Thursday, October 28, 2010

वक्त

आजकल का वक्त बडा ही अजीब किस्म का चल रहा है एक अजीब का अहसास है मानसिक ऊर्जा के मामले मे इतनी बडी हलचल से मै शायद ही कभी गुजरा हूं जितना आजकल महसूस कर रहा हूं। जीवन अपना मायने तलाशने के लिए रोज नए बहाने गढ लेता है लेकिन एक इनर काल कई दिन से आ रही है कि कही तो कुछ गलत चल रहा है अपने साथ। सामूहिकता के चक्कर मे अपने मौलिक हथियार इतने जंग खा जाएंगे ये मैने कभी सपने मे भी नही सोचा था। वैसे तो मै मनोविज्ञान पढाता हूं और कई नैदानिक रुप से मनोरोगियों को परामर्शन देता हूं लेकिन खुद की दवा नही कर पा रहा हूं। मनोव्याधि की भाषा के अगर कहूं तो मेरे व्यवहार के जो लक्षण है वे क्रोनिक डिप्रेशन और एनजाईटी न्यूरोसिस के है पत्नि बार-बार कह भी रह है कि सेल्फ मेडीकेशन के बजाए किसी योग्य साईकेट्रिट को दिखा लूं...। मुझे लगता है कि मर्ज़ मन का है सो क्या किसी डाक्टर के पास जाना जितना मै जानता हूं उसी के हिसाब से दवा ले लेता हूं चूंकि मानसिक व्याधियों की दवा शामक किस्म की होती है इसलिए सारे दिन नींद सी आई रहती है विश्वविद्यालय से घर आता हूं खाना खाता हूं और सो जाता हूं अभी शाम को सो कर उठा हूं रात को फिर एक डोज़ मुझे नींद के आगोश मे ले जाएगी। सेल्फ मेडीकेशन का मुझे भी कोई शौक नही है और न ही मुझे दवा से नींद आना प्रिय है।

लेकिन पिछले दो महीनो से मष्तिक की क्रियाशीलता इतनी बढी हुई है कि अगर रात को बिना दवा के सोना भी चाहूं तो एक के बाद एक इतनी तीव्र गति विचार आने लगते है कि बैचेनी बढ जाती और नींद का कोसो पता नही रहता है। जब मै गांव मे गया था तब मैने मेडिशन का ब्रेक दिया था क्योंकि मै एडिक्शन नही चाहता हूं वहाँ कमोबेश ठीक ठाक ही नींद आई न ज्यादा गहरी न ज्यादा सतही।

हरिद्वार आते ही मेरे कडवा अतीत और नीरस वर्तमान खडा हो जाता है जिससे मेरा भविष्य प्रभावित हो रहा है। एक अजीब से अहसास से भरी ज़िन्दगी जी रहा हूं कभी लगता है अभी बहुत कुछ करना बाकि है तो कभी लगता है कि मै अपने सर्वश्रेष्ट प्रयास करके देख चूका हूं अब वक्त अनुकूल नही है कोई भी प्रयास सार्थक नही होगा ये सब मेरे पिछले दो महीने के भगीरथ प्रयासों की निष्फलता की उपज है,सो अपने आपको वक्त हवाले कर देना चाहिए अब साक्षी भाव से ही जीना बुद्दिमानी है वक्त अपने रास्ते खुद तय कर लेगा।

दरअसल,मै उकता गया हूं कही बहुत दूर जाना चाहता हूं और साथ ही अपने अतीत को भुलाना चाहता हूं जहाँ मैने संवेदनशीलता के चक्कर मे अपनी एक बालकीय छवि बनाई है जिसको सभी अपनी सलाह दे कर बचाना चाहते है।

अब देखते है कि कल क्या होगा? आज का दिन तो यूं ही कट गया बेवजह...।

डा.अजीत

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