था सो सबसे पहले अपने पीजी के दिनों के दोस्त पवन लालचंद (सीनियर रिपोर्टर ईटीवी न्यूज़) के घर पर डेरा डाला गया गौरतलब हो कि हम लगभग दो साल बाद साक्षात मिले थे 6 महीने से फोन पर पुनर्सवांद  हो रहा था एक दौर ऐसा भी आया था कि लगभग डेढ साल तक हमारे मध्य संवादशून्यता की स्थिति रही है वजह कुछ अलग किस्म की थी उनकी चर्चा यहाँ करना न प्रासंगिक है और न ही अर्थपूर्ण... खैर ! पवन जी उसी दोस्त के रुप मे मिलें जैसे हम कभी हुआ करते थे हालांकि मेरे दिल में उनके घर जाने से पहले के कुछ संकोच अवश्य थे लेकिन बाद मे जी को कडा किया और पवन जी को साधिकार कह दिया कि मै फलां तारीख को आपके घर रात्रि विश्राम करुंगा और उन्होनें भी उसी सहज़ता से मुझे आश्रय दिया।
अगले दिन सुबह ब्रंच करने के बाद मुझे अपने एक दूसरे सजातीय मित्र एडवोकेट सुनील बैंसला साहब से मिलना था सो फिर वहाँ से रवानगी ली और सुनील भाईसाहब के घर पहूंचा उनसे मेरी यह पहली मुलाकात थी इससे पहले हम फोन/फेसबुक के माध्यम से एक दूसरे से बतियाते रहे है। सुनील भाईसाहब का अपनापन और स्नेहिल व्यवहार मेरे लिए अभूतपूर्व किस्म का था उन्होने साधिकार अपने साथ नाश्ता करवाया हालांकि मै ब्रंच कर चुका था लेकिन फिर भी उनके घर पर नाश्ता करके मुझे ऐसा लगा जैसे कि अपने गांव मे घर पर नाश्ता कर रहा हूँ क्योंकि भले ही वह आधुनिक और प्रगतिशील लोगों मे शुमार है लेकिन भी फिर भी खान पान के मामलें में उनका देहाती टेस्ट मुझे प्रभावित कर रहा था। सुनील भाई साहब से कई समसामयिक विषयों पर चर्चा हुई मुझे किसी मसले पर उनकी मदद की जरुरत थी सो वो भी मांगी गई कुल मिलाकर सुनील भाईसाहब एक सह्र्दय और बुद्धिजीवी साथी लगे मुझे उनकी तत्परता का मै कायल हो गया हूँ।
चाय,घर का मक्खन और आलू के परांठे का भोग लगाने के बाद मै वहाँ से मेटरो पकड कर सीधा शाहदरा पहूंच गया वहाँ पर राजेश भाई मेरा इंतजार कर रहे थे उनकी बाईक पर सवार हो सीधे उनके फ्लैट पहूंच गये... चाय-पानी के बाद गप्पबाजी का सिलसिला शुरु हुआ वो देर रात तक चलता ही रहा 3 बार चाय 1 बार सूजी का हलवा का भोग लगाया गया...राजेश भाई पाक कला में निष्णात हैं इसलिए कोई दिक्कत नही हुई उस दिन उनका मंगलवार का व्रत था फिर भी उन्होनें मेरे आतिथ्य मे कोई कसर नही छोडी हालांकि मुझे थोडा बहुत अपराधबोध भी हुआ उनसे खादय सामग्री बनवानें में लेकिन उनकी सदाशयता के समक्ष सब कुछ छोटा पड गया।
राजेश भाई के मकान पर ही बिट्टु कसाना जावली (बीकेजे साहब) से मुलाकात हुई उनसे मिलने का कार्यक्रम भी पिछले एक साल से बन बिगड रहा था लेकिन अंत: वह घडी आ ही गई जिसका इंतजार था फेसबुक के माध्यम से मिले पूर्व के लोगो के साथ मेरे अनुभव कुछ कडवे किस्म के रहे है इसलिए मन मे एक भय भी था कि कही फिर से वैसी ही पुनरावृत्ति हो अक्सर लोग दिल मे जगह बना लेते है लेकिन बाद मे दिल तोड कर जाते है....खैर! बिट्टु भाई से मिलकर ऐसा कुछ नही लगा कि फिर से वही सब होने जा रहा है जो पहले मेरे साथ हो चुका है वो एक बेहद सरल,निष्पाप किस्म के सच्चे इंसान लगे उन्होने कम से कम से मुझे उतना स्पेस प्रदान किया जितना मुझे जरुरी था अन्यथा अपने अधिकारबोध के चलते वो कई बार अतिवादी भी हो जाते है लेकिन मेरी सुविधा से उन्होनें अपना मिलने का समय तय किया यह मेरे लिए एक बडी बात थी...मै राजेश भाई और बिट्टु भाई की गप्पबाजी का सिलसिला जब एक बार चल निकला तो फिर रुका का नाम ही नही लिया बीच-बीच मे चाय की चुस्कियाँ चल रही थी। बिट्टु भाई मुझे आग्रह कर रहे थे कि मै आज रात उनके साथ जावली ही चलूँ और वही रात्रि विश्राम करुँ लेकिन मैने मना कर दिया थोडी तर्क वितर्क के बाद मान गये...। उस रात हम तीनो दोनो ने साथ ही भोजन किया और इसके बाद बिट्टु भाई ने विदा ली।
रात मे थोडी देर तत्व.दर्शन की की चर्चा के बाद सोने चले गये राजेश भाई मेरे फोल्डिंग के नजदीक ही सोफे पर ही पसर कर सो गये...कुल मिलाकर एक यादगार मुलाकत रही।
अगले दिन बिट्टु भाई का आग्रह था कि उनके गांव पधारा जाए और नाश्ता साथ ही किया जाए...इस आग्रह को मै चाहकर भी मना न कर सका सो सुबह जल्दी ही नहाकर मै और राजेश भाई जावली पहूंच गये...वहाँ बिट्टु भाई के परिवार से मिलना हुआ और साथ ही पनीर,आलू के परांठो का पेट भरवा नाश्ता किया गया एक आत्मीय जन से मिलकर जैसा रिश्ता महसूस हो जाता है वैसा ही मुझे उनके यहाँ लगा...वहाँ एक फोटो सेशन के बाद मै और राजेश जी वापिस शाहदरा आ गये।
मुझे दिन मे एक मित्र रविकांत शर्मा से मिलना था उसके लिए पहले दिल्ली विश्वविद्यालय जाने का कार्यक्रम था लेकिन बाद मे यह तय किया गया कि रवि को यही बुला लेते है रविकांत को फोन पर पता बता दिया गया और जब तक रवि आया मै और राजेश जी धूप में  बैठे गपियाते रहें इस दौरान राजेश जी ने नींद की एक झपकी भी ले ली क्योंकि जावली मे खाये गए आलू के परांठो के असरात हो रहे थे...।
रविकांत 2 बजे के आसपास पहूंचा... और लगभग हम 2 घंटे बतियाते रहे...बातचीत का मुख्य मसला रहा फैमिनिज़्म रविकांत एक समानतावादी समाज़ की वकालत करता रहा और मै उस समाज़ की कल्पना...इस सिलसिले मे सारा वक्त गुजर गया..।
शाम होने को थी तो शाम की महफिल की तैयारी की गई...इस रात के मुख्य आकर्षण थे मित्र राहुल खारी और राहुल चौधरी दोनो ही विदेशी भाषा क्रमश: (पुर्तगाली,इटैलियन) के प्राध्यापक है दिल्ली विश्वविद्यालय में... राजेश जी फ्लैट बैचलर होस्टल बन चुका था और इस बार हमने डेरा जमाया था उनके बैडरुम में क्योंकि उस दिन उनकी पत्नि घर पर नही थी...।
राहुल खारी और राहुल चौधरी दोनो लगभग साथ ही पहूंचे और इन दोनों से मेरी मुलाकत पहली बार ही हो रही थी इससे पहले हम फेसबुक के माध्यम से सम्पर्क मे थे।
दोनो ही जिंदादिल और आत्मीय लगें मुझे राहुल खारी से पहले ज्यादा सम्पर्क था राहुल चौधरी से थोडा कम लेकिन दोनो से मिलकर ऐसा नही लगा कि हम पहली बार मिल रहे थे...राहुल चौधरी काफी समय यूरोप मे रहा है पढाई के सिलसिले में और राहुल खारी भी पुर्तगाल मे रहकर आ चुका है ऐसे में दोनो का बहु सांस्कृतिक ज्ञान बेहद सम्पन्न है अपनी किस्सागोई ऐसे ही चल निकली और जैसे ही महफिल जँवा होती गई सब अपने अपने तेवर और कलेवर मे आते गये...जब मुझे लगा कि इतिहास,परम्परा और सांस्कृतिक मसलों पर खुब चर्चा हो गई है इसके बाद मै महफिल के उवान को गज़ल और कविता के तरफ ले गया और मै चंद शेर और दो गज़ले तरन्नुम मे गाकर सुनाई... जिसे शामीन ने खुब पसंद किया...।
हम चारों ने साथ ही डीनर किया मेरी इस यात्रा में दो दिन से भोजन का भार राजेश के उपर था वो बाहर से ही खाने आर्डर कर रहे थे....मुझे थोडा अजीब भी लग रहा था क्योंकि ये मज़मा मैने जमाया था और सारा भार राजेश भाई वहन कर रहे थे...खैर ! धीरे-धीरे मै अपनी बेशर्मी के साथ मज़ा ले रहा था..। खुब गप्पबाजी,कविताई,आदि के बाद फोटोशेसन हुआ और फिर राहुल स्कैवयर (राहुल खारी,राहुल चौधरी) ने विदा ली और मैने और राजेश जी ने अपने अपने खंरार्टो से आलाप छेड दिए...बेहद गहरी और धुत्त किस्म की नींद के बाद सुबह आंख खुली...आज मुझे जयपुर के लिए निकलना था सो जल्दी नहा धो कर तैयार हो गया सुबह बिट्टु भाई भी राजेश जी के मकान पर ही आ गये पूडी,दही और सब्जी का भरपेट नाश्ता करने के बाद बिट्टु भाई ने अपनी कार से मुझे जयपुर की बस पकडने के लिए बीकानेर हाउस छोडा...रास्ते में भी बातचीत का सिलसिला चलता ही रहा...विदाई का समय मेरे लिए भावुक क्षण था क्योंकि राजेश भाई के अपनेपन और अनौपचारिक व्यवहार ने दिल मे एक खास जगह बना ली थी साथ ही बिट्टु भाई की सदाशयता का भी मै आभारी हो गया था...खैर ! कार से उतरते ही बस मिल गई और मैने दोनों बंधुओं से विदा ली...बस मे बैठकर दोनों को एक एक कृतज्ञता ज्ञापित करता हुआ एसएमएस भेजा।
यह एक वोल्वो बस थी बस मे ज्यादा यात्री नही थें सो मुझे ठीक सीट मिल गई थी।
मैने कंडक्टर से टिकिट के कहा तो सुना टिकिट मुझे थमाते हुए कहा 685/- रुपये....मुझे एक बार झटका सा लगा लेकिन जल्दी ही संभल गया सोचा भईया ! अभिजात्य श्रेणी मे सफर करने के अपने आर्थिक जोखिम तो होते ही है...इस टिकिट के साथ मुझे मात्र एक पानी की बोतल मिली थी जिसकी सर्दी मे कोई जरुरत भी नही पडी..।
रास्ते मे एक थ्री स्टार टाईप के रिसार्ट पर बस रुकी जहाँ मैने लंच किया एक सौ बीस रुपये मे दो नान और एक थर्माकोल की बनी दाल मखनी की कटोरी भूख लगी हुई थी इसलिए अच्छी ही लगी....रास्ते में मोबाईल पर गाने सुनता रहा और बस बाहर झांकता रहा...।
जयपुर में फेसबुक के माध्यम से मिलें एक और मित्र रत्नजीत सिंह से मिलने का कार्यक्रम था वैसे भी यह यात्रा फेसबुकिया सम्बंधो के ही नाम थी रत्नजीत भी आज ही अपने गांव से लौटा था मुझसे मिलने के चक्कर मे वह भी अपने गांव से जल्दी आ गया था..बस स्टैंड पर उतरते ही मुझे अंजान यात्री समझकर आटो वालो ने घेर लिया लेकिन अपनी पूर्व की यात्राओं के अनुभव के चलते मै चालाकी से जयपुर को जानने पहचानने वाले का अभिनय करने मे लगभग कामयाब रहा है मंदिर मे पडें-पुजारी और बस स्टैंड पर ऑटो चालको का आतंक मुझे सबसे ज्यादा परेशान करता है।
रत्नजीत से जयपुर पहूंचने से पहले से ही फोन पर सम्पर्क पर था...सो तय हुआ कि मुझे टोंक फाटक पहूंचना है जहाँ मेरे रुकने की भी व्यवस्था रत्नजीत ने की हुई थी। होटल के बाहर पहूंचकर रत्नजीत को फोन मिलाया और रत्नजीत बमुश्किल दो मिनट मे वही पर हाजिर हो गया।
पहली बार में रत्नजीत को देखकर मुझे ऐसा नही लगा कि हम पहली बार मिल रहे है जल्दी ही हम दोनो होटल पहूंच गए वहाँ की आरम्भिक औपचारिकताओं के बाद हम रुबरु थे...शुरुवात मे रत्नजीत थोडा संकोच कर रहा था और शायद होटल की व्यवस्थाओं से असहज़ भी थी लेकिन फिर एक बार जब मै अपनी रौ और औकात मे आ गया तो सारा बेगानापन दूर हो गया मुझे रत्नजीत अपने गांव के दोस्त जैसा लगा जिसका मै यदा-कदा जिक्र भी करता हूँ हालांकि रत्नजीत आर ए एस का प्री एग्ज़ाम पास कर चुका है तथा अपने करियर को लेकर बेहद सचेत और जागरुक किस्म का है लेकिन मुझे उसके ज्ञान की बजाए उसके अपनेपन और जिज्ञासु प्रवृत्ति ने प्रभावित किया।
रत्नजीत से खुब बातें हुई साथ खाया-पीया गया रात में वो मेरे साथ होटल मे ही रुक गया जहाँ मैने उसको चंद शेर और दो गज़ल सस्वर सुनाई...कुल मिलाकर खुब शमाँ बंधा..सुबह मै जल्दी जाग गया फिर एक वार्तालाप का सत्र शुरु हुआ जो 2 घंटे के तकरीबन चला मुझे बेहद अपनापन,सम्मान मिला रत्नजीत से और उसे मुझ जैसे करमठोक इंसान से क्या मिला यह तो वह ही बता सकता है।
सुबह होटल मे नान हाईजिनक बाथरुम होने के कारण नहाने की हिम्मत ही नही सो हमने निवृत्ति के बाद होटल छोड दिया पढाई के लिहाज़ से रत्नजीत का यह समय काफी महत्वपूर्ण था इसलिए मै अपनी आवारागर्दी के चक्कर में उसका ज्यादा वक्त बर्बाद नही करना चाहता था सो बस वही टोंक फाटक पर हमने छाछ पी एक दूसरे से मुलाकात ली...मुझे उस वक्त एक शेर याद आ रहा था...
ऐसे ही लोगो के सहारे जिन्दगी कटती है
बैगाने होकर भी जो अपने से लगते है
वहाँ से मै पैदल-पैदल लक्ष्मीमन्दिर टॉकीज़ तक पहूंचा अब मुझे एक और मित्र यावर अली से मिलना था लेकिन तकनीकि वजह से पता चला कि उनसे आज मुलाकात नही हो पायेगी ऐसे मेरे पास 2-3 घंटे थे उसके बाद मुझे अजमेर के लिए निकलना था सो मैने नेहरु गार्डन में वह वक्त बिताना का निर्णय लिया..।
नहाया नही था इसलिए अजीब सा लग रहा था सो सोचा किसी सैलून पर सेविंग करवायी जाए उसके बाद एक थोडे हाई-फाई किस्म के सैलून मे घूस गया वहाँ सेविंग कराई और बालों मे शैम्पू करवाया ताकि नहाने जैसी फीलिंग आ सके...सैलून के स्वामी ने इस काम के 80 रुपये लिए जो मुझे ज्यादा लगे लेकिन शायद वहाँ की अभिजात्यता की वजह से मै रेट के बारे पूछ ही नही पाया...फिर संतोष करके वहाँ से निकल पडा।
नेहरु गार्डन मे एक और फेसबुकिया शिष्या से मुलाकात हुई नाम था एम आई एस सरकार ( मोनू शेर ) इस फेसबुकिया आईडी थी लेकिन इस सांस्कारिक शिष्या का असल नाम मोनू था... उसको वहीं पहूंचने का आदेश दे दिया गया और मै खुद भी नेहरु गार्डन मे एक बैंच पर पसर गया थोडी देर बाद वह अपने एक साथी के पहूंच गई...फेसबुक के कलेवर,तेवर,फ्लेवर के लिहाज़ से मै उनको थोडा दबंग किस्म की लडकी सोच रहा था लेकिन वो दबंग तो नजर आई लेकिन खालिश वेशभूषा के लिहाज़ से बाकि ऐसा लगा अपने किसी कालिज़ स्टूडेंट से मिल रहा हूँ।
मोनू से काफी बातें हुई कुछ निजि किस्म की कुछ औपचारिक और दूनियादारी की हमने एक साथ पार्क के कई चक्कर लगाये मैने जैनिज़्म के बारें अपनी जिज्ञासाएं शांत करता रहा है और वो बताती रही वैसे वो लडकी मुझे सांसारिक गुरु कहती है लेकिन आज मै जिज्ञासु की भूमिका में था...खैर ! सारांश: यही कहूंगा कि मोनू में एक पवित्र ऊर्जा है लेकिन उसकी दिशा तय करने मे अभी उसे काफी मेहनत करनी होगी...वो लीक से हटकर चलना चाहती है लेकिन अभी उसकी बातों में एक ‘बचपन’ है...बचपना नही है ये एक बडी बात है लेकिन अपने आप को समेटते हुए चलना तथा खुद की शर्तो पर जीने की कोशिस करने के लिए जिस प्रकार की साधना की जरुरत होती है वह अभी उसे सीखना बाकि इसे मै एक उम्र के तकाजे के साथ भी जोडकर देख रहा हूँ अभी शायद 24 साल की ही है सो अभी दूनिया देखनी बाकी है साथ ही दूनियादारी के प्रपंच भी...।
मोनू से मिलकर अच्छा लगा हमने साथ ही लंच किया उसके बाद मैने उससे विदाई ली...अब मै अजमेर की बस मे सवार हो गया इसके बाद मेरी निजी आवारागर्दी एक पारिवारिक यात्रा मे तब्दील हो गई क्योंकि अजमेर में मुझे अपने बडे भाई के पास जाना था।
इसके बाद मै तीन रात अजमेर मे रुका वहाँ भाई और उसके परिवार के साथ अच्छा समय बिताया..अजमेर मे आनासागर झील के टापू पर एक दिन अकेले धूप सेंकते बिताया...एक दिन पुष्कर गया जहाँ पंडो का आतंक देखा खुद को फ्रेंच कट दाढी की वजह से क्रिश्चिन बता कर जान बचाई...। क्या करें धार्मिक स्थानों पर जाने के अपने खतरे तो रहते ही है हरिद्वार मे रहता हूँ इसलिए ये सब तमाशे जानता भी हूँ।
31 दिसम्बर को वापसी थी रात मे 8 बजे ट्रेन थी मै आधे घंटे पहले पहूंच गया था घर से परांठे सब्जी भी मिल गये थे बडे भाई कोच में ही मुझसे मिलने आएं क्योंकि दिन भर से वो ओ.टी. में ही थें...एक विदाई युक्त मुलाकत के बाद मैने अपनी बर्थ पर अपना बिस्तर जमा लिया लिम्का के संग जादुई क्षणों का आनंद लिया, भोजन किया, एकाध मित्रों से गपियाया और फिर लम्बी तानकर सो गया जब आंख खुली तो अपने प्रदेश में था और 2013 आ चुका था...कहने का एक और नया साल और उसी नए साल मे ट्रेन में लेटा हुआ एक पुराना आदमी।
उफ्फ....बेहद लम्बी पोस्ट हो गई है इसके लिए क्षमा चाहूंगा अब मै भी थक गया हूँ यदि कुछ शेष रह गया हो तो आदतन यही कहूंगा.....
शेष फिर
डॉ.अजीत 

Thursday, December 13, 2012

ब्रेक



जिन्दगी की गाडी लम्बे समय से ब्रेक मारते-मारते ही चल रही है और इन्ही ब्रेक की श्रृंखला में मेरी तदर्थ से आमंत्रित व्याख्याता के रुप मे तब्दील हुई नौकरी में भी इस एक महीने का ब्रेक मिला है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने तीन महीने काम करने की अनुमति दी थी जो 30 नवम्बर को समाप्त हो गयी सो 1 दिसम्बर से बंदा निबट निठल्ला हो गया है।
एक तारीख से डिपार्टमेंट जाना बंद कर दिया है अब अल्टरनेट डे पर नहाता हूँ सारा दिन बिस्तर पर कम्बल में पडा रहता हूँ कमोबेश ज्यादा वक्त फेसबुक पर ही कटता है कभी-कभार दिल करता है तो कुछ पढ भी लेता हूँ।
ब्रेक मिलने का आर्थिक नुकसान वाला एक पहलू है लेकिन इसके अलावा मुझे यह भी नुकसान महसूस होता है वह है कि आपकी एक बंधी-बंधाई जीवनशैली बाधित हो जाती है फिर बहुत सी चीज़ें जो आपके रोजमर्रा की आदत का हिस्सा होती है वह छूट जाती है।
इस महीने मुझे घर पर रहने का एकमात्र लाभ यह मिला है कि मेरे कुछ काम पेंडिंग पडे हुए थे वह जरुर पूरे हो जायेंगे।
फेसबुक काफी समय और ऊर्जा ले लेती है इसके अलावा कुछ करने का मन ही नही होता है मुझे ज्ञात है कि यह उचित नही है लेकिन पहले भी बहुत सी अनुचित किस्म की जीवनशैली मै ऐसे ही जीता आया हूँ।
इस महीने के आखिरी हफ्ते में दिल्ली-जयपुर-अजमेर की यात्रा प्रस्तावित है हालांकि सर्दी बेहद ज्यादा हो रही है लेकिन फिर भी जाने की यथासम्भव कोशिस रहेगी यदि कोई भौतिक बाधा न रही तो जरुर यह यात्रा की जायेगी। दिल्ली में लगभग एक साल बाद कुछ सजातीय बंधुओं से मिलना होगा जिनसे परिचय फेसबुक के माध्यम से ही हुआ है हालांकि मेरे पहले मेल-मिलाप के अनुभव ज्यादा अच्छे किस्म के नही रहे है लेकिन फिर भी इस बार फिर से कुछ नये लोगों से मिलने का मन तो है।
बहरहाल, इस बेतरतीब सी जिन्दगी में फिलवक्त का एक भावी रोमांच यही बचा हुआ है कि जनवरी मे हमारे विश्वविद्यालय मे स्थाई नियुक्ति के लिए साक्षात्कार हो रहे हैं सो इस बार क्या तो मै स्थाई हो जाउंगा या फिर स्थाई रुप से विश्वविद्यालय से सेवाओं से मुक्त। पत्नि कुछ ज्यादा चिंतित है हालांकि मै भी सचेत हूँ लेकिन फिर भी पत्नि को लगता है कि यदि यहाँ नियुक्ति नही हुई तो फिर 5 साल से जो तदर्थ साधना चल रही थी अध्यापन की वह भी व्यर्थ चली जायेगी जो सच भी है यदि इस बार यहाँ अपने विश्वविदयालय में कुछ नही हुआ तो फिर यहाँ सम्भावना शेष भी नही बचेगी।
मेरे लिए मनोविज्ञान के अध्यापन की दिशा में स्थाई होने की यह अंतिम अवसर होगा क्योंकि मै इसके बाद फिर मनोविज्ञान मे मास्टरी के लिए प्रयास भी नही करुंगा फिर कहाँ करुंगा (मास कॉम अथवा हिन्दी) कुछ कह नही सकता हूँ।
आने वाला नया साल कई अर्थों में नया होगा यह जीवन की दशा और दिशा तय कर देगा ऐसा मेरा पूर्वानुमान है वह भी जनवरी के पहले पखवाडे तक ही इसके बाद क्या होगा वह न मै जानता हूँ और न कोई और।
मन निर्मूल आंशकाओं से भी भरा रहता है जब आपके अतीत के अनुभव कडवे किस्म के हो तो फिर कुछ सहज़ रुप मे मिल जायेगा इसकी आशा दिल नही कर पाता है इसलिए मुझे भी लग रहा है कि संघर्ष बडा है इस बार लेकिन फिर भी मै भयभीत नही हूँ बल्कि एक रोमांच भी है दिल मे कि जो भी होगा जीवन का एक स्थाई फैसला तो होगा।
जनवरी में जो भी होगा वो देखा जायेगा और फिर उसके बाद ही जीवन को किस दिशा मे ले जाना है वह देखा जायेगा सो फिलहाल यही सब चल रहा है।

शेष फिर
डॉ.अजीत 

Thursday, October 25, 2012

विरोधाभास


जीवन विरोधाभासों में जीना अब आदत बनता जा रहा है। कुछ अजीब से इत्तेफाक आपके साथ शेयर कर रहा हूँ जो अपने आप मे विरोधी प्रतीत होते है लेकिन अपने जेहन मे सह अस्तित्व की अवधारणा के साथ बने हुए है मसलन:
  1. मै पीएचडी मनोविज्ञान मे हूँ और पिछले छ: सालों से मनोविज्ञान का अध्यापन कर रहा हूँ लेकिन अभी तक खुद को बतौर शिक्षक स्वीकार नही कर पाया आज भी दिलचस्पी के लिहाज़ से कविता,साहित्य,पत्रकारिता दिल औ’ जेहन के सबसे करीब है...मनोविज्ञान के उपचारात्मक पक्ष मे गहरी दिलचस्पी है आज भी लगता है कि यदि अध्यापक ही बनना है तो साहित्य/पत्रकारिता क्यों न पढाया जाएं मनोविज्ञान जीने और समझने का विज्ञान/कला है इसका टीचर बननें मे दिल नही लगता है।
  2. लगभग नास्तिक हूँ लेकिन ज्योतिष,तंत्र में गहरी अभिरुचि है और ज्योतिष को विज्ञान सम्मत भी मानता हूँ स्वांत सुखाए भाव से मित्र/परिचितों की कुंडलियाँ भी बांचता हूँ लेकिन गैर पेशेवर ढंग से नही, एक मित्र बहुत दिन से अपने पुत्र की कुंडली बनाने के लिए जोर दे रहे है लेकिन जब तक दिल नही करेगा मै देखूंगा भी नही..।
  3. गजल पढना और सुनना अपना ऑल टाईम फेवरेट काम है लेकिन इसके साथ-साथ मुझे कभी कभी पंजाबी पॉप और भावपूर्ण नये फिल्मी गीत सुनना भी अच्छा लगता है सबसे बडा विरोधाभास तो यह है कि इन सबके के साथ मुझे अपने दोआब क्षेत्र के लोकगीत रागणी से बेहद अनुराग है, है न अजीब सा इत्तेफाक की एक तरफ आप अदब की दूनिया मे गजल सुनते है दूसरी तरफ ठेठ देहाती लोकगीत।
  4. पेशे से विश्वविद्यालय का अध्यापक हूँ लेकिन सभी दोस्त पत्रकार/कवि/लेखक है अपने विषय के अकादमिक लोगो से मुझे एक खास किस्म की चिढ है।
  5. शहर के दोस्तों/परिचितों से दिल भर गया है आज भी गांव का एक दोस्त अपने दिल के बेहद करीब है।
  6. लोग-बाग संबधो का विस्तार चाहते है और मै खुद मे सिमटना चाहता हूँ।

और भी बहुत से विरोधाभास है जिनका अगर जिक्र करुंगा तो पोस्ट बहुत लम्बी हो जायेगी...
शेष फिर

डॉ.अजीत