Sunday, November 10, 2013

मेरे मित्र..... सुनील सत्यम


एक सामंती जमीदार परिवार में जन्म फिर खांटी दबंगई और मदिरा के तांडव और उसके प्रभावों की सामाजिक आंच में तपता हुआ बचपन जीते हुए मै कब लेखन की तरफ मुड गया इसकी मुझे पुख्ता वजह अभी भी याद नही है हाँ शायद मन के अन्दर संवेदनशीलता के बीज प्रारब्ध से ही मिले थे इसलिए हमेशा अपने वय से आगे की जिन्दगी जीता रहा आज भी जी रहा हूँ आज भी सभी मित्र वय में मुझसे बडे है।
बचपन बाहर से जितना अशांत किस्म का रहा है अन्दर से मै उतना ही विलग और एकाकी होता चला जब अनुकूल माहौल न मिला तो अपने एकांत को अपनी दूनिया बना लिया और मेरे एकांत की जडता तोडने तथा मन मे उपजे अपरिपक्व रचनात्मक कौतुहल को आश्रय देने वाले मेरे पहले मित्र बने आज के पीसीएस अधिकारी और मेरे बचपन के मित्र सुनील सत्यम।
ये उन दिनों की बात है जब मै कक्षा सात में पढता था सुनील सत्यम मुझसे पांच साल बडे है वो उस साल इंटरमीडिएट में थे मेरे एक खेल सखा अमनीष कौशिक ने मुझे बताया कि सुनील जी ( संघ परम्परा के होने की वजह से नाम के बाद जी लगना आदत थी) के पास कॉमिक्स का अकूत भंडार है बस मेरा कॉमिक्स पढने का लोभ ही मुझे सुनील सत्यम के दर तक ले गया। सुनील सत्यम के पास अपनी पुस्तकों का ठीक ठाक निजि संग्रह था उन्होने एक वीर सावरकर सांस्कृतिक पुस्ताकालय भी बनाया हुआ था उनसे मैने पहले चाचा चौधरी, बिल्लू,नागराज़ ये सब कॉमिक्स पढे उसके बाद मुझे उनके सत्संग का चस्का लग गया वो उन दिनों बीमार थे और बैड रेस्ट पर थे सुनील सत्यम को पहली बार डंकल प्रस्ताव के विरोध मनमोहन सिंह का हाथ में कटोरा लिए (आर्थिक उदारीकरण) कार्टून बनाते देखा बस तभी उनकी रचनात्मकता को मन ही मन आदर्श मान लिया और खुद को उनका प्रशिक्षु आज मै जो भी कुछ लिख लेता हूँ जिसकी आप सब तारीफ कर देते है उस लेखकीय वृत्ति के पीछे सुनील सत्यम की प्रेरणा रही है यह बात मै आजीवन भी सार्वजनिक रुप से स्वीकार करने में कोई संकोच नही करुंगा।
हम दोनों में निकटता बेहद तेज गति से विकसित हुई फिर अपने घर के अलावा मेरा ठिकाना सुनील सत्यम की दहलीज़ ही हुआ करता था। हमारी यह अडडेबाजी धीरे-धीरे रचनात्मक रुप लेने लगी थी फिर हमने तमाम बाल प्रयास किए यथा युवा स्वत्ंत्र लेखक विकास मंच, जन उत्थान समिति आदि बनाना।
मै कक्षा आठ में था जब मेरा लिखा पहला सम्पादक के नाम पत्र प्रकाशित हुआ उससे पहले एक साल तक मै लगातार पोस्टकार्ड पर पत्र लिख कर भेजता रहा लेकिन नही छपे वजह एक तो वैचारिक अपरिपक्वता दूसरा बिना लाईन के लिखने का अभ्यास भी नही थी और हस्तलेख भी कोई खास नही था।
एक बार छपने के बाद छपास रोग लग जाता है फिर दिल करता है कि मै रोज अखबारों में छपूँ मै भी इसी फिराक में था इसलिए मै अपने सम्पादक के नाम लिखे पत्र सत्यम भाई को दिखाया करता था वो उसमे वर्तनी की गलती सुधारते थे ( मै उस वक्त भी वर्तनी की खूब गलतियां करता था जैसा आज भी करता हूँ) और कई बार अपने सुन्दर हस्तलेख में भी लिख कर भेजते थे। लेखन के मामलें सुनील सत्यम मेरे वरिष्ठ रहे है और उन्होने मेरे अन्दर बौद्धिक जिज्ञासा के बीज रोपित किए इसके लिए मै उनके प्रति आजीवन कृतज्ञ रहूंगा। विचारधारा,चेतना और सम्वेदना की सबकी अपनी-अपनी यात्रा होती है जो व्यक्ति का खुद का चयन होता है यह बात सच है कि मै बचपन में संघ की वैचारिकी से निकला और एक खास दौर तक कट्टर हिन्दूवादी भी रहा हूँ लेकिन बाद में जब सही-गलत विचार विश्लेषण की क्षमता विकसित हुई तब मेरा मार्ग सत्यम भाई की वैचारिकी से अलग हो गया। हमारी मित्रता में एक बात जो खास रही वह यह थी कि भले ही साल में एकाध बार ही संवाद होता हो लेकिन हम जब भी एक दूसरे मिलें तो तब-तब हम एक दूसरे शिद्दत से मिलें।
सिविल सेवा की तैयारी के सिलसिले में सुनील सत्यम दिल्ली चले गए और मै अपने गांव में ही रह गया लेकिन पत्राचार के जरिए भी हम एक दूसरे से जुडे रहे यदा-कदा मुलाकात भी हो जाया करती थी। ग्रेजुएशन के बाद मै पीजी के लिए हरिद्वार आ गया और फिर यही पीएचडी और तदर्थ नौकरी में लग गया।
एक वक्त ऐसा भी आया जब मेरी और सुनील सत्यम का साल-साल भर बात न होती थी लेकिन फिर सखा भाव हमेशा बना रहा इधर मै अपनी अलग दूनिया में सीखने समझने की धारा से गुजर रहा था। एक रोचक बात और जो बताना चाहता हूँ कक्षा आठ की वार्षिक परीक्षा में मेरे थोडे नम्बर कम आ गये थे मेरे पिताजी को उनके एक मित्र ने भडका दिया कि यह इस पत्रकारिता के भूत और सुनील सत्यम की संगत की वजह से हो रहा है वो साल मेरे जीवन के दुरुहतम वर्षों में से एक था घर,परिवार यहाँ तक भाई-बहन सभी के सहयोग के मोर्चे पर मै नितांत ही अकेला पड गया था मुझे पर चौतरफा वार हो रहे थे यहाँ तक सुनील सत्यम को भी मेरे से अलग बैठाकर मेरे उज्ज्वल भविष्य की दुहाई देकर मुझसे एक सुरक्षित दूरी बनाने की सलाह दी जा रही थी हालांकि हम दोनों के संज्ञान में यह सब था लेकिन हमनें कभी पारस्परिक इस बात की चर्चा नही की यह तो आज मैने लिख दिया है।
लेखन,पत्रकारिता मेरी पारिवारिक पृष्टभूमि के लिहाज़ से भी सम्मानित कर्म नही समझा जाता था देहात के क्षेत्रों में पत्रकारिता का श्रमजीवी स्वरुप न होना मेरे लिए बडा भारी साबित हुआ और मुझ पर लेखन कर्म तत्काल छोडने दबाव बना दिया था कुछ दिनों तक अपने बौने भावनात्मक तर्कों से लडने के बाद आखिर पिताजी के अहंकार के समक्ष मैने हथियार डाल दिए और मन ही मन संकल्प लिया कि अब कक्षा 12 तक मै कलम नही उठाऊंगा और यह सच है कि मैने चार साल तक एक अक्षर नही लिखा।
मेरे लेखकीय कर्म पर जहाँ परिजनों को प्रसन्न होना चाहिए था वही उन्हे वह मेरे व्यक्तित्व का विकार नजर आने लगा था उन्हे लगा कि लडका पढाई मे पिछड जाएगा इसलिए मुझसे लिखना बलात छुडवा दिया गया....मेरे लिए यह सब एक बडा मानसिक सदमा था।
सुनील सत्यम की एक खासियत यह भी रही कि उन्होने मेरे क्रमिक बौद्धिक विकास को हमेशा से सहज स्वीकृति और सकारात्मक दृष्टि से लिया और मुझे कभी अपना ‘चेला’ नही समझा सामान्यत: लोग उन लोगो की प्रगति या बौद्धिक रुपांतरण को सहज रुप से स्वीकार नही कर पाते है जिन्होने आपसे लिखना-पढना सीखा हो। यही वजह है कि सुनील सत्यम मेरे लिए आज भी उतने ही सम्मानीय और ग्राह्य है जितने कभी बचपन में हुआ करते थे हाँ अब मै अपनी कलंदरी से इतनी आजादी जरुर ले लेता हूँ कि जहाँ मै उनसे असहमत हूँ तो अपनी असहमति उन्हे जता देता हूँ और शायद उनके द्वारा दिए गए लौकतांत्रिक स्पेस की वजह से ही यह सम्भव है उन्होने सदैव मेरा हौसला ही बढाया है इसलिए आज भी जब वो मेरे लिखी किसी चीज़ की तारीफ करते है तो मुझे बडी सच्ची खुशी मिलती है क्योंकि उस वक्त यह लगता है यह तारीफ वो शख्स कर रहा है जिससे मैने कलम पकडना सीखा है....लिखना तो खैर अभी भी नही सीख पाया हूँ।

(वर्तमान डॉ अजीत की निर्माण प्रक्रिया के हिस्सेदार रहे ऐसे मित्र के प्रति कृतज्ञता भाव के रुप में यह पोस्ट समर्पित है)

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