Saturday, September 8, 2012
तीस बरस
Wednesday, September 5, 2012
वक्त की मांग
Wednesday, August 29, 2012
बुलेटिन
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो ।
Saturday, August 18, 2012
एक था.....
Saturday, August 4, 2012
आमद
Friday, April 27, 2012
लम्बा विराम
Sunday, January 1, 2012
2012
साल का बीत जाना मेरे लिए ठीक वैसा है जैसे घडे से धीरे-धीरे पानी का रीत जाना क्योंकि हर नया साल अपने साथ नये सपने नई चुनौतियां लेकर आता है जिनमे से कुछ ही पूरे हो पाते है बाकि सभी ऐसे ही अधूरे पडे रहे जाते है। हर जाने वाला साल अपने होने की एक ऐसी जमानत होता है जिसमे हमारी खट्टी-मिट्ठी यादें दर्ज़ रहती हैं।
कल ही गांव से लौटा हूँ वैसे तो एकाध तकनीकि पर कम भरोसा करने वाले मित्रों ने 31 दिसम्बर को ही एसएमएस भेज कर अपनी शुभकामनाओं की औपचारिकता खत्म की क्योंकि कई बार 1 जनवरी को मोबाईल का नेटवर्क जाम हो जाता है लेकिन आज सुबह जैसे ही मैने अपने मोबाईल का स्वीच ऑन किया तुरंत ही कतार में खडे एसएमएस की झडी सी लग गई मैने सभी को एक-एक करके पढा और साक्षी भाव से पढता रहा इसे आप मेरी काहिली ही समझ सकते है कि मैने किसी को जवाब मे हेप्पी न्यू ईयर नही कहा हाँ मैने कल जरुर अपने दो गुरुजनों को मैसेज़ भेजे हर साल मै ऐसा ही करता हूँ इसके अलावा मित्रों/रिश्तेदारों को कोई मैसेज़ नही भेजा क्या करुँ मुझे दिल से ही ऐसी कोई प्ररेणा नही मिलती और मैने सायास कुछ करना नही चाहता हूँ।
अब थोडा कुछ 2011 के बारें मे बतिया लिया जाए बेचारा अब मेरे घर मे कुछ दिन तक बस कैलेंडर की शक्ल मे पडा रहेगा और फिर किसी दिन रद्दी वाले के साथ रवाना हो जायेगा। तारीख के हिसाब से तो मुझे कुछ ज्यादा याद नही है लेकिन एकाध बातों के साथ यह कह सकता हूँ कि यह साल भी अन्य सालों की तरह से औसत ही गुजरा पिछले कई सालों से या यूँ कहूँ सभी गुजरने वाले सालों में ऐसा कुछ खास नही घटा जिसका जश्न मनाया जाये और न ही ऐसा कुछ खोया जिसका अफसोस किया जा सके।
पिछले साल मे दो बडी घटना घटी मेरे जीवन मे एक तो 18 मार्च को मेरे यहाँ दूसरा बेटा हुआ और दूसर जून में मैने जर्नलिज़्म एंड मॉस कम्यूनिकेशन मे यूजीसी-नेट की परीक्षा पास की इसके अलावा मुझे इस बार अपनी तदर्थ नियुक्ति मे बढा हुआ वेतन भी मिला। इसके अलावा कुछ भी ऐसा खास नही हुआ जिसकी यहाँ चर्चा करुँ... इस 2012 में मेरे सामने कई चुनौतियां है कुछ प्रकट किस्म की और कुछ गुप्त प्रकट चुनौतियों से फिर भी एक बार निबटा जा सकता है लेकिन गुप्त किस्म की जो चुनौतियां होती है उनसे निबटना बेहद मुश्किल काम है।
खैर ! अभी तक तो कुछ रास्ता नज़र नही आ रहा है लेकिन दिल मे एक उम्मीद जरुर है कि शायद कुछ बीच का रास्ता निकल आयेगा और जीवन के घर्षण से कुछ राहत मिलेगी।
आखिर मे 2011 में जो सबसे बडी क्षति हुई है उसका जिक्र करता चलूँ थोडा दिल हल्का हो जायेगा 2002 में अपने मित्र बनें अभिषेक जी ने हमसे इस साल औपचारिक रुप से नाता तोड लिया मतलब आजकल वें अपने गर्दिश के दिन बेहद तन्हा होकर काटना चाहते है इसी सिलसिले मे वे पिछले एक साल से सम्पर्क शुन्य चल रहे है पिछले साल मे बमुशकिल दो बार ही फोन पर बात हो पायी और अब तो इसकी भी उम्मीद नही है क्योंकि कल ही मुझे एक मेरे मित्र ने बताया है अभिषेक जी अब जयपुर शिफ्ट हो गये है अपने मामा जी के पास।
अभिषेक जी के साथ का छूटना किसी सदमे से कम नही है पिछले एक साल मे कई बार ऐसा हुआ कि मन बेबस हो गया और टीस भर गयी बात करने का दिल्ली जाकर मिलने का बहुत मन हुआ लेकिन फिर अपने आप को रोक लिया क्योंकि जब अभिषेक ही हमारी शक्ल देखना नही चाहता तो फिर हम जबरदस्ती उसके लिए दिक्कते क्यों पैदा करें! बस निदा फाज़ली साहब की ये गज़ल सुनता रहा हूँ “ ना मुहब्बत ना दोस्ती के लिए वक्त रुकता नही किसी के लिए....” इसे सुनकर दिल को तसल्ली मिलती है।
रिश्तों के मामले में मै बडा निर्धन किस्म का रहा हूँ जो भी मिला दिल के करीब आया वही फिर अचानक दूर हो गया अब तो आदत सी हो गई है इस सब की...एक चीज़ और खुद के अन्दर महसूस कर रहा हूँ कि अब मन अविश्वासी सा हो गया है जल्दी से किसी बात पर यकीन नही कर पाता हूँ और लोग ये कहते है कि सीखने के लिए शंका को त्यागना पडेगा साथ ही विश्वास और समर्पण प्रदर्शित करना पडेगा लेकिन दिल है कि मानता नही...।
आज के लिए बस इतना ही आप सभी के लिए नववर्ष 2012 मंगलमय हो इसी शुभकामना के साथ विदा लेता हूँ.....।
डॉ.अजीतFriday, December 9, 2011
अलविदा फेसबुक
आज तकरीबन एक हफ्ता होने जा रहा है मैने करीब-करीब छ महीने के अपने फेसबुकिया जनून को अलविदा कह दिया है कई सवाल सामने आ रहे है मेरे भी और मेरे परिचय के संसार में भी कि आखिर ऐसी कौन सी बात है जिसकी वजह से मैने फेसबुक पर अपना एकाउंट डिएक्टिवेट कर दिया है सच तो यह है कि एक कोई खास वजह मुझे भी नही पता है पहले मै बचता रहा कि एक खत्म हुए अध्याय पर लिखने बोलने का कोई फायदा नही है लेकिन आज मन मे आया कि इस लघुवृत्त एक बारे में जो कुछ मन मे अच्छा-बुरा या तटस्थ भाव है उसको यहाँ अभिव्यक्त कर ही दूँ।
फेसबुक पर यूँ तो मेरा अकाउंट पिछले दो सालों से था लेकिन मुझे पहले वहाँ का नेवीगेशन ज्यादा फैमिलियर नही लगता था मेरे एक छात्र ने उसकी काफ़ी तारीफ की तो मैने एकाध बार ट्राई भी किया लेकिन अधूरे मन से फिर एक दिन अपने ब्लॉगर मित्र शील गुर्जर जी से फेसबुक पर राफ्ता हो गया और ये मुलाकात ही वह घडी थी जब मै पूरे मन से फेसबुक से जुड गया उन्होने मुझे एक सजातीय ग्रुप गुर्जर प्रतिहार से भी जोड दिया।
अपनी आदत रही है कि जो भी काम करते है डूब कर करते है भले ही एक दिन करें या एक साल इससे कोई फर्क नही पडता है। धीरे-धीरे फेसबुक पर सम्बन्धों की हरी-भरी फसल लहरा उठी मुझे भी खुब मज़ा रहा था एक तरफ शेरो शायरी का अपना ग्रुप दिल-ए-नादाँ था तो दूसरी तरफ जातीय विमर्श का बडा मंच गुर्जर प्रतिहार इन सबके साथ वॉल पर भी तुकबंदी का दौर चलता रहता था दीगर बात यह है कि अब तक अपुन को कमेंटबाजी का पूरा चस्का लग चुका था, एकाध बार को छोडकर मै अपनी सभी पोस्ट पर विजयी भाव के साथ स्वीकार होने लगा था मनोविज्ञान की भाषा में जिस ईगो कहते है जो भी परम संतुष्ट अवस्था मे पहूंच गया था।
बीच-बीच मे मैने दो बार तथाकथित ब्रेक भी लिए लेकिन वो एक परिपक्व निर्णय की बजाए क्षणिक भावावेश की प्रतिक्रिया था जब भी मैने फेसबुक छोडने की घोषणा अपनी वॉल पर की लोगो के मनुहार के कमेंट आएं कुछ मित्रों ने फोन करके भी वजह जाननी चाही इन सब ड्रामेबाजी मे भी मुझे मज़ा आ रहा था और कमोबेश दो-तीन बाद फिर मै फेसबुक की वॉल पर लौट आया था।
स्वीकार और नकार दोनो का अपना अलग मज़ा है फेसबुक की खुबसूरती यही है कि यहाँ आपको त्वरित प्रतिक्रिया मिल जाती है जिससे संवाद में जीवंतता बनी रहती है। अभी पिछले चार-पांच दिन पहले अचानक मै फिर से चैतन्य हो गया हूँ फिर से एक इनर कॉल आयी कि बस अब बहुत हो गया यह चर्चाओं/वाह-वाह का दौर अब एक पूर्ण विराम लेना चाहिए ये मेरी बहुत पुरानी आदत रही है कि मै जल्दी ही बोरडम का शिकार हो जाता हूँ यहाँ तक कि मानवीय सम्बन्धों में भी मुझे बोरियत लगने लगती है वैसे ये बात बडी विरोधाभासी है कि मै कविता लिखता हूँ और खुद के सम्वेदनशील होने का दावा करता हूँ लेकिन एक खास सीमा के बाद मुझे हर चीज़ मे एक स्पेस एंड डिस्टेंस की जरुरत महसूस होती है और ये बात मेरे निजि जीवन पर भी लागू होती है मसलन साल भर साथ रहते-रहते मुझे पत्नि से भी डिस्टेंस की जरुरत पडती है वरना मै एक ही शक्ल देख कर बोरियत का शिकार हो जाता हूँ इसलिए अब मुझे लगता है फेसबुक पत्नि से ज्यादा जरुरी चीज़ तो हो नही सकती है सो अब इससे भी मुक्ति का समय आ गया है और मुझे ये भी लगता है कि यह चीज़ का एक चरम होता है अभिव्यक्ति के मामलें मे मैने फेसबुक का वह चरम भोग लिया है अब मुझे यहाँ कोई रस नही आ रहा था और ढोने के लिए ढोना मुझे कभी अच्छा नही लगा है चाहे वह रिश्ते हों या एप्लीकेशन।
फेसबुक छोडने के बाद अपने करीबी लोगो से लेकर परिचित और प्रशंसकों के दिल औ दिमाग मे कयासो का दौर जारी है सबके अपने अपने मत है मै उनके विस्तार मे नही जाना चाहता हूँ सबकी अपनी अपनी सोच और भावनाएं है लेकिन हाँ इतना जरुर कह सकता हूँ कि मैने फेसबुक किसी बाहरी वजह से नही छोडी इसकी वजह आंतरिक है और आंतरिक वजह के लिए स्पष्टीकरण देने का इसलिए कोई औचित्य नही बनता है क्योंकि पका हुआ दिमाग को यह एक बौद्धिक चोचला या शिगूफा नज़र आयेगा और जो आत्मीय जन है उसको स्पष्टीकरण देने की कोई जरुरत ही नही है वहाँ एक मौन समझ हर बात को खुद सम्प्रेषित कर देती है।
सो अब तो बस यही कहूंगा अलविदा फेसबुक और शुक्रिया फेसबुक अच्छे और कच्चे लोगो से मुलाकात कराने के लिए यदि कभी ख्वाहिश हुई तो फिर से तुम्हारे दर पर ये फकीर अलख जगाने जरुर आयेगा...।
बशीर बद्र साहब का एक शे’र याद आ रहा है
मुसाफिर है हम भी मुसाफिर है तुम भी
किसी मोड पे फिर मुलाकात होगी...!
आमीन
Friday, November 25, 2011
बाईसकोप
जीवन मे अपनी प्रासंगिकता तलाशने के लिए कितने जतन करने पडते है इस बात का अन्दाज़ा आज तब लगा जब तमाम उपाधियों योग्यताओं के बाद भी एक अदद स्थाई नौकरी के लिए जद्दोजहद बढती ही जा रही है पिछले सप्ताह कश्मीर गया था श्रीनगर मे एक नई सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनी है उसके पत्रकारिता विभाग में असि.प्रोफेसर पद के साक्षात्कार था। ओबीसी श्रेणी में अपना नाम था लेकिन दो दर्जन लोग आये थे लगभग कुल मिलाकर सामान्य और आरक्षित वर्ग के लोगो सहित कश्मीर मूल के लोगो से मिलना सुखद अनुभव रहा लेकिन पहली बार अपने देश मे परदेस का बोध भी हुआ जिस भारतीयता के तमगे को हम अपने माथे से चस्पा किए हुए गर्व के साथ घुमते रहते है वहाँ के बाशिन्दों के लिए वह एक जहीन से गाली से बेहतरीन कुछ नही है।
एक और बडी बात पता चली कि हिन्दी भाषी होना अपनी हिन्दी पट्टी तक तो ठीक है लेकिन शेष देश मे यह किसी काम की नही है जिस विश्वविद्यालय मे मेरा साक्षात्कार होना था वहाँ पढाई का अंग्रेजी माध्यम है और साक्षात्कार का भी ऐसे मे मेरे जैसे हिन्दी भाषी के सामने बडा धर्म सकंट था भले ही मेरे पास यूजीसी का नेट क्वालीफाई सर्टिफिकेट है लेकिन यदि अंग्रेजी मे धाराप्रवाह बोलना नही आता है तो वह महज़ एक कागज़ का टुकडा भर है।
अब उम्र के पकने की प्रक्रिया के साथ एक जतन यह भी करना कि अंग्रेजी बोलना आना चाहिए अपने आप मे बडी अजीब सी समस्या है मित्र भी सलाह दे रहें है कि यदि उच्च शिक्षा जमे रहना है तो अंग्रेजी पर अधिकार होना ही चाहिए उनकी बात तार्किक रुप से ठीक है लेकिन मेरी मानसिक स्थिति अभी तक इस बात के लिए तैयार नही है कि मै किसी इंगलिश स्पीकिंग कोर्स को ज्वाईन करुँ।
आज शाम ऐसे ही बेतरतीब ढंग से घुमता रहा अपनी कुछ खासो औ’ आम दोस्तों से अपनी फिक्रे तमाम करता रहा आज बहुत दिनों बाद आवारा की डायरी लिख रहा हूँ कमबख्त फेसबुक ने सारा वक्त और ऊर्जा चूस लिया है चाहकर भी वहाँ से मुक्त नही हो पा रहा हूँ जबकि वहाँ ऐसा कुछ भी नही है जिससे दिल को राहत मिलती हो बस कमेंटबाजी का चस्का है और कुछ भी नही....। मेरे करीबी दोस्त सुशील जी भी काफी निराश है कि मै ब्लॉग पर नियमित रुप से लिख नही रहा हूँ वें इस ब्लॉग के नियमित पाठक थे उनका कहना है कि फेसबुक पर लिखना अखबार में लिखने जैसा है जबकि ब्लॉग लेखन किताब लिखने जैसा है मै उनकी बात अक्षरश: सहमत हूँ। अब मेरी कोशिस रहेगी कि बिना गैरहाजिरी के लिख सकूँ।
आज मन अजीब सा बेबस और अनमना है सो ज्यादा नही लिख रहा हूँ कुछ ऊर्जा की जरुरत है जिसकी कमी लम्बे समय से महसूस कर रहा हूँ अपने को रिक्लेक्ट करके जल्दी ही हाजिर होता हूँ...!
शब्बा खैर !
डॉ.अजीत
Tuesday, August 9, 2011
फेसबुक:उधडते-बुनतें रिश्तों की पाठशाला
अभी विश्वविद्यालय मे मेरी सैकिंड् इनिंग शुरु नही हुई है इसलिए अधिकांशत: घर पर ही पडा रहता हूँ अभी तबीयत भी ज्यादा ठीक नही है कुछ दिन पहले वायरल फीवर हुआ था तब से अभी तक शरीर का मामला अपने ट्रैक पर नही आ पाया है अब पत्नि और बच्चे भी इसके शिकार हो गए है...सो सारा घर बीमारु टाईप का हो गया है।
मेरा छोटा भाई जनक पिछले एक साल से अदद नौकरी के लिए हाथ-पैर मार रहा है पहले सरकारी के चक्कर मे अपनी टेलीकॉम की नौकरी को अलविदा कह दिया और जब सरकारी मे बात बनती नही दिखी तो अब फिर से प्राईवेट सेक्टर मे प्रयासरत है लेकिन पता नही कौन सा प्रारब्ध उसका सामने आ रहा है कि बात बनतें-बनतें बिगड जाती है मै भी अपने यथा सामर्थ्य प्रयास उसके लिए कर चुका हूँ यथा सामर्थ्य क्या अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करके अपने कुछ ऐसे रसूखदार मित्रों को बोल चुका हूँ अनुरोध की भाषा मे विनती कर चूका हूँ कि वें किसी भी तरह से उसे एक अदद नौकरी दिलानें मे मदद करें...सभी ने अपने-अपने स्तर से प्रयास भी किए है लेकिन सफलता नही मिली है इस बात से आजकल मन बहुत खिन्न रहता है। आप अपनी असफलता एकबारगी बर्दाश्त कर सकते है लेकिन जब कोई आपसे छोटा आपके सामने असहायता के भाव के साथ खडा नज़र आता है तब अपने ऐसे होने पर बडी कोफ्त होती है मुझे ऐसे में अपना एक पुराना मित्र याद आता है जो अक्सर कहा करता था कि मै अपने मित्रों के माथें पर शिकन नही देखना चाहता हूँ वो कहता कि हे! ईश्वर मुझे व्यक्तिगत रुप से कुछ दे न दें इसका मुझे कोई मलाल नही लेकिन इतनी ताकत जरुर दें कि यदि कोई मेरा मित्र मुझे मुसीबत मे याद करें तो मै उसकी समस्या का निवारण कर सकूँ...” वास्तव में ये ज़ज्बा ही अपने आप मे काबिल-ए-तारीफ है दीगर बात यह भी है मेरा वही मित्र आजकल गर्दिश का शिकार होकर गुमनामी ज़िन्दगी जी रहा है वो किसी की क्या मदद करता कोई मित्र उसकी ही कोई मदद नही कर पा रहा है...।
इस बार मेरे विश्वविद्यालय मे यूजीसी के नये नियमों का हवाला दे कर एडहॉक नियुक्ति के लिए साक्षात्कार आयोजित किए जाने के समाचार आ रहें है समाचार क्या आ रहें है इस बार ऐसा हो कर ही रहेगा पिछले सालों मे तो विभागाध्यक्ष की संस्तुति से ही नियुक्ति पत्र मिल जाया करतें है लेकिन इस बार यह व्यवस्था बदली जा रही है वैसे तो यह भी कहा जा रहा है कि इस बार असि.प्रोफेसर को पूरा वेतनमान दिया जायेगा सो इस लिहाज़ से तो यह खबर ठीक ही है लेकिन मेरे जैसे मास्टर के लिए थोडी मुश्किल की बात यह है कि मेरा विभागाध्यक्ष मुझे कतई पसंद नही करता है क्योंकि मै दूसरे प्रोफेसर का चेला रहा हूँ इसलिए इस बार साक्षात्कार के नाम पर उसके पास एक मौका भी है मुझे बाहर का रास्ता दिखा सकें....लेकिन सबके अपने-अपने समीकरण होतें है सो मै भी यथायोग्य समीकरण फिट करने मे लगा हुआ हूँ चाहे वह सिफारिश हो या कुछ और...क्या करें पापी पेट का सवाल है अब साथ मे पत्नि और दो बच्चे भी है और फिर गांव की एक पुरानी कहावत अक्सर याद आती है कि “ भाई मरोड के लिए करोड चाहिए...” अब करोड तो पास है नही इसलिए किसी न किसी स्तर पर समझोता तो करना ही पडेगा...।
अब देखतें है कि वक्त कब तक अपने साथ ये पैतरेबाज़ी का खेल खेलता है मुझे लगता है कि अब वो वक्त करीब ही है जब इस पार या उस पार वैसे अब मै भी थक गया हूँ जल्दी ही तदर्थ जीवन का स्थाई समाधान चाहता हूँ क्योंकि जब साथ चलने वाले लोग आगे निकल जाते है और आपको नसीहत के अन्दाज़ मे सलाह देते है तो उन शब्दों का बोझ कितना भारी होता है उसको ब्याँ नही किया जा सकता है...आज के लिए बस इतना ही बाकी बातें बाद मे होंगी...।
डॉ.अजीत
Wednesday, August 3, 2011
इन दिनों...
15 मई के सेवा विश्राम के बाद से ये समय आ गया है करीब-करीब तीन महीने होने को जा रहें है...कुल मिलाकर काफी मिला जुला किस्म का वक्त गुजरा पिछले साल के जितनी यात्राएं तो नही कर सका लेकिन फिर भी केदारनाथ के दर्शन हो गए साथ एकाध और जगह भटका गया है।
साफगौई और ईमानदारी का यही तकाज़ा है कि ये मान लिया जाए कि इन दिनों दिन बडे ही बेतरतीब और नीरस किस्म से कट रहें है गुलज़ार साहब की उस गज़ल की तरह जिन्दगी अपना फलसफा रोज पढा जाती है...दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई, अहसान जैसे उतारता है कोई...’ कमोबेश यही मन:स्थिति बनी हुई है। थिंक पाजिटिव जैसे जुमलो और मोटिवेशनल कायदों से परे मै मनोविज्ञान का विद्यार्थी होने के बावजूद जैसा महसूस कर रहा हूँ वैसा ही ब्याँ कर रहा हूँ वरना दिल बहलाने के ख्याल बहुत से अच्छे मेरे पास भी हैं।
कल प्रेमनगर आश्रम पर डॉ.सुशील उपाध्याय जी मुलाकात हुई अपनी कुछ सामयिक चिंताएं उनके साथ सांझा की कुल मिलाकर अपनी कही उनकी सुनी। उपाध्याय जी अभी चीन की यात्रा से लौटे से है सो उनसे चीन के मनो-सामाजिक जगत के बारे मे जानने का अवसर मिला.. उपाध्याय जी ने समग्रता के साथ अपनी चीन यात्रा का संक्षेप मे वृतांत कहा साथ मुझे हौसला भी दिया कि बदले हुए हालात मे कुछ बीच का रास्ता निकाल लिया जायेगा वो आत्मीयता से सुनतें है तथा सुख-दुख मे तुरंत ही शामिल हो जाते है मै इसलिए भी उनका कद्रदान हूँ वरना आजकल लोग कुछ ज्यादा ही आत्ममुग्ध होते जा रहे हैं बस यदि आप सहमत है तो ठीक है वरना आप आउटडेटड...। इन सब बातों के बीच फिलवक्त मन की बैचेनी दूसरी दिशा मे जा रही है किसी भी तरह से एक दशक से बनी हुई यथास्थिति को तोडने की जुगत दिल मे पल भी रही है और साथ जल भी रही है लेकिन मंजिल का पता रहबर से कैसे पता चले जब रहजन ही तनकीद मे माहिर मे हो..! ऐसी आधी-अधूरी मन:स्थिति मे ही दिन गुजर जाता है पिछले एक हफ्ते से तबीयत भी नासाज़ रही है सो उसका भी असर है दिल बोझिल और मन थका-थका सा रहता है।
बहरहाल, बदली हुई परिस्थितियों मे सामंजस्य स्थापित करने की एक कवायद चल रही है वक्त बदला है...लोग बदले है और हालात भी सो बसी इन्ही के बीच से मध्य मार्ग तलाश रहा हूँ गुजर जाने के लिए....। आवारा की डायरी के एकाध नियमित पाठकों के लिए इस पर लिखी तज़रबों की तहरीरें निराशा की गवाह बनती जा रही है जबकि हकीकत मे ऐसा नही है मै कतई निराश नही हूँ और न ही हताश बस थोडा मिज़ाज ही ऐसा कडवा हो गया है कि चाह कर भी दिलकश बातें पेश नही कर पाता हूँ...वरना किस्से और भी बहुत है।
अर्ज़ किया है:
हमारे दिल में भी झांखो अगर मिले फुरसत हम अपने चेहरो से इतने नज़र नही आतें... (प्रो.वसीम बरेलवी)
डॉ.अजीतSunday, July 10, 2011
आमद
15 मई के सेवा विश्राम के बाद से अब फिर गुरुकुल मे अपने को स्थापित होने की जद्दोजहद शुरु होने की तैयारी चल रही है संभवत: अगस्त की प्रथम सप्ताह मे ही मेरे जैसे तदर्थ असि.प्रोफेसरगणो के भविष्य की नियुक्ति के लिए प्रक्रिया शुरु होगी हर साल का वही पुराना झंझट...जिसमें अपने विभागाध्यक्ष की अनिच्छा के बावजूद भी मै किसी तरह से सेंध मारकर विभाग मे घुसने की जुगत मे लगा रहता हूँ पिछले साल तो एंट्री मिल गई थी इस बार किस मोर्चे पर लडाई लडी जाएगी इसके बार मे अभी कुछ कहा नही जा सकता है।
फिलवक्त घर मे छोटे बच्चे को संभालने मे भी मेरा छदम वक्त कट रहा है हालांकि पत्नि को इस बात की शिकायत है कि मुझे जितना गृहस्थी मे सहयोग करना चाहिए उतना मै नही कर पा रहा हूँ, उसे लगता है कि मै घरेलू कामों मे इसलिए हाथ नही बंटाता हूँ क्योंकि इसमे मेरा पुरुषवादी अह्म आडे आता है जबकि मै अकेला होता हूँ तो सारा काम खुद ही करता हूँ अब उसको कौन बताए कि जब मै अकेला होता हूँ तो प्रमादवश बमुश्किल एक वक्त ही खाना खाता हूँ...।
आजकल छोटा भाई भी साथ ही रह रहा है वो भी नौकरी की तलाश मे दर-बदर भटक रहा है मेरे एक रसूखदार मित्र की बिनाह पर मैने उसको यहाँ बुला लिया था ताकि कुछ सिफारिश से ही काम बन जाए लेकिन जब वक्त ठीक न हो तो अधिकांश प्रयास अकारथ चले जाते है ऐसा ही उसके साथ हो रहा है प्रदेश के एक प्रभावशाली काबीना मंत्री की सिफारिश के बाद भी काम नही बन सका है....बस यही कहूंगा कि सबका अपना भाग्य होता है उसके साथ ऐसा अक्सर होता रहा है कि ज़ाम लबो तक आतें-आतें छलक जाते है सो वह अब इसका अभ्यस्त हो चुका है। मेरे लिए यह एक मुश्किल वक्त मे प्रार्थना करने के जैसा है क्योंकि मै अपनी कनिष्ठजनों को परेशान देखकर कुछ ज्यादा ही परेशान हो जाते हूँ कुछ ऐसी ही फितरत है अपनी...।
मॉस कम्यूनिकेशन मे नेट पास होने के बाद से एक दूसरा भी विकल्प उभर रहा है सो अगर इस तरफ अवसर मिला तो कारंवा अब इसी दिशा मे कूच करेगा...वैसे मै भी अब उकता गया हूँ यहाँ मुझे वसीम बरेलवी साहब का एक शे’र याद आ रहा है कि” तुझे पाने की कोशिस इतना खो चूका हूँ मै कि अब तु मिल जाए तो मिल जाने का गम होगा...”
येन-केन-प्रकारेण यह यथास्थिति खत्म होनी चाहिए...बस यही एक अभिलाषा है...।
आज बहुत दिनों बाद लिखा है इसलिए थोडी सी ‘रौ’ नही बन पा रही है जल्दी ही अपनी औकात पर आता हूँ...।
डॉ.अजीत
Tuesday, June 14, 2011
मुखबिर...
परेशान दोस्तों के लिए एक कविता
चला जाऊँगा एक दिन
जैसे हर दिन चला जाता है कभी न लौटने के लिए
चला जाऊँगा जैसे चला जाता है सभा के बीच से उठाकर कोई
जैसे उम्र के साथ जिंदगी से चले जाते हैं सपने तमाम
जैसे किसी के होठों पर एक प्यास रख उम्र चली जाती है
इतने परेशान न हो मेरे दोस्तों
कभी सोचा था बस तुम ही होगे साथ और चलते रहेंगे क़दम खुद ब खुद
बहुत चाहा था तुम्हारे कदमो से चलना
किसी पीछे छूट गए सा चला जाऊँगा एक दिन दृश्य से
बस कुछ दिन और मेरे ये कड़वे बोल
बस कुछ दिन और मेरी ये छटपटाहट
बस कुछ दिन और मेरे ये बेहूदा सवालात
फिर सब कुछ हो जाएगा सामान्य
खत्म हो जाऊँगा किसी मुश्किल किताब सा
कितने दिन जलेगी दोनों सिरों से जलती यह अशक्त मोमबत्ती
भभक कर बुझ जाऊँगा एक दिन सौंपकर तुम्हें तुम्हारे हिस्से का अन्धेरा
उम्र का क्या है खत्म ही हो जाती है एक दिन
सिर्फ साँसों के खत्म होने से ही तो नहीं होता खत्म कोई इंसान
एक दिन खत्म हो जाऊँगा जैसे खत्म हो जाती है बहुत दिन बाद मिले दोस्तों की बातें
एक दिन रीत जाउंगा जैसे रीत जाते है गर्मियों में तालाब
एक मुसलसल असुविधा है मेरा होना
तिरस्कारों के बोझ से दब खत्म हो जायेगी यह भी एक दिन
दृश्य में होता हुआ हो जाऊँगा एक दिन अदृश्य
अँधेरे के साथ जिस तरह खत्म होती जाती हैं परछाईयाँ
एक दिन चला जाउंगा मैं भी
जैसे हर दिन चला जाता है कभी न लौटने के लिए....
अशोक कुमार पाण्डेय
ब्लॉग: http://asuvidha.blogspot.com/
Monday, June 13, 2011
ज़लसा
ज़िन्दगी के लगभग एक दशकीय उतार-चढाव भरे सफर में जिसमें मीठी यादों को बहाने से याद करना पडा हो और रिश्तों के बुनावट मे अपने वजूद को बचाए रखने की जद्दोजहद के साथ मिज़ाज अक्सर कडवा होता गया हो...ऐसे तमाम संघर्षो,चुनौतियों,रिक्तता और तिरस्कार को साक्षी भाव से स्वीकार मानकर आज एक छोटी सी उपलब्धि आपके साथ बांट रहा हूँ।
जनाब मसला यह है कि एक पत्रकार मित्र डॉ.सुशील उपाध्याय जी की प्ररेणा,मेरी अल्पज्ञता में भी संभावना के दर्शन और बिना शर्त के प्रेम ने मुझे एक कोशिस मे शामिल होने का हौसला दिया...आध्यात्मिक शिक्षक और यायावर ध्यानी मुकेश जी नें संबल देकर मुझे उस मोड तक जाने का ज़ज्बा दिया और इन सबके बीच पत्नि के उलाहने,मेरे ज्ञान पर संदेह और शुभचिंताओं के सामूहिक बल पर मैने यह दुस्साहस किया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) दिसम्बर,2010 में मै शामिल हुआ और किसी खानदानी राज़ की तरह इस बात को सभी से छुपाए रखने की चालाकी भी की जिसकी एकमात्र वजह खुद पर कम यकीन ही था।
...और आज शाम इसका परिणाम आ गया है सभी के सामूहिक बल से और अपनी कमअक्ली से मैने यह नेट की परीक्षा जनसंचार(मॉस कम्यूनिकेशन) में पास कर ली है वो भी अपने पहले प्रयास मे ही।
शाम को कुछ खास मित्रों को इसकी सूचना फोन से दे दी गई है...व्यक्तिगत तौर पर यह बात मेरे लिए एक बडी उमस भरी दुपहरी मे किसी बुढे बरगद ने नीचे सुस्तानें जैसी बात है शायद अब यात्रा इसी दिशा मे शुरु हो....।
किसी किताबी ज्ञान के बजाए पत्रकार मित्रों की सोहबत...ब्लॉग,न्यू मीडिया से जुडाव और सुबह उठतें ही दो अखबारों की खबरों की कटेंट से लेकर ले आउट तक की तुलना करने के चस्के नें मेरी इस परीक्षा को पास करनें मे बडी मदद की है तो भईया मेरा एक्ज़ाम सीक्रेट भी बस यही है।
मुझमे विश्वास प्रकट करने वाले मित्रों के प्रति मे कृतज्ञता प्रकट करता हूँ और उन सभी शुभचिंतको का भी आभार जिन्होनें मुझे कम गंभीरता से लिया तभी शायद में इस तरफ थोडा सा गंभीर हो पाया।डॉ.अजीत
Monday, May 16, 2011
वीआरएस
वीआरएस शब्द केन्द्र की समवर्ती सूची का विषय हो सकता है लेकिन अपने लिए एक सस्ता प्रहसन है जिसमें एक आत्म व्यंग्य छिपा हुआ है । तो जनाब मसला यह है कि जिस विश्वविद्यालय मे बतौर असि.प्रोफेसर मै पिछले चार सालों से पढा रहा हूँ वहाँ पर 15 मई को शैक्षणिक सत्र का आधिकारिक अवसान हो जाता है सो काम के बदले अनाज़ योजना की भांति इस तारीख के बाद विश्वविद्यालय के पास न हमारे लिए कोई काम बचता है और इसके बदले हमे दाम देने की जिजिविषा सो विश्वविद्यालय की छदम गौरवमयी साढे नौ महीने की नौकरी के बाद मेरे जैसे लगभग 100 तदर्थ लोगो को विश्राम दे दिया जाता है। यह विश्राम अवैतनिक होता है फिर से नये शैक्षणिक सत्र में विभागाध्यक्ष की कृपा/अनिच्छा/षडयंत्रों और एक लम्बी सस्ती किस्म की लडाई लडने के बाद फिर से अगस्त मे हमें सेवा मे ले लिया जाता है। इस दो ढाई महीने मै तो खानाबदोशी करता हूँ क्योंकि खुद को समय मिल जाता है एक नई लडाई और जद्दोजहद से लडने के लिए ऊर्जा समेट लेता हूँ। हर बार जिस दिन यह सत्रावसान का यज्ञ होता है मै संकल्प लेता हूँ कि ईश्वर करें मेरा यह आखिरी सत्र हो और मित्रों के बीच मे बैठ कर बडे-बडे दावें करता हूँ कुछ हठकर करने के....लेकिन अंतोत्गत्वा फिर से यही लौट आता हूँ और पुनश्च: नौकरी पाने की कुकर परिक्रमा में सबसे आगे कृपांकाक्षी बनकर घुमता हूँ।
सो कल एक दिन पहले ही अपना वीआरएस विश्वविद्यालय ने थमा दिया था क्योंकि आज रविवार था। दिन भर कुछ जबरदस्ती की व्यस्तता के बोध को बनाए हुए कुछ आम काम निबटाए फिर बेतरतीब ढंग से पसर गया घर आकर आजकल बालक गांव गये हुए है सो निपट अकेला हूँ वैसे तो अब अकेलेपन मे भी मज़ा आने लगा वरना एक वक्त हुआ करता था कि मूतने भी अकेले नही जाता था नहाने-हगने-मूतने का काम सामूहिक ही हुआ करता था और ऐसा कभी सोचा ही नही था कि ज़िन्दगी इस मोड पर ले आयेगी कि गिनती के लिए एक भी दोस्त का नाम जबान पर नही मिलेगा।
जिन्दगी अप्रत्याशित होने की जिद पर उतर आयी है मै भी देख रहा हूँ कि कैसे-कैसे रंग देखेने को मिलतें हैं। आज का दिन भी यूं ही बैठे बिठाए कट गया 18 को लखनऊ जाना है एक कानूनी लडाई के सन्दर्भ में फिर उसके बाद कारंवा किस दिशा मे जायेगा अभी कुछ नही पता है हाँ अभी केवल एक निर्धारित कार्यक्रम है कि संभवत: 25 मई को मै और डॉ.अनिल सैनी जी लुधियाना जा सकतें क्योंकि हमारा गोरखपुर जाने का पूर्ववर्ती कार्यक्रम निरस्त हो गया है। बातें तो सुशील जी से भी कुमायूं क्षेत्र मे जाने की हो रही है अब देखा जायेगा कि कब कार्यक्रम मूर्त रुप लेता है। मैने अभी तक अपने अनुभवों से यही सिखा है कि कुछ भी नियोजित मत करों जो भी होना होता है वह अपनी गति से घटित होता है उसमे अपना कुछ बस नही चलता है।
आज शाम एक पुराने हॉस्टल के परिचित का फोन आया था उसने एक मित्र की क्षेम-कुशल मुझ से जाननी चाही जिसका मुझे खुद भी नही पता है मै अब किस-किस की खबर रखुँ जबकि मैं खुद ही बेखबर जी रहा हूँ... फिर उसने एक बात ऐसी बताई जो सुनकर मै आधे घंटे तक बैचेन रहा...आखिरी ये दिन भी देखना था...!
खैर! अब मै ज्यादा विस्तार मे जाना नही चाहता हूँ क्योंकि अपने रिश्तों का ताना-बाना इस कदर उलझा हुआ है कि क्या सही है क्या गलत है इसका अभी फैसला करना मुमकिन ही नही है बस वैट एंड वाच की हालात ही बेहतर है।
आजकल अकेला रह रहा हूँ सो बडा अस्त-व्यस्त जी रहा हूँ न वक्त से ब्रेकफास्ट होता है और न ही डीनर बस सब कुछ अवसर और संयोग के सहारे पर निर्भर करता है। कल शाम को मै और मेरे मित्र डॉ.सुशील उपाध्याय जी का एक आत्मीय संवाद सत्र आयोजित होने जा रहा है फिर इसके बाद वे कल रात मेरी ही कुटिया पर प्रवास करेंगे सो कल ये वीरान चमन किस्सागोई से आबाद रहेगा...ये सोच कर आज रात नींद अच्छी आने के आसार हैं बशर्तें कोई पुरानी याद न छेड जाएं....।
शुभ रात्री( रात्री 11.02, 15/05/2011)
डॉ.अजीत