Tuesday, March 29, 2011

हास्पिटल के कुछ पात्र



भले ही मैं यहाँ अपना सबसे बुरा वक्त गुजार रहा हूँ लेकिन फिर भी अस्पताल की भागदौड में जब भी फुरसत में सुस्ताने बैठता हूँ तो अस्पताल के कुछ चेहरे मेरी आखों के सामने बरबस दौड जातें हैं कहते हैं कि दूनिया मे भांति-भांति के लोग रहते है इसी तरह अस्पताल मे भी काम करने वालों कर्मचारियों की भी एक अलग ही वैरायटी है यहाँ मै उनमे से कुछ पात्रों का जिक्र कर रहा हूँ।

सोनाली सिस्टर

सोनाली सिस्टर इस अस्पताल की सबसे अनुभवी नर्स में से एक है जिस दिन हमारा बालक बालक पैदा हुआ यही सिस्टर नाईट ड्यूटी पर थी।जब लेबर पेन शुरु हुआ तब हम लोग बडे घबरायें हुए थें लेकिन सोनाली सिस्टर एकदम कूल थी वैसे तो यें प्रतिदिन इन सब चीज़ो की अभ्यस्त रहती है लेकिन वो आत्मविश्वास से पूर्ण थी उसने डिलिवरी को बडे परिपक्व ढंग से सम्पन्न करवाया दीगर बात यह रही कि जब पत्नि ओ.टी. में थी तब सोनाली सिस्टर नें सब कुछ मैनेज़ किया अस्पताल की गाईनिकोलाजिस्ट तो उस समय ओ.टी. मे पहूंची जब बच्चा पैदा हो चुका था हालांकि उसने अपनी फीस पूरी ली है। सोनाली सिस्टर का प्रोफेशनल पक्ष उज्ज्वल है लेकिन पर्सनल रुप से वह उतनी ही अमानवीय,संवेदनहीन,रुखी और तथाकथित रुप से हार्डकोर प्रेक्टिकल नर्स है। जब तक पत्नि प्राईवेट रुम में प्रसूति के रुप मे भर्ती रही तब तक सोनाली सिस्टर की नजरे इनायत रही वो अपना काम बखुबी करती रही लेकिन जैसे मैने अस्पताल का प्रसव संबन्धी कार्य का भुगतान किया तो अस्पताल ने हमे डिस्चार्ज़ स्लिप थमा दी अब समस्या यह बनी कि चूंकि अभी बच्चा नर्सरी मे रहेगा तो फिर बालक की मम्मी कहाँ रहेगी? मैने अस्पताल के मैनेजर से बात करके जिस प्राईवेट रुम मे हम भर्ती थें उसको ही रुम चार्ज़ पर ही ले लिया। इसके बाद सोनाली सिस्टर का नजरिया ही बदल गया कल तक सेवा की प्रतिमूर्ति और निपुण कर्तव्यनिष्ठ नर्स अब कायदा प्लस कानून बताने वाली कठोर प्रशासक बन गई उसे हमारा इस तरह से अस्पताल मे रुकना नागवार गुज़रा।

वैसे तो सोनाली सिस्टर कुछ कर नही सकती थी लेकिन जो उसके बस में था उसका उसका खुब प्रयोग किया मसलन हम लोग जच्चा के भोजन के लिए दाल/खिचडी अभी तक अस्पताल मे ही पका रहे थे और चाय वगैरह भी अस्पताल के चूल्हे पर ही बना लेते थे,सोनाली सिस्टर नें अपना तुगलकी फरमान जारी कर दिया कि यह गैस अस्पताल के अंदरुनी कामों के लिए है खाने बनानें के लिए नही इसका प्रयोग ओ.टी के उपकरणो को उबालनें के लिए किया जाता है सो आप यहाँ खाना मत बनाया करें। उसके इस ब्यान के बाद हम एकाध दिन सहमें-सहमें से रहें क्योंकि यहाँ देहरादून मे और कोई ऐसा जरिया नही था जहाँ से जच्चा के लिए हल्का भोजन बन कर आ सके।

अगले दिन मैने अस्पताल के मैनेजर से अपनी समस्या का जिक्र किया तो उसने बडी आत्मीयता से कहा कि कौन रोकता है आपको? आप खाना पका सकतें है,चाय बना सकतें है वो भी साधिकार। बस इसके बाद हमने सोनाली सिस्टर को उपेक्षित करते हुए खाना-पकाना जारी कर दिया इस बात से वह और भी चिढ गई और एक दिन फिर हमें टोक दिया बोली आप तो अपने लिए एक छोटे चूल्हे की व्यवस्था करने वाले थें क्या हुआ चूल्हा आया नही क्या? चूंकि मैं इस मसले पर अस्पताल के मैनेजर से विधिवत रुप अनुमति ले ली थी सो अब मैनें सोनाली सिस्टर को थोडा सख्त लहज़े में बता दिया कि हम लोग वैसे ही परेशान है आप और परेशानी खडी करने की कोशिस न करें लेकिन वो ढीठता से अपनी बात अडी रही और विदेश गये अस्पताल के मालिक डाक्टर का हवाला देते हुए कहा कि डाक्टर साहब यहाँ खाने-पकाने की किसी को परमिशन नही देतें है साथ ही उसने ओ.टी.के लिए चूल्हे की उपयोगिता का तर्क भी दिया हमनें उसको पुरी तरह से इगनोर कर दिया। अब सोनाली सिस्टर रोज़ाना नाईट ड्यूटी पर आती हैं और हमारी शक्ल देखकर भुन कर रह जाती है साथ रोज़ाना हमारी यहाँ से जल्दी विदाई की भी दुआ करती है जिसके हमें सख्त जरुरत भी है।

अस्पताल के मैनेजर-नेगी जी

अस्पताल के कर्मचारियों के लिए वें एक कठोर प्रशासक है सुबह आतें ही सभी की क्लास लेतें है। कर्मचारी की गल्ती पर सीधे उसके मुँह पर ही डांट देना उनकी प्रशासनिक कार्यकुशलता का परिचायक है। जब मैने उनसे अपनी वास्तविक समस्या बताई कि इस शहर में मै एकदम अंजान हूँ कुछ मित्रादि हैं भी तो वें यहाँ से भौगोलिक रुप से ज्यादा दूरी पर रहतें है तो उन्होनें ने अस्पताल में वही कमरा हमें दे रुम चार्ज़ पर दे दिया जिसमें हम रुके हुए थें साथ ही गैस पर खाने-पकाने की भी अनुमति दे दी जिससे हमें बडी राहत मिली। सोनाली सिस्टर के रुखे व्यवहार पर जब मैने उनके समक्ष आपत्ति जताई तो उन्होनें व्यक्तिगत रुप से सोनाली सिस्टर को आदेश दिया कि हमें खाना बनाने में चकल्लस न करें हालांकि सोनाली सिस्टर को यह बात भी नागवार ही गुजरी और उसने अस्पताल के आंतरिक अनुशासन का सहारा लेकर डाक्टर साहब का सन्दर्भ दे दिया जिससे यह पता चल सके कि मैनेजर से भी उपर वह डाक्टर साहब के विश्वसनीय लोगों मे से एक हैं। नेगी जी एक खासियत और है वें सुबह आतें ही सभी मरीज़ो के कमरों मे जातें है और सभी कि कुशल-क्षेम पुछतें है यह उनके नित्यक्रम का एक हिस्सा है।

भूषण,रुपाली,शशि सिस्टर और अन्य....

भूषण लगभग बाईस साल का नौजवान है कान में ईयरफोन और जेब मे मोबाईल अक्सर रहता है उसका काम अस्पताल मे भर्ती होनें वालें मरीज़ो का बिलिंग आदि का काम करने का है ड्यूटी के समय वह आक्सीज़न का सिलेंडर भी मेन सप्लाई रुम मे बदलता है। अभी युवा है थोडा मसखरा है साथ ही मुझे लगता है कि प्रेम मे भी पडा हुआ है क्योंकि मै उसको फोन कर अक्सर गुप्त भाषा मे घंटो बाते करता और फुसफुसाता देखता हूँ अस्पताल के कैमिस्ट से भी उसकी अच्छी ट्यूनिंग है शाम को अक्सर उसके केबिन मे का जाकर नीचे ही बैठ जाता है। प्रेम की बात पर मुझे इसलिए भी शक हुआ कि एक दिन मैने उसके कैमिस्ट के केबिन मे अपने फोन से किसी को गाना सुनाते हुए सुन लिया सब उसका मज़ा ले रहे थें और गाना भी कौन सा भींगे होंठ तेरे....प्यासा दिल मेरा...बस फिर इसके बाद मुझे लगा कि भूषण भईया की जरुर किसी से आंखे चार हो रखी हैं।

रुपाली सिस्टर कम रिसेप्शनिस्ट है यह भी युवा है साथ ही काम भी काफी करती है लेडी डाक्टर के मरीजो का हिसाब किताब यह ही रखती है पत्नि की डिस्चार्ज़ स्लिप भी रुपाली नें ही बनायी थी, भूषण के साथ भी इसका सखा भाव ही झलकता है दोनो अक्सर मोबाईल पर फनी रिंगटोनस और गाने सुनते देखे जा सकतें है।

शशि सिस्टर भी अस्पताल की वरिष्ठ नर्स में से एक ही दिन मे ड्यूटी पर रहती है। शशि सिस्टर सौम्य,सभ्य,संवेदनशील और एक ममत्व से पूर्ण एक परिपक्व नर्स है इन्होनें हमारा बडा ख्याल रखा है ऐसे लोगो का सम्मान करने का मन करता है।

एक सिस्टर और है मैं इनका नाम नही जान पाया हूँ अक्सर रिसेप्शन पर बैठा देखता हूँ चूंकि इनकी शक्ल यूपी की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती से काफी मिलती है और देखने में उनकी बडी बहन लगती है सो मैने इनका नाम खुद ही माया सिस्टर रख लिया है। माया सिस्टर भी भद्र,सौम्य और सम्वेदशील महिला है मै उनको हमेशा विन्रम ही देखता हूँ भले ही सामने वाला कितना उत्तेजित अवस्था मे न हो। माया सिस्टर भी लगभग प्रतिदिन ही मुझसे बच्चे की कुशल क्षेम पुछती है साथ ही अधिकार के साथ कहती है कि भईया अब नीलम की तबीयत कैसी है? उनकी इसकी आत्मीयता का बडा प्रशंसक हूँ।

कृष्णा दीदी

अगर इस पोस्ट मे मै कृष्णा दीदी का जिक्र नही करुंगा तो खुद के साथ नाइंसाफी होगी। कृष्णा दीदी अस्पताल में सफाईकर्मीं है लेकिन उनकी कर्तव्यपरायणता काबिल-ए-तारीफ है दिन मे कईं बार हमारे रुम से लेकर अस्पताल के कोने-कोने झाडु-पोंछा लगाती है वह भी निष्ठाभाव के साथ ऐसा नही कि बस खानापूर्ति के लिए यह सब कर रही हो दिन भर मैं कृष्णा दीदी को सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ काम करते देखता हूँ जबकि नाईट ड्यूटी पर जो सफाई करने वाली आती है वो एक नंबर की कामचोर और बातूनी महिला है जिस दिन हमारा बच्चा पैदा हुआ उसी सुबह रुम मे आ गई थी बोली कि हमारा ईनाम लाओं जबकि उसको पता था कि इस बच्चे के साथ प्राब्लम है क्योंकि रात में वो भी ओ.टी. में थी लेकिन बडी बेशर्म महिला है साथ मे फैशनपरस्त भी उम्र पचास के पार की होगी और धुप मे जब निकलती है तो युवा लडकी की तरह छाता लेकर चलती है ताकि झुलस न जाएं।

खैर! कृष्णा दीदी की जितनी तारीफ की जाएं उतनी ही कम हैं ऐसे लोगो के सहारे ही दूनिया में काम चल रहा है जो अपने कर्तव्यों के पक्के हैं। जिस दिन मै यह अस्पताल से जाउंगा मेरा मन है कि उसको जरुर इनाम दे कर जाउंगा बिन मांगा इनाम जोकि मेरी एक कृतज्ञता होगी उनकी कार्यशैली के प्रति....।
अब विराम देता हूँ कुछ जरुरत से ज्यादा ही बडी पोस्ट हो गई है लेकिन इतने सारे पात्रों को समेटना कोई आसान काम नही था ये जब है कि मैने नर्सरी के नर्सिंग स्टाफ का जिक्र भी नही किया है जिनसे मुझे हर तीन घंटे बाद मिलना पडता है उनके भी किस्से अजीब ही हैं....लेकिन फिर कभी।
डा.अजीत

Monday, March 28, 2011

अस्पताल का अवसाद

आज अस्पताल मे आयें 13 दिन हो गयें है। दिनभर यहाँ मरीज़ो की आवाजाही रहती है प्राय: प्रतिदिन एक डिलिवरी तो हो ही जाती है ओ.टी. के बाहर खडे परिजनों के चेहरे डाक्टर की सुरक्षित प्रसव की सूचना और साथ मे यदि बेटा हुआ है तो उसकी खबर लोगो के चेहरो पर एक खास किस्म की खुशी बिखेर देती है,फिर शुरु होता है बधाईयां...मिठाई का दौर कुछ चेहरे ऐसे भी होते है जो पहली बार बाप बने होते है उनकी बाडी लेंग्वेज़ अलग ही किस्म की होती है।

जिस अस्पताल मे मै पिछले एक पखवाडे से रह रहा हूँ उसके स्वामी डाक्टर दम्पत्ति अपने बच्चों के पास अमेरिका गये हुए हैं संभवत: एक अप्रैल को लौटेंगे सो यहाँ के कर्मचारियों के अंदर के खास किस्म की स्वतंत्रता को भाव छाया हुआ है चाहे वह सिस्टर हो या रिसेप्शनिस्ट सभी मुक्त भाव से अपने काम का मज़ा ले रहें है मुझे कल कैमिस्ट ने बताया कि जब डाक्टर साहब यहाँ होतें है तो यहाँ का माहौल ही अलग किस्म का होता है एक खास किस्म का सन्नाटा और आंतरिक अनुशासन पसरा रहता है।

रोज़ाना इतने चेहरे सामने से गुजरते है कि कभी-कभी लगने लगता है कि दूनिया मे दुख कितना बडा सामाजिक यथार्थ है ऐसे भी भगवान बुद्द भी याद आतें है। जीवन-मरण,हानि-लाभ,नियति-प्रारब्ध जैसे शब्द मन मे दस्तक देते रहतें हैं। अस्पताल का जीवन इतना बोझिल और मानसिक थकान से भरा होता है कि सारा दिन अपना बोझ ढोने के बाद जब रात को मै लेटता हूँ तो पडकर यह पता नही रहता है कि कहाँ पडा हूँ। पत्नि को भी हर तीन घंटे के बाद बच्चें को दूध पिलानें के लिए छत पर जाना पडता है(एन.आई.सी.यू. छ्त पर ही है) वो भी थकी-थकी सी रहती है क्योंकि रात मे नींद पूरी नही हो पाती है और बच्चे के स्वास्थ्य को लेकर मानसिक तनाव अलग से रहता है।

दुख और इससे उपजी आत्मीयता का संसार अस्पताल मे बखुबी देखा जा सकता है मै दिन मे कईं बार नर्सरी के चक्कर लगाता हूँ बालक को शीशे से देखकर लौट आता हूँ नर्सरी के बाहर मेरे जैसे और भी कई लोग अपने बच्चे की स्वास्थ्य लाभ की कामना से बाहर बैठे रहते हैं खासकर ऐसी माएं जिनका बच्चा नर्सरी में भर्ती है उनके आंखों मे हर समय पानी तैरता रहता है जैसी ही किसी ने उनसे यह पूछा कि आपका बच्चा कैसा है वें बडी मुश्किल से अपने आप को संभाल पाती है गला रुंध जाती है और पलको के कोने से एकाध बूंद टपक ही पडती है। यह देखकर मन द्रवित हो जाता है और बस यही दुआ करता हूँ कि ईश्वर ऐसा मानसिक कष्ट किसी दुश्मन को भी न दें। सभी एक दूसरे के बच्चों का हाल चाल जानकर परस्पर सांत्वना देते रहते है तथा एक दूसरे का ढांडस बंधाते रहतें है जिसके बच्चे को छूट्टी मिल जाती है वो यहाँ से जितनी जल्दी हो सके भागना चाहता है और यही उम्मीद करता है कि वो फिर कभी यहाँ लौट कर न आयें। सभी को अपनी-अपनी बारी का इंतजार है बाल रोग विशेषज्ञ दिन मे दो बार राउंड लेते है जिस समय वो आतें है सभी पेरेंट्स की हालात देखने वाली होती है अपने बच्चे को लेकर इतनी शंकाए इतने सवाले उनके मन मे होते है कि बेचारे डाक्टर के समक्ष डरते-डरते थोडा बहुत ही कह पातें है जिस दिन डाक्टर बेबी के ठीक होने की बात कह देता है उस दिन उनके बोझिल चेहरों पर उत्साह से एक इंच मुस्कान बरबस ही आ जाती है और जिन बच्चों को तकलीफ अभी भी जारी है तथा संकट नही टला है वें चिंतित हो जाते है और भगवान की शरण मे जा कर खुद की एक आस बंधाते हैं।

पता नही ईश्वर का अस्तित्व है या नही है लेकिन मुझे इतना जरुर लगने लगा है कि विज्ञान की कडवी सच्चाई से भागकर यदि कही शरण मिल सकती है तो वह ईश्वर की शरण ही है हो सकता है कि यह एक झुठी आस ही हो लेकिन जब डाक्टर नकारात्मक बातें बताता है तो पेरेंट्स बस यही प्रार्थना करते है कि हे! ईश्वर हमारें बच्चे की मदद कर मै भी उन्ही मे से एक हूँ।यदि यह ईश्वर की अवधारणा न होती तो संकट की घडी में न जाने कितने लोग आत्महत्या कर चुके होतें कुछ और मिले न मिलें ईश्वर की प्रार्थना से एक संबल तो मिलता ही है भले ही वह सच्चा न हो।

सर्व: भवन्तु सुखिन:

डा.अजीत

Sunday, March 27, 2011

एक इम्तिहान और...

बात लिखने मे अजीब लग रही है लेकिन पिछले एक पखवाडे से मै जिस मन:स्थिति से गुज़र रहा हूँ उसको शब्दों मे ब्याँ कर पाना आसान नही हैं फिर भी आज थोडी सी फुरसत मिली तो अपनी इस डायरी मे यह अनुभव भी दर्ज कर रहा हूँ।

हुआ यूं है कि अगले महीने यानी अप्रैल मे 26 तारीख के आसपास मेरे यहाँ एक नया मेहमान आना संभावित था मसलन पत्नि की डिलिवरी होनी थी।हम लोग उसी के हिसाब से अपने कार्यक्रम तय कर चुके थे कि कहाँ डिलिवरी होगी आदि-आदि।17 मार्च की सुबह जब मै अपने बेटे राहुल का एडमिशन नई क्लास में करवा कर घर लौटा तो पत्नि नें मुझे बताया कि उसे कुछ तकलीफ हो रही है मैने मामले को थोडा हल्के मे लिया और रुटीन की तरह यूनिवर्सिटी चला गया लेकिन थोडी देर बाद पत्नि ने आग्रहपूर्ण ढंग से मुझे फोन किया कि हमें एक बार अपने डाक्टर का परामर्श ले लेना चाहिए। मैं सहमत होकर तुरंत घर लौट आया और पत्नि को लेकर डाक्टर के यहाँ पहूंच गया। लेडी डाक्टर नें जांच के बाद जो बात हमें बताई उसने हमारे पैरो तले की जमीन खिसका दी...। डाक्टर ने बताया कि अपरिहार्य कारणोंवश गर्भस्थ शिशु की आज ही डिलिवरी करानी पडेगी क्योंकि लिक्विड का निकलना जारी हो गया था अभी 26 मार्च को गर्भकाल के आठ माह पूर्ण होनें थे लेकिन ये क्या हुआ कि लगभग सवा महीनें पहले ही यह डिलिवरी होने का दुर्योग बन गया था। हम दोनों गहरी चिंता मे डूब गये थें क्योंकि हमारा पहला बेटा भी माईल्ड सेरेब्रल पाल्सी से पीडित रहा है और ईश्वर ने इस दूसरें बालक के साथ भी कैसा संयोग बना दिया है।

खैर! डाक्टर ने कहा कि आप जल्दी अपना निर्णय बता दीजिए क्योंकि अब इस बच्चे को गर्भ मे ज्यादा समय तक रोक पाना संभव नही होगा, हमारे पास डिलिवरी के अलावा कोई विकल्प नही था सो अब क्या किया जाए इस दुविधा मे पडे हुए हम चिंतामग्न सोचते रहे तभी डाक्टर ने यह भी कहा कि इस समय डिलिवरी के लिए किसी योग्य डाक्टर की इतनी जरुरत नही है जितनी कि एक नवजात शिशुरोग विशेषज्ञ की क्योंकि यह एक प्रीमैच्योर बेबी होगा सो इसकी एक्सक्लूसिव केयर की जरुरत पडेगी जोकि हरिद्वार में उपलब्ध नही है सो एक विकल्प यह भी ठीक रहेगा कि आप यह डिलिवरी देहरादून मे करायें।

इसके बाद हमें भी यही ठीक लगा और आनन फानन मे देहरादून के लिए रवाना हो गयें इस आकस्मिक आपदा मे एक मित्र नें इतना आत्मीय सहयोग प्रदान किया कि मेरे पास उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए भी शब्द नही हैं...बस यही कहूंगा कि ऐसे निस्वार्थ और भलेमानुष लोगो के तपोबल पर ही यह दूनिया कायम है।

देहरादून मे जिस प्राईवेट नर्सिंग होम हमे रेफर किया गया था वहाँ पहूंचने पर पता चला कि उसके स्वामी डाक्टर दम्पत्ति विदेश यात्रा पर है बडी दुविधा की स्थिति थी फिर अपने डाक्टर से मशविरा किया गया तब उन्होनें ने आश्वस्त किया कि उनकी अनुपस्थिति मे जो डाक्टर मरीज़ देख रहें है वे भी उनके परिचय के हैं और काबिल भी है,बस इसके बाद यही भर्ती हो गयें डाक्टर ने जांच के बाद बताया कि कल तक यदि लेबर पेन रुक जाए तो बेहतर रहेगा लेकिन ऐसा हो नही पाया रात को ग्यारह बजे लेबर पेन शुरु हो गया और ठीक 1.10 पर एक बालक(पुत्र) का जन्म हुआ।

वैसे तो नार्मल डिलिवरी हुई थी लेकिन बाल रोग विशेषज्ञ जोकि ओ.टी. में थें और सारे केस पर नज़र बनाए हुए थें क्योंकि मैने उन्हे अपने पहले बालक की क्लीनिकल हिस्ट्री बता दी थी, वो बालक को लेकर बडी हडबडी में एन आई सी यू(नर्सरी) की तरफ रवाना हुए और मुझे भी साथ आने के लिए बोल गये। मैं घबरा गया था लेकिन जैसे तैसे वहाँ पहूंचा तो डाक्टर ने मुझे बताया कि बालक ने जन्म के बाद ठीक ढंग से क्राई नही किया है वह रोया तो जरुर लेकिन क्लीनिकल पाईंट आफ व्यूव से एक्सक्लूसिव रेंज की क्राई नही है सो यह एक चिंताजनक पहलू हो सकता है।

मेरे सामने 6 साल पहले का अतीत घुम गया जब राहुल पैदा हुआ था उसके साथ भी कमोबेश इसी तरह की दिक्कत आई थी लेकिन वो मैच्योर डिलिवरी थी बाकि रोया वह भी काफी देर बाद था जब आक्सीजन लगाई गई थी।

डाक्टर अपने प्रयासों मे तत्परता से लगा हुआ था और मै असहायता के बोध के साथ उसको देख रहा था मैने डाक्टर से आग्रह किया कि वह इस समय जो अपनी बेहतरीन कोशिस कर सकता है वह करें भले ही कितनी ही महंगी दवाईयों का प्रयोग क्यों न करना पडें क्योंकि मैं एक और सीपी चाईल्ड के लिए मानसिक रुप नही तैयार नही था।

थोडी देर बाद मै बाहर आ गया और फिर डाक्टर के आने की प्रतिक्षा करने लगा...थोडी देर बाद डाक्टर साहब भी बाहर आ गयें उन्होनें ने मुझे आश्वासन दिया कि अब बालक बहुत बेहतर स्थिति मे है उन्होने कहा कि क्राईसिस टाईम अब गुज़र गया है जैसे उन्हें पहले लग रहा था कि बच्चे को वेंटीलेटर की जरुरत पडेगी लेकिन बाद मे बच्चा ठीक से सांस लेने लगा था सो उसकी जरुरत नही पडी।

17 मार्च से लेकर अब तक यानि 27 तक मै और पत्नि यही अस्पताल मे बनें हुए है बच्चा अभी नर्सरी मे ही है और धीरे-धीरे रिकवर हो रहा है आज रात को डाक्टर साहब ने उसकी मां को ब्रेस्ट फीडिंग के लिए कहा है इससे पहले उसे फीडिंग ट्यूब से ही मां का दूध दिया जा रहा था।

अस्पताल के थकाऊ माहौल और मानसिक यंत्रणा के इस दौर से मै गुज़र रहा हूँ पता नही कि यह मेरी नियति है या प्रारब्ध कुछ तय नही कर पा रहा हूँ। आज थोडी राहत मिली तो आपसे अपनी मन:स्थिति शेयर कर ली है। डाक्टर का मत है कि बच्चा शत प्रतिशत रिकवर हो जायेगा लेकिन फिर भी मन मे एक डर हमेशा बना रहता है।

आपकी दुआओं का तालिब हूँ....।

इस दस दिन के तज़रबे ने बहुत कुछ सिखाया है कुछ दोस्त याद आयें तो कुछ दुश्मन दोस्त...बहुत सी परिभाषाएं बदली है..अपने-बैगानो का फर्क समझ मे आया है जिनके बारें मे धीरे-धीरे मै खुलकर लिखूंगा। अभी तो अस्पताल का जीवन जी रहा हूँ और शायद यहाँ से 1 अप्रैल तक ही मुक्ति मिलें....।

बच्चे की कहानी चित्रों की जुबानी....


डा.अजीत

Tuesday, March 8, 2011

तनाव प्रबन्धन

जिस विभाग मे मै काम करता हूँ वह विश्वविद्यालय का मनोविज्ञान विभाग है मतलब मानसिक स्वास्थ्य के उन्नयन के लिए अब तक सैकडों शोध प्रबन्ध यहाँ के यशस्वी प्रोफेसर के कुशल निर्देशन मे लिखें जा चुके हैं।साल भर देश भर मे आयोजित होने वाली सेमीनार/कांफ्रेंस मे विभागीय भागीदारी जबरदस्त रहती है। देश मे मनोविज्ञान की विश्वविद्यालय स्तरीय पढाई के आरम्भिक दौर के विभाग के रुप मे यह शुमार रहा हैं,1962 से पीजी स्तर की पढाई हो रही है और यही स्थिति शोध के मामलें मे है।

इस भूमिका के साथ जो बात मै कहना चाह रहा हूँ वह विरोधाभासी किस्म की है मतलब विषय का अध्यापन व्याख्यानों तक सीमित हो जाना तथा आचरण में उसका अनुशीलन कर पाना सारी अकादमिक उपलब्धि को शुन्य कर देती हैं।प्रतीकात्मक रुप से इसलिए सन्दर्भ रख रहा हूँ क्योंकि इससे मेरे कुछ विभागीय लोगो को बदहजमी हो सकती है और वें अपना नज़ला मुझ पर उतार सकतें है क्योंकि मै विभाग की सबसे कमजोर ईकाई हूँ मतलब तदर्थ असि.प्रोफेसर।
मेरे गुरुजी जिनके कुशल निर्देशन में मैने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है उनका व्यवहार अपवाद स्वरुप हैं मै इसलिए नही लिख रहा हूँ कि वें मेरे गुरु रहें है बल्कि सारा विश्वविद्यालय उनकी सहज़ता का साक्षी है। वें अपने स्तर से किसी को ऐसी कभी असुविधा नही होने देतें कि किसी को मानसिक परेशानी हो। विभाग के एक अन्य विद्वान भी हैं वें मनोविज्ञान विषय के जाने माने विद्वान हैं देश भर में अधिकांश सेमीनार आदि में उनका आना जाना लगा रहता है लेकिन पता नही ऐसी क्या बात है कि वें हमेशा इस बात कि फिराक मे रहतें है कि कैसे अमुक व्यक्ति को तनाव दिया जाए। विश्वविद्यालय कर्मीयों का प्रमोशन कैसे होगा इसकी उन्हे जानकारी भले ही न हों लेकिन विश्वविद्यालय में किसका प्रमोशन कैसे रुकना है उसकी जानकारी उन्हे हमेशा रहती है। कागज़ो के पक्कें और लोगो को उनका कैरियार तबाह कर देने की चेतावनी देने की दुर्वासा प्रवृत्ति उनके अन्दर इस कदर हावी है कि वें खुद भी तनाव मे रहतें है और अपने सहकर्मीयों को भी तनाव में रखतें है।

मेरे शक्ल उन्हें विशेष रुप से नापसंद है और हमेशा इस बात की तलाश मे रहतें है कि कैसे मुझे प्रेम-पत्र(अनुशासनात्मक कार्यवाही की चेतावनी का पत्र) थमाया जाएं? मै वैसे तो अपनी तरफ से भरसक प्रयास करता हूँ कि ऐसा कोई अवसर पैदा न होने दूँ लेकिन कमियां निकाल लेने के लिए सायास कुछ भी तर्क विकसित किए जा सकतें है। इस शैक्षणिक सत्र की नियुक्ति के समय उन्होनें ने मुझे हकबात का दावा करने के अपराध मे विश्वविद्यालत प्रशासन के समक्ष कदाचार/अपराधी सिद्द करनें का भरसक प्रयास किया जमकर चिट्ठीबाजी की लेकिन कुछ मेरे शुभचिंतकों की वजह से मुझे नौकरी करने का अवसर मिल ही गया यह बात उनको इस कदर नागवार गुजरी कि विभागीय समय चक्र मे मुझे ऐसे लेक्चर पढाने के लिए दिए गयें जो मैने पहले के सालों में न पढायें हो ताकि मै असुविधा मे रहों लेकिन अपन के लिए मनोविज्ञान विषय मे ऐसी कोई असुविधा विषय के स्तर पर ईश्वर की दया से नही है।
अब कैसे एक मनोविज्ञान का विद्वान दूसरे के लिए मानसिक असुविधा पैदा कर सकता है इसका ऐस उदाहरण यह भी है कि सुबह दस से ग्यारह मेरा पहला लेक्चर दिया गया है इसके बाद दो घंटे का ब्रेक फिर एक बजे से तीन बजे तक लगातार दो लेक्चर ताकि मै लंच के समय भी घर न आ सकूँ। सुबह दस बजे एक बार विभाग मे जाओं फिर तीन बजे ही घर आओं खैर ! मैने इसके साथ भी समायोजन स्थापित कर लिया है लेकिन वें इस बात की फिराक मे रहतें है कि संयोग से यदि मै तीन बजे से थोडा सा पहले विभाग से निकल आया( यदि छात्र न हों तो) बस फिर वें एक चिठ्ठी तैयार करके अगले दिन मुझे थमा देंगे कि आप कक्षा मे नही पायें जाते है आपके विरुद्द अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है।

अब मैं इस दुराग्रही और पूर्वाग्रही प्रवृत्ति से तंग आ गया हूँ क्योंकि मै जिस पृष्टभूमि से ताल्लुक रखता हूँ वहाँ पर सीन ही अलग है और मै नौकरी आत्म सम्मान के लिए कर रहा हूँ जरुरत के लिए नही यह बात उनके संज्ञान में नही है।

आज इतना सब इसलिए लिखा है क्योंकि मुझे आज शाम ही पता चला है कि आज मेरे आने के बाद उन्होनें फिर से एक चिट्ठी तैयार कर ली है जो कल मुझ थमायी जायेगी। मै यह समझ नही पा रहा हूँ कि किस प्रकार से प्रतिक्रिया करुं क्योंकि वें भी मेरे अध्यापक रहें है मै किसी विवाद मे नही पडना चाहता हूँ क्योंकि अभी मार्च-अप्रैल मे जिस पद पर मै काम कर रहा हूँ उस पर स्थाई नियुक्ति के लिए साक्षात्कार होनें वाले है तथा ये श्रीमान मुझे प्रोवोक कर रहें है कि मै कुछ प्रतिक्रिया करुं और ये मुझे साक्षात्कार के लिए अयोग्य घोषित करवा दें।

यह सब वृतांत कहने का मकसद सिर्फ इतना है कि लोगो के मानसिक स्वास्थ्य के लिए व्याख्यान देने और शोध करने प्रबुद्द बुद्दिजीवी लोग भी मानसिक स्तर पर कितने दुराग्रही हो सकतें है जबकि स्ट्रेस मैनेजमेंट पर इनके अतिथि व्याख्यान होतें है,जबकि तस्वीर का दूसरा पहलु बडा ही अजीब किस्म का है।

यह सत्र मेरे लिए एक निर्णायक सत्र की भूमिका मे हैं यदि विभाग मे स्थाईत्व मिल जाए और न भी मिलें दोनो ही दिशा में मै तो परम पिता परमेश्वर से यही प्रार्थना करुंगा कि ऐसे लोगों को सद्बुद्दि प्रदान करें ताकि वें अपनी मानसिक उर्जा का सदुपयोग कर सकें किसी के अहित के लिए नही...।

डा.अजीत

Sunday, March 6, 2011

निजता: जिसका मैने हनन किया

निजता को बचाए रखना मेरी अकेले की जिम्मेदारी थी ऐसा वें सब सोचतें है जो मेरे आस पास है। ग्रामीण पृष्टभूमि से निकल कर जब शहर मे आया तब मन में इतने सारें संकोच थे कि उनका जिक्र करुँ तो अलग से एक पोस्ट लिखनी पड जायेगी। वें सारे किंतु-परंतु और मनोवैज्ञानिक डर जिस आप मेरी हीन भावना भी कह सकतें है दिल-दिमाग पर इस कदर हावी थी कि बस बता नही सकता। ऐसा नही है कि आर्थिक रुप वंचित परिवेश से आया था और शहर की तथाकथित कुलीनता और अभिजात्यता से भयभीत था मेरे पिताजी गांव के सबसे बडे जमीदार है, एक प्रकार से सामंतवादी व्यवस्था का परिवार रहा है बडी जायदाद और कई कामगार आदि-आदि। ये एक लम्बी दास्तान है कि कैसे एक जमीदार के घर मे पैदा हुआ लडका कविता की बात करने लगा,दर्शन पढने लगा और फिर अतंत: मनोविज्ञान की मास्टरी करने लगा जिसकी चर्चा मै कभी फिर करुंगा।

बहरहाल, मुझ पर यह इलजाम है कि मै दोस्तों के बीच की नितांत ही निजी किस्म की बातों को भी अपने इस ब्लाग के माध्यम से सार्वजनिक कर देता हूँ जो सबको नागवार गुजरता है कुछ लोगो का यह भी कहना है कि मै ऐसा इसलिए करता हूँ कि खुद को महान सिद्द कर सकूँ और दूसरो को हीन जबकि मेरी मंशा ऐसी कभी नही रही। मेरे एक पूर्व मित्र नें मेरी कुछ पोस्ट्स पढने के बाद मुझ पर यह आरोप लगाया था कि मै ब्लाग पर भावनात्मक मुज़रा करता हूँ। यें सब मेरी शख्सियत के वें पहलु हैं जिन पर गाहे-बगाहे बातें बनती ही रहती है।

मेरे लिए यह सौभाग्य की बात है कि मुझे समझदार दोस्त मिलें है जिन्हें और किसी बात की फिक्र हो न हो लेकिन मेरी छवि की बडी परवाह रहती है। यहाँ एक और अभिन्न मित्र का जिक्र याद आ रहा है जिनके हिसाब से मेरे मित्र बनने की हैसियत किसी मेरे परिचित के पास नही है उनका आशय मानसिक हैसियत से था उनका मानना रहा है कि लोग मेरे प्रशंसक हो सकतें है मित्र नही वें भी मेरी ऐसे ही मित्र टर्न प्रशंसक बन गये हैं।

कुछ ऐसे भी चेहरे है जिनसे मेरा वास्ता तकरीबन मेरे होश मे जीने के बराबर से ही रहा है हम लोग साथ ही मन्जिल के लिए निकले थे....उनमें कुछ ने अपनी मंजिल पा ली है कुछ ने मंजिल का पता बदल दिया और कुछ रास्तें मे ही खो गये हैं। मै अभी तक मुसाफिर ही हूँ मंजिल क्या है इसका न मुझे पता था है न है और न ही निकट भविष्य मे होने वाला है। मेरे अन्दर इतने सारे ख्याल,वजूद ,ख्वाब सिमटे हुएं है कि पता नही कौन सा मेरा अपना निकलेगा।

दिल वालो की सोहबत ढूंडता हुआ मै अपने घर से बहुत दूर निकल आया हूँ यह एक ऐसा सफर है जिसमे मीलों नंगे पांव चलने के बाद भी रास्तें मे सुस्तानें के लिए कोई ठौर-ठिकाना नज़र नही आता है। अपनी कमजोरियों के साथ जो भी मुझसे गल्तियां हुई है उन सबका अफसोस मुझे जरुर है लेकिन सबसे ज्यादा अफसोस बस इस बात का है कि जिस तरह का लहू मेरी नसों मे दौड रहा है जो हकबात और ज़ज्बात का मुफीद है उसके जैसे कदावर लोगो से अभी मुलाकात नही हो पाई है। अपने देहात मे एक कहावत प्रचलित है कि जिसकी भी पूंछ उठाई वही मादा निकला बस ऐसी ही कुछ-कुछ हालत से मेरा वास्ता पडा है। मुझे पता है यह बात जानकर कुछ मेरे अज़िजों को बदहज़मी हो सकती है उन्हे अपने वजूद पर भी सवालिया निशान नज़र आयें लेकिन यह अपने जीवन की वो सच्चाई है जिसे मै रोज़ाना महसूस करता हूँ।

मै यह स्वीकार करता हूँ कि मै मित्रों की निज़ता का हनन किया है अपनी निजता का तो कोई अर्थ ही नही है क्योंकि मै जब तक विरेचित न हो जाउं मुझे चैन नही आता है अब यें सब दूनियादारी के किस्से है जो ज़िन्दगी से जुडे हुए सो किरदार के रुप मे किसी न किसी का जिक्र होने लाजिमी ही है ऐसे में अगर कुछ बातें ऐसी लिखी गई हो जिससे किसी को असहज़ लगा हो या अपनी निज़ता का हनन लगा हो तो मेरे पास क्षमा याचना के भी शब्द नही है बस अपनी बात जनाब वसीम बरेलवी साहब के शेर के माध्यम से कहना चाहूंगा...अर्ज़ किया है:

मेरे शेरों को तेरी दूनिया में

मेरे दिल का गुबार लाया है

मेरे शेरों गौर से मत सुन

उनमें तेरा भी जिक्र आया है।

फिर भी मै यही कहूंगा कि सायास किसी को अपमानित,हीन या क्रुर सिद्द करने के लिए मैने कभी नही लिखा जैसा भी महसूस किया ठीक वैसा लिखा बिना किसी लाग-लपेट के और शायद यही मेरी मौलिकता है।

अपने दौर के बेहतरीन लोगो के बीच वक्त बितानें के बावजूद भी कुछ सवालात ऐसे है जिनका कोई जवाब किसी के पास नही है,मुझे अब किसी से कोई शिकवा-शिकायत भी नही पहले कई दिन परेशान रहता था खुद को कोसता रहता था लेकिन अब थोडी देर के लिए मलाल होता है ज़ज्बातों का एक ज्वार भाटा आता है और उतर जाता है और जिन्दगी अपनी धुन मे अपनी गति से फिर से चलने लगती है।

अब विश्राम लेता हूँ वसीम बरेलवी साहब के इस उम्दा ख्याल के साथ जो शायद मेरे तज़रबे की एक कतरन हैं....।

किसी को मीर कहतें हैं किसी के साथ चलतें हैं

पढे लिक्खों का अपना ही कोई चेहरा नही होता

मगर ये मैले कपडों मे सीधे सादे अनपढ लोग
उन्हें पहचानने में कोई भी धोखा नही होता....।
॥आमीन॥
डा.अजीत

Saturday, March 5, 2011

दीक्षांत समारोह के बहानें

आज हमारे विश्वविद्यालय में 111 वां दीक्षांत समारोह था।लोकसभा अध्यक्ष डा.मीरा कुमार मुख्य अतिथि थी साथ दिल्ली विधान सभा अध्यक्ष डा.योगानंद शास्त्री विशिष्ट अतिथि थें। गत शैक्षणिक सत्र के पीएचडी,पोस्ट ग्रेजुएट्स तथा ग्रेजुएट्स को उपाधि दी गई भिन्न-भिन्न रंग के गाउन मे छात्र-छात्राएं आज अपनी शिक्षा पूर्ण होने की खुशी मे मस्त नज़र आ रहे थें। मुझे अपना दीक्षांत समारोह याद आ रहा था जब हम तीन अभिन्न मित्रों ने एक साथ अपनी डिग्री प्राप्त की थी जिसमे से हम दो पी.एच.डी थें एक पत्रकारिता मे गोल्ड मैडल प्राप्त करने वाले उपाधिपत्र धारक। हमने अपने-अपने गुरुजनों के साथ भी एक-एक फोटो खिचवाया था ठीक आज ऐसा ही नज़ारा था गुरुकुल के आचार्यगण(प्रोफेसर) अपने प्रिय विद्यार्थियों के साथ क्लोज़ अप फ्रेम के स्नैपस खिचवातें नज़र आ रहे थे। भले ही गुरुकुल मे कई प्रकार की तकनीकि अव्यवस्थाएं साल भर चलती रहती है लेकिन एक बात यह यहाँ के अकादमिक माहौल को खास बनाती है वह है यहाँ की गुरु-शिष्य परम्परा।शोध करने वाले छात्रों का अपने गुरु के साथ एक ऐसा आत्मीय संबन्ध बन जाता है जो कई अर्थों मे यूनिक किस्म का है। मै यह बात दावे के साथ इसलिए कह सकता है कि मैने अन्य विश्वविद्यालयों मे देखा है कि वहाँ के प्रोफेसर एक खास किस्म की पर्सनल डिस्टैंस बना कर चलते है अपने स्टूडेंट्स सो वहाँ एक औपचारिक रिश्ता होता है ब्रितानी किस्म का।
अब अपनी कुछ बात....मेरी ड्यूटी विश्वविद्यालय के सीनेट हाल की भोजन व्यवस्था मे थीं मै और मेरे एक मित्र डा.अनिल सैनी दोनो वही दिन भर डटे रहें, वैसे तो बडा ही बोझिल किस्म का काम था लेकिन कभी-कभी कुछ काम अनिच्छा से भी करने पडतें है, वक्त काटने के लिए हमने समालोचना-निन्दारस का खुब पान किया साथ ही अपने भविष्य को लेकर अपनी चिंताएं सांझा की। हमारे कोर ग्रुप के वरिष्ठ प्रोफेसर को हमारी ईज़ी गोईंगनेस से तकलीफ भी होती रही वो बार-बार बडबडाकर अपने वरिष्ठ होने और हमारें तदर्थ होने का बोध संज्ञा,सर्वनाम और विशेषणों के माध्यम से कराते रहें जिसका भी हमने लुत्फ ही लिया।
कुल मिलाकर दिन सामान्य रुप से कट गया जैसे रोज़ाना कटता है आज मैने शाम को दूध लेने जाते समय अतीत की स्मृतियों को सायास दफन किया मुझे लगता है कि ये आदत मेरे लिए तकलीफ की बडी वजह बनती जा रही है। वैसे तो परिपक्वता के मामले मे मेरे कुछ मित्रों के हिसाब से मै अभी शिशु ही हूँ इसलिए दूनियादारी का सबक सीख रहा हूँ मैच्योर होने और प्रेक्टिकल होने की कोशिस भी कर रहा हूँ।
गत 28 फरवरी को एक सामूहिक उत्सव का मै भी हिस्सा बना था, कार्यक्रम तो बेहद मज़ेदार किस्म का रहा दो दोस्तों के लिहाज़ से यह एक अविस्मरणीय था लेकिन समापन के बाद कुछ एकाध घटना ऐसी घट गई जिसने मुझे बैचेनी से भर दिया है क्या हुआ था इसकी चर्चा नही करुंगा क्योंकि इससे अनावश्यक निज़ता का हनन हो सकता है। बस सांकेतिक रुप से यही कहूंगा कि जो भी हुआ मुझे कतई अच्छा नही लगा। मुझे अपनी छवि की कोई खास परवाह नही है लेकिन पता नही कैसा बुरा वक्त चल रहा है मै करता हूँ अच्छा और अंत मे मुझे मिलती है बुराई ही है। खैर!अधिकार,स्नेह,छवि,अपनापन,मित्र,परिवार,सम्बन्ध,परिपक्वता,मैच्योरटी इन सभी शब्दों के इर्द-गिर्द अपने वजूद को तलाश रहा हूँ। उस रात की एक घटना को सोचकर अभी भी भयभीत हो जाता हूँ साथ भी आत्मप्रवंचना,ग्लानि जैसे भावों से भी भर जाता हूँ।
पिछले कुछ दिनों से आवारा की डायरी पर नियमित लेखन नही हो रहा है जिसका मुझे भी खेद है। भले ही यह ब्लाग कमेंट्स के मामले मे एक दम निर्धन किस्म का है लेकिन एक वेबसाईट के आंकडों के हिसाब से मेरी कविताओं के ब्लाग शेष फिर जो तीन साल पुराना है से ज्यादा लोकप्रिय है मतलब ज्यादा बार देखा जाता है। यह बात दिल को सुकून देती है।
अभी इतना ही...शेष फिर
डा.अजीत

Thursday, February 24, 2011

स्वामी रामदेव: दर्शन से नीति का सफर

भारतीय मीडिया और विशेषत: इलेक्ट्रानिक मीडिया अपने बालकीय व्यवहार से कईं बार हैरत मे डाल देता है पिछले कुछ दिनों से स्वामी रामदेव के भ्रष्टाचार और काले धन के विषय मे दिए गये ब्यानों और कांग्रेस के पलटवार को बडे ही चुटीले ढंग से दिखाया जा रहा है। यह वही मीडिया है जिसने स्वामी रामदेव को स्थापित कराने मे एक अभूतपूर्व भूमिका का निर्वहन किया था लेकिन आज जैसे ही उनके ब्यानों और कांग्रेस के पलटवार मे थोडी सी सनसनी दिखाई दी तो मीडिया ने इसे ऐसे प्रचारित किया जैसे उनके पास स्वामी रामदेव की सम्पत्ति की पता नही कौन सी एक्सक्लूसिव जानकारी हाथ लग गई है।

यह बात बहुत से लोग जानते है कि स्वामी रामदेव ने जब योग का प्रचार प्रसार शुरु किया था तब उनके पास इतना बडा तंत्र नही था,आर्य समाज़ की पृष्टभूमि के कारण गुरुकुल मे पढे हुए थें और गुरुकुल शिक्षा पद्दति मे योग शिक्षा का एक अनिवार्य अंग होता है आज भी गुरुकुल के ब्रहमचारी कठिन से कठिन योगासन आसानी से करते हुए देखे जा सकतें है।

इंडिया टूडे के मिसाल-बेमिसाल स्तम्भ मे उदय माहूकर की रिपोर्ट के साथ मीडिया ने उनका हाथ थामा था तब वें गुज़रात मे योग के शिविर लगाया करते थें,उसके बाद उन्होनें फिर कभी मुडकर नही देखा मीडिया ने उन्हें हाथो-हाथ लिया और उनको वह प्रतिष्ठा दिलाई जिससे खासकर हरिद्वार का संत समाज़ अभी तक वंचित था।

देश की बात बहुत बाद की है अभी तक हरिद्वार के अतीत व्यसनी लोग इस बात को हजम नही कर पायें कि कल तक जिस स्वामी रामदेव को वें साईकिल पर घुमता देखते थें वो अब हैलीकाप्टर मे घुमता है और उसके पास दूनिया का अत्याधुनिक आश्रम है। आज भी हरिद्वार में लोग उनके भूत की चर्चा करते पायें जातें है,और इसमे भी कोई दो राय नही है कि उनकी जितनी स्वीकार्यता देश भर में है हरिद्वार मे वें उतने ही सामान्य लिए जातें हैं।

निसंदेह स्वामी रामदेव ने योग के लिए जो कार्य किया है वह प्रशंसनीय है लेकिन इसके साथ उन्होनें व्यवसाय मे अपना हाथ आजमाया है इस बात को भी नकारा नही जा सकता है। आज योग,नैचरोपेथी,आयुर्वेद और हर्बल ट्रीटमेंट के नाम पर उनकी पुडिया मे इतना सामान है जिसको आसानी से बेचा जा सकता है।

देश की राजनीति शोध अध्ययन से नही चलती है शायद स्वामी रामदेव को इस बात का अन्दाज़ा नही था आज वें आकडों की भाषा बोलतें है जबकि इस देश का मतदाता भावनाओं के चक्कर मे वोट करता हैं। बुद्दिजीवी वर्ग पहले से ही एक मानसिक निराशा का शिकार है जिसे पता है कि इस देश मे कोई क्रांति नही हो सकती है। ऐसे मे स्वामी रामदेव की राजनीतिक पुनर्जागरण की बात को मीडिया और बुद्दिजीवी वर्ग मे कभी गंभीरता से नही लिया जबकि स्वामी रामदेव को अपने करोडों की संख्या मे अनुलोम-विलोम और प्राणायाम करते योग साधकों की वोट पावर पर गुमान हो गया है तभी तो वें शेर की तरह से दहाडतें और ललकारतें पाएं जाते हैं लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उनके साधकों को ज्यादा दिलचस्पी अपने आरोग्य मे हैं और वे वोट और राजनीति की बात को उतनी रुचि से नही सुनतें है और योगी के मुख से आध्यात्मिक बातों के साथ अचानक राजनीति की कडवी बातें सुनने की उन्हें कोई ज्यादा चाह भी नही है। यह बस एक शिष्टाचार है,श्रद्दा है और विश्वास है जिसके चलते भीड के समर्थन का गुमान स्वामी रामदेव को होने लगता है,लेकिन इस भीड से उन्हे अप्रत्याशित रुप से वोट के रुप मे देशभक्त लोग मिल जायेंगे ऐसी उम्मीद करनी तो बेमानी ही होगी।

स्वामी रामदेव जिस व्यापक जन आन्दोलन के लिए जमीन तैयार करने की बात करतें है उसके सफल होनें के लिए अभी कई सवाल ऐसे है जिनके तार्किक जवाब खुद स्वामी रामदेव के पास भी नही है। मसलन भारतीय राजनीति का पुनर्जागरण कैसे होगा? भ्रष्टाचार कैसे दूर होगा और इसकी मान्य परिभाषा क्या है? क्या आगामी लोकसभा चुनाव मे भारत स्वाभिमान ट्रस्ट अपनी उम्मीदवार चुनाव मे उतारेगा या किसी राजनीतिक दल का समर्थन करेगा....आदि-आदि।

इस देश की अवाम के मिज़ाज को समझे बिना कोई बडे दावे करना एक प्रकार का अति उत्साह और जल्दबाजी ही है जैसा कि स्वामी रामदेव कर रहें है। सबसे बडी बात यह है कि यदि उनके भक्तों की श्रद्दाभाव को एक तरफ रख कर तटस्थ भाव के साथ स्वामी रामदेव के सेवा प्रकल्प पातंजलि योग पीठ के स्वरुप और कार्य विस्तार को देखा जाए तो जेहन मे कई तीखे सवाल उठतें है।

ऐसे ही कुछ सवालों की बानगी देखिए:

  • स्वामी रामदेव योगी से ज्यादा ब्रांड एम्बेसडर बन गये है, आपके उनके योग शिविर मे पातंजलि आयुर्वेद की औषधियों का प्रचार प्रसार बखुबी देख सकतें है।
  • हमेशा आम आदमी की बात करने वाले स्वामी रामदेव जो अक्सर एक आम आदमी की पीडा को अपनी पीडा बडे गर्व के साथ भी बतातें है उसी आम आदमी के अन्दर इतना मानसिक और सामाजिक साहस नही है कि वो पातंजलि योगपीठ की भव्य ओपीडी मे अपने ईलाज़ के घुस भी सके। बीपीएल तो बेचारा मेन गेट से भी एंट्री नही कर पायेगा। हो सकता है कि सरकारी खाना-पूर्ति के लिए कुछ गरीब लोगों के ईलाज़ का दावा उनका संस्थान करता हो।
  • स्वदेशी आन्दोलन और राजीव दीक्षित के आंकडो के बल पर स्वामी रामदेव स्वराज्य की अवधारणा और ग्रामोद्योग को पुनर्जीवित करने का बीडा उठायें हुए है लेकिन उनके आश्रम मे लगभग एक दर्जन से ज्याद विदेश से दान मे मिली गाडियां है जो उनके विदेशी भक्तों ने दान मे दी और उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण तो खुद मित्सुबिशी की मोंटेरो कार का प्रयोग करते है। ऐसे मे एक जागरुक आदमी को यह बात बडी अखरती है कि देश मे स्वदेशी का ढिंडोरा पीटने वाले स्वामी रामदेव खुद विदेशी कम्पनियों की कारों का प्रयोग करते है और ये विदेशी वाहन उनके आश्रम की शोभा है तो फिर करनी और कथनी मे अंतर क्यो?
  • स्वामी रामदेव के पुराने साथी और तथाकथित रुप साधना के सहयोगी रहे स्वामी कर्मवीर ने उन्हें क्यों छोड दिया जबकि पातंजलि और दिव्य योग मन्दिर के शुरुवाती दिनों के सहयोगी रहे स्वामी कर्मवारी की छवि बडे ही ईमानदार और त्यागी साधक की रही है। स्वामी कर्मवीर का आरोप यह था कि स्वामी रामदेव ने योग का व्यवसायीकरण कर दिया है और आम आदमी तक योग पहूंचाने की उनकी कवायद अब पीछे छूट गई है वें अब मास के नही लिए नही क्लास के लिए उपलब्ध रहतें है। रोचक बात यह भी है कि स्वामी कर्मवीर ने उन्हें तब छोडा जब स्वामी रामदेव का योग कैरियर चरम था ऐसे मे वें निस्वार्थ थें यह बात तो स्पष्ट होती है।
  • स्वामी रामदेव,आचार्य बालकृष्ण और स्वामी कर्मवीर तीनों ने अपने शुरुवाती दिनों मे कनखल,हरिद्वार स्थित दिव्य योग मन्दिर मे आश्रय पाया था तथा यहीं से इन्होनें अपनी योग यात्रा आरम्भ की थी। स्वामी कर्मवीर के संस्थान छोड जाने के बाद दिव्य योग मन्दिर के मालिक और स्वामी रामदेव के गुरु रहे शंकर देव अपना पुराना मन्दिर छोड कर कहाँ चले गये इस बात का पता आजतक नही चल पाया है स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण सार्वजनिक मंचो से यह घोषणा करते रहें है उनके करोडों भक्त उनके गुरु की तलाश करेंगे लेकिन आज तक उनका कुछ पता नही चल पाया है, सुना जाता है इनके गुरु भी इनके कार्यकलापों से खिन्न हो गये थें।
  • योग शिविर के बडे-बडे मंचो से स्वामी रामदेव देश के भ्रष्टाचारी नेताओं के खिलाफ अपने व्यंग्यबाणों से वार करते नज़र आतें है लेकिन शायद यह बात कम ही लोग जानते है कि अपनी राजनीतिक पकड का प्रदर्शन का कोई मौका उन्होनें ने हाथ से नही जाने दिया है पातंजलि योगपीठ के विभिन्न सेवा प्रकल्पों के शिलान्यास या अनावरण समारोह में स्वामी रामदेव नें हर बार दर्जन भर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को हरिद्वार बुलाकर यह सन्देश देना चाहा है कि उनकी पकड कहाँ तक है? एक बार के कार्यक्रम मे तो हरिद्वार के जिला प्रशासन ने भी इतनी बडी वीवीआईपी की फौज के प्रोटोकाल को मेंटेन करने मे अपनी असमर्थता जाहिर कर दी थी। इन बडे नेताओं मे वें चेहरे भी शामिल है जिन पर देश की अदालतों में घोटालों के मुकदमे भी चल रहें है। सिद्दांतो की बात करने वाले स्वामी रामदेव के यहाँ नेताओं की बडी फौज कई बडें सवाल खडे करती है और सन्यासी का उनका राजनीति से अनुराग का भी पता चलता है।
  • यह सच है कि भारतीय राजनीति के पुनर्जागरण के लिए स्वामी रामदेव कठिन परिश्रम कर रहे हैं और उन्होने सुख-सुविधा सब कुछ त्याग दिया है यहाँ तक की अन्न का सेवन भी नही करते है लेकिन उन्होनें अपने चेलो और खासकर कारपोरेट और अभिजात्य चेलो के लिए विलासिता के सभी साधन जुटाए हुए हैं लेकिन फ्री मे नही इसके लिए अच्छा खासा पैसा खर्च करना पडता है। योग ग्राम के नाम से कुटियानुमा आवास से युक्त एक अलग गांव उन्होनें विकसित किया है जहाँ योग,पंचकर्म,आयुर्वेद चिकित्सा के नाम पर अलग-अलग किस्म के पैकेज़ उपलब्ध है यही स्थिति उनके गेस्ट हाउस की भी है। योग ग्राम में उनके विदेशी अतिथि खुब आनंद करते है लेकिन सशुल्क।
  • विदेश से काला धन वापस लाने के लिए स्वामी रामदेव रात दिन अपने योग शिविर के माध्यम से अलख जगा रहे हैं लेकिन खुद स्काटलैंड में दान मे मिले आइसलैंड को योग हेरिटेज़ के रुप मे विकसित कर रहे है जिससे डालर/पाउंड कमाया जा सके इसके अलावा उनके पास ह्युस्टन मे भी दान मे मिली सम्पदा है। विदेशी संस्कृति को भारत के लिए घातक बताने वाले स्वामी रामदेव ने विदेश मे अपने पैर जमाने मे कोई कसर नही छोडी है। पातंजलि यूके और यूएसए के नाम से उनका संगठन काम भी कर रहा है।

....और भी बहुत से विषय है जिनका यहाँ जिक्र नही किया गया है सवाल बस यही उठता है कि देश के भोलेमानस जिस श्रद्दा के साथ स्वामी रामदेव को योग ऋषि और सन्यासी मानकर उनका अनुशीलन कर रहें है उसके हिसाब से स्वामी रामदेव की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वो अपने जीवन मे सिद्दांत,त्याग,शुचिता और पुनर्जागरण जैसे भारी भरकम शब्दों का प्रयोग करने से पहले अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को भी समझें और अध्यात्म के साथ व्यवसाय को जोड कर आम आदमी से किसी क्रांति की अपेक्षा न करें। भ्रष्टाचार,गरीबी और बेरोज़गारी से जुझता यह भारत देश और इसकी करोडों जनता स्वामी रामदेव की तरफ एक आशा भरी निगाह से देख रही है ऐसे आप ब्यानबाजी और विवादों के चक्कर मे न पडते हुए कुछ सार्थक कार्य करना चाहिए तथा जो उन्होनें लोगो को स्वप्न दिखाया है उसी दिशा मे सोचना और कर्म करना चाहिए तभी उनका और देश का भला हो सकता है अन्यथा उत्थान और पतन की कहानियों से इस देश का इतिहास पटा पडा है और उनके हितचिंतक/प्रशंसक यह कभी नही चाहेंगे कि स्वामी रामदेव कभी इतिहास का विषय बन जाएं....।

डा।अजीत

Thursday, February 17, 2011

इंटरव्यूव

ये तकरीबन 2009 की बात है जब मुझे सुबह-सुबह मेरे एक शुभचिंतक ने फोन पर यह सूचना दी कि जिस पद पर मै तदर्थ काम कर रहा हूँ वह पद विश्वविद्यालय मे स्थाई नियुक्ति के लिए प्रकाशित किया है। निसंदेह मेरे लिए यह एक उत्साह देने वाली खबर थी फिर मैने पुरे मनोबल के साथ इस पद के लिए विधिवत ढंग से आवेदन भी किया,धीरे-धीरे वक्त गुजरता गया इस उम्मीद पर कि जल्दी ही साक्षात्कार आयोजित होंगे और मुझे भी अपनी किस्मत आजमाने का मौका मिलेगा लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने पुरे दो साल बीत जाने पर भी आजतक उन पदों की नियुक्ति के लिए कोई कदम नही उठाया जिससे मुझे खासी निराशा हो रही है।
बीच-बीच एकाध बार अफवाह की शक्ल मे यह सूचना भी मिलती रही कि बस अब अगले महीने साक्षात्कार होने ही वालें है। इसी दौरान यह एक बडा परिवर्तन हुआ कि इस शैक्षणिक सत्र से मेरे विभाग के विभागाध्यक्ष दूसरे प्रोफेसर बन गये हैं मतलब पहले हेड मेरे गुरुजी थे अब उनका टर्म तीन साल बाद ही आयेगा। वर्तमान हेड और मेरे गुरुजी मे छत्तीस का आंकडा रहा है वैचारिक स्तर पर सो यह भी एक मुश्किल हालत रही है मेरे लिए लेकिन जैसे तैसे मै अपने तदर्थ रुप काम करने मे सफल रहा अन्यथा वर्तमान हेड साहब को मेरी शक्ल पसंद नही है।
इस बडी भूमिका लिखने का प्रयोजन यह है कि अब फिर यह खबर छन-छन कर आ रही है कि आगामी मार्च-अप्रैल में विश्वविद्यालय साक्षात्कार की एक श्रृंखला आरम्भ करने जा रहा है जिसमें अपने वाले पद का भी नम्बर आयेगा इस बार खबर कुछ पुष्ट सुत्रों से आ मिली है सो फिर से एक मानसिक हलचल से गुज़र रहा हूँ। जब यह पोस्ट प्रकाशित हुई थी तब मेरे गुरुजी हेड थें तब तो साक्षात्कार हुए नही जिसमें मेरे चयन होने के प्रबल संभावना भी थी और अब जब दूसर खेमे के हेड है तब साक्षात्कार का आयोजन हो रहा है। हालांकि मै बडी शिद्दत से इस दिन का इंतजार कर रहा था क्योंकि अब मै जीवन मे एकतरफा होना चाहता हूँ तदर्थ ज़िन्दगी जीते-जीते चार साल होने को जा रहें है।
बहरहाल, अब देखतें है कि क्या होता है? आपको बताता चलूँ कि फिलवक्त हम विभाग में तीन असि.प्रोफेसर है जो तदर्थ रुप से कार्य कर रहें है और तीनों ही यहाँ स्थाई होने के प्रबल अभिलाषी हैं अब देखतें है कि किसका सितारा चमकता है और कौन गेम से आउट होता है। सबके अपने-अपने समीकरण है और स्थाई होने के अपने-अपने तर्क।
जैसे ही इस संभावित साक्षात्कार की कोई नियत तिथि मेरे संज्ञान मे आती हैं मै फिर से आवारा की डायरी के कुछ पन्ने काले करुंगा सो अब के लिए इतना ही...।
तब तक हो सके तो मेरे लिए दुआ कीजिए....।
डा.अजीत

Wednesday, February 2, 2011

बात तज़रबे की...

वैसे तो मेरे एक करीबी दोस्त के हिसाब से मै कमअक्ला और गैरतज़रबा कार इंसान हूँ जिसे अपनी कीमत का भी नही पता है लेकिन फिर भी मै अपने वजूद के बिनाह पर अब तक जो मुझे ज़िन्दगी ने सिखाया है उसी पर कुछ सुत्र वाक्य या नीति वचन टाईप का कुछ लिखने का मन है सो आज यह पोस्ट लिख रहा हूँ।

मेरी ज़िन्दगी के कडवे मिज़ाज,हमसफर की बेरुखी और दूनियादारी की कम समझ होने के साथ ज़ज्बाती होने की जो सज़ा मुकर्रर की गई है उसी का फलसफा यहाँ हिस्सों मे पेश कर रहा हूँ यह मेरी शाश्वत भटकन का प्रतीक है और अपने जैसे किसी की तलाश का परिणाम भी...। इसे मेरे द्वारा किसी व्यक्ति विशेष का चरित्र चित्रण अथवा व्यक्तिगत अनुभव का सारांश न समझा जाए बल्कि इसका अर्थ अधिक व्यापक एवं सम्रग है...मै ऐसा समझता हूँ....।

अथ कथारम्भे:

  1. दूनिया मे अपने जैसा कोई और भी होगा ऐसा सोचना सबसे बडी मूर्खता है लोग अपने जैसे प्रतीत होतें है लेकिन होता कोई नही।
  2. ऐसे आदमी से सदैव सावधान रहना चाहिए जिसके पास खोने के लिए कुछ भी न हो।
  3. किसी के लिए अपने सपनों के साथ समझौता किसी हालत मे नही करना चाहिए वरना ज़िन्दगी भर एक कसक बनी रहती है।
  4. विश्वास मत करो संदेह करो डेकार्ते यह दर्शन ज्यादा प्रेक्टिकल है जिसे अक्सर भावुक लोग नकार देते है।
  5. अपने अतिरिक्त किसी से भी वफा की उम्मीद करना बेमानी है, सबकी अपनी-अपनी मजबूरी होती हैं।
  6. कच्ची भावुकता और परिपक्व संवेदनशीलता मे फर्क करना जितनी जल्दी सीख सको सीख लेना चाहिए वरना आप अक्सर रोते हुए पाए जाते हैं और हालात आप पर हँसते है।
  7. मित्रता के साथ कभी सामूहिक व्यवसायिक प्रयास की सोचना भी मूर्खता है अंत मे न दोस्ती नसीब होती है और न ही कुछ व्यवसायिक काम सिद्द होता है।
  8. अक्सर लोग आपका ज्ञान आपसे सीखकर आपके सामने ही बडी ही बेशर्मी के साथ बघार सकने की हिम्मत रखते है सो इसके लिए मानसिक रुप से तैयार रहना चाहिए।
  9. आप किसी के लिए सीढी बन सकतें लेकिन मंजिल कभी नही अक्सर लोग एक पायदान का सहारा लेकर उपर चढ जाते हैं और आप जडतापूर्वक यथास्थान खडे हुए रह जातें है।
  10. रंज,मलाल,अपेक्षा और अधिकारबोध ऐसे भारी भरकम शब्दों को समझने की मैंटल फैकल्टी लोगो के पास होती ही नही है।
  11. रिश्तों मे अपनी जवाबदेही अक्सर कम ही लोग समझ पातें है दोषारोपण बेहद आसान है लेकिन किसी की कमजोरियों के साथ उसका साथ निभाना बहुत मुश्किल काम है।
  12. सफलता सम्बन्धों का फेवीकोल है असफल लोग अक्सर एक साथ नही रह पातें है।
  13. अतीत व्यसन से बडा कोई दूसरा व्यसन दूनिया मे हो ही नही सकता यह आपको रोजाना जिन्दा करता है और रोजाना मारता हैं।
  14. दूनिया की सबसे बडी सच्चाई यही है कि आदमी इस भरी दूनिया में नितांत ही अकेला है,सम्बन्धो का हरा-भरा संसार एक शाश्वत भ्रम है।
  15. ....अभी बस इतना ही और भी बहुत सी बातें है लेकिन अगर मै सभी को लिखुंगा तो आपको लगेगा कि महान लोगों की उक्तियाँ टीप रहा हूँ।यह मेरा तज़रबा है अगर आप इससे कुछ सबक ले सकें तो मुझे खुशी होगी लेकिन यह सच है कि मैं आज तक नही ले पाया हूँ। आभार सहित... डा.अजीत

Friday, January 28, 2011

ज़िन्दगी:अजीब पहेली

जिन्दगी इम्तिहान लेती है ये गाना मैने खुब सुना है और अक्सर सुनता भी रहता हूँ लेकिन ये इम्तिहान जानलेवा भी हो सकता है ऐसा अन्दाज़ा नही था। वैसे तो मेरा मन नियतिवादी नही रहा है लेकिन पिछले कुछ सालों के अनुभव ये सोचने और मानने के लिए मजबूर कर रहे है कि सब कुछ पहले से ही तय होता है रंगमंच की तरह हम तो केवल अपने पात्र का अभिनय करते रहतें हैं।

कहने के लिए एक समझदार पत्नि,बच्चा और पैतृक पृष्टभूमि के नाम पर एक जमीदार का नाम और खेती के लिए लगभग 100 बीघा जमीन का मालिक हूँ इसके अलावा अपने विश्वविद्यालय का सबसे कम उम्र का पी.एच.डी.उपाधिधारक रहा हूँ जब से पी.एच.डी. की डिग्री अवार्ड हुई तब से लगातार विश्वविद्यालय मे अध्यापन का कार्य कर रहा हूँ मसलन एक दिन भी बेकारी और बेज़ारी का शिकार नही हुआ हूँ। अपने छात्रों मे लोकप्रिय हूँ और सहकर्मीयों मे सम्मानीय.........लेकिन इन सब भौतिक उपलब्धियों के बावजूद भी बडा बेचैन हूँ....अधूरा हूँ..उदास और बेहद आवारा भी।

मित्रों के नाम पर गिने चुने नाम ज़िन्दगी मे शामिल किए थे वैसे परिचितों की एक बडी भीड है लेकिन शायद वक्त की मार ने मेरे अज़ीज दोस्तों को मुझ से इतना दूर कर दिया है कि कभी कभी मुझे लगने लगता है कि रिश्तें बस एक छलावा भर होतें है वरना दूनिया की सबसे बडी सच्चाई यही है कि आदमी नितांत ही अकेला है।

अतीत मे जीने का चस्का अभी तक नही छूटा है अब तो यह एक लत की तरह से ज़िन्दगी मे शामिल है,कुछ समझदार लोग अक्सर मुझे यह सलाह देते रहतें है कि मुझे वर्तमान मे जीना चाहिए और भविष्य का नियोजन करना चाहिए खासकर अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए लेकिन मै अभी तक इस दूनियादारी के सबक पर अमल नही कर पाया हूँ पता नही क्यों...।

अभी पिछली पोस्ट मे मैने अपने वीतरागी जीवन मे प्रवेश करने की सूचना दी थी...कुछ अर्थों मे यह एक युक्तियुक्त पलायन जैसा था जिसे निर्वासन जैसा समझा जा सकता है।

लेकिन नियति पता नही मुझसे क्या चाहती है जैसे ही मैने यह सोचा भर न कि कोई फैसला लिया था तभी से इस मार्ग मे बाधा आने लगी है जहाँ मैने अपना डेरा जमाने की योजना बनाई थी वहाँ पर तो मेरे जाने से पहले ही कुछ मेरे अपने लोगो के अहम नाग के फने की तरह से फुनफुना के खडे हो गये है और उनकी असुरक्षा मुझे किसी भी रुप मे बर्दाश्त करने की स्थिति मे नही है।

सो अभी मैने वहाँ जाने का विचार त्याग दिया है क्योंकि मै अपनी शांति के लिए किसी और के जीवन मे अशांति,असुरक्षा आदि-आदि नही फैलाना चाहता हूँ। इस पूरी घटना से बस यही सबक मिला है कि भईया! आप जो चाहते है उसे भूल जाओं आपके लिए किसी ने पहले से ही बहुत कुछ सोचा हुआ है आपको तो बस उसके हिसाब से चलना है जिसे आप अपना निर्णय कहते है वो तो किसी और की चाल का एक हिस्सा होता है वो कौन है? ईश्वर,प्रारब्ध या नियति ये मै नही जानता हूँ लेकिन है बडा ही चालाक।

बहरहाल,अभी न किसी संकल्प पर विचार किया जा रहा है और न ही किसी विकल्प पर बस यथास्थिति मे जीते हुई कुछ बीच का रास्ता निकल जाए यही प्रार्थना कर रहा हूँ। वैसे मेरी दुआएं कम ही कबूल होती है इस बार क्या होगा पता नही!!!

॥आमीन॥

डा.अजीत

Wednesday, January 19, 2011

बहुत हुआ विश्राम...अब थोडा सा काम

जब से 2011 शुरु हुआ है तब से अपनी कोई गालबजाई प्रकाशित नही हुई ऐसा नही है कि पिछले कुछ दिनों से मै निर्विचार जी रहा हूँ बल्कि कुछ ज्यादा ही क्रांतिकारी रुप से विचारशील हूँ लेकिन आजकल कुछ लिखने का मन नही होता है आज अनायास ही ये पोस्ट लिख रहा हूँ जब यह ब्लाग लिखना शुरु किया था तब यह खुद से वादा किया था कि मैं यहाँ रोज़ाना कुछ न कुछ जरुर लिखा करुंगा बहुत दिनों तक मैने अपना वादा निभाया लेकिन फिर मेरा हौसला जवाब दे गया। मेरी यह आदत भी रही है कि मै जितनी तत्परता से कोई काम शुरु करता हूँ उससे उतनी ही जल्दी मोहभंग भी हो जाता है। मेरी विस्तार मे जीने की आदत है आपने देखा भी होगा कि जब भी लिखा है तफसील से लिखा है जबकि मेरे एक अभिन्न मित्र के अनुसार ब्लाग की मूल आत्मा संक्षप्तिकरण ही हैं,मै भी उनसे अक्षरश: सहमत हूँ...काहे को लम्बा चिट्ठा लिखना अपना दुखडा रोने से फायदा भी कुछ नही है किसी को इससे कोई फर्क नही पडता कि आप क्या भोग रहें है और न ही जीवन की आपधापी मे किसी के पास इतना वक्त है कि वो आपके विधवा विलाप मे शामिल हो सके।

बहरहाल, ये सब तो अपनी जगह है नया साल बहुत से लोगो के लिए नई उम्मीदें लेकर आया है अपने लिए तो बस कैलेंडर बदल जायेगा...वही पुराने लोग पुराने किस्से...। मेरे लिए 2011 का बस इतना महत्व है कि मै इस साल अपना चोला बदलने की सोच रहा हूँ बदल पाउंगा या नही इसका पता नही लेकिन इरादा है कि इस मास्टरी के लबादे को उतार कर फैंक दूँ और अपने जेहन की बैचेनी खत्म करने के लिए कुछ ऐसा करुँ जिससे बिना मलाल के जी सकूँ यदि यह बदलाव आया तो कई अर्थों मे नया होगा और अप्रत्याशित भी क्योंकि इस बार मै आमूलचूल परिवर्तन के मूड मे हूँ।

एक नई दूनिया...और एक नये जिन्दगी एक पुरानी पहचान के साथ फिर इस तथाकथित बौद्दिक और पढी लिखी दूनिया से मेरा कोई ताल्लुक नही रहेगा और मै अपने डाक्टर(पी.एच.डी.) के विशेषण और इसके औपचारिक शिष्टाचार से भी मुक्ति पा लूंगा साथ उन सभी भद्र शिक्षाविदो,पत्रकारों और पढे लिखे लोगो से भी जिनसे मेरा औपचारिक या आत्मीय किस्म का परिचय है तब मै बिना परिचय और बिना सम्पर्क सुत्र के जीना चाहता हूँ वह भी एकांत मे अपेक्षा रहित...। ओशो कहते है कि भूत मे देखने वाला बुढा होता है और भविष्य बुनने वाला जवान सो मै भी अतीत के कडवे-मीठे अनुभवों को विस्मृत करके जीना चाहता हूँ एक नई ज़िन्दगी जिसमे मेरे अतीत का कोई अंश न हो न मित्र,परिचत के रुप मे और न ही किसी किस्से में...।

इस बदलाव के बाद मै अपने मोबाईल पर उपलब्ध नही रहूंगा और शायद ही ई मेल का भी जवाब दे पाउं अलबत्ता किसी को इसकी जरुरत ही नही पडेगी फिर भी यदि किसी का कोई किसी किस्म का उधार मुझे पर शेष हो चाहे वो मानसिक हो या आर्थिक या किसी और वजह से मुझे तलाशना चाहे या मुझ से सम्पर्क करना चाहे वह मेरे घर के पते पर पत्र के द्वारा मुझ से सम्पर्क कर सकता है मै केवल पत्र के द्वारा ही एक्सेस किया जा सकता हूँ फोन,मोबाईल के लिए माफी चाहूंगा....मैं।

जब मै औपचारिक रुप से यह चोला बदलूंगा उससे पहले एक पोस्ट के माध्यम से सबको सूचित कर दूंगा तभी अपने घर का पता भी दूंगा।

अब अपने मित्र मनोज अनुरागी जी की पुस्तक सन्यास से सन्यास तक के शीर्षक को उधार लेकर कहना चाहूंगा कि मेरी भी यात्रा कुछ ऐसी ही होगी और यदि संभव हुआ तो अपने कुछ संस्मण इस ब्लाग के माध्यम से आपके साथ सांझा करुंगा।

ईश्वर मेरी मदद करें!

डा.अजीत