Sunday, May 12, 2013

आवारा की डायरी से आपबीती तक



जब यह ब्लॉग लिखना आरम्भ किया था तब ऐसे ही ब्लॉग का नाम आवारा की डायरी रख दिया गया था क्योंकि इसमे मेरे निजि अनुभव संस्मरण की शैली में लिखने का मन था लेकिन डायरी शब्द के साथ नियमितता का बहुत ही बडा बंधन जुडा हुआ है जब तक मै फेसबुक पर अति सक्रिय नही था तब तक इस ऑनलाईन डायरी पर नियमित लिखा करता था ब्लॉग लगभग रोज़ ही अपडेट हो जाया करता था लेकिन जैसे-जैसे मै फेसबुक का एडिक्ट होता गया उसके बाद ब्लॉग पर लिखना प्राय: यदा-कदा ही होने लगा था सारी ऊर्जा फेसबुक ही खींच लेती थी वहाँ गप्पबाजी के बाद और कुछ कहने लिखने के लिए बचता ही नही था बीच-बीच में कई बार फेसबुक से ब्रेक लेने का प्रपंच भी किया लेकिन कुछ दिन फिर से उन्ही गलियों में भटकने पहूंच जाता था जीवंत संवाद और थोडी लोकप्रियता का चस्का था ही ऐसा कि बार बार फेसबुक पर फिर से सक्रिय हो जाता था। अब लगभग एक महीने से फिर से फेसबुक से बाहर हूँ इस बार कोशिस करुंगा कि लम्बे समय तक फेसबुक से बाहर रहूँ।
इसी श्रृंखला में ब्लॉग का नाम भी बदल दिया है अब यह आवारा की डायरी न होकर आपबीती है क्योंकि डायरी पर नियमित लिखना आवश्यक होता लेकिन आपबीती आप जब आपका दिल कहे आप सुना सकते हैं इसलिए मैने इस ब्लॉग का नाम बदल दिया है।
पिछले छ महीनें से कोई खास और उल्लेखनीय घटना तो घटित नही हुई जिसकी किस्सागोई की जा सकें एक खास किस्म की मनस्थिति में जीवन चल रहा है कभी उदास तो कभी फिर से लडाई के लिए के खुद को तैयार करने में वक्त बीत रहा है।
पिछले 4 अप्रैल को गोरखपुर-कुशीनगर की यात्रा हुई यह यात्रा भी अपने एक करीबी मित्र के साथ की गई।
गोरखपुर एक अकादमिक आयोजन था उसमे भाग लेना था लेकिन उससे कंही ज्यादा मेरा स्वार्थ जनपद कुशीनगर के गांव गुरुवलिया जाने का था वहाँ बहुत दिनों से जाने का मन था कार्यक्रम बन और बिगड रहे थें। लगभग दो साल पहले एक बार पहले भी वहाँ जाने के लिए गोरखपुर पहूंच गया था लेकिन फिर किसी वजह से गोरखपुर से ही वापिस आना पडा था।
मेरे एक पूर्व प्रोफेसर नें मुझे एक बार प्रसंगवश बताया कि जनपद देवरिया पूर्वी उत्तर प्रदेश में कोई गांव है और वहाँ पर एक पाठक जी है उनके पास ज्योतिष के दुलर्भ ग्रंथ रावण संहिता की पांडुलिपि हैं। चूंकि मै काफी समय से परामनोविज्ञान और रहस्यजगत की निजि तौर पडताल में लगा हुआ हूँ इसको मेरी निजि गैर अकादमिक किस्म की रिसर्च आप समझ सकते है सो तभी से मेरे दिल में यह जिज्ञासा थी कि मुझे एक बार वहाँ जाना है और पाठक जी से मिलना है लेकिन तब न पता मालूम था और न अन्य कोई जानकारी फिर जैसे-तैसे मैने अपने ऑनलाईन सुत्रों से मदद मांगी और रावण संहिता वाले पाठक जी का पता लगाने की जुग़त मे लग गया भडास नामक ब्लॉग पर इस सन्दर्भ में एक पोस्ट भी लिखी जिसके प्रत्युत्तर में दो लोगों ने मुझे ई मेल भी किया पहले जिस व्यक्ति मुझे रावण संहिता ग्रंथ के स्वामी के बारें मे बताया संयोग से वह गलत था उसने गांव का नाम और जनपद वगैरह तो सही बता दिया लेकिन उसने रावण संहिता के सही जानकार व्यक्ति का नाम न बताकर उसी गांव में रावण संहिता के नाम पर ज्योतिष का धंधा करने वाले एक अन्य पाठक जी के बारें मे जानकारी दी चूंकि मै नया था सो उनकी सूचना की पुष्टि करे बिना ही मैने उनकी बातों को अक्षरश: सच मान लिया और छ्द्म रावण संहिता के जानकार श्री शिव शंकर पाठक जी से मिलनें ग्राम-गुरुवलिया जनपद-कुशीनगर के लिए एक मित्र के साथ रवाना हो लिया था यह बात दो साल पहले की है संक्षेप में बताना चाहूंगा कि उक्त शिव शंकर पाठक जी से हमारी भेंट गोरखपुर मे ही हो गई थी थोडी हडबडी में वह मुलाकात हुई क्योंकि वह सम्भवत: लखनऊ जा रहें थें लेकिन पाठक जी ने हमे यह विश्वास दिलाया कि वही रावण संहिता के जानकार उस वक्त मैने उनसे बातचीत की और प्रक्रिया जानने के लिए अपनी कुंडली और दक्षिणादि भी दिया लेकिन वो सही व्यक्ति नही थे सो उन्होने फलादेश के नाम पर हमें केवल गोली दी और आज तक फलादेश नही भेजा जबकि उन्होनें गोरखपुर में मुझसे और मेरे मित्र से वादा किया था कि वह हमारी कुंडली का विश्लेषण करनें के बाद डाक के द्वारा हमारा फलादेश भेज देंगे...। खैर ! कुछ दिन बाद मुझे एक ई मेल और मिली जिसमे एक दूसरे और असली वाले पाठक जी के बारें में जानकारी दी गई थी जानकारी देने वालें सज्जन थे दैनिक जागरण के राजापाकड संवाददाता श्री धनंजय मिश्र जी तब मुझे पता चला कि पहली वाली यात्रा का श्रम अकारथ ही गया है शिव शंकर पाठक सही बंदा नही था  उसके बाद धनंजय मिश्र जी से फोन पर सम्पर्क हुआ तब उन्होने विस्तार से सब बताया कि श्री कामाख्या प्रकाश पाठक जी असली रावण संहिता के जानकार है। धनंजय मिश्र जी बडी आत्मीयता से मेरी इस मसलें पर मदद की उन्ही के माध्यम से कामाख्या प्रकाश पाठक जी के निजि सचिव दुर्गा से सम्पर्क हो पाया और उनसे मिलने का समय आदि मिल आया। लगभग एक साल से गुरुवलिया जाने का कार्यक्रम बनता रहा और बिगडता रहा लेकिन अंत में गोरखपुर मे एक सेमीनार के सिलसिले में आने का निमंत्रण मिला तो मैने तय कर लिया कि इस बार पक्का असली वालें पाठक जी से मिलकर आना है।
हरिद्वार-गोरखपुर-कसया-गुरुवलिया
हरिद्वार से ट्रेन से रवानगी पकडी मेरे एक जिज्ञासु मित्र भी साथ थे अमूमन हम ऐसी यात्राएं साथ ही करते है एक अच्छी कम्पनी बनी रहती है हमारी सुबह 8 बजे गोरखपुर पहूंच गयें पहले सेमीनार का काम निबटाया उसके बाद अगली सुबह सीधी कुशीनगर (कसया) जाने वाली बस पकड ली कसया एक छोटा कस्बा है कुशीनगर जनपद की एक तहसील है यह कस्बा कुशीनगर से सटा हुआ है मात्र 3 किमी. की दूरी है। कसया से तमकुही रोड जाने वाले बस सीधी गुरुवलिया जाती है गुरुवलिया ऑन रोड बसा हुआ गांव हैं।
कसया में हम तकरीबन 10 बजे के आसपास बस से उतरे सोचा ब्रंच यही करके जाया जाए क्योंकि आगे गांव मे किस प्रकार की व्यवस्था मिलेगी यह कुछ कहा नही जा सकता था।
कसया में बहुत तलाशने पर भी एक अदद स्वच्छ किस्म का भोजनालय नही मिल सका बस स्टैंड पर चाय की दुकान टाईप के कई होटल थें लेकिन अस्वच्छता की भरमार थी भुख लगी थी लेकिन वहाँ का माहौल देखकर खाने का साहस जुटाना मुश्किल हो रहा था एक दिक्कत यह भी थी कि वहाँ अधिकांश होटल मांसाहारी भोजन की सुविधा से युक्त थें और अममून मांसाहारी लोग साफ सफाई को लेकर ज्यादा चैतन्य नही रहते है इसलिए अंडा/मछली हर जगह पर उपलब्ध थी लेकिन शाकाहार के बेहद कम विकल्प थें एक तो हम सांस्कृतिक भिन्नता की वजह से भी खान पान की वस्तुओं के साथ सामंजस्य स्थापित नही कर पा रहे थें दूसरा साफ सफाई भी एक मसला थी खैर ! जैसे तैसे भुख से आंतकित होकर हमने एक चाय की दुकान में  शरण ली मैने समोसा-छोले का आर्डर दिया जबकि मित्र नें स्थानीय डिश लिट्टी-चोखा मंगवाया बाद में खाते समय उनके चेहरे की भाव भंगिमाएं यह बता रही थी कि उन्होनें मेरे समोसे के विकल्प को न अपनाकर बडी भूल की है मै तो अपनी समोसा छोले की प्लेट जैसे-तैसे डकार गया लेकिन मित्र ने अपनी प्लेट आधी खा कर ही छोड दी।
होटल से बाहर निकलकर हमने एक किलो अंगूर और लिए और उन्हें पानी से तर किया उसके बाद गुरुवलिया जाने वाली एक प्राईवेट बस मे बैठ गये आश्चर्यजनक रुप से बस ‘वीडियो कोच’ थी..जिसमे मिथुन चक्रवर्ती की एक्शन फिल्म चल रही थी जो न देखने की इच्छा होते हुए भी देखनी पड रही थी कसया से गुरुवलिया लगभग 20 किमी. है सिंगल रोड है थोडी ठीक तो थोडी टूटी-फूटी किस्म की इसलिए जब गड्ढे आतें तो वीडियोकोच बस की सीडी अटक जाती और फिल्म फिर से शुरु से चलने लगती यह बेहद खीझजनक अनुभव था।
बस ने लगभग पौन घंटे मे गुरुवलिया उतार दिया पाठक जी गुरुवलिया के प्रसिद्ध व्यक्ति है उनको लोग ‘बाबा’ कहते है कसया बस स्टैंड पर भी लोग बाहरी व्यक्ति को जान जाते है कि यह गुरुवलिया बाबा के पास आया है।
बस स्टैंड से सीधा रास्ता (खडंजा) पाठक जी के घर तक जाता है हम दोनो तकरीबन 11 बजे पाठक जी के घर पहूंच गए घर में घुसते समय एकबारगी सन्देह भी हुआ कि कही हम किसी गलत घर में तो नही घुस रहें है क्योंकि वह किसी पंडित जी का मकान न दिखकर किसी बडे काश्तकार का मकान हमें लग रहा था।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हिसाब से वह घर और घेर था घेर मतलब पशु भी वही पर बंधे हुए थे दो मजदूर सरसों को हाथ के पंखे से उडा रहे थे हमने उनसे पूछा कि पाठक जी का मकान यही है क्या है उन्होने कहाँ हाँ ! तब हम आश्वस्त हुए इतनी ही देर में एक भद्र पुरुष आयें हमने उनसे अपना परिचय देते हुए बताया कि हम हरिद्वार से आयें है और हमने दुर्गा (पंडित जी के निजि सचिव) से पहले से समय लिया हुआ है तब उन्होनें कहा कि यहाँ रुकने के लिए केवल कमरे की सुविधा है खाना आपको बाहर खाना पडेगा उन्होने सामने बने कमरों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि इनमें से किसी भी कमरें में आप ठहर सकते हैं बस इतनी बात के बाद वह अपने काम मे लग गये और हम दोनों ने जल्दी से कमरों का जायज़ा लेना शुरु किया। कमरें धूल से अटे पडे हुए थे बिस्तर के नाम पर केवल लकडी के तख्त थे कुछेक पर धान की पुराल पडी हुई थी तथा कुछ पर दरी बिछी हुई थी जिस पर मोटी गर्द की तह जमी हुई थी हमने वहाँ उपलब्ध कमरों में से एक सबसे बेहतर कमरा देखा और उसमे अपना आसन जमा दिया।
उस दिन कुछ भयंकर किस्म की तेज हवा चल रही थी ऊपर से पाठक जी के घेर में सरसों उडाई जा रही थी सो काफी गर्द उड रही थी पाठक जी के बडे भाई ने हमें बाथरुम और शौचालय दिखा दिया था लेकिन बाद मे उसका जायज़ा लेने पर पाया कि वहाँ स्नान और निवृत्ति नही की जा सकती है क्योंकि वहाँ मच्छरों और मकडी के जालों का आतंक था...इसलिए स्नान के लिए बाहर खुले में नल को चुना गया और निवृत्ति के गांव से बाहर खेत जाने के विकल्प को चुना गया अब साहब वहाँ नल तो था लेकिन न बाल्टी न मग ऐसे में स्नान कैसे किया जाए यह सबसे बडी चुनौति थी और रात भर के सफर और बस की यात्रा के बाद स्नान करे बगैर चैन मिलने वाला नही था।
मरता क्या न करता वाली हालात हो गई थी फिर एक अतिवादी कदम उठाया गया हम दोनों मित्रों ने नल के नीचे ही बैठ कर स्नान करने का फैसला किया यह तय हुआ कि जब मै स्नान करुंगा तो मित्र नल चलायेंगे और जब मित्र स्नान करेंगे तब नल मै चलाऊंगा फिर इसी विधि से हमने पारस्परिक एक दूसरे को स्नान करवाया वह भी बिना बाल्टी बिना मग के।
स्नान के बाद हमें भूख भी लग रही थी इसलिए गांव के बाजार का जायज़ा लेने के लिए निकल पडे एक तो धूल भरी आंधी ने जीना मुहाल कर रखा था ऊपर से अंजान जगह मे खानें की समस्या का भी सामना करना पड रहा था सडक के दोनो तरफ छोटा सा बाजार है सारा बाजार देखनें के बाद भी एक भी जगह ऐसी नजर नही आयी जहाँ कुछ खाया जा सके गुरुवलिया गांव मे खाने का कोई होटल नही है बस चाय पानी की छोटी-छोटी दुकान हैं जहाँ ‘हाईजिन’ का बेहद अभाव है फिर गांव में हाईजिनिक फूड की अपेक्षा रखना भी बेमानी ही था। 
मेरे मित्र ने घोषणा कर दी कि वह इस गांव मे कुछ भी नही खायेंगे और वो केवल लिक्विड डाईट ही लेंगे उनकी इस घोषणा ने मेरी और भी बैचेनी बढा थी क्योंकि मै ठहरा छ फुट का दैत्याकार मानव यहाँ बिना भोजन के कैसे गुजारा हो लेकिन सच तो यह है वहाँ के चाय की दुकानों की हालत देखकर मेरी भी हिम्मत नही हो रही थी हालांकि कुछ जगह पकौडियां तली जा रही थी लेकिन मक्खियाँ भी भिन्नभिना रही थी सो मैने भी उनकी हाँ में ही हाँ मिलाई सारा बाजार घूमने के बाद अंत में दस रुपये का एक नमक लगा खीरा लिया ताकि कुछ नमका खाया जाएं और इसी सहारे पानी पिया जा सके लेकिन वो खीरा भी बेहद बेकार थी आधा खा कर ही बीच में फैकना पडा।
भुख से पीडित ऐसे ही चिप्स और फ्रुटी की दो बोतल लेकर फिर अपने कमरे(पाठक जी) के घर लौट आएं और उनसे ही क्षुधा शांत की। थोडी देर सख्त तख्त पर कमर सीधी करनें के बाद हमने तुर्कपट्टी जाने का निर्णय लिया तुर्कपट्टी गुरुवलिया से 8 किमी के आस पास कसया रोड पर एक छोटा सा कस्बा हैं वहाँ गुप्तकालीन सूर्य मन्दिर है सोचा शाम तक वही घूम कर आते है।
यह पोस्ट काफी बडी हो गई है तुर्क पट्टी और गुरुवलिया यात्रा का अन्य विवरण अगली पोस्ट में...।
डॉ.अजीत 

1 comment:

  1. Lo ji aapke sath sath hmne bhi kushinagar ki yatra kr li hai bhaisahab lekin aapne yatra ka anya vivran nhi likha abhi tak,yatra vratant pdhne ka alag hi maja hai ummeed hai aap baki ka vritant bhi jaldi likhenge.

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