Saturday, September 8, 2012

तीस बरस



कल तीस बरस का हो जाउंगा। हर साल 9 सितम्बर को मेरा जन्मदिन आता है वैसे तो मैने अपना जन्मदिन कभी मनाया नही है लेकिन इस बार हरिद्वार मे मुझे एक रहते हुए मुझे एक दशक पूरा हो गया है साथ ही मै 30 साल का भी हो गया हूँ इसलिए थोडा सा मन मे मानसिक कौतुहल अवश्य है। कल अपने एक मित्र सुशील उपाध्याय जी के साथ से मिलने का कार्यक्रम है देखते है कैसे मिलकर गम गलत किया जाता है।
सिंहावलोकन करने जैसा कुछ जीवन है नही बस कभी मै अपने हिसाब से जीता रहा और कभी जिन्दगी अपने हिसाब से मुझे जीने के लिए बाध्य करती रही बस इस ज्वार भाटे मे वक्त निकल गया...। क्या खोया-क्या पाया टाईप का विश्लेषण करने बैठूंगा तो काफी जख्म हरे हो जायेंगे जो खासकर दोस्ती के नाम पर मैने खाये है बस इतना कहूंगा कि न मुहब्बत न दोस्ती के लिए वक्त रुकता नही किसी के लिए...।
कल और परसो (बीते हुए) दो अप्रत्याशित घटनाएं हुई अप्रत्याशित इसलिए जिसकी मुझे आदत नही है अमूमन दैत्याकार शरीर (6 फीट 2 इंच) का होने की वजह से कभी कोई ऐसे ही फालतू ही उलझने की जुर्रत नही करता है हालांकि मै स्वभाव से लडाका किस्म का नही हूँ लेकिन ये प्रीवाईलेज़ मिलता रहा है तो मै लेता रहा हूँ।
पहली घटना यह हुई कि मै परसो बडे बेटे की स्कूल फीस जमा करवाने उसको स्कूल गया था जिस तरफ पार्किंग थी वहाँ काफी भीड भी थी और धूप भी हो रही थी सो मैने सोचा कि स्कूल के मेन गेट के पास ही एक पेड है उसकी छाया मे बाईक पार्क कर दूँ  सो मै जैसे ही बाईक पार्क करने लगा गेट पर बैठे गार्ड ने प्रतिरोध जताया मैने उसको समझाया कि बस 5 मिनट का काम है मुझे केवल फीस जमा करवानी है जल्दी ही वापिस आ जाउंगा लेकिन वो बडबडाता रहा जब मैने थोडा देहाती अन्दाज़ मे कहा कि भाई क्या आफत आ जायेगी तो वो बिगड गया और तू तडाक पर आ गया एक बार मुझे गुस्सा आया लेकिन फिर भी मै बात टाल गया लेकिन वो बडबडाता रहा जब अन्दर एंट्री करते समय मैने उससे उसका नाम पूछा जोकि उसकी वर्दी पर नही लिखा था तो उसे लगा कि शायद मै उसकी शिकायत करुंगा जो मै करता ही...वो बोला अरे...नाम मे क्या रखा क्या करेगा नाम पूछ कर....! उसने मेरे साथ अभद्रता की लेकिन फिर भी मै क्षमाशील भाव से फीस जमा करवाने चला गया वापिसी मे मेरा मन भी हुआ कि स्कूल के मैनेजर ( जो मेरे अच्छे परिचित है) से उसकी शिकायत कर दूँ बल्कि उसको वही बुला कर जलील करुँ लेकिन फिर पता नही क्या सोच कर कान दबा कर चला आया सोचा कि अभी वक्त सही नही चल रहा है इसलिए अपमान सहन कर लिया।
अब दूसरा किस्सा सुनिए अगले दिन मुझे बैंक से ड्राफ्ट बनवाना था सो मै निकट की एसबीआई की ब्रांच मे गया वहाँ पता चला कि इस शाखा का प्रिंटर खराब है इसलिए मैन ब्रांच जाना पडेगा  फिर गर्मी मे वहाँ से बाईक पर सवार हो कर मेन ब्रांच पहूंचा साहब...वहाँ कैश काउंटर पर काफी लम्बी लाईन थी लगभग 1 घटें मे मेरा नम्बर आया हालांकि जो एकाउन्टेंट रुपये जमा कर रहा था उसका व्यवहार बेहद पेशवर था इसलिए थकान मिट गई उसने आत्मीयता से मेरे दोनो ड्राफ्ट फार्म स्वीकार किए और जल्दी ही मुझे ड्राफ्ट छापने के लिए दो फार्म दे दिये और बोला वहाँ लास्ट मे जो मैडम बैठी उससे ड्राफ्ट छपवा लो....अब सीन यहाँ से बिगडता है मैने मैडम को फार्म दिए और अनुरोध किया कि इनके ड्राफ्ट छाप दें उसने अनमने मन से मुझसे फार्म लिए, मुझे याद है वह एक पतली सी विवाहित स्त्री थी शक्ल से लग रहा था कि उसका मूड खराब है फिर बोली आप बैठ जाओ जब जरुरत होगी वह बुला लेगी लेकिन मै काउंटर के पास ही खडा रहा क्योंकि उसके पास मेरे अलावा कोई काम नही था और उसके काउंटर पर और कोई कस्टमर था भी नही बस एक वजह यह हो सकती है कि उसे मेरी शक्ल पसन्द न आयी हो और वो मुझे सामने न देखना चाह रही हो..। एक बार फिर से उसने वही कहा कि आप बैठ जाओ...मैने कहा कि नही मै ठीक हूँ आप कर लीजिए अपना काम जल्दी करने के लिए हालांकि  उस पर कोई दवाब नही बनाया लेकिन इतने मे वो मोहतरमा अपना आपा खो बैठी...बोली... “कहीं भी खडे रहो बेवकूफ आदमी मुझे क्या फर्क पडता है” मैने उसका तंज सुना और सुनकर बडी तेजी से गुस्सा भी आया लेकिन फिर भी गुस्सा पी भी गया मैने सोचा इसको क्या बताउँ ये आदमी बेवकूफ तो है लेकिन तुझ बीए पास एसएससी/पीओ क्लीअर बैंक क्लर्क से कम ही बेवकूफ है तेरे सामने जो इंसान खडा है वो हर साल तेरे जैसे बैंक क्लर्क दर्जनो की संख्या में पैदा करके बाज़ार मे उतार देता है और खुद भी 3 विषयों मे पीजी, पीएचडी है...। बाद मे मैने उसको भी इग्नोर कर दिया हालांकि जब मै ब्रांच मैनेजर के पास ड्राफ्ट साईन करवाने गया तब उसने  पूछा कि आप क्या करते है और जब उसको मैने यह बताया कि मै विश्वविद्यालय मे टीचर हूँ तो उसने काफी सम्मान दिया और पानी भी पिलवाया एक बार दिल मे आ रही थी कि उस मोहतरमा को यही बुलवा कर पूछा जाए कि मै किस ऐंगल से बेवकूफ इंसान हूँ....लेकिन यहाँ भी वक्त ही दुहाई देकर खुद को समेट लिया और चल दिया वहाँ से....।
स्कूल का गार्ड हो या बैंक की क्लर्क दोनो में मुझे कोई खास फर्क नजर नही आया इसलिए मैने अपने अपने अपमान को नियति और प्रारब्ध मानते हुए मन में क्लेश लिए वहाँ सीधा अपने घर आना ही उचित समझा घर आकर यह किस्सा पत्नि को सुनाया तो बोली कि जब वक्त बुरा चलता तो ऐसे ही हानि-लाभ,यश-अपयश के दौर भी चलते है इनसे गुजरजाना ही एक मात्र समाधान है।
इन दोनो घटनाओं ने मेरे उस आत्मविश्वास को कम किया है जिसके बल पर मै साधिकार कई भी घुस जाया करता था अब आईना दिखा दिया दो बुद्धिजीवी लोगो ने....आगे से सावधानी रखनी पडेगी...।
कल मेरा फोन फ्लाईट मोड पर रहेगा क्योंकि सुबह सुबह जन्मदिन के एसएमएस का हमला हो जाता है और मै किसी का न तो फोन उठाता हूँ और न ही एसएमएस का जवाब देता हूँ इसलिए बस मुझे दिल से दुआ दो जिसमे असर भी हो....इन बेअसर खत’ओ’खतूत  से कुछ मसला हल नही होता है। आपकी मुबारकबाद  और जज्बाती पैगाम इस करमठोक के लिए बेशकीमति है...आमीन।
(आज के लिए इतना ही काफी है बाकि ‘तीस बरस’ के नाम से एक किताब अलग से लिखी जाने की योजना है....उसमे होगा मेरा सम्पूर्ण विवरण एक दोगले इंसान की सच्ची कहानी)
शेष फिर
डॉ.अजीत 

Wednesday, September 5, 2012

वक्त की मांग



वक्त बेरहम होता है,वक्त बडा संगदिल होता है ऐसे जुमले अभी तक फिल्में में खुब सुने थे लेकिन आजकल इसका भुक्तभोगी भी हो गया हूँ। हर वक्त शिकायत करते रहना किसी समस्या का कोई समाधान भी नही इसलिए आज ज्यादा विधवा विलाप नही करुंगा, पिछले एक पखवाडे से गुरुकुल की नौकरी छूट जाने के बाद मेरे मित्र,शुभचिंतको ने भरसक प्रयास करें कि मेरी ससम्मान वापसी हो जाए लेकिन कई बारे चीज़े अपने हाथ मे भी नही होती है कुछ लोग चाहकर भी आपका भला नही कर पाता है ऐसे मे इसे वक्त की दुहाई देकर आगे बढने के अलावा कोई विकल्प शेष नही बचता है।
सो आज एक पखवाडे के तनाव,सम्भावनाओं,अपेक्षाओं,सम्बन्धो के खुरदरेपन की रवायत के बीच यही लिखना पड रहा है कि कल से यानि 6 सितम्बर से मै फिर से गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय ज्वाईन करने जा रहा हूँ लेकिन बतौर एडहॉक असि.प्रोफेसर नही बल्कि अतिथि व्याख्याता के रुप में जिसको प्रति व्यख्यान के हिसाब से भुगतान किया जायेगा, दीगर बात यह है कि तकरीबन दस दिन पहले तक मै सार्वजनिक रुप से यहाँ तक अपने विभागाध्यक्ष साहब को भी यही दहाड कर कह रहा था कि मुझे गेस्ट फैकल्टी के रुप मे नही पढाना है लेकिन वक्त और हालात की मार ने मुझे फिर उसी जगह पर लाकर खडा कर दिया है जहाँ से ये सब बातें शुरु हुई थी तमाम भगीरथ प्रयासों के बावजूद भी जब कोई चारा न चला तो अंत: मैने यही फैसला किया है अब जैसा भी है वैसी ही सही यह जॉब करनी ही है।
गेस्ट फैकल्टी के रुप मे पढाने की कई तकनीकि दिक्कतें है लेकिन जब आपके पास कोई अन्य विकल्प न हो तो फिर दिक्कतों को स्वीकार कर आगे बढने के अलावा कोई चारा भी नही बचता है। गैस्ट फैकल्टी को 3 महीन के लिए परमिशन मिलती है जिसमे प्रति लेक्चर के हिसाब से पैसो का भुगतान किया जाता है विश्वविद्यालय प्रशासन की यह शर्त रहती है कि किसी भी सूरत में यह राशि 22000/- से ज्यादा नही होनी चाहिए यदि महीने मे कम दिन यूनिवर्सिटी खुलती है पैसों मे कटौती की जाती है कोई छूटी आदि का लाभ नही मिल पाता है आदि-आदि। ये भी एक अजीब विद्रुप बात है जिस विभाग मे मैने पिछले पांच सालों से पढाया है और जहाँ मेरे जूनियर टीचर 41000/- प्रति माह का फिक्स वेतन पा रहे है वहाँ मै अधिकतम 22000/- रुपये की प्राप्त कर सकूंगा वह भी तब यदि विभागाध्यक्ष साहब की नजरे इनायत रही तो...।
जब वक्त के फिकरे कस जाते है लोगो की निगाहे बदल जाती है कुकरमुत्ते की भांति सलाह देने वाले शुभचिंतक उग आते है कुछ करीबी दोस्त जरुरत से ज्यादा समझदार हो जाते  है और कुछ दोस्त दोस्ती के सम्पादन की कला का रिफ्रेशर कोर्स चलाने मे माहिर हो जाते है मै लम्बे समय से ये सब संत्रास भोग रहा हूँ इसलिए कोई नही पीडा नही है  और न ही मै दोषारोपण करके अपनी काहिली को कम करने या महान बनने जैसी कोई कोशिस कर रहा हूँ लेकिन एक बात जरुर दिल में आती है बार-बार कि आखिर ऐसी क्या चीज़ होती है जो आदमी को बदलने की जिद पर उतर आती है। खुद की नजरों मे गिरना और फिर खुद को सम्भाल कर लडखडाते हुए चलना बहुत मुश्किल काम है मैने यह महसूस किया है कि जब एक बार आपके समीकरण बिगड जाते है तब मित्रों की सामान्य सलाह भी व्यंग्य लगने लगती है और दुश्मनों की बातों पर प्यार आने लगता है।
वक्त,सलाह,दोस्ती,घर,परिवार,बच्चे,पत्नि और सम्बंधो का हरा-भरा संसार आपसे सतत श्रम साध्य सफलता की मांग रखता है यदि आप एक बार चूक गये तो फिर आजीवन आप स्पष्टीकरण देते रहिए कोई राहत नही मिलने वाली है।
मेरे एक पूर्व मित्र कहा करते थे कि यह चौकने का दौर है आपको कोई भी कभी भी चौका सकता है आज मुझे उनकी बातों की सच्चाई और गहराई पता चली है सच मे आजकल चौकने का दौर है मै अक्सर दूनियादारी के तमाशों से हाल-बेहाल परेशान होकर चौकता रहता हूँ लेकिन अब धीरे-धीरे आदत हो रही है। राम की मरजी राम ही जाने कह गये भईया लोग सयाने....!
एक मौजूँ शे’र अर्ज किया है..
कभी यूँ भी हुआ है हँसते-हँसते तोड दी हमने
हमें मालूम था जुडती नहीं टूटी हुई चीज़ें

जमाने के लिए जो है बडी नायाब और महँगी
हमारे दिल से सब की सब हैं वो उतरी हुई चीजें

दिखाती हैं हमें मजबूरियाँ ऐसे भी दिन अक्सर
उठानी पडती हैं फिर से हमें फेंकी हुई चीज़े....(हस्तीमल हस्ती)

शेष फिर
डॉ.अजीत

Wednesday, August 29, 2012

बुलेटिन



क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो ।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’
रामधारी सिंह दिनकर जी की इन पंक्तियों से बात शुरु करता हूँ ये पंक्तियां मुझे सदैव से प्रिय लगती है क्योंकि इस तरह से अपने साथ भी होता रहा है। अपने गांव देहात की एक कहावत है कि कभी कभी अच्छा करते करते भी किसी से बुरा हो जाता है ऐसा ही मेरा साथ हुआ है अपने एक दोस्त की प्रशंसावश भावातिरेक में लिखा गया और उसके निहितार्थ उनके लिए नुकसानदायक साबित होने की दशा मे आ गये जब आदमी का वक्त बुरा चल रहा होता है ऐसे प्रसंग बन ही जाते है। लिखने के मामले मे गाफिल होना ठीक नही है अब सावधानी रखनी पडेगी ताकि किसी को कष्ट न पहूंचे वैसे तो ये करमठोक किसी काबिल है नही ले दे कर एक लिखने का हुनर आता है थोडा बहुत और वह भी अगर जहीन सी गाली बन जायें तो इससे अजीब बात और क्या हो सकती है।
कल शाम अपने मित्र अनुरागी जी पधारे थे उनका सत्संग हुआ दूनिया भर का निंदारस का लाभ लिया गया ठाली बैठे बिठाये देर रात अपने एक करीबी दोस्त से मतभेद बढा लिये खुब भावुक एसएमएस बाजी हुई। रात भर बैचनी रही कि क्या सही कहा क्या गलत कहा सुबह उठते ही माफी का एसएमएस रवाना किया फिर उन मित्र से क्षमा याचना के लिए एक ईमेल भेजा। अनुरागी जी भद्र पुरुष है पिछले तीन साल से मै गांव से उनके लिए आम का आचार मंगवा कर देता हूँ (एक दिन जोश मे वायदा कर दिया था कि अनुरागी जी हमारे होते हुए आप आम का आचार बाजार से खरीद कर खाये...ऐसा नही चलेगा) अनुरागी जी जैसे लोग कम ही बचे है दूनिया में उनके साथ एक अपनापन महसूस होता है और उनके आने पर कोई औपचारिक संकोच नही होता है कि उनकी मेहमाननवाजी के लिए भी कोई फिक्र नही करनी पडती है....वैसे भी मेरे घर तक वो ही दोस्त आतें है जिनसे अपनापन हो..।
अनुरागी जी से कल विरोधाभास पर चर्चा चल रही थी कि मै जो भी कहता हूँ कि मुझे फलाँ काम नही करना है अंत मे ऐसी परिस्थितियां बन जाती है कि मुझे हार कर वही काम करना पडता है ऐसा लगता है कि मेरी सार्वजनिक घोषणाओं के विरोध में ईश्वर का कोई गुप्त एजेंडा काम कर रहा है। एक बात और मैने महसूस की है मैने जो विचार,स्वप्न,परियोजना किसी मित्र से शेअर कर ली वो काम मै कभी नही कर पाता हूँ संकल्प प्रकाशित होते ही कमजोर पड जाते है। अनुरागी जी ने मुझे समझाया कि डॉ.साहब यह प्रकृति का गुप्त सन्देश है जो आप समझ नही पा रहे है....! अब मै क्या समझुँ लेकिन ऐसा कई सालों से होता आ रहा है मेरे साथ थूक कर फिर से चाटना पडता है।
आज से दस साल पहले मेरी शादी में दहेज स्वरुप जो मारुति 800 कार आयी थी वह कल 45000/- मे बिक गई मै सोच रहा था कि कम से कम पचपन हजार की तो बिक जाये क्योंकि पिछले महीने मैने 55000/- की एक नई बाईक (उधार) खरीदी थी लेकिन अर्थशास्त्र का एक नियम पढा था कि जब आपकी क्रय शक्ति कमजोर होती है तो आप अपनी चीज़े सस्ती बेचतें है और दूसरों से चीजें महंगे दामों पर खरीदते है...सो इन दिनों अपनी क्रय शक्ति कमजोर चल रही है अब दस हजार की भरपाई इधर-उधर से करनी पडेगी।
देखते ही देखते सामने लोग जवान हो रहे है समझदार हो गये है और एक हम है कि चोट पे चोट खाये जा रहे है लेकिन फिर भी गैरत नही जागती है शायद फंतासी मे जीने वालो का यही हश्र होता है वो किसी चमत्कारिक दिन की उम्मीद पर अपनी पूरी जिन्दगी टेर सकते है जैसा मै टेर रहा हूँ।
कुछ दिन के लिए एकांत,अज्ञातवास पर जाने का मन हो रहा है घर पर दिन भर चिढचिढा पडे रहने से बेहतर है एकांत में चले जाना लेकिन अभी वक्त और हालात दोनो ही खराब है इसलिए इसकी भी उम्मीद कम ही है अब सीता राम सीता राम कहिए जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए...फिलास्फी पर चलने की नौबत आ गई है।
कल एक विदेशी मित्र से मदद मांगी है कि कुछ दिन के लिए मुझे अपने देश मे बुला लें ताकि मै अलग-थलग जिन्दगी जी सकूँ उसने आश्वासन भी दिया है मेरी शाश्वत भटकन किसकी प्रतीक है यह समझ नही आ रहा है आखिर मै किस चीज़ से भाग रहा हूँ खुद से या हालात से....।
बुलेटिन समाप्त..
डॉ.अजीत

Saturday, August 18, 2012

एक था.....


एक था अजीत...
जो अक्सर फेसबुक से चिपका पाया जाता था।
जो अक्सर उधार के शे’रो से वाहवाह लूटने का आदी था।
जो जल्दी ही अपना धैर्य खो देता था।
जो लोगो से जल्दी जुड जाता था और फिर जल्दी ही उनसे ही बोर हो जाता था।
जो लोगो से मिलने से कतराता था।
जो अपने मित्रो के फोन नही उठाता था।
जो दोगली जिन्दगी जीता था मतलब जो है वो नही दिखता और जो दिखना चाहता है वो है नही।
जो बेहूदा बातें करता रहता और जिसकी बातों से बोरडम फैला रहता था।
जो अपनेपन से डरता था जिसे दिल तोडने की आदत थी।
जो खुद को महान घोषित करने के जाने क्या –क्या प्रपंच नही करता था।
जो पहले सिद्धांत बनाता था और खुद ही सबसे पहले उन्हे तोडता था।
जो एक बेबात नाराज़ और उदास रहने वाला इंसान था।
जो शिखर पर पहूंच कर उसको छोड देने और शून्य से जीवन शुरु करने का आदी था।

एक यह अजीत है...
जिसने फेसबुक छोडने के बाद अपनी अध्येतावृत्ति को बढाने का दावा किया था लेकिन अभी तक एक भी किताब नही पढ पाया है।
जिसने अपने दोनो ब्लॉग को नियमित करने का दावा किया था लेकिन अभी तक एक भी पोस्ट नही लिख पाया है।
जो अपने बढते वजन को लेकर चिंतित है और कुछ ठोस कदम उठाना चाह रहा था लेकिन ज्यादा कुछ नही कर पाया है।
जिसको आज भी रात मे देर सोना और दिन मे खोना और बेबस होना अच्छा लगता है।
जो आज भी अक्सर अपना फोन बंद रखता है और कुछ दोस्तों के फोन नही उठाता है।
जो आज भी अज्ञातवास जीने का आदी है।
जो अपने परिचितों से को यह नही समझा पाता है कि उसके जीवन मे अब कोई मित्र के लिए स्पेस नही बचा है।
जो लोगो को खुश रखना नही सीख पाया है।
एक कोशिस...
जैसा हूँ वैसा ही रहने की।
बिना शर्त के सम्बंधो को जीने की।
किसी को कोई जवाब न देने की।
कुछ खोने पाने की जद्दोजहद जारी रखने की।
अपना वजूद सिद्ध करने तक हौसला बनायें रखने की...।
कुछ लिखने-पढने की।  

बस यही है अपना खेल तमाशा...जिसे आप हाथ की सफाई और नज़रबन्दी समझ सकते है।

शेष फिर....
डॉ.अजीत

Saturday, August 4, 2012

आमद


आवारी की डायरी बहुत दिनो से बंद पडी है अब बार बार फेसबुक को भी दोषी नही ठहराया जा सकता है कुछ मेरी ही कमअक्ली है कि नियमित लिखना नही हो पा रहा है इन दिनों फिर से एक अजीब किस्म का ठहराव आया हुआ है न नियोजन का मन होता है और न ही प्रयोजन का कुछ साथी लोग ऐसे बदले हुए व्यवहार से खफा है लेकिन अब किसी की कोई खास फिक्र नही होती है ऐसा लगता है जो लोग साथ के लिए है वो ऐसे ही छूट जायेंगे और जो साथी है उन्हे मेरे ऐसे होने से कोई फर्क नही पडेगा।
सच्चाई के साथ जीना कई बार बेहद खतरनाक हो जाता है चूंकि मै मनोविज्ञान से ताल्लुक रखता हूँ तो ऐसे मे हर किसी की अपेक्षा यही रहती है कि मै हमेशा अति आत्मविश्वास से लबरेज रहूँ,हमेशा बी पॉजिटिव और मोटिवेशन का लेक्चर पेलता रहूँ जो मुझसे नही होता है। मैने इस विषय को अपने सुख के लिए पढा और मेरे जीवन मे इसकी जितनी उपयोगिता है वह भी मुझे पता है लेकिन किसी को दिखाने के लिए मै अपने मूल स्वरुप को बदलना जरुरी नही समझता हूँ।
आने वाली 9 सितम्बर को तीस का हो जाउंगा एक तरह से कमोबेश आधी जिन्दगी जी ली है मैने जिन्दगी अपने फ्लेवर के हिसाब से जीने का सबक सिखाती रहती है लेकिन मै आज तक कुछ नही सीख पाया बस ऐसे ही पता नही किस झोंक मे जिए जा रहा हूँ कुछ विद्वान दोस्तो का कहना है कि मेरे जीवन मे लक्ष्य का अभाव है जबकि ऐसा नही है मेरे पास जो लक्ष्य है उसे सुनकर कोई मेरे मानसिक पागलपन पर हंस सकता है अपना आपा खो सकता है लेकिन यह जरुर है खालिस लक्ष्य होने से कुछ नही हो जाता है फिर कभी कभी सोचता हूँ कि ऐसा भी नही है मैने अपने स्तर से कोई प्रयास न किए हो लेकिन अब फिर से अपने को समेट कर जुट जाना थोडा मुश्किल काम है लेकिन इसके अलावा कोई विकल्प भी नही है।
कुछ दोस्त कहते है कि मेरे पास खुश होने/रहने की बहुत सी पुख्ता वजह है लेकिन मुझे अहसास-ए-कमतरी इतना ज्यादा है कि मै कभी अपनी छोटी-छोटी उपलब्धियों को भी सेलीब्रेट नही कर पाता हूँ दो विषयों ने यूजीसी नेट,25 साल की उम्र मे पीएचडी की उपाधि,निर्बाध नौकरी (एडहॉक ही सही) आदि-आदि कुछ चीजे जिन पर खुश होना चाहिए लेकिन सच यह है कि मुझे इनसे कोई खुशी नही मिलती है बस एक साक्षी भाव बन गया है जैसे भी चीजो से गुजर जाना है।
आधी जिन्दगी जीने के बाद अब यह सोचता हूँ कि ये जिन्दगी की पतवार मुझे किस दिशा मे लिए जा रही है मै हूँ क्या ? और बनना क्या चाहता हूँ...। इन दिनो एक खास किस्म की आदत और अपने निकट के लोगो मे देख रहा हूँ कि यदि जैसे ही किसी को आपने अपने मन की बात ईमानदारी से शेअर कर दी बस फिर लोग आपके सम्पादन मे लग जाते है सलाहो, नसीहतों का कारोबार शुरु हो जाता है वो आपको खारिज़ करते हुए आपको बदलने की जिद पर आ जाते है।
ऐसे लोगो के साथ मुझे बहुत मुश्किल होती है पहले करीब आना और फिक्र-ए-यार के हिजाब में अपनी पसन्द-नापसन्द थोपना आज के दौर के इंसान की खुबी है मुझे आग्रही लोग लम्बे समय तक बांधे नही रख पाते है एक समय के बाद एक खास किस्म की चिढ सी हो जाती है और फिर अपने स्पेस के थोडा कडवा बोलना पडता है जो मुझे भी अच्छा नही लगता है लेकिन क्या करुँ इसके अलावा कोई रास्ता ही नही बचता है..।
मसले तो बहुत से है लिखने बताने के लिए लेकिन अब बस इतना ही.....शेष फिर
डॉ.अजीत 

Friday, April 27, 2012

लम्बा विराम

आवारा की डायरी लिखना मेरे लिए निजि पीडा को ब्याँ करने जैसा रहा है एक साल पहले मेरे लिए यहाँ लिख कर राहत महसूस करना एक स्थाई उपचार हो गया था लेकिन फिर धीरे धीरे फेसबुक की लग गई अब वहाँ वमन करता रहता हूँ इसलिए अपनी डायरी के पन्ने कोरे पडे है। आज बहुत दिनों बाद यहाँ लिखने का मन हुआ पिछले दिनों के बहुत से किस्से है यदि उन सभी को विस्तार से लिखना शुरु करुँ तो कई पोस्ट हो जायेंगी लेकिन सारांश: यह कह सकता हूँ दिन ब दिन जिन्दगी एक नया पाठ पढाती है और मेरे जैसा जीव कभी उससे कोई सबक नही सीखता है और फिर से वही गल्तियाँ करता है जो पहले की है।
अब मुझे यह लगने लगा है कि मै एक पकाऊ किस्म का इंसान हूँ इसे आत्म आलोचना की व्याधि जैसा कुछ न समझें बल्कि यह एक ऐसी मनस्थिति का परिचायक है जहाँ खुद का अप्रासंगिक लगना एक आदत बनती जा रही है। मनोविज्ञान मे यदि इस बीमारी का नाम देने की बात कही जाए तो यह क्रोनिक डिप्रेशन है लेकिन मुझे अलग इसलिए लगता है कि मै अभी तक मुश्किल वक्त में भी इसी स्थाई भाव मे रहता हूँ एक प्रकार से चित्त का यह एक स्थाई भाव हो गया है न किसी बात से ज्यादा खुशी होती है और न किसी बात की ज्यादा पीडा।
कल शाम फेसबुक पर चटियाते हुए मैने एक मित्र से कहा कि मुझे लगता है कि मै कभी किसी को खुश नही कर पाया और मैने लोगो को निराश ही किया है फिर यही बात मैने अपने स्टेट्स पर भी शेअर की लेकिन आस-पास देखता हूँ तो सम्बन्धो का एक हरा भरा संसार है लेकिन मुझे किसी मे कोई खास दिलचस्पी नही है सब कुछ साथ होते हुए भी विलग है अपेक्षाएं,जिम्मेदारियाँ सब है और सब जरुरी भी है लेकिन फिर भी दिल मे एक खास किस्म का अनासक्तिबोध है। पिछले दिनो एक फेसबुकिया मित्र मुझसे खफा हो गया और मुझे दोगला इंसान करार देते हुए बेवफा घोषित कर दिया पहले पीडा हुई फिर कुछ जायज़ स्पष्टीकरण भी दिए लेकिन अब मन शांत हो गया है कोई मेरे विषय मे जो भी राय करें अब क्या फर्क पडता है आप एक सीमा तक ही अपना पक्ष रख सकते है  लेकिन जब दिमाग पक जाता है तब वह पक्ष बहाना लगने लगता है ऐसे फिल्म हमराज़ का वही गीत अच्छा लगने लगता है..चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनो...यह अध्याय यही समाप्त हो जाता है।
सम्बंधो की नियति यही है शत प्रतिशत समर्पण का अंत भी अंतोत्गत्वा शंका के साथ ही होता है कई बार आपका होना लोगो के लिए एक सुविधा मात्र होता है जहाँ आप फिलर की तरह से अपना जगह भरते है और जैसे ही किसी और का विकल्प आपकी जगह तैयार होता वैसे ही आप हाशिए पर आ जाते है यही एक स्थाई परम्परा है।
इन दिनों विश्वविद्यालय में भी अपनी सेवा का अंतिम काल चल रहा है 15 मई के बाद अपनी छुट्टी हो जाती है फिर अगले सत्र में बुलाया जाता है वो भी काफी आधिकारिक जद्दोजहद के बाद ऐसे में सारी ऊर्जा समीकरण,षडयंत्र,संकल्प,विकल्प आदि मे व्यय होती है पता नही कब इस तदर्थ जीवन से मुक्ति मिलेगी! अब तो यह सोचना भी बन्द कर दिया है।
इस बार गर्मियों मे यात्रा की योजना है किस तरफ की यह कहा नही जा सकता है वैसे भी किसी योजना का कोई इसलिए भी कोई अर्थ नही है कि मै जो भी योजना बनता हूँ वह सफल नही हो पाती है पता नही इसमे क्या हरि इच्छा रहती है।
अंत मे एक बात और कहना चाहता हूँ आवरण जीवन की सच्चाई है और यह दूनिया ऐसे ही आवरणों मे जीती भी है आपको दिगम्बर स्वरुप मे कोई देख पाये और उसको पचा पाये यह दुर्लभ संयोग की बात है कभी कभी मुझे यह लगता है कि जैसे मै मनोविज्ञान का प्राध्यापक हूँ तो सभी लोग मुझसे यही चाहते है कि हमेशा मोटिवेशन और पाजिटिव थिंकिंग की बातें करुँ...हमेशा लोगो को उत्तेजित अवस्था मे रखूँ खुश रखने की कोशिस करुँ और मै अक्सर करता भी हूँ लेकिन कभी कभी मेरी हिम्मत भी जवाब देने लगती है क्योंकि बतौर इंसान मै कैसा महसूस करता हूँ यह जिसके शेअर कर सकूँ ऐसा कोई शख्स मेरी जिन्दगी में नही है क्योंकि यदि मै अपनी वास्तविक हालात ब्याँ करुं तो मेरे मनोविज्ञान के ज्ञान पर संदेह हो जाता है कि अमाँ यार लोगो को क्या खाक रिहेबिलेट करोगे खुद ही जब संतुलित नही हो...ऐसे में दिन भर जबरदस्ती का शिव खेडा टाईप का मोटिवेशन भी बांटना पडता है और खुद को पाजिटिव बनाये रखने की एक कवायद करनी पडती है।
बहरहाल,जिन्दगी ऐसे ही एक सुर मे आलाप खींचे जा रही है अब पता नही इसे कोई नया राग पैदा होगा या यह अनुराग भी समाप्त हो जायेगा। उम्मीद करता हूँ अपने हाल-ए-दिल की अगली किस्त आप तक जल्दी पहूंचा सकूँ...आमीन।
डॉ.अजीत

Sunday, January 1, 2012

2012

साल का बीत जाना मेरे लिए ठीक वैसा है जैसे घडे से धीरे-धीरे पानी का रीत जाना क्योंकि हर नया साल अपने साथ नये सपने नई चुनौतियां लेकर आता है जिनमे से कुछ ही पूरे हो पाते है बाकि सभी ऐसे ही अधूरे पडे रहे जाते है। हर जाने वाला साल अपने होने की एक ऐसी जमानत होता है जिसमे हमारी खट्टी-मिट्ठी यादें दर्ज़ रहती हैं।

कल ही गांव से लौटा हूँ वैसे तो एकाध तकनीकि पर कम भरोसा करने वाले मित्रों ने 31 दिसम्बर को ही एसएमएस भेज कर अपनी शुभकामनाओं की औपचारिकता खत्म की क्योंकि कई बार 1 जनवरी को मोबाईल का नेटवर्क जाम हो जाता है लेकिन आज सुबह जैसे ही मैने अपने मोबाईल का स्वीच ऑन किया तुरंत ही कतार में खडे एसएमएस की झडी सी लग गई मैने सभी को एक-एक करके पढा और साक्षी भाव से पढता रहा इसे आप मेरी काहिली ही समझ सकते है कि मैने किसी को जवाब मे हेप्पी न्यू ईयर नही कहा हाँ मैने कल जरुर अपने दो गुरुजनों को मैसेज़ भेजे हर साल मै ऐसा ही करता हूँ इसके अलावा मित्रों/रिश्तेदारों को कोई मैसेज़ नही भेजा क्या करुँ मुझे दिल से ही ऐसी कोई प्ररेणा नही मिलती और मैने सायास कुछ करना नही चाहता हूँ।

अब थोडा कुछ 2011 के बारें मे बतिया लिया जाए बेचारा अब मेरे घर मे कुछ दिन तक बस कैलेंडर की शक्ल मे पडा रहेगा और फिर किसी दिन रद्दी वाले के साथ रवाना हो जायेगा। तारीख के हिसाब से तो मुझे कुछ ज्यादा याद नही है लेकिन एकाध बातों के साथ यह कह सकता हूँ कि यह साल भी अन्य सालों की तरह से औसत ही गुजरा पिछले कई सालों से या यूँ कहूँ सभी गुजरने वाले सालों में ऐसा कुछ खास नही घटा जिसका जश्न मनाया जाये और न ही ऐसा कुछ खोया जिसका अफसोस किया जा सके।

पिछले साल मे दो बडी घटना घटी मेरे जीवन मे एक तो 18 मार्च को मेरे यहाँ दूसरा बेटा हुआ और दूसर जून में मैने जर्नलिज़्म एंड मॉस कम्यूनिकेशन मे यूजीसी-नेट की परीक्षा पास की इसके अलावा मुझे इस बार अपनी तदर्थ नियुक्ति मे बढा हुआ वेतन भी मिला। इसके अलावा कुछ भी ऐसा खास नही हुआ जिसकी यहाँ चर्चा करुँ... इस 2012 में मेरे सामने कई चुनौतियां है कुछ प्रकट किस्म की और कुछ गुप्त प्रकट चुनौतियों से फिर भी एक बार निबटा जा सकता है लेकिन गुप्त किस्म की जो चुनौतियां होती है उनसे निबटना बेहद मुश्किल काम है।

खैर ! अभी तक तो कुछ रास्ता नज़र नही आ रहा है लेकिन दिल मे एक उम्मीद जरुर है कि शायद कुछ बीच का रास्ता निकल आयेगा और जीवन के घर्षण से कुछ राहत मिलेगी।

आखिर मे 2011 में जो सबसे बडी क्षति हुई है उसका जिक्र करता चलूँ थोडा दिल हल्का हो जायेगा 2002 में अपने मित्र बनें अभिषेक जी ने हमसे इस साल औपचारिक रुप से नाता तोड लिया मतलब आजकल वें अपने गर्दिश के दिन बेहद तन्हा होकर काटना चाहते है इसी सिलसिले मे वे पिछले एक साल से सम्पर्क शुन्य चल रहे है पिछले साल मे बमुशकिल दो बार ही फोन पर बात हो पायी और अब तो इसकी भी उम्मीद नही है क्योंकि कल ही मुझे एक मेरे मित्र ने बताया है अभिषेक जी अब जयपुर शिफ्ट हो गये है अपने मामा जी के पास।

अभिषेक जी के साथ का छूटना किसी सदमे से कम नही है पिछले एक साल मे कई बार ऐसा हुआ कि मन बेबस हो गया और टीस भर गयी बात करने का दिल्ली जाकर मिलने का बहुत मन हुआ लेकिन फिर अपने आप को रोक लिया क्योंकि जब अभिषेक ही हमारी शक्ल देखना नही चाहता तो फिर हम जबरदस्ती उसके लिए दिक्कते क्यों पैदा करें! बस निदा फाज़ली साहब की ये गज़ल सुनता रहा हूँ ना मुहब्बत ना दोस्ती के लिए वक्त रुकता नही किसी के लिए.... इसे सुनकर दिल को तसल्ली मिलती है।

रिश्तों के मामले में मै बडा निर्धन किस्म का रहा हूँ जो भी मिला दिल के करीब आया वही फिर अचानक दूर हो गया अब तो आदत सी हो गई है इस सब की...एक चीज़ और खुद के अन्दर महसूस कर रहा हूँ कि अब मन अविश्वासी सा हो गया है जल्दी से किसी बात पर यकीन नही कर पाता हूँ और लोग ये कहते है कि सीखने के लिए शंका को त्यागना पडेगा साथ ही विश्वास और समर्पण प्रदर्शित करना पडेगा लेकिन दिल है कि मानता नही...।

आज के लिए बस इतना ही आप सभी के लिए नववर्ष 2012 मंगलमय हो इसी शुभकामना के साथ विदा लेता हूँ.....।

डॉ.अजीत

Friday, December 9, 2011

अलविदा फेसबुक

आज तकरीबन एक हफ्ता होने जा रहा है मैने करीब-करीब छ महीने के अपने फेसबुकिया जनून को अलविदा कह दिया है कई सवाल सामने आ रहे है मेरे भी और मेरे परिचय के संसार में भी कि आखिर ऐसी कौन सी बात है जिसकी वजह से मैने फेसबुक पर अपना एकाउंट डिएक्टिवेट कर दिया है सच तो यह है कि एक कोई खास वजह मुझे भी नही पता है पहले मै बचता रहा कि एक खत्म हुए अध्याय पर लिखने बोलने का कोई फायदा नही है लेकिन आज मन मे आया कि इस लघुवृत्त एक बारे में जो कुछ मन मे अच्छा-बुरा या तटस्थ भाव है उसको यहाँ अभिव्यक्त कर ही दूँ।

फेसबुक पर यूँ तो मेरा अकाउंट पिछले दो सालों से था लेकिन मुझे पहले वहाँ का नेवीगेशन ज्यादा फैमिलियर नही लगता था मेरे एक छात्र ने उसकी काफ़ी तारीफ की तो मैने एकाध बार ट्राई भी किया लेकिन अधूरे मन से फिर एक दिन अपने ब्लॉगर मित्र शील गुर्जर जी से फेसबुक पर राफ्ता हो गया और ये मुलाकात ही वह घडी थी जब मै पूरे मन से फेसबुक से जुड गया उन्होने मुझे एक सजातीय ग्रुप गुर्जर प्रतिहार से भी जोड दिया।

अपनी आदत रही है कि जो भी काम करते है डूब कर करते है भले ही एक दिन करें या एक साल इससे कोई फर्क नही पडता है। धीरे-धीरे फेसबुक पर सम्बन्धों की हरी-भरी फसल लहरा उठी मुझे भी खुब मज़ा रहा था एक तरफ शेरो शायरी का अपना ग्रुप दिल-ए-नादाँ था तो दूसरी तरफ जातीय विमर्श का बडा मंच गुर्जर प्रतिहार इन सबके साथ वॉल पर भी तुकबंदी का दौर चलता रहता था दीगर बात यह है कि अब तक अपुन को कमेंटबाजी का पूरा चस्का लग चुका था, एकाध बार को छोडकर मै अपनी सभी पोस्ट पर विजयी भाव के साथ स्वीकार होने लगा था मनोविज्ञान की भाषा में जिस ईगो कहते है जो भी परम संतुष्ट अवस्था मे पहूंच गया था।

बीच-बीच मे मैने दो बार तथाकथित ब्रेक भी लिए लेकिन वो एक परिपक्व निर्णय की बजाए क्षणिक भावावेश की प्रतिक्रिया था जब भी मैने फेसबुक छोडने की घोषणा अपनी वॉल पर की लोगो के मनुहार के कमेंट आएं कुछ मित्रों ने फोन करके भी वजह जाननी चाही इन सब ड्रामेबाजी मे भी मुझे मज़ा आ रहा था और कमोबेश दो-तीन बाद फिर मै फेसबुक की वॉल पर लौट आया था।

स्वीकार और नकार दोनो का अपना अलग मज़ा है फेसबुक की खुबसूरती यही है कि यहाँ आपको त्वरित प्रतिक्रिया मिल जाती है जिससे संवाद में जीवंतता बनी रहती है। अभी पिछले चार-पांच दिन पहले अचानक मै फिर से चैतन्य हो गया हूँ फिर से एक इनर कॉल आयी कि बस अब बहुत हो गया यह चर्चाओं/वाह-वाह का दौर अब एक पूर्ण विराम लेना चाहिए ये मेरी बहुत पुरानी आदत रही है कि मै जल्दी ही बोरडम का शिकार हो जाता हूँ यहाँ तक कि मानवीय सम्बन्धों में भी मुझे बोरियत लगने लगती है वैसे ये बात बडी विरोधाभासी है कि मै कविता लिखता हूँ और खुद के सम्वेदनशील होने का दावा करता हूँ लेकिन एक खास सीमा के बाद मुझे हर चीज़ मे एक स्पेस एंड डिस्टेंस की जरुरत महसूस होती है और ये बात मेरे निजि जीवन पर भी लागू होती है मसलन साल भर साथ रहते-रहते मुझे पत्नि से भी डिस्टेंस की जरुरत पडती है वरना मै एक ही शक्ल देख कर बोरियत का शिकार हो जाता हूँ इसलिए अब मुझे लगता है फेसबुक पत्नि से ज्यादा जरुरी चीज़ तो हो नही सकती है सो अब इससे भी मुक्ति का समय आ गया है और मुझे ये भी लगता है कि यह चीज़ का एक चरम होता है अभिव्यक्ति के मामलें मे मैने फेसबुक का वह चरम भोग लिया है अब मुझे यहाँ कोई रस नही आ रहा था और ढोने के लिए ढोना मुझे कभी अच्छा नही लगा है चाहे वह रिश्ते हों या एप्लीकेशन।

फेसबुक छोडने के बाद अपने करीबी लोगो से लेकर परिचित और प्रशंसकों के दिल औ दिमाग मे कयासो का दौर जारी है सबके अपने अपने मत है मै उनके विस्तार मे नही जाना चाहता हूँ सबकी अपनी अपनी सोच और भावनाएं है लेकिन हाँ इतना जरुर कह सकता हूँ कि मैने फेसबुक किसी बाहरी वजह से नही छोडी इसकी वजह आंतरिक है और आंतरिक वजह के लिए स्पष्टीकरण देने का इसलिए कोई औचित्य नही बनता है क्योंकि पका हुआ दिमाग को यह एक बौद्धिक चोचला या शिगूफा नज़र आयेगा और जो आत्मीय जन है उसको स्पष्टीकरण देने की कोई जरुरत ही नही है वहाँ एक मौन समझ हर बात को खुद सम्प्रेषित कर देती है।

सो अब तो बस यही कहूंगा अलविदा फेसबुक और शुक्रिया फेसबुक अच्छे और कच्चे लोगो से मुलाकात कराने के लिए यदि कभी ख्वाहिश हुई तो फिर से तुम्हारे दर पर ये फकीर अलख जगाने जरुर आयेगा...।

बशीर बद्र साहब का एक शेर याद आ रहा है

मुसाफिर है हम भी मुसाफिर है तुम भी

किसी मोड पे फिर मुलाकात होगी...!

आमीन

डॉ.अजीत

Friday, November 25, 2011

बाईसकोप

जीवन मे अपनी प्रासंगिकता तलाशने के लिए कितने जतन करने पडते है इस बात का अन्दाज़ा आज तब लगा जब तमाम उपाधियों योग्यताओं के बाद भी एक अदद स्थाई नौकरी के लिए जद्दोजहद बढती ही जा रही है पिछले सप्ताह कश्मीर गया था श्रीनगर मे एक नई सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनी है उसके पत्रकारिता विभाग में असि.प्रोफेसर पद के साक्षात्कार था। ओबीसी श्रेणी में अपना नाम था लेकिन दो दर्जन लोग आये थे लगभग कुल मिलाकर सामान्य और आरक्षित वर्ग के लोगो सहित कश्मीर मूल के लोगो से मिलना सुखद अनुभव रहा लेकिन पहली बार अपने देश मे परदेस का बोध भी हुआ जिस भारतीयता के तमगे को हम अपने माथे से चस्पा किए हुए गर्व के साथ घुमते रहते है वहाँ के बाशिन्दों के लिए वह एक जहीन से गाली से बेहतरीन कुछ नही है।

एक और बडी बात पता चली कि हिन्दी भाषी होना अपनी हिन्दी पट्टी तक तो ठीक है लेकिन शेष देश मे यह किसी काम की नही है जिस विश्वविद्यालय मे मेरा साक्षात्कार होना था वहाँ पढाई का अंग्रेजी माध्यम है और साक्षात्कार का भी ऐसे मे मेरे जैसे हिन्दी भाषी के सामने बडा धर्म सकंट था भले ही मेरे पास यूजीसी का नेट क्वालीफाई सर्टिफिकेट है लेकिन यदि अंग्रेजी मे धाराप्रवाह बोलना नही आता है तो वह महज़ एक कागज़ का टुकडा भर है।

अब उम्र के पकने की प्रक्रिया के साथ एक जतन यह भी करना कि अंग्रेजी बोलना आना चाहिए अपने आप मे बडी अजीब सी समस्या है मित्र भी सलाह दे रहें है कि यदि उच्च शिक्षा जमे रहना है तो अंग्रेजी पर अधिकार होना ही चाहिए उनकी बात तार्किक रुप से ठीक है लेकिन मेरी मानसिक स्थिति अभी तक इस बात के लिए तैयार नही है कि मै किसी इंगलिश स्पीकिंग कोर्स को ज्वाईन करुँ।

आज शाम ऐसे ही बेतरतीब ढंग से घुमता रहा अपनी कुछ खासो औ आम दोस्तों से अपनी फिक्रे तमाम करता रहा आज बहुत दिनों बाद आवारा की डायरी लिख रहा हूँ कमबख्त फेसबुक ने सारा वक्त और ऊर्जा चूस लिया है चाहकर भी वहाँ से मुक्त नही हो पा रहा हूँ जबकि वहाँ ऐसा कुछ भी नही है जिससे दिल को राहत मिलती हो बस कमेंटबाजी का चस्का है और कुछ भी नही....। मेरे करीबी दोस्त सुशील जी भी काफी निराश है कि मै ब्लॉग पर नियमित रुप से लिख नही रहा हूँ वें इस ब्लॉग के नियमित पाठक थे उनका कहना है कि फेसबुक पर लिखना अखबार में लिखने जैसा है जबकि ब्लॉग लेखन किताब लिखने जैसा है मै उनकी बात अक्षरश: सहमत हूँ। अब मेरी कोशिस रहेगी कि बिना गैरहाजिरी के लिख सकूँ।

आज मन अजीब सा बेबस और अनमना है सो ज्यादा नही लिख रहा हूँ कुछ ऊर्जा की जरुरत है जिसकी कमी लम्बे समय से महसूस कर रहा हूँ अपने को रिक्लेक्ट करके जल्दी ही हाजिर होता हूँ...!

शब्बा खैर !

डॉ.अजीत

Tuesday, August 9, 2011

फेसबुक:उधडते-बुनतें रिश्तों की पाठशाला

अभी शायद एक महीने से ज्यादा हो गया है कि मै फेसबुक पर लगातार नज़र आ रहा हूँ एकाउंट तो दो साल पहले ही बना लिया था लेकिन पहले मुझे फेसबुक इतनी ज्यादा जंचती नही थी लेकिन अब ऐसा हो गया है दिन मे जब भी ऑनलाईन होता हूँ तभी नज़र फेसबुक पर अटक जाती है। बहुत से नये लोगो से मिलना हुआ है दिन भर मैसज़बाजी/कमेंटबाजी चलती रहती है। अपने एक सजातीय मित्र के आग्रह पर मैने अपनी बिरादरी के एक ग्रुप को भी ज्वाइन किया हुआ है उस पर दिन भर बडी सक्रिय किस्म की चर्चाएं चलती रहती है जिसमे चाहते न चाहते हुए भी मै भी हिस्सा ले लेता हूँ अभी दो दिन पहले मैने पातंजलि योगपीठ के आचार्य बालकृष्ण के बारें मे कुछ लिखा तो अपने ही समाज़ के जिम्मेदार लोग मेरे पीछे पड गये मुझे कांग्रेसी बता दिया गया पहली बार अहसास हुआ कि रामदेव के भक्त लोग काफी है। खैर! ये सब मतभिन्नता तो चलती ही रहती है कोई पक्ष मे होता है तो विपक्ष मे...। फेसबुक के माध्यम से कुछ अच्छे लोगो से भी परिचय हुआ है यह इस सोशल नेटवर्किंग का सबल पक्ष है कि इसमे समान विचारधारा के लोग आसानी से एक साथ जुड जाते हैं...।

अभी विश्वविद्यालय मे मेरी सैकिंड् इनिंग शुरु नही हुई है इसलिए अधिकांशत: घर पर ही पडा रहता हूँ अभी तबीयत भी ज्यादा ठीक नही है कुछ दिन पहले वायरल फीवर हुआ था तब से अभी तक शरीर का मामला अपने ट्रैक पर नही आ पाया है अब पत्नि और बच्चे भी इसके शिकार हो गए है...सो सारा घर बीमारु टाईप का हो गया है।

मेरा छोटा भाई जनक पिछले एक साल से अदद नौकरी के लिए हाथ-पैर मार रहा है पहले सरकारी के चक्कर मे अपनी टेलीकॉम की नौकरी को अलविदा कह दिया और जब सरकारी मे बात बनती नही दिखी तो अब फिर से प्राईवेट सेक्टर मे प्रयासरत है लेकिन पता नही कौन सा प्रारब्ध उसका सामने आ रहा है कि बात बनतें-बनतें बिगड जाती है मै भी अपने यथा सामर्थ्य प्रयास उसके लिए कर चुका हूँ यथा सामर्थ्य क्या अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करके अपने कुछ ऐसे रसूखदार मित्रों को बोल चुका हूँ अनुरोध की भाषा मे विनती कर चूका हूँ कि वें किसी भी तरह से उसे एक अदद नौकरी दिलानें मे मदद करें...सभी ने अपने-अपने स्तर से प्रयास भी किए है लेकिन सफलता नही मिली है इस बात से आजकल मन बहुत खिन्न रहता है। आप अपनी असफलता एकबारगी बर्दाश्त कर सकते है लेकिन जब कोई आपसे छोटा आपके सामने असहायता के भाव के साथ खडा नज़र आता है तब अपने ऐसे होने पर बडी कोफ्त होती है मुझे ऐसे में अपना एक पुराना मित्र याद आता है जो अक्सर कहा करता था कि मै अपने मित्रों के माथें पर शिकन नही देखना चाहता हूँ वो कहता कि हे! ईश्वर मुझे व्यक्तिगत रुप से कुछ दे न दें इसका मुझे कोई मलाल नही लेकिन इतनी ताकत जरुर दें कि यदि कोई मेरा मित्र मुझे मुसीबत मे याद करें तो मै उसकी समस्या का निवारण कर सकूँ... वास्तव में ये ज़ज्बा ही अपने आप मे काबिल-ए-तारीफ है दीगर बात यह भी है मेरा वही मित्र आजकल गर्दिश का शिकार होकर गुमनामी ज़िन्दगी जी रहा है वो किसी की क्या मदद करता कोई मित्र उसकी ही कोई मदद नही कर पा रहा है...।

इस बार मेरे विश्वविद्यालय मे यूजीसी के नये नियमों का हवाला दे कर एडहॉक नियुक्ति के लिए साक्षात्कार आयोजित किए जाने के समाचार आ रहें है समाचार क्या आ रहें है इस बार ऐसा हो कर ही रहेगा पिछले सालों मे तो विभागाध्यक्ष की संस्तुति से ही नियुक्ति पत्र मिल जाया करतें है लेकिन इस बार यह व्यवस्था बदली जा रही है वैसे तो यह भी कहा जा रहा है कि इस बार असि.प्रोफेसर को पूरा वेतनमान दिया जायेगा सो इस लिहाज़ से तो यह खबर ठीक ही है लेकिन मेरे जैसे मास्टर के लिए थोडी मुश्किल की बात यह है कि मेरा विभागाध्यक्ष मुझे कतई पसंद नही करता है क्योंकि मै दूसरे प्रोफेसर का चेला रहा हूँ इसलिए इस बार साक्षात्कार के नाम पर उसके पास एक मौका भी है मुझे बाहर का रास्ता दिखा सकें....लेकिन सबके अपने-अपने समीकरण होतें है सो मै भी यथायोग्य समीकरण फिट करने मे लगा हुआ हूँ चाहे वह सिफारिश हो या कुछ और...क्या करें पापी पेट का सवाल है अब साथ मे पत्नि और दो बच्चे भी है और फिर गांव की एक पुरानी कहावत अक्सर याद आती है कि भाई मरोड के लिए करोड चाहिए... अब करोड तो पास है नही इसलिए किसी न किसी स्तर पर समझोता तो करना ही पडेगा...।

अब देखतें है कि वक्त कब तक अपने साथ ये पैतरेबाज़ी का खेल खेलता है मुझे लगता है कि अब वो वक्त करीब ही है जब इस पार या उस पार वैसे अब मै भी थक गया हूँ जल्दी ही तदर्थ जीवन का स्थाई समाधान चाहता हूँ क्योंकि जब साथ चलने वाले लोग आगे निकल जाते है और आपको नसीहत के अन्दाज़ मे सलाह देते है तो उन शब्दों का बोझ कितना भारी होता है उसको ब्याँ नही किया जा सकता है...आज के लिए बस इतना ही बाकी बातें बाद मे होंगी...।

डॉ.अजीत

Wednesday, August 3, 2011

इन दिनों...

15 मई के सेवा विश्राम के बाद से ये समय आ गया है करीब-करीब तीन महीने होने को जा रहें है...कुल मिलाकर काफी मिला जुला किस्म का वक्त गुजरा पिछले साल के जितनी यात्राएं तो नही कर सका लेकिन फिर भी केदारनाथ के दर्शन हो गए साथ एकाध और जगह भटका गया है।

साफगौई और ईमानदारी का यही तकाज़ा है कि ये मान लिया जाए कि इन दिनों दिन बडे ही बेतरतीब और नीरस किस्म से कट रहें है गुलज़ार साहब की उस गज़ल की तरह जिन्दगी अपना फलसफा रोज पढा जाती है...दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई, अहसान जैसे उतारता है कोई... कमोबेश यही मन:स्थिति बनी हुई है। थिंक पाजिटिव जैसे जुमलो और मोटिवेशनल कायदों से परे मै मनोविज्ञान का विद्यार्थी होने के बावजूद जैसा महसूस कर रहा हूँ वैसा ही ब्याँ कर रहा हूँ वरना दिल बहलाने के ख्याल बहुत से अच्छे मेरे पास भी हैं।

कल प्रेमनगर आश्रम पर डॉ.सुशील उपाध्याय जी मुलाकात हुई अपनी कुछ सामयिक चिंताएं उनके साथ सांझा की कुल मिलाकर अपनी कही उनकी सुनी। उपाध्याय जी अभी चीन की यात्रा से लौटे से है सो उनसे चीन के मनो-सामाजिक जगत के बारे मे जानने का अवसर मिला.. उपाध्याय जी ने समग्रता के साथ अपनी चीन यात्रा का संक्षेप मे वृतांत कहा साथ मुझे हौसला भी दिया कि बदले हुए हालात मे कुछ बीच का रास्ता निकाल लिया जायेगा वो आत्मीयता से सुनतें है तथा सुख-दुख मे तुरंत ही शामिल हो जाते है मै इसलिए भी उनका कद्रदान हूँ वरना आजकल लोग कुछ ज्यादा ही आत्ममुग्ध होते जा रहे हैं बस यदि आप सहमत है तो ठीक है वरना आप आउटडेटड...। इन सब बातों के बीच फिलवक्त मन की बैचेनी दूसरी दिशा मे जा रही है किसी भी तरह से एक दशक से बनी हुई यथास्थिति को तोडने की जुगत दिल मे पल भी रही है और साथ जल भी रही है लेकिन मंजिल का पता रहबर से कैसे पता चले जब रहजन ही तनकीद मे माहिर मे हो..! ऐसी आधी-अधूरी मन:स्थिति मे ही दिन गुजर जाता है पिछले एक हफ्ते से तबीयत भी नासाज़ रही है सो उसका भी असर है दिल बोझिल और मन थका-थका सा रहता है।

बहरहाल, बदली हुई परिस्थितियों मे सामंजस्य स्थापित करने की एक कवायद चल रही है वक्त बदला है...लोग बदले है और हालात भी सो बसी इन्ही के बीच से मध्य मार्ग तलाश रहा हूँ गुजर जाने के लिए....। आवारा की डायरी के एकाध नियमित पाठकों के लिए इस पर लिखी तज़रबों की तहरीरें निराशा की गवाह बनती जा रही है जबकि हकीकत मे ऐसा नही है मै कतई निराश नही हूँ और न ही हताश बस थोडा मिज़ाज ही ऐसा कडवा हो गया है कि चाह कर भी दिलकश बातें पेश नही कर पाता हूँ...वरना किस्से और भी बहुत है।

अर्ज़ किया है:

हमारे दिल में भी झांखो अगर मिले फुरसत हम अपने चेहरो से इतने नज़र नही आतें... (प्रो.वसीम बरेलवी)

डॉ.अजीत

Sunday, July 10, 2011

आमद

15 मई के सेवा विश्राम के बाद से अब फिर गुरुकुल मे अपने को स्थापित होने की जद्दोजहद शुरु होने की तैयारी चल रही है संभवत: अगस्त की प्रथम सप्ताह मे ही मेरे जैसे तदर्थ असि.प्रोफेसरगणो के भविष्य की नियुक्ति के लिए प्रक्रिया शुरु होगी हर साल का वही पुराना झंझट...जिसमें अपने विभागाध्यक्ष की अनिच्छा के बावजूद भी मै किसी तरह से सेंध मारकर विभाग मे घुसने की जुगत मे लगा रहता हूँ पिछले साल तो एंट्री मिल गई थी इस बार किस मोर्चे पर लडाई लडी जाएगी इसके बार मे अभी कुछ कहा नही जा सकता है।

फिलवक्त घर मे छोटे बच्चे को संभालने मे भी मेरा छदम वक्त कट रहा है हालांकि पत्नि को इस बात की शिकायत है कि मुझे जितना गृहस्थी मे सहयोग करना चाहिए उतना मै नही कर पा रहा हूँ, उसे लगता है कि मै घरेलू कामों मे इसलिए हाथ नही बंटाता हूँ क्योंकि इसमे मेरा पुरुषवादी अह्म आडे आता है जबकि मै अकेला होता हूँ तो सारा काम खुद ही करता हूँ अब उसको कौन बताए कि जब मै अकेला होता हूँ तो प्रमादवश बमुश्किल एक वक्त ही खाना खाता हूँ...।

आजकल छोटा भाई भी साथ ही रह रहा है वो भी नौकरी की तलाश मे दर-बदर भटक रहा है मेरे एक रसूखदार मित्र की बिनाह पर मैने उसको यहाँ बुला लिया था ताकि कुछ सिफारिश से ही काम बन जाए लेकिन जब वक्त ठीक न हो तो अधिकांश प्रयास अकारथ चले जाते है ऐसा ही उसके साथ हो रहा है प्रदेश के एक प्रभावशाली काबीना मंत्री की सिफारिश के बाद भी काम नही बन सका है....बस यही कहूंगा कि सबका अपना भाग्य होता है उसके साथ ऐसा अक्सर होता रहा है कि ज़ाम लबो तक आतें-आतें छलक जाते है सो वह अब इसका अभ्यस्त हो चुका है। मेरे लिए यह एक मुश्किल वक्त मे प्रार्थना करने के जैसा है क्योंकि मै अपनी कनिष्ठजनों को परेशान देखकर कुछ ज्यादा ही परेशान हो जाते हूँ कुछ ऐसी ही फितरत है अपनी...।

मॉस कम्यूनिकेशन मे नेट पास होने के बाद से एक दूसरा भी विकल्प उभर रहा है सो अगर इस तरफ अवसर मिला तो कारंवा अब इसी दिशा मे कूच करेगा...वैसे मै भी अब उकता गया हूँ यहाँ मुझे वसीम बरेलवी साहब का एक शेर याद आ रहा है कि तुझे पाने की कोशिस इतना खो चूका हूँ मै कि अब तु मिल जाए तो मिल जाने का गम होगा...

येन-केन-प्रकारेण यह यथास्थिति खत्म होनी चाहिए...बस यही एक अभिलाषा है...।

आज बहुत दिनों बाद लिखा है इसलिए थोडी सी रौ नही बन पा रही है जल्दी ही अपनी औकात पर आता हूँ...।

डॉ.अजीत

Tuesday, June 14, 2011

मुखबिर...

परेशान दोस्तों के लिए एक कविता



चला जाऊँगा एक दिन
जैसे हर दिन चला जाता है कभी न लौटने के लिए
चला जाऊँगा जैसे चला जाता है सभा के बीच से उठाकर कोई
जैसे उम्र के साथ जिंदगी से चले जाते हैं सपने तमाम
जैसे किसी के होठों पर एक प्यास रख उम्र चली जाती है

इतने परेशान न हो मेरे दोस्तों
कभी सोचा था बस तुम ही होगे साथ और चलते रहेंगे क़दम खुद ब खुद
बहुत चाहा था तुम्हारे कदमो से चलना
किसी पीछे छूट गए सा चला जाऊँगा एक दिन दृश्य से
बस कुछ दिन और मेरे ये कड़वे बोल
बस कुछ दिन और मेरी ये छटपटाहट
बस कुछ दिन और मेरे ये बेहूदा सवालात
फिर सब कुछ हो जाएगा सामान्य
खत्म हो जाऊँगा किसी मुश्किल किताब सा
कितने दिन जलेगी दोनों सिरों से जलती यह अशक्त मोमबत्ती
भभक कर बुझ जाऊँगा एक दिन सौंपकर तुम्हें तुम्हारे हिस्से का अन्धेरा

उम्र का क्या है खत्म ही हो जाती है एक दिन
सिर्फ साँसों के खत्म होने से ही तो नहीं होता खत्म कोई इंसान
एक दिन खत्म हो जाऊँगा जैसे खत्म हो जाती है बहुत दिन बाद मिले दोस्तों की बातें
एक दिन रीत जाउंगा जैसे रीत जाते है गर्मियों में तालाब
एक मुसलसल असुविधा है मेरा होना
तिरस्कारों के बोझ से दब खत्म हो जायेगी यह भी एक दिन
दृश्य में होता हुआ हो जाऊँगा एक दिन अदृश्य
अँधेरे के साथ जिस तरह खत्म होती जाती हैं परछाईयाँ

एक दिन चला जाउंगा मैं भी
जैसे हर दिन चला जाता है कभी न लौटने के लिए....


अशोक कुमार पाण्डेय

ब्लॉग: http://asuvidha.blogspot.com/

(श्री अशोक कुमार पाण्डेय जी का हार्दिक धन्यवाद उन्होनें न केवल मेरी पीड़ा को शब्दों मे पिरोया बल्कि मुझे अपनी इस अमूल्य कविता को इस तरह से प्रयोग करने की अनुमति भी दी जिसके लिए मैं कृतज्ञता प्रकट करता हूँ....डॉ.अजीत)

Monday, June 13, 2011

ज़लसा

ज़िन्दगी के लगभग एक दशकीय उतार-चढाव भरे सफर में जिसमें मीठी यादों को बहाने से याद करना पडा हो और रिश्तों के बुनावट मे अपने वजूद को बचाए रखने की जद्दोजहद के साथ मिज़ाज अक्सर कडवा होता गया हो...ऐसे तमाम संघर्षो,चुनौतियों,रिक्तता और तिरस्कार को साक्षी भाव से स्वीकार मानकर आज एक छोटी सी उपलब्धि आपके साथ बांट रहा हूँ।

जनाब मसला यह है कि एक पत्रकार मित्र डॉ.सुशील उपाध्याय जी की प्ररेणा,मेरी अल्पज्ञता में भी संभावना के दर्शन और बिना शर्त के प्रेम ने मुझे एक कोशिस मे शामिल होने का हौसला दिया...आध्यात्मिक शिक्षक और यायावर ध्यानी मुकेश जी नें संबल देकर मुझे उस मोड तक जाने का ज़ज्बा दिया और इन सबके बीच पत्नि के उलाहने,मेरे ज्ञान पर संदेह और शुभचिंताओं के सामूहिक बल पर मैने यह दुस्साहस किया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) दिसम्बर,2010 में मै शामिल हुआ और किसी खानदानी राज़ की तरह इस बात को सभी से छुपाए रखने की चालाकी भी की जिसकी एकमात्र वजह खुद पर कम यकीन ही था।

...और आज शाम इसका परिणाम आ गया है सभी के सामूहिक बल से और अपनी कमअक्ली से मैने यह नेट की परीक्षा जनसंचार(मॉस कम्यूनिकेशन) में पास कर ली है वो भी अपने पहले प्रयास मे ही।

शाम को कुछ खास मित्रों को इसकी सूचना फोन से दे दी गई है...व्यक्तिगत तौर पर यह बात मेरे लिए एक बडी उमस भरी दुपहरी मे किसी बुढे बरगद ने नीचे सुस्तानें जैसी बात है शायद अब यात्रा इसी दिशा मे शुरु हो....।

किसी किताबी ज्ञान के बजाए पत्रकार मित्रों की सोहबत...ब्लॉग,न्यू मीडिया से जुडाव और सुबह उठतें ही दो अखबारों की खबरों की कटेंट से लेकर ले आउट तक की तुलना करने के चस्के नें मेरी इस परीक्षा को पास करनें मे बडी मदद की है तो भईया मेरा एक्ज़ाम सीक्रेट भी बस यही है।

मुझमे विश्वास प्रकट करने वाले मित्रों के प्रति मे कृतज्ञता प्रकट करता हूँ और उन सभी शुभचिंतको का भी आभार जिन्होनें मुझे कम गंभीरता से लिया तभी शायद में इस तरफ थोडा सा गंभीर हो पाया।
डॉ.अजीत

Monday, May 16, 2011

वीआरएस

वीआरएस शब्द केन्द्र की समवर्ती सूची का विषय हो सकता है लेकिन अपने लिए एक सस्ता प्रहसन है जिसमें एक आत्म व्यंग्य छिपा हुआ है । तो जनाब मसला यह है कि जिस विश्वविद्यालय मे बतौर असि.प्रोफेसर मै पिछले चार सालों से पढा रहा हूँ वहाँ पर 15 मई को शैक्षणिक सत्र का आधिकारिक अवसान हो जाता है सो काम के बदले अनाज़ योजना की भांति इस तारीख के बाद विश्वविद्यालय के पास न हमारे लिए कोई काम बचता है और इसके बदले हमे दाम देने की जिजिविषा सो विश्वविद्यालय की छदम गौरवमयी साढे नौ महीने की नौकरी के बाद मेरे जैसे लगभग 100 तदर्थ लोगो को विश्राम दे दिया जाता है। यह विश्राम अवैतनिक होता है फिर से नये शैक्षणिक सत्र में विभागाध्यक्ष की कृपा/अनिच्छा/षडयंत्रों और एक लम्बी सस्ती किस्म की लडाई लडने के बाद फिर से अगस्त मे हमें सेवा मे ले लिया जाता है। इस दो ढाई महीने मै तो खानाबदोशी करता हूँ क्योंकि खुद को समय मिल जाता है एक नई लडाई और जद्दोजहद से लडने के लिए ऊर्जा समेट लेता हूँ। हर बार जिस दिन यह सत्रावसान का यज्ञ होता है मै संकल्प लेता हूँ कि ईश्वर करें मेरा यह आखिरी सत्र हो और मित्रों के बीच मे बैठ कर बडे-बडे दावें करता हूँ कुछ हठकर करने के....लेकिन अंतोत्गत्वा फिर से यही लौट आता हूँ और पुनश्च: नौकरी पाने की कुकर परिक्रमा में सबसे आगे कृपांकाक्षी बनकर घुमता हूँ।

सो कल एक दिन पहले ही अपना वीआरएस विश्वविद्यालय ने थमा दिया था क्योंकि आज रविवार था। दिन भर कुछ जबरदस्ती की व्यस्तता के बोध को बनाए हुए कुछ आम काम निबटाए फिर बेतरतीब ढंग से पसर गया घर आकर आजकल बालक गांव गये हुए है सो निपट अकेला हूँ वैसे तो अब अकेलेपन मे भी मज़ा आने लगा वरना एक वक्त हुआ करता था कि मूतने भी अकेले नही जाता था नहाने-हगने-मूतने का काम सामूहिक ही हुआ करता था और ऐसा कभी सोचा ही नही था कि ज़िन्दगी इस मोड पर ले आयेगी कि गिनती के लिए एक भी दोस्त का नाम जबान पर नही मिलेगा।

जिन्दगी अप्रत्याशित होने की जिद पर उतर आयी है मै भी देख रहा हूँ कि कैसे-कैसे रंग देखेने को मिलतें हैं। आज का दिन भी यूं ही बैठे बिठाए कट गया 18 को लखनऊ जाना है एक कानूनी लडाई के सन्दर्भ में फिर उसके बाद कारंवा किस दिशा मे जायेगा अभी कुछ नही पता है हाँ अभी केवल एक निर्धारित कार्यक्रम है कि संभवत: 25 मई को मै और डॉ.अनिल सैनी जी लुधियाना जा सकतें क्योंकि हमारा गोरखपुर जाने का पूर्ववर्ती कार्यक्रम निरस्त हो गया है। बातें तो सुशील जी से भी कुमायूं क्षेत्र मे जाने की हो रही है अब देखा जायेगा कि कब कार्यक्रम मूर्त रुप लेता है। मैने अभी तक अपने अनुभवों से यही सिखा है कि कुछ भी नियोजित मत करों जो भी होना होता है वह अपनी गति से घटित होता है उसमे अपना कुछ बस नही चलता है।

आज शाम एक पुराने हॉस्टल के परिचित का फोन आया था उसने एक मित्र की क्षेम-कुशल मुझ से जाननी चाही जिसका मुझे खुद भी नही पता है मै अब किस-किस की खबर रखुँ जबकि मैं खुद ही बेखबर जी रहा हूँ... फिर उसने एक बात ऐसी बताई जो सुनकर मै आधे घंटे तक बैचेन रहा...आखिरी ये दिन भी देखना था...!

खैर! अब मै ज्यादा विस्तार मे जाना नही चाहता हूँ क्योंकि अपने रिश्तों का ताना-बाना इस कदर उलझा हुआ है कि क्या सही है क्या गलत है इसका अभी फैसला करना मुमकिन ही नही है बस वैट एंड वाच की हालात ही बेहतर है।

आजकल अकेला रह रहा हूँ सो बडा अस्त-व्यस्त जी रहा हूँ न वक्त से ब्रेकफास्ट होता है और न ही डीनर बस सब कुछ अवसर और संयोग के सहारे पर निर्भर करता है। कल शाम को मै और मेरे मित्र डॉ.सुशील उपाध्याय जी का एक आत्मीय संवाद सत्र आयोजित होने जा रहा है फिर इसके बाद वे कल रात मेरी ही कुटिया पर प्रवास करेंगे सो कल ये वीरान चमन किस्सागोई से आबाद रहेगा...ये सोच कर आज रात नींद अच्छी आने के आसार हैं बशर्तें कोई पुरानी याद न छेड जाएं....।

शुभ रात्री( रात्री 11.02, 15/05/2011)

डॉ.अजीत